बहुरूपिया, संजय कुंदन की कहानी | #Hindi #Kahani #Shabdankan - #Shabdankan
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बहुरूपिया, संजय कुंदन की कहानी | #Hindi #Kahani #Shabdankan

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मैंने चपरासी से कहकर अपने और उसके लिए चाय मंगवाई। चाय पीने के बहाने वह सामने बैठ गया वर्ना मैं तो उससे लेख लेकर उसे तुरंत विदा करने वाला था। हालांकि मुझसे चाय मंगवाना उसकी रणनीति का हिस्सा था, यह मुझे बाद में पता चला। वह पूरी तैयारी के साथ आया था। —बहुरूपिया, संजय कुंदन की कहानी 

सबसे पहले अनुज कुमार का आभार जो उन्होंने 'कथानक' पत्रिका का विशेषांक निकाला. एक संग्रहणीय अंक. उसी 'कथानक' की शुरूआती कहानी पढ़ते हुए, 'बहुरूपिया' ने मोह लिया. विशेष कहानी की शैली, के संवाद और पात्र सबको कहानीकार ने अपने रास्ता स्वयं तय करने और अपना रूप आप धरने, और खुल कर बात कहने का पूरा और बड़ा अवसर दिया है. लेखक संजय कुंदन द्वारा दी गयी इस छूट का गलत फ़ायदा न उठाकर उनसब ने लेखक के इस निर्णय और दृष्टि को सही सिद्ध किया है. कहानी पढ़िए लेकिन एक और बात सुनते जाइये: 'कथानक' में हर एक कहानी की आलोचना भी कहानी के फौरन बाद प्रकाशित है. यह कैसा प्रयोग है इस पर कोई टिप्पणी नहीं देते हुए इस कहानी पर आलोचक, मित्र संजीव कुमार का लेखक से अधिक उम्मीदों को रखना, मुझ पाठक को अधिक समझ नहीं आया. वैसे कहानी के तुरंत बाद अगर उसकी आलोचना प्रकाशित की जाए तो साथ में वैधानिक चेतावनियाँ भी दी जानी चाहिए. अब वो क्या - क्या हों यह आपसब तय कीजिये.


भरत तिवारी

बहुरूपिया, संजय कुंदन की कहानी

बहुरूपिया

— संजय कुंदन

‘जज साहब, पिछले कुछ समय से एक सवाल मुझे लगातार परेशान कर रहा है। मैं आप जैसे काबिल आदमी से इसका जवाब जानना चाहता हूं। आप लोग देश और समाज को दिशा देते हैं। मेरा प्रश्न भी मेरे मुल्क और इसके लोगों से जुड़ा है।’ ‘ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड…।’ सरकारी वकील यह कहकर खड़ा हो गया। मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने चश्मा ऊपर उठाकर वकील की ओर देखा।

वकील ने मुझसे कहा, ‘आप बेकार की बात करके अदालत का वक्त मत बर्बाद कीजिए। आप मुद्दे पर बोलिए। आपका 313 बयान चल रहा है। आपको अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देना है। मुद्दा यह है कि आपने एक मामूली बात पर श्री नंदलाल प्रसाद को जान से मारने की कोशिश क्यों की?’

मैंने मजिस्ट्रेट की ओर देखकर कहा, ‘मेरा सवाल इसी से जुड़ा है।’ मजिस्ट्रेट ने एक हाथ से सरकारी वकील को चुप रहने का और मुझे बोलने का इशारा किया।

मैंने कहा, ‘धन्यवाद सर। एक आम आदमी की यही विडंबना है कि उसकी बात तभी सुनी जाती है जब उससे कोई गुनाह हो जाता है। जब वह कठघरे में खड़ा होता है। हम ऐसा माहौल क्यों नहीं बना पाते कि कोई साधारण आदमी गुनाह करे ही नहीं?’


सरकारी वकील के चेहरे पर ऊब की रेखाएं उभर रही थीं, लेकिन मजिस्ट्रेट साहब के चेहरे से लगा कि उन्हें मेरी बातों में उत्सुकता पैदा हो रही थी। मैने कहा, ‘एक साधारण आदमी ऐसे ही अपराध नहीं करता। अब मेरे जैसा पढ़ा-लिखा, एक शरीफ आदमी अगर यहां कठघरे में आ गया तो इसका मतलब यह है कि सिस्टम में कोई बड़ी गड़बड़ी है।’

‘आप कोई सवाल पूछना चाह रहे थे।’ मजिस्ट्रेट साहब ने अपनी ठुड्डी पर उंगलियां फिराते हुए कहा।

