चाँद पर जो दाग हैं...वह पंछियों के ही प्रेम चिह्न हैं — रुचि भल्ला

प्रेम का ज़ख़्म तो वैसे भी सदा गहराता है...हरा रहता है ताउम्र...जैसे रहता है नीम के दरख्त पर झूमते पत्तों का रंग



दूर देस की पाती - 1

— रुचि भल्ला


चैत मास की यह सुबह...आकाश आज निखरा-निखरा सा दिख रहा है...कल शाम की बूँदा-बाँदी ने सूरज के चेहरे को झिलमिलाते आइने सा चमका दिया है...सूरज का यह आइना, हर रोज़ देखना ज़रूरी है, जीवन की आँखों के लिए। छत पर खड़ी मैं सूरज के चेहरे को देखती हूँ। उस जोगी के माथे पर किरणों की गुलाबी रेखाएँ त्रिपुंड सी सजी दिख रही हैं...वह जोगी शिव के प्रेम में धूनी रमाये दिखता है...जोगिया वस्त्रों को पहने ज्योतिषी बन कर बैठ गया है, आकाश के नीले बिछौने पर और अब बैठा खोल रहा है, दिन की बंद मुट्ठी को...हथेली की रेखाओं को देख रहा है कि दिन कैसा बीतेगा आज...दिन की यह मुट्ठी रहस्य की खुली पोटली है सूरज के हाथों में थमी हुई...

चाँद को यह ज्योतिष विद्या नहीं आती...वह तो क्रोशिए का बुना गोल रूमाल है चाँदी के तार का जिसके किनारों पर नीले तारों की बुंदकियाँ लटक रही हैं...। हाँ ! फलटन के आसमान में तारे भी नीले ही होते हैं...। दिन भर का थका सूरज जब पठार पर अपनी ठोड़ी टिका देता है और दिन को विदा देने लगता है, किरणों वाले अपने हाथ हिला कर...सारे तारे चाँद की गुफ़ा से निकल आते हैं और गोधूलि के आसमान का रंग ले लेते हैं अपनी हथेली में कैद करके...

फलटन के आकाश में मैंने नीले तारे देखे हैं...। चाँद की अँगूठी में जड़े नीलम रत्न वाले तारे...। चाँद की यह तारों वाली अंगूठी मैंने आकाश से उधार माँग कर पहन रखी है अपनी उंगली में...। पहना तो मैंने सूरज का गोल कंगन भी है कलाई में...। कौन कहता है कि सूरज को हाथ नहीं लगा सकते...। मैं तो सूरज के गोल जलाशय में सातारा के पंछियों को रोज़ डूबते-उबरते देखती हूँ...। अब यह बात अलग है कि पंछियो ने अपनी चोंच से हर रात चाँद के मस्तक को भी जाकर चूमा है...। चाँद पर जो दाग हैं...वह पंछियों के ही प्रेम चिह्न हैं..। ऐसे दाग जो कभी मिटते नहीं...चाँद पर पड़े गड्ढे वक्त की धूल से भी भरते नहीं...प्रेम का ज़ख़्म तो वैसे भी सदा गहराता है...हरा रहता है ताउम्र...जैसे रहता है नीम के दरख्त पर झूमते पत्तों का रंग...हाँ ! उन पत्तों पर पीली छाँव भी पड़ती है...पर दरअसल वह हरे रंग को हासिल करने की आखिरी सीढ़ी होती है...वही सीढ़ी जो धरती से आकाश की ओर आती-जाती है...जीवन से मृत्यु...मृत्यु से जीवन की ओर...। वह चाँद से पार की दुनिया है...जहाँ जाकर सूरज की गुफ़ा के भीतर से फ़िर लौट आना होता है...। यह आना-जाना...जाना-आना...सूरज और चाँद के दो पहियों पर सवार वह रथ है...जो हमें सैर कराता है इस दुनिया और उस पार की दुनिया की भी...। यह रंग पीले पत्तों पर हरा चढ़ना...हरे का पीला हो जाना होता है...मनुष्य की आँखें ही हर रंग नहीं देखा करतीं...दरख्त के पास भी आँखें होती हैं...सभी मौसमों के रंग वह योगी एक टाँग पर खड़ा होकर देखता रहता है...दरख्त से ज्यादा कौन बड़ा तपस्वी है इस संसार में...जो उसकी छाँव में रात-दिन बैठे , वह तो खुद सिद्धार्थ से बुद्ध हो जाता है...

रुचि भल्ला


दरख्त की जो बात चली...मैं घर की छत पर झुकते नीम के दरख्त की ओर देखने लगी...जितने पत्ते उतने ही फूल खिल आए हैं वहाँ...एक-दूसरे को होड़ देते हुए...इस रस्साकशी के खेल में आम का दरख्त भी पीछे नहीं रहता...अब उसमें भी उतनी ही अमिया हैं जितने पत्ते हैं वहाँ...मार्च का यह मौसम रानी रंग का हो आया है...आम और नीम के दरख्त घर के आँगन में हाथ में हाथ डाले खड़े हैं...एक दूसरे के प्रेम में उनके पत्ते रानी रंग के हुए जाते हैं...यह रंग उन पर आकाश से उतरता चला आ रहा है...

आसमान में बिखरते गुलाबी बादलों के गुच्छे अब ऐसे लग रहे हैं जैसे सूरज के हाथ में बँधी डोर हो गुलाबी गुब्बारों की...मैं आकाश की ओर देखने लगती हूँ...पच्चीस पंछियों का झुंड उड़ा चला जा रहा है दूर चहचहाते हुए...तीन बगूले भी हैं वहाँ ...बीस मिट्ठुओं का झुंड भी...नीलकंठ पंछी ने भी पंखों को खोल कर अपने सभी रंग सौंप दिए हैं आकाश को...बी ईटर ऐसे उड़ रही है जैसे लहराती पतंग हो कोई...सभी पंछी पतंग से उड़ते लग रहे हैं...रंग-बिरंगी उन पतंगों से फलटन का सारा आकाश भर आया है...और उन पतंगों की अदृश्य डोर सूरज के हाथ में थमी हुई दिखती है...

चैत के महीने का आकाश फ़ालसायी होता जा रहा है...पीली चोंच वाली एक चिड़िया भी कहीं से उड़ी चली आ रही है और आकर बैठ गई है नीम के दरख्त पर । मेरे देखते-देखते उसने खोल दी है अपनी पीली चोंच...उसकी चोंच खुलते ही सरगम के स्वर बिखर गए हैं आकाश में। पीली चोंच वाली यह चिड़िया अब चैती गा रही है।...मैं उसे देखती हूँ...याद आने लगते हैं उपेन्द्र नाथ अश्क...याद आती है उनकी लिखी किताब...'पीली चोंच वाली चिड़िया के नाम...' उस याद के साथ फड़फड़ा उठते हैं किताब के पन्ने फलटन की बहती हवा में...पृष्ठ दर पृष्ठ वह किताब खुद पलटती जाती है...और मैं पन्ना-पन्ना उसके पीछे-पीछे...और जा पहुँचती हूँ पीली चिड़िया के साथ उड़ते हुए सातारा के पठार की हद को लाँघते हुए इलाहाबाद शहर में...जहाँ उपेन्द्रनाथ अश्क लिख रहे होते हैं इस पीली चोंच वाली चिड़िया को अपने बगीचे में सेब की फुनगी पर बैठे देखते हुए—

अपनी किस्मत को सराहे या गिला करता रहे ।
जो तेरे तीर-ए-नज़र का कभी घायिल न बने।।


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