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आकांक्षा पारे की कहानी "नीम हकीम"

नव॰ 19, 2017


इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी  में प्रकाशित आंकाक्षा पारे की कहानी 

नीम हकीम

रक्कू भैया का कहा ब्रहृम वाक्य। ऐसे कैसे टाल दें। तीन दिन खद्दर कपड़े से नाक पोंछ-पोंछ कर भले ही बंदर के पिछवाड़े की तरह हो जाए लेकिन मजाल क्या कि तीन दिन से पहले कोई सीतोपलादि का कण भी चाट ले। 




सात्विक कुमार मिश्रा ने बिस्तर पर ही भरपूर अंगड़ाई ली और दोनों हथेलियों को खोल कर सस्वर ‘कराग्रे वसते लक्ष्मी कर मध्ये सरस्वती, कर मूले तू गोविंदम प्रभाते कर दर्शनम्’ का पाठ किया और हथेलियां रगड़ कर आंखों पर लगा लीं। तीन बार यह क्रिया दोहराने के बाद अट्ठाइस साल के सात्विक कुमार ने मुंह खोला और लार से सनी तर्जनी को आंखों में काजल आंजने की तरह फिरा लीं। दोनों आंखों के साथ यह क्रिया दोहराने के बाद उन्होंने एक हाथ की दूरी पर रखा स्टूल पास खींचा और तांबे के जग में रखा पानी गटक गए। गरदन को दाएं-बाएं घुमाने में खुल गई शिखा में गांठ लगाई और सुनहरे कवर में लिपटे अपने मोटो जी 4प्लस की स्क्रीन पर ऊंगलियां घुमाने लगे। अब तक छोटे मिश्रा को गौर से देख रहे उनके बाप बड़े मिश्रा का चेहरा अचानक टेढ़ा हो गया और न चाहते हुए भी वह बोल पड़े, ‘मलेच्छ पहले दातुन तो कर ले फिर इस टुनटुने पर ऊंगलिया फिराना।’ सात्विक कुमार के हाथ में मोबाइल देखते ही उनका रक्तचाप एवरेस्ट छूने लगता है। बड़े मिश्रा सब कुछ सहन कर सकते थे बस मोबाइल पर यह ऊंगली फिराना सहन नहीं कर सकते। इसलिए नहीं कि आम बाप की तरह उन्हें लगता है कि यह नई पीढ़ी को बर्बाद कर सकता है, बल्कि इसलिए कि यही वह डब्बा है जो उन्हें बर्बाद किए दे रहा है। मोबाइल फोन जिसे उनके कुपुत्र (बकौल बड़े मिश्रा के) स्मार्ट फोन कहते हैं ने उनकी सारी स्मार्टनेस छीन ली है। स्मार्टफोन न सिर्फ उनका रोजगार छीन रहा था बल्कि उनका भोकाल भी खत्म किए दे रहा था। वैसे रोजगार जैसा उनके पास कुछ नहीं था पर जो भी था, नामुराद व्हॉट्स ऐप जैसी किसी तुच्छ वस्तु ने उनकी दिनचर्या, आसपास भैया-भैया कह कर घूमते लोगों को छीन लिया था। 

बड़े मिश्रा जी को वे दिन याद आते हैं जब वह न ‘ख्यात’ ज्योतिषी थे न ‘विख्यात’ आयुर्वेद चिकित्सक। वह सिर्फ राकेश कुमार मिश्रा थे जिनके पप्पा जी सरकारी स्कूल में हेड क्लर्क थे और मम्मी जी भक्त प्रहलाद की लेडी वर्जन। यानी धर्मपारायण, घरेलू, सीदी-साधी महिला। मुहल्ले के दूसरे बच्चों की तरह उन्होंने भी दसवीं के बाद गणित लिया था क्योंकि उन दिनों सभी लड़कों का गणित पढ़ना अनिवार्य था। लेकिन जैसे-जैसे वह आगे की कक्षाओं में ग्रेस के साथ आगे बढ़ते गए उन्हें और उनके पप्पा जी को समझ आ गया कि यदि वह अलजेब्रा, टिगनॉमेट्री के चक्कर में ज्यादा दिन फंसे रह गए तो उनके साथ वाले बाप बन जाएंगे और इनसे कॉलेज भी पास न हो सकेगा। इसलिए जब वह बीएससी मैथ्स में दूसरी बार फेल हुए तो पप्पा जी ने उन्हें बीए प्रथम वर्ष में प्रवेश करा दिया। बस यहीं से उनके जीवन ने करवट ली और उन्हें वह ‘टर्निंग पॉइंट’ मिल गया जिसके लिए अच्छे-अच्छे लोग तरस कर रह जाते हैं।