‘मैं पूछना चाहता हूं कि आज हर जगह नकली लोग क्यों दिखाई दे रहे हैं? देखता हूं कि सामने एक संत खड़ा है। पता चलता है कि वह तो कारोबारी है। पूरी दुनिया जिसे विद्वान के रूप में प्रतिष्ठा दे रही है, पता चलता है कि वह महामूर्ख है। लेकिन जो असल विद्वान है, उसे कोई जानता ही नहीं। अधकचरे लोग हर जगह बैठ गए हैं। माफ कीजिएगा, न्यायाधीश की कुर्सी पर भी कुछ ऐसे लोग बैठे हुए हैं, जिनके फैसलों पर आश्चर्य होता है।’

मजिस्ट्रेट साहब के चेहरे का रंग अचानक उड़ गया। सरकारी वकील ने जोर से कहा, ‘मी लॉर्ड, ये केवल टाइम पास कर रहे हैं।’

मजिस्ट्रेट ने उन्हें शांत रहने को कहा और डिफेंस लायर यानी मेरे वकील गुप्ताजी से पूछा, ‘ये बयान दे पाएंगे या नहीं।’

गुप्ताजी ने हल्के से मुस्कराते हुए कहा, ‘मैंने तो कहा ही कि ये मेंटली डिस्टर्ब हैं।’

मैंने उनकी बात काटते हुए कहा, ‘मैं बिल्कुल ठीक हूं।’

सरकारी वकील ने कहा, ‘हां तो फिर आपको इस पर क्या कहना है कि आपने नंदलाल जी पर जानलेवा हमला किया।’

अचानक मेरी तरफ कई आंखें टिक गईं। मैं इस वक्त का कब से इंतजार कर रहा था। मुझे केस की सुनवाई के दौरान अब तक लगता रहा था कि लोग यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि नंदलाल जैसे व्यक्ति पर भला मैं क्यों हमला करूंगा। हालांकि मेरे वकील गुप्ताजी मुझे थोड़ा खिसका हुआ साबित कर मेरी सजा कम करवाने की कोशिश में थे। या फिर मुझे जेल के बजाय अस्पताल भेजने की व्यवस्था चाहते थे । लेकिन मेरी दिलचस्पी नंदलाल की असलियत को सामने लाने में थी। गुप्ताजी केस को इस तरह पेश कर रहे थे जैसे नंदलाल से मेरी निजी दुश्मनी हो। पर मैं यह बताना चाहता था कि नंदलाल समाज के लिए खतरनाक था। लेकिन यही मेरी सबसे बड़ी चुनौती थी। मुझे पूरा शक था कि यहां शायद ही कोई मेरी बात समझेगा। मजिस्ट्रेट भी नहीं। क्योंकि न्यायिक तंत्र से जुडे लोग चीजों को एक खास तरीके से देखने के आदी थे। मेरे मामले को समझने के लिए एक अलग नजरिए की दरकार थी। फिर भी मुझे कोशिश तो करनी ही थी।

नंदलाल…। मेरे सामने उसका चेहरा घूम गया। हाल का चेहरा नहीं, आज से छह-सात साल पहले वाला चेहरा। कौन यकीन करेगा कि एक समय मैं उसके प्रति गहरी सहानुभूति से भरा हुआ था। इसे नौकरी दिलाना और दिल्ली में टिकने लायक बनाना मेरा सबसे बड़ा अजेंडा था। तब मैं एक राष्ट्रीय अखबार में काम करता था और उसमें फीचर देखता था। वह मेरे अखबार में लिखने के सिलसिले में मुझसे मिलने आया था। जब पहली बार मैंने उसे देखा था, तब वह एकदम दीन-हीन लग रहा था। दिसंबर के महीने में भी वह बस एक घिसी हुई जींस और पटरी बाजार से खरीदा एक स्वेटर पहने हुए थे। आंखें लाल और सूजी थीं, और गाल एकदम पिचके हुए।

‘क्या आप मुझे चाय पिला सकते हैं?’ उसके इस सवाल से मैं चौंका था। कोई व्यक्ति पहली ही बार दफ्तर में घुसते ऐसी मांग करे, यह थोड़ी अजीब बात थी। लेकिन यह तो समझ में आ गया कि इस शख्स में गजब का आत्मविश्वास है। और कोई होता तो मुझे गुस्सा आता पर नंदलाल से मैं नाराज नहीं हुआ क्योंकि मुझे इस बात का अहसास था कि यह आदमी कितनी ठंड में आया है।

मैंने चपरासी से कहकर अपने और उसके लिए चाय मंगवाई। चाय पीने के बहाने वह सामने बैठ गया वर्ना मैं तो उससे लेख लेकर उसे तुरंत विदा करने वाला था। हालांकि मुझसे चाय मंगवाना उसकी रणनीति का हिस्सा था, यह मुझे बाद में पता चला। वह पूरी तैयारी के साथ आया था।

अचानक उसने मेरे पिताजी का नाम लेकर पूछा कि आप तो उनके लड़के हैं न?