उनका सरकारी कॉलेज बस स्टैंड से ऐन लगा हुआ था और वहां मचलती जवानी के साथ-साथ ऊं हीं कीं तंत्र मंत्र और टोटके और घर का वैद्य जैसी किताबें बिना भेदभाव के बिकती थीं। सबसे पहले उन्होंने एक निरोग धाम खरीदी ताकि उस हष्ट पुष्ट पुस्तक के बीच में रख कर गदराया बदन जैसी किताब छुपा कर पढ़ी जा सके। निरोग धाम पढ़ने से उनके पप्पा जी खुश होते थे और कभी-कभी मां घुटने के दर्द के कुछ उपाय पूछ लिया करती थीं। जब जवानी, मस्ती टाइप का सारा स्टॉक वह पढ़ कर खत्म कर चुके तब एक दिन उन्होंने निरोग धाम पर यूं ही उड़ती सी नजर डाली। उन्हीं दिनों किसी कारणवश उन्हें ‘कमजोरी’ लगने लगी थी। निरोग धाम की सलाह मान कर उन्होंने रोज सात मुनक्के गुनगुने दूध से लेना शुरू कर दिए। अब गदराई...जैसी किताब पढ़े बिना सिर्फ कवर भर देख लेने से वह फिर वही ‘फुर्ती’ महसूस करने लगे थे। इस बीच तंत्र-मंत्र और टोटके से उसी ‘कमजोरी’ के लिए वह इक्कीस शनिवार नीबू के छिलके से बने दीए को शाम को पीपल के नीचे जलाया करते थे। दो उपाय एक साथ कर लेने से ठीक-ठीक पता नहीं चला कि कौन से ‘अटैम्ट’ से सफलता मिली। पर उन्होंने ठान लिया कि आम जनता की ‘सेवा’ में यह जीवन लगा देना है। सभी किताबें खरीदने की न उनकी हैसियत थी न जरूरत इसलिए वह दुकान वाले को कुछ रुपये पकड़ाते और कागज पर ज्यादा से ज्यादा टोटके लिखने की कोशिश करते। बारीक अक्षरों में टोटके लिखने और उसे दोबारा पढ़ने में उन्हें जो महारत हासिल हुई उसका फल उन्हें परीक्षा के दिनों में मिला। बड़े से बड़ा फर्रा वह बिना अटके परीक्षा हॉल में ‘एज इट इज’ उतारने में सफल रहे। नाक में रोज षडबिंदू तेल की पांच बूंदे डालने से उनका सायनस जाता रहा, इससे उनका चित्त शांत रहा और उन्हें पूजा करने का ज्यादा समय मिला। हर गुरुवार को पीले कपड़े में हल्दी की गांठ, चने की दाल, गुड़ और पीली मिठाई मंदिर में रखने से उनका लघु गुरु उच्च का हो गया और वह ऐसे परीक्षा केंद्र के छात्र बने जहां पर्ची को अछूत नहीं माना जाता था। इस तरह पूरणमाशी के चंद्रमा की तरह वह उत्तरोरत्तर प्रगति करते हुए राकेश कुमार मिश्रा से श्री पंडित राकेश कुमार मिश्रा, बीए, एमए, एलएलबी, आयुर्वेद रत्न, वास्तु एवं ज्योतिष सलाहकार भये।

फिर उन पर ‘मैया की कृपा’ हुई और हर मंगलवार उन पर देवी की सवारी आने लगी। वह लोगों की परेशानियां चुटकियों में हल करने लगे लेकिन उनकी असली ‘हॉबी’ अभी भी आयुर्वेद ही थी। पिछले पचास सालों से लेखक, प्रकाशक, आलोचक चिल्ला रहे हैं कि पढ़ने की आदतें कम हुई हैं। यह सच ही होगा क्योंकि अपनी हॉबी के तहत वह जो भी उपाय लोगों को बताते थे वह उन्हीं पत्रिकाओं से होते थे जिनसे पाठकों ने दूरी बना ली थी। राकेश कुमार मिश्रा कब रक्कू भैया में बदल गए यह तभी पता चला जब ‘नोरात्रे’ में सिर पर लाल चुन्नी बांधे, गले में भगवा दुपट्टा ओढ़े जगह-जगह उनके द्वारा समस्त जनता को बधाई देते पोस्टर शहर भर में लग गए। धीरे-धीरे वह प्रसिद्ध होते गए और यह खबर दूसरे मोहल्ले तक भी पहुंच गई कि मंगल को फलां बजे उनको ‘देवी’ आती है। देवी उन्हीं की तरह चतुर सुजान थीं। जब तक उनके घर की जाफरी भीड़ के दबाव से चरमराने न लगती तब तक आती ही नहीं थीं! और तभी तक रुकतीं थीं जब तक कोई ऐसा केस न आ जाए जो पहली बार आया हो। यदि कोई पहली बार आया है और बिना पांच घंटे इंतजार के वह ‘देवी’ से कुछ पूछने की कोशिश करता या करती तो देवी फौरन उड़नछू हो जातीं। थोड़ी देर पहले बल खाता, अंगडाई लेता रक्कू भैया का शरीर तुरंत तार की तरह सीधा हो जाता। वह अपने पीले गंदे दांतों को निपोरकर कहते, ‘देवी चली गई। अब अगले मंगल।’ सामने वाला कुनमुनाता तो आंखें तरेर कर ताकीद करते, ‘देवी हैं, हमाई गुलाम हैं क्या। चली गईं तो हम क्या करें। अगले मंगल चार बजे से आकर लैन में बैठ जाओ तभी दरसन होंगे।’




मंगलवार को उनका जीवन मंगल था ही लेकिन हफ्ते में बाकी दिन भी तो थे। मंगलवार को वह भावनाओं से खेलते थे, बाकी पांच दिन अपने ‘मनोरंजन’ के लिए लोगों की सेहत से खेलने लगे। इसके लिए उन्हें बहुत प्रयास भी नहीं करना पड़े। ज्योतिष और आयुर्वेद का डेडली कॉकटेल बन जाने से जल्द ही वह कोढ़ में खाज मुहावरे में तब्दील हो गए। कई बार मरीज की जान पर बन आती थी। उन दिनों ज्योतिष या देवी भक्त को दोयम कहने का फैशन नहीं था वरना जितने दोयम वह भक्त थे उससे भी दो-चार पायदान नीचे उतर कर आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। कोशिश तो उन्होंने बहुत की कि वह ‘वैद्य जी’ कहलाए जाने लगें लेकिन चमत्कारी भविष्य वक्ता का मुलम्मा उन पर कुछ ज्यादा ही मजबूती से चस्पा था। मंगलवार को वह ‘काम हो जाएगा’ टाइप सांत्वना का इतना ओवरडोज दे देते थे कि बाकी दिन उसका अजीर्ण ठीक करने के लिए कई बार लोगों को ऐसे ही कह देते थे, ‘आंखें पीली दिख रही हैं। पित्त का असर दिख रहा है भाईसाब, लिवर पर बुरा असर डालता है पित्त। देखना कहीं सिरोसिस-इरोसिस का चक्कर न हो।’ ‘जिज्जी, पचास की हो रही हो, वात बढ़ता है इस उमर में, घुटने घिसा जाएंगे। देखना कहीं गठिया बाय न हो जाए।’ सामने वाला सुन कर बस कलकला कर रह जाता था। देवी के भक्त से उलझना आसान है क्या। अपनी आयुर्वेदी के चक्कर में उनके कई दुश्मन हो सकते थे लेकिन मंगलवार उन्हें हर बला से बचाए हुए था। रक्कू भैया की छवि ऐसी बन गई थी कि साक्षात यमराज भी उन्हें देख ले तो भैंसे को यू टर्न लेने को कह दे। घोर सावधानी बरतने के बाद भी यदि रक्कू भैया की नजर पड़ जाए तो समझो बहुत ही बुरे दिन आ गए हैं। बहुत बुरे मतलब जैसे शनि वक्रीय हो जाए, राहू लग्न में घुसा चला आए, केतु पंचम भाव के मंगल पर नजर जमा दें, शुक्र सीधी दृष्ट से सूर्य को देखे वगैरह-वगैरह। हाल चाल, उसमें भी खास तबियत पूछने का पेटेंट सिर्फ उनके पास था। उनके अलावा पूरे मोहल्ले में कोई किसी से तबियत नहीं पूछता था। वही पूछ कर इतना प्रचारित कर देते हैं कि आदमी ढोल पीट कर भी कहे कि उसे फलां परेशानी नहीं है तो कोई यकीन नहीं करता था। जिस जाफरी में मंगलवार को पैर धरने की जगह नहीं होती थी उसी जाफरी में बाकी दिन चूहे कुश्ती खेलते थे। यदि कोई टाइम पास करने के लिए भी उनकी जाफरी में चला जाए तो वह उसे कोई न कोई चूरण की पुड़िया थमा कर पचास रुपये ऐंठ लेते थे। यदि कोई गलती से अपनी मुसीबत बता बैठे तो उनकी हॉबी से ऊपर उनके अंदर का राकेश कुमार मिश्रा एलएलबी जाग जाता था। वात, कफ और पित्त के कारण, दोष और निवारण बता रहे रक्कू भैया अचानक धाराप्रवाह धाराओं की बात करने लगते थे। पुरानी सांस की बीमारी में हरिद्राखंड के साथ सीतोपलादि चाटने की सलाह देने वाले रक्कू भैया चंद्र-शनि की युति को मुसीबतों का कारण बताते हुए तुरंत भैरव मंत्र के एक लाख जाप कर डालने की सलाह दे डालते। बीच में उनका कोई भक्त नाक बहाता पहुंच जाता तो समझो गई भैंस पानी में। ‘ना ना भैया जुकाम में तुरंत दवा नहीं। तीन दिन तो बादी का पानी बहाना ही पड़ेगा। छाती में सीत जमा हो जाएगी और यही सीत जम कर साइनस कर देती है।’ रक्कू भैया का कहा ब्रहृम वाक्य। ऐसे कैसे टाल दें। तीन दिन खद्दर कपड़े से नाक पोंछ-पोंछ कर भले ही बंदर के पिछवाड़े की तरह हो जाए लेकिन मजाल क्या कि तीन दिन से पहले कोई सीतोपलादि का कण भी चाट ले। पेट सख्त तो लवण भास्कर चूर्ण। खांसी ज्यादा तो त्रिभुवन कीर्ति, गला खराब तो, चूसने के लिए चंद्रप्रभावटी। हाथ में फांस चुभ जाए और निकल न रही हो तो गरम दशांग लेप की पुल्टिस। यानी जो परेशानी ले कर जाओ रक्कू भैया के पास सब का इलाज। जनता के मन में संतोष की अंग्रेजी दवा का ‘साइट इफेक्ट’ नहीं होगा। और पैसा? लेंगे वह जरूर पर आगे जोड़ेंगे, ‘अरे, ये तो परमारथ का काम है।’ रक्कू भैया घिसे हुए दांतों से गुटखे को और घिसने का प्रयास करते। जी रक्कू भैया सुपारी खाते हैं। उनके इस ऐब के बारे में किसी ने चर्चा नहीं की। कभी किसी मनुष्य योनि के प्राणी ने ऐसा करने की धृष्टता की थी। फिर क्या था, बेचारा। वाकया तो किसी को याद नहीं लेकिन संवाद कोई नहीं भूला, ‘क्योंकि आयुर्वेद का ज्ञान है हमें (ज्ञान बघारते वक्त वह हमेशा मैं से हम हो जाते हैं) इसलिए लक्षण तुरंत पहचान लेंगे और अपना इलाज कर लेंगे। ऐसी कोई बीमारी नहीं है जिसे ठीक करने की शक्ति आयुर्वेद में नहीं है। चरक ने ऐसी-ऐसी दवा खोज के रखी हैं कि मुर्दे के मुंह में भी डाल दो तो वह जी जाए। अरे ऐसे ही नहीं ऋषि-मुनि वेदों में लिख गए हैं। सुश्रुत ने तो उस युग में ऑपरेशन तक कर दिया था। भारतीय संस्कृति पर गर्व करना ही नहीं आता निर्लज्जों को। आम आदमी तो आसानी से लक्षण पहचान न सकेगा। तब तक कैंसर फैल जाएगा। बाद में बीवी-बच्चे दर-दर की ठोकरें खाएंगे। बच्चे अपराधी भी हो सकते हैं, मकान-जेवर बिक सकते हैं...’ ‘बस-बस। समझ गया। दद्दा।’ सुनने वाले प्राणी ने भयाक्रांत हो कर शास्त्रार्थ में अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी। अलबत्ता उसने गुटखा खाना नहीं छोड़ा बस उनके सामने नहीं खाता था। उस तुच्छ मनुष्य ने तय कर लिया था चाहे जो हो जाए इस सनीच्चर के सामने गुटखे का पैकेट नहीं खोलना है। लेकिन आदमी तो है, क्या-क्या छुपा कर करे। अब केला तो छुपा कर नहीं खाया जा सकता। किसी को केला खाते देख लें रक्कू भैया, ‘इलायची के दो दाने चबाओ इस पर फौरन। वरना पेट पर भारी पड़ेगा।’ कोई गलती से बोल दे, श्रीखंड बन रहा है घर पर। ‘जायफल घिसना उसमें। बिना जायफल के तो जहर है श्रीखंड।’ यानी जो बोलो रक्कू भैया के पास उसका तोड़ हाजिर।

दूसरों का जीवन नरक करते, ज्ञान बांटते हुए राकेश कुमार मिश्रा दो बच्चों के बाप बने। बेटी की शादी कर वह कब के निश्चिंत हो चुके। लेकिन अपने धंधे से प्रेरित हो जिस पुत्र रत्न का नाम सात्विक कुमार मिश्रा रखा गया था उसने उनका जीवन तामसिक कर दिया है। सात्विक कुमार मिश्रा ने अपने पिताश्री का धंधा चौपट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सुबह दुर्गासप्तशति का पाठ कर, बालों में सुगंधित तेल लगाए जब तक बड़े मिश्रा जी अपने ‘ऑफिस’ में पधारते तब तक शानदार डियो लगा कर छोटे मिश्रा जी मोहल्ले के लौंडों को व्हॉट्स ऐप से ज्ञान लेकर बांट चुके होते। बड़े मिश्रा जी के कुछ दोस्त वहां बैठे रहते और मिश्रा जी अपनी ज्ञान पुस्तिका में से कुछ बताने की कोशिश करते तो कोई न कोई टोक देता, ‘सात्विक बाबू इंटरनेट से देख कर पिछले हफ्ते ही बता रहे थे मिश्रा जी।’

‘अजी बहुत देखे ऐसे इंटरनेट वाले। इंटरनेट से क्या होता है जी। और यह सात्विक बाबू क्या होता है। लड़के की तरह है तुम्हारे, सात्विक बोलो।’

लेकिन बोलने वालों जब बाबू का दर्जा दे दिया तो बस दे दिया। मिश्रा जी का माथा ठनका जब उनकी मंगल की दुकानदारी अचानक ठप्प होने लगी। उन्होंने अपने गुप्तचर दौड़ाए। जो पता चला उससे उन्हें गश आ गया। सात्विक बाप से दो हाथ आगे निकल चुके थे। उन्होंने ज्योतिष सलाह के लिए अपना यूट्यूब चैनल बना लिया था जिसके दस हजार सबस्क्राइबर थे। उनके फेसबुक पेज पर रोज हजारों की संख्या में लाइक आते थे और उनके पोस्ट व्हॉट्स ऐप पर घंटे भर के भीतर कई समूहों में तैर रहे होते थे। बड़े मिश्रा जी को बस इतना ही समझ आया कि लड़का मारकेश की तरह उन पर लग गया है। उन्होंने फौरन सात्विक को तलब किया। सात्विक ने सारगर्भित शब्दों में अपनी तकरीर पेश की, ‘पापा जी नया जमाना है। अब लोग घिसे-पिटे फार्मूले नहीं चाहते। पुरानी चीजों पर नया मुलम्मा न चढ़ा हो तो किसी काम की नहीं रहतीं। हाई टेक जमाना है। उसके साथ चलना पड़ता है।’

‘तुम मेरे ग्राहक तोड़ रहे हो।’ बड़े मिश्रा जी कांप रहे हैं।

‘बात तो यहीं खत्म हो गई पप्पा जी। आप उनको ग्राहक समझते हो मैं उन्हें मतदाता की तरह मूल्यवान।’ सात्विक कुमार ने दांत कुरेदते जारी रखा।

‘निर्लज्ज हो तुम। बाप की इज्जत का भी खयाल नहीं।’




‘लो कल्लो बात। ऐसे कैसे नही है। जो बात आप जबान से समझाते हैं वोई हम मोबाइल से समझा देते हैं। कहीं भी बैठ कर ज्ञान ठेल देते हैं। आपकी तरह दस से पांच इंतजार थोड़ी करते हैं। अच्छा गुस्सा छोड़िए पहले ये बताइए कि कल हमने गुप्त नौरात्री पर किए जाने वाले टोटके यूट्यूब पर डाले थे वो आपने देखे कि नई। बहुत जबरा रिस्पांस आ रहा है हमे। आपई की डायरी से लिए थे। इस्से पहले कभी कहीं ऐसा ओरजनल कंटेट था नहीं पप्पा जी!’

‘दूर हो जा मेरी नजरों से नालायक।’

‘अब ये न कह देना कि इससे तो तू पैदा न होता। येई समझा रए हैं पुराने डायलॉग मारोगे तो पुराने ही रह जाओगे डियर डैडी।’

बड़े मिश्रा सब कर के दुख चुके। उन्हीं के नुस्खे उन्हीं के उपाय रोज कोई न कोई उन्हें सुना जात है। सात्विक की सलाह पर मोहल्ले के लौंडों ने खड़े हो कर पानी पीना बंद कर दिया है क्योंकि खड़े होकर पानी पीने से घुटनों के दर्द को दुनिया का कोई डॉक्टर तो क्या डॉक्टर का बाप भी ठीक नहीं कर सकता। डॉक्टर बाप में राकेश कुमार मिश्रा भी शामिल हैं। रक्कू भैया के दोनों तरह के ‘क्लाइंट’ सात्विक की ओर शिफ्ट हो गए हैं। सात्विक कुमार माथे पर गाढ़े लाल कुमकुम का तिलक लगाकर, पैरों में सफेद जूते पहनते हैं और फ्रेंड, गाइड, फिलॉस्फर की भूमिका में रहते हैं। हर हफ्ते जन्मकुंडली के सबसे बड़े शत्रु शनि के उपायों का वीडियो अपलोड करते हैं और प्रति सोमवार निशुल्क ‘नाड़ी परीक्षण कैंप’ का आयोजन करते हैं। सिर्फ नाड़ी छू कर वह पुरानी से पुरानी बीमारी का शर्तिया इलाज करते हैं। उनके व्हॉट्स ऐप नंबर पर कभी भी कब्ज, पेचिश, स्वाइन फ्लू से लेकर गुप्त रोग तक का गुप्त परामर्श लिया जा सकता है। पिता की तरह वह धर्मार्थ नहीं धर्म के लिए काम करते हैं। धर्म के काम में बहुत पैसा है वह जान चुके हैं। हर आने वाले को चैनल सबस्क्राइब और फेसबुक पेज लाइक करने की ताकीद की जाती है। वह गूगल विज्ञापन से भी कमा रहे हैं। पिता को नियमित खर्च देते हैं लेकिन उनके ग्राहकों को तोड़ने में कसर नहीं छोड़ते।

कहानी लिखे जाने तक विश्वस्त सूत्रों से सूचना मिली है, राकेश कुमार मिश्रा ने रेड मी का फोन अपने परिचित से मंगवाया है। व्हॉट्स ऐप सिखाने की शर्तों के साथ। सिखाने पर छोटा सा सितारा अंकित है, जिसका खुलासा होने से रहा।


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