मैंने हतप्रभ होकर कहा, ‘हां।’ फिर मैंने पूछा कि वह मेरे पिता को कैसे जानता है। उसने बताया कि वह दरअसल मेरे गांव के पड़ोस का है। मेरे पिता उसके गांव जा चुके हैं, जिनसे वह एक बार मिल चुका है। उन्होंने ही उसे मेरे बारे में बताया था।

उसने इस एक निशाने से मुझे चित कर दिया। उसने चाय के लिए कहा था, पर मैंने समोसे भी मंगवाए। वह जिस तरह से समोसे खा रहा था, उसे देखकर मैं अंदर तक भीग गया। मैंने जानना चाहा कि वह यहां तक कैसे..।

जो बात सामने आई, वह यह कि वह एक गरीब परिवार का था। थोड़ी बहुत खेतीबाड़ी थी उसकी। पिता की जल्दी मौत हो गई। किसी तरह मां ने उसे और उसके दो और भाइयों का लालन-पालन किया। चूंकि वह पढ़ने में ठीक था, इसलिए उसे किसी तरह पास के कस्बे में पढ़ने भेजा गया। अब वह नौकरी की तलाश में किसी तरह दिल्ली चला आया था। वैसे वह कई जनांदोलनों में भी शामिल रहा था। चूंकि लिखने-पढ़ने में उसकी गहरी रुचि थी, इसलिए वह पत्रकारिता के क्षेत्र में ही कुछ करना चाहता था। बाकी काम उससे होगा नहीं।

कुल मिलाकर मैं उससे प्रभावित हो गया। मुझे लगा कि मुझे नंदलाल के लिए कुछ करना चाहिए।

मैंने जब उससे पूछा कि वह कहां ठहरा हुआ है, तो उसने मुझे कातर नजरों से देखा। मैंने तुरंत एक निर्णय लिया। मैंने उसे अपने घर चलने के लिए कहा। उन दिनों मैं अकेला ही था। मेरी पत्नी सीमा गर्भवती थी और मायके गई हुई थी। बच्चे का जन्म वहीं होना था, सो नंदलाल को मैं लंबे समय तक घर पर रोक सकता था।

उसे घर पर लाने का एक लाभ तो यह हुआ कि भोजन संबंधी दिक्कत कम हो गई। नंदलाल खाना बनाने में माहिर था। उसने यह काम संभाल लिया। मुझे खाना बनाने वाले की जरूरत थी, और उसे आश्रय की। दोनों की समस्या हल हो गई। लेकिन मेरे लिए बड़ी दुविधा तब पैदा हुई जब मैंने उसका लेख पढ़ा। नंदलाल का लेख महा वाहियात था। भाषा भी चौपट थी और विषय की समझ भी। कहां तो पहली नजर में मैंने उसे जीनियस समझ लिया था, पर यह तो बड़ा मीडियॉकर निकला। बातें तो वह बड़ी-बड़ी कर रहा था। उसका दावा था कि देश की प्रमुख पत्रिकाओं में उसके लेख छप चुके थे। उसने कई नेताओं और बुद्धिजीवियों के नाम इस तरह लिए जैसे उसका इन लोगों के साथ रोज का मिलना और उठना-बैठना रहा हो।

मैंने उसके लेख को ठीक करते-करते एक नया ही लेख लिख दिया। जिस दिन वह छपा, उस दिन नंदलाल बेहद खुश था। उसने कहा, ‘अब मुझे अपने अखबार में नौकरी दिलवा दो।’

मैंने कहा, ‘तुम्हारी जैसी भाषा है, उसे देखकर कहीं तुम्हारी नौकरी नहीं होने वाली।’ उसने हंसकर कहा, ‘देखना, हम इसी लेख के बल पर नौकरी ले लेंगे।’

दूसरे दिन वह एक जाने-माने प्रकाशन संस्थान से अनुवाद का काम ले आया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। वह संस्थान बहुत ठोक-बजाकर काम दिया करता था। मैंने उससे पूछा तो उसने अपने अंदाज में हंसते हुए कहा, ‘अरे तुम्हारे लिखे लेख का कमाल है यह। मैंने यही दिखाकर यह काम ले लिया।’

मुझे थोड़ी राहत हुई कि चलो इसे कुछ काम तो मिला। लेकिन मुश्किल यह थी वह न तो ढंग से अंग्रेजी जानता था, न ही हिन्दी। अनुवाद करते हुए वह हर पंक्ति का मुझसे अर्थ पूछता। मैं झल्लाकर रह जाता लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था।

मेरे घर का सारा काम उसने संभाल लिया था। वह मुझसे भी पहले जाग जाता। बर्तन धोता और चाय नाश्ता तैयार कर मुझे जगाता। मैं आराम से उठता और मुंह हाथ धोकर नाश्ता करता। फिर देर तक अखबार पढ़ता और कुछ लिखता, इस बीच वह खाना भी बना लेता था। मैं खाकर दफ्तर जाता। घर का राशन, सब्जियां वगैरह वही लाता था। कुछ ही दिनों में वह खासा तगड़ा हो गया था। चेहरे पर भी रौनक आ गई थी। बीच-बीच में वह अपने लिए भी यह कहकर पैसे मांगता था कि समय पर लौटा देगा। उसके साथ रहने से मुझे आराम तो था पर मैं सोचता था, ऐसा कब तक चलेगा। सीमा और बच्चे के आने के बाद तो इसे जाना ही होगा।

मैं चाहता था कि जल्द से जल्द उसे कहीं नौकरी दिलवा दूँ। वह मेरे लिए जितना कुछ कर रहा था, उसे देखते हुए मेरा दायित्वबोध और बढ़ रहा था। लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इस अयोग्य व्यक्ति के लिए मैं किसके पास पैरवी करूं। जिस दिन इसकी असलियत उजागर होगी, मेरी भारी बदनामी होगी। यह भी समझ में नहीं आता था कि मैं इसे किस तरह की नौकरी दिलवाऊं। यह पत्रकार बनना चाहता है, पर इसे लिखना आता नहीं, दूसरा और कोई काम इसके बस का था नहीं। पर नंदलाल बेफिक्र रहता था। ऐसा लगता था, जैसे अपने जीवन की नाव की पतवार मेरे हाथों में सौंपकर वह निश्चिंत हो गया हो।

एक दिन जब मैं दफ्तर जा रहा था तो मेरे परिचित दुकानदार ने पूछा,’

घर में सब ठीक है न। आजकल खूब उधार ले रहे हो।’ मैं चौंका क्योंकि मैं तो उधार लेता ही नहीं था। मैंने पूछा, ‘कौन सा उधार?’

उसने कहा, ‘आपका नौकर काफी कुछ उधार ले गया है।’

मैंने टोका, ‘वह मेरा नौकर नहीं, दोस्त है।’

फिर उसने बिल थमाया तो मैं घबरा गया क्योंकि एक महीने में करीब तिगुना खर्च हो गया था। मैंने सामान की लिस्ट देखी तो होश उड़ गए। घी, बेसन जैसी चीजें जरूरत से कई गुना ज्यादा मंगाई गई थीं। मैं समझ गया कि नंदलाल मेरे पीछे खूब माल उड़ा रहा था। लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि जो पैसे मैंने उसे राशन लाने के लिए दिए, उनका क्या किया उसने। मैंने जब उस बारे में सवाल किया तो उसने गोलमोल जवाब दिया। इस तरह मेरा दूसरा भ्रम टूटा। पहले मैंने उसे काफी प्रतिभावान समझा था, पर वह वैसा नहीं निकला। फिर मैंने सोचा था कि वह गांव का सीधी-सादा ईमानदार व्यक्ति होगा। पर नंदलाल यह भी नहीं धा। मुझे अचानक उससे वितृष्णा हो गई।

रात में जब वह लौटा तो देखा कि उसके हाथ में एक काली थैली है। मैंने पूछा, ‘इसमें क्या है।’

उसने कहा, ‘मटन लेकर आया हूं।’ मैं भड़क गया, ‘साले किस खुशी में मटन लाए हो। तुम्हारे बाप का घर है कि जो मन करेगा ले आओगे। एक बार भी मुझसे पूछा नहीं कि मेरा मन क्या है।’

वह सहम गया। फिर थोड़ी देर बाद हिचक-हिचक कर रोने लगा, ‘जो कहना है कह लो। गरीब हूं न। गरीब को तो सब कुछ सहना ही पड़ता है।’

मैंने उसके इस रूप की कल्पना ही नहीं की थी। मैं पश्चाताप से भर उठा। मैंने उससे माफी मांगी और सोने जाने लगा। फिर उसने मुझे कसम देकर खाने के लिए मनाया और कहा कि वह बहुत स्वादिष्ट कलिया बनाने वाला है। मैं उसे जरूर खाऊं। मैंने मटन खाते हुए एक कसम भी खाई कि जल्दी से जल्दी इसकी कहीं व्यवस्था करा दूं और इससे हमेशा के लिए संबंध तोड़ लूं।

मैंने उस दिन से तमाम अखबारों, पत्रिकाओं में अपने परिचितों को फोन मिलाना शुरू कर दिया। मैं रोजगार वाले कॉलम भी देखने लगा। इतनी मेहनत तो मैंने अपनी नौकरी के लिए भी नहीं की थी।

एक दिन संयोग से मेरे एक मित्र ने बताया कि उसके अखबार में जगह खाली हुई है। और वह अपने संपादक से नंदलाल के लिए बात कर सकता है। हां, नंदलाल को टेस्ट देना पड़ेगा। मैंने वहां की परीक्षा के लिए नंदलाल को तैयार करवाया। रोज दफ्तर से आकर मैं एक शिक्षक की तरह उसे ट्यूशन देता था। पर नंदलाल को कुछ भी समझाना आसान नहीं था। वह इस तरह बात करता जैसे वह सब कुछ जानता है। वह यह भी कहता कि अखबारों में प्रतिभा की कद्र करने वाले लोग नहीं हैं। अगर होते तो अब तक नंदलाल कहां से कहां पहुंच चुका होता।

खैर नंदलाल वहां के इंटरव्यू में पास हो गया। मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य था। मैंने उससे कहा,‘अब तुम्हारी नौकरी हो गई है, अब कोई अपने लिए बढ़िया सा कमरा ढूंढ लो। और हां, पहली तनख्वाह मिलते ही मेरे उधार चुकाना मत भूलना।’ लेकिन उसकी नौबत ही नहीं आई। एक हफ्ते बाद ही उसकी नौकरी चली गई। एक बड़ा रहस्योद्घाटन यह हुआ कि नंदलाल तो बीए पास है ही नहीं। उसने मुझसे झूठ बोला था। दरअसल इंटरव्यू पास करने के बाद उससे कहा गया था कि वह काम तो शुरू कर दे लेकिन एक हफ्ते के भीतर उसे सारे डॉक्यूमेंट्स जमा करने होंगे। उसने बीए का रिजल्ट जमा नहीं किया। इस पर एचआर डिपार्टमेंट ने उसकी नियुक्ति रद्द कर दी। लेकिन नंदलाल इस पर भी इस तरह बात कर रहा था, जैसे अखबार की ही गलती हो। वह बार-बार दलील दे रहा था कि अखबार में काम करने के लिए बीए पास करना क्या जरूरी है। मैंने डांटा कि उसने मुझसे झूठ क्यों कहा कि वह बीए है। उसने दयनीय सूरत बना ली और कहने लगा कि वह बीए में पढ़ता तो था, लेकिन परीक्षा की फीस भरने लायक पैसे उसके पास नहीं थे। मैं द्रवित होकर चुप रह गया। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं।

कुछ ही दिनों के बाद मेरे एक परिचित वरिष्ठ लेखक-पत्रकार ने बताया कि वह एक पत्रिका निकालने वाले हैं। उन्हें इसके लिए दौड़-धूप करने वाले एक सहयोगी की जरूरत थी। मुझे लगा कि नंदलाल इसके लिए उपयुक्त है क्योंकि इसके लिए कोई खास डिग्री भी नहीं चाहिए। मैंने उन्हें नंदलाल के बारे में सब कुछ बता दिया और उसे रख लेने का अनुरोध किया। वे मान गए। नंदलाल ने उनके यहां नौकरी शुरू कर दी। मैंने उससे कहा कि अब वह रहने का कहीं और इंतजाम कर ले पर उसने कहा कि इतने कम पैसे में कहां मकान मिलेगा।

आखिरकार उससे मुक्ति तब मिली जब मैं पिता बन गया और सीमा और अपने बेटे को घर ले आया। नंदलाल ने मेरे घर से थोड़ी ही दूर पर एक ग्रामीण इलाके में एक कमरा किराये पर लिया। मैंने सोचा था कि मैं अपने दायित्व से मुक्त हो गया और एक मुसीबत ने मेरा साथ छोड़ दिया, पर यह मेरी गलतफहमी थी।

वह गाहे-बगाहे मेरे घर आता रहता था। कई बार मेरी अनुपस्थिति में भी आता और सीमा से खूब बातें करता। एक दिन उसने मुझे बताया कि वह शादी करने वाला है। मैंने उसे समझाया कि अभी शादी की जिम्मेदारी उसे नहीं लेनी चाहिए क्योंकि अभी उसकी आमदनी पर्याप्त नहीं है। मैंने उसे खुद अपना उदाहरण दिया कि बाप बनने के बाद मेरी ही हालत खस्ता हो गई है। लेकिन उसने कहा कि उसकी मां की तीव्र इच्छा है कि वह शादी करे। और उसकी मां ने गांव में उसकी शादी तय भी कर दी है। मैंने सोचा कि उसे समझाना बेकार है। खैर कुछ दिनों के लिए वह गायब हो गया। इधर मैं अपने परिवार में व्यस्त हो गया। कई महीने बाद वह अपनी पत्नी के साथ लौटा। वह बेहद खुश था। मुझे उन दोनों को देखकर अच्छा लगा। सोचा, चलो बेचारे की जिंदगी में कुछ तो सुख के पल आए। मैंने उसके सुखद भविष्य की कामना की लेकिन अगले ही दिन उस पर पानी पड़ गया। पता चला कि पत्रिका में उसकी जगह किसी और को रख लिया गया है। स्वाभाविक ही था। वह पंद्रह दिन की दिन छुट्टी लेकर गया था और दो महीने बाद लौटा था।

एक बार फिर वह नौकरी दिलाने के लिए मेरा सिर खाने लगा। पैसे मांगने का सिलसिला भी फिर शुरू हो गया। मैं हमेशा सोचता था कि अब इसे अगली बार पैसे नहीं दूंगा, पर वह कुछ ऐसी बात कह देता था कि मैं पिघल जाता। जैसे अब वह अकसर कहने लगा था कि उसकी पत्नी ने दो दिनों से कुछ नहीं खाया है। या उसकी पत्नी की तबीयत बहुत खराब है। यह सुनने के बाद तो इनकार करना कठिन था। अब नंदलाल मेरे अलावा मेरे कुछ दोस्तों से भी उधार मांगने लगा था। इस बीच एक दिन मैंने उससे साफ कह दिया था कि अब मैं उसकी नौकरी के लिए जितना कर सकता था, कर चुका। आगे नहीं कर पाऊंगा।

हालांकि मन ही मन मैं कामना करता था कि उसकी समस्याएं हल हों, उसे कोई ढंग का काम मिल जाए। मुझे उससे ज्यादा उसकी पत्नी की चिंता सताती थी। पर इतने बुरे हाल के बावजूद नंदलाल के चेहरे पर कभी कोई तनाव नहीं दिखता था। वह हमेशा की तरह निश्चिंत रहता था और दुनिया की हर चीज पर एक्सपर्ट कमेंट करता था।

‘नंदलाल जी से आपके संबंध खराब कैसे हो गए?’ मजिस्ट्रेट साहब के इस सवाल पर मैं कुछ कहता इससे पहले सरकारी वकील बोल उठा, ‘आप बहुत लंबा खींच रहे हैं। मूल मुद्दे पर आइए न...।’

मजिस्ट्रेट साहब ने कहा, ‘कोई बात नहीं। अदालत इनकी पूरी बात सुनेगी, चाहे हमें जितनी बार बैठना पड़े।’

‘थैंक्यू सर’, यह कहते हुए मैं थोड़ा भावुक हो गया था। मुझे मजिस्ट्रेट का रुख काफी सकारात्मक लग रहा था। मुझे लग रहा था कि यह शख्स जरूर ईमानदार है और मुझे समझ रहा है।

सरकारी वकील पसीना पोंछ रहा था। उमस से सभी परेशान थे, लेकिन न्यायाधीश महोदय की मेरे मामले में गहरी अभिरुचि मेरे लिए सुखद हवा की तरह थी। मैंने कहा, ‘सर, मैंने नंदलाल से दूरी बनानी शुरू कर दी। वह आता भी तो मैं कोई बहाना बनाकर निकल जाता। कई बार तो मैं घर में होता तो भी उससे बात नहीं करता। एकाध बार उसने पैसे मांगे तो मैंने साफ मना कर दिया। फिर उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया। वह गायब हो गया। मैं बहुत खुश हुआ। मुझे लगा कि मेरा पीछा छूट गया। मैं अपनी जिंदगी की आपाधापी में उसे एक तरह से भूल ही गया। ...लेकिन करीब पांच सालों के बाद वह फिर मेरी जिंदगी में प्रकट हुआ।....सच बताऊं सर यह वह नंदलाल नहीं था, यह कोई और ही नंदलाल था।

क्या संयोग था। पांच साल बाद जब नंदलाल दूसरी बार एक नए अवतार में मेरे जीवन में आया, तब भी दिसंबर का ही महीना था। लेकिन मेरा सामना मजबूर, अभावग्रस्त नंदलाल से नहीं एक सफल और समृद्ध नंदलाल से हो रहा था। मैं अपने दफतर में उसी तरह बैठा हुआ था। तभी रिसेप्शन से फोन आया कि मिस्टर नंदलाल प्रसाद आपसे मिलने आए हैं। मैं कांप उठा। मेरे जेहन में उसकी वही तस्वीर कौंध गई। मुझे लगा कि एक बार फिर वह आकर पैसे मांगेगा या नौकरी दिलाने की मिन्नत करेगा। मैं अजीब ऊहापोह में पड़ गया। फिर सोचा जो होगा देखा जाएगा। मैंने उसे बुलवा लिया।

उसे देखा तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ। वह थ्री पीस सूट पहने हुए था। आंखों पर शानदार चश्मा था, पैरों में महंगे जूते।

आते ही उसने मुझसे हाथ मिलाया। मैंने बैठने का इशारा किया और पूछा, ‘चाय मंगवाऊं?’

नंदलाल ने कहा, ‘बिल्कुल नहीं।...यह बताओ, तुम्हारा काम खत्म होने में कितनी देर है?’

मैंने कहा, ‘बस खत्म ही होने वाला है। चलो घर चलते हैं।’

उसने कहा, ‘नहीं, आज मैं तुम्हें ले चलूंगा। घर पर फोन करके भाभीजी को बोल दो कि देर से आओगे।’

मैं उसे हैरत से देखता रह गया। मैंने फोन पर सीमा को बताया कि मैं देर से आऊंगा। फिर मैं उसके साथ चल पड़ा।

बाहर एक बड़ी कार खड़ी थी। नंदलाल ने गाड़ी खोली और मुझे बैठने का इशारा किया। नंदलाल ठसक के साथ ड्राइविंग सीट पर बैठा। गाडी चल पड़ी।

मुझे महसूस हो रहा था कि मैं नंदलाल नहीं उसके डुप्लीकेट के साथ हूं। मन में कई सवाल भी उठ रहे थे। सोच रहा था कि आखिर यह क्या धंधा करता होगा।

वह मुझे एक फाइव स्टार होटल में ले आया। नंदलाल जिस अंदाज में चल रहा था उससे साफ लग रहा था कि वह यहां अक्सर आता-जाता है। लेकिन मैं सहम रहा था।

वह मुझे बार में ले गया। हम कोने की टेबल पर बैठे। उसने पूछा, ‘क्या पिओगे?’

मैंने कहा, ‘तुम जानते हो मैं पीता नहीं।’


उसने हंसकर कहा, ‘आज तो पीनी पड़ेगी।’ मैंने कुछ सोचकर रेड वाइन के लिए कहा। फिर पीते और खाते हुए उसने पिछले पांच सालों के सफर के बारे में जो बताया, वह काफी दिलचस्प था।

वह अपने एक आदिवासी दोस्त के जरिए एक आदिवासी सांसद से मिला, जिसने नंदलाल को एक बड़ा पत्रकार और बुद्धिजीवी समझा। उसने कहा कि वह आदिवासियों पर केंद्रित एक पत्रिका निकालना चाहता है। उसने नंदलाल को यह जिम्मेदारी सौंप दी। सांसद ने उसे रहने के लिए अपने क्वार्टर में जगह भी दे दी। नंदलाल पत्रिका निकालने लगा। पत्रिका को प्रचुर मात्रा में सरकारी विज्ञापन मिलते थे। इसके लिए सांसद महोदय अपने संपर्क से भी विज्ञापन जुटाते थे जिसमें से काफी कुछ वे खुद भी डकार लेते थे। बकौल नंदलाल सांसद महोदय के साथ रहते-रहते उसके दिमाग में कई बत्तियां एक साथ जल उठीं। नंदलाल ने एक संस्था बनाई जिसका काम था लोगों का नागरिक अभिनंदन करना और उपाधियां बांटना।

हर चीज की फीस थी। अभिनंदन कराने के लिए एक लाख से लेकर दस लाख तक। उपाधि के लिए पचीस हजार से लेकर पचास हजार तक। उसने अजीब-अजीब लोगों का नागरिक अभिनंदन किया और उन्हें महान समाज-सुधारक संत और न जाने क्या-क्या साबित किया। बिल्डर, स्मगलर और बड़े-बड़े माफिया भी पैसे देकर उसकी संस्था की ओर से सम्मानित होते रहे। उसने कई ऐसे लोगों को साहित्य रत्न और साहित्य शिरोमणि जैसी उपाधि दी, जिनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं था। उसने कई पत्रकारों को पत्रकार श्री, पत्रकार भूषण जैसी उपाधियां बांटीं। उसने बताया कि बड़े-बड़े नौकरशाह और भूतपूर्व सांसद और मंत्री तक मंच के लिए लालायित रहते हैं। कोई अध्यक्षता के लिए मर रहा होता है तो कोई सम्मानित होने के लिए।

इस संस्था के जरिए नंदलाल ने राजनीति के गलियारे में जगह बना ली। अब वह लोगों को मंत्रियों और अफसरों से मिलाने का काम करने लगा। वह फीस लेता और किसी को मंत्री या सेक्रेटरी से पांच मिनट के लिए मिलवा लेता। कुछ लोग इसी दौरान अपना काम करवा लेते या कुछ लोग भविष्य के लिए जुगाड़ कर लेते। इसी क्रम में उसने कुछ दूतावासों से संपर्क बना लिए। ‌वह उनके लिए काम करने लगा। कई देश सांस्कृतिक या शैक्षिक आदान-प्रदान के तहत अक्सर छात्रों, बुद्धिजीवियों को अपने यहां बुलाते थे। वे दूतावास वाले नंदलाल को यह जिम्मा दे देते थे कि वह लोगों का चयन करे। नंदलाल पैसे लेकर लोगों का नाम उस सूची में डाल देता था। इसके बदले वह विदेशी लोगों के काम करता था। उन्हें यहां के राजनेताओं से मिलाने के अलावा शॉपिंग कराने और दूसरी कई जिम्मेदारियां उठाता था।

‘जज साहब, नंदलाल की सक्सेस स्टोरी सुनकर मैं हतप्रभ रह गया था। मैंने उसे क्या समझा था, वह क्या निकला। एक पिछड़े राज्य के गांव का एक गरीब लड़का राजधानी की सत्ता के गलियारे में घुसकर उसके सारे दंद-फंद सीख लेगा और दलाली के खेल में शामिल हो जाएगा, इसका मुझे थोड़ा भी अंदाजा न था। खैर, मुझे लगा कि अब वह बड़ा आदमी हो गया है। राजधानी के सबसे सफल और समृद्ध लोगों में शुमार हो गया है तो अब वह मुझसे दूर हो जाएगा, लेकिन उसने मुझे छोड़ा नहीं। वह पहले भी मेरे लिए आफत ही था और अब मेरे जीवन के लिए ग्रह बन गया।’

‘वह कैसे?’

आखिर कैसे? मैं सोचने लगा। कई दृश्य आंखों के आगे मंडराने लगे। दुखद स्मृतियों से गुजरना कितना कष्टकारक होता है।

अब नंदलाल ने पहले की तरह फिर मेरे घर आना-जाना शुरू किया। कई बार मेरी गैर हाजिरी में आकर वह सीमा से मिलता। सीमा उससे गजब प्रभावित हो गई थी। वह अकसर उसकी प्रशंसा करती थी, जो मुझे अच्छी नहीं लगती थी।

एक दिन सीमा ने मुझसे कहा कि मैं क्यों नहीं नंदलाल की मदद से विदेश चला जाता हूं। मैंने कहा कि क्यों जाऊं उस फ्रॉड के जरिए।

सीमा लड़ने पर उतारू थी, ‘तुम उसे फ्रॉड कैसे कह सकते हो।’ मैंने उस समझाया कि वह एक दलाल है। वह पैसे लेकर लोगों को विदेश भेजता है। पैसे लेकर लोगों के काम करवाता है। यह विशुद्ध दलाली है।

सीमा मानने को तैयार नहीं थी। वह उसका पक्ष लेकर बोलने लगी, ‘यह एक रूढ़िवादी सोच है। तुम्हारे जैसे पिछड़े ख्याल के लोग पब्लिक रिलेशन को दलाली कहते हैं। अरे भाई वह लोगों को सर्विस देता है जिसके बदले फीस लेता है। तब तो तुम शेयर में पैसा लगाने को भी जूआ कहोगे।’

मुझे सीमा का यह रूप देखकर आश्चर्य हुआ। मुझे नहीं पता था कि वह इस तरह की महत्वाकांक्षी लड़की है। मैंने कहा, ‘देखना, नंदलाल किसी दिन जेल जाएगा।’

सीमा ने कहा, ‘साफ कहो न कि तुम उससे जलते हो। तुम इतने दिन में कुछ नहीं कर पाए और वह कहां से कहां निकल गया।’

‘क्या नहीं कर पाया मैं। मैं ईमानदारी के साथ रोजी-रोटी कमा रहा हूं, इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए।’ मैं जोर से चीखा और दूसरे कमरे में चला आया।

वैवाहिक जीवन में पहली बार मेरे मन में सीमा को लेकर शक का एक कीड़ा कुलबुलाने लगा। अब मैं उसके फोन पर ध्यान देने लगा था। जब वह बाथरूम में होती तो मैं उसके मोबाइल उठाकर रिसीव्ड और डायल्ड कॉल चेक करता।

एक दिन जब मैं घर लौटा तो सीमा ने बताया कि वह महिला पत्रकारों और साहित्यकारों के एक दल के साथ यूरोप की यात्रा पर जाने वाली है। वह पहले बच्चे को अपने मायके इलाहाबाद छोड़कर आएगी, फिर विदेश यात्रा पर जाएगी। मैंने छूटते ही कहा, ‘फिर लौटकर यहां मत आना।’

सीमा ने चिल्लाकर कहा, ‘मैं नहीं सोचती थी कि तुम इतने दकियानूस आदमी हो। अरे, फ्री में यूरोप जाने का अवसर मिल रहा है, तो इसमें गलत क्या है। तुम तो मुझे हरिद्वार भी नहीं घुमा पाए। चलो इसी बहाने तुम्हारा चेहरा पहचान गई। अब तो वैसे भी मैं नहीं लौटूंगी।’ यह कहकर सीमा बच्चे को लेकर उसी समय निकल गई।

हालांकि सीमा ने पता नहीं क्यों अपना फैसला बदल लिया। वह विदेश नहीं गई, लेकिन वह लौटकर मेरे पास भी नहीं आई। मैंने इलाहाबाद जाकर उसके सामने पश्चाताप किया, रोया लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। उसका कहना था कि वह एक शक्की आदमी के साथ नहीं रह सकती। मैं वापस आ गया।

यहीं से मेरा जीवन अब एक अंधेरी सुरंग में उतरने लगा। गोरखपुर से भइया का फोन आया कि मां की बीमारी बढ़ गई है और उसका दिल्ली में इलाज जरूरी है। उन्होंने मुझसे पहली बार मुंह खोलकर कहा कि मां के इलाज में मुझे भी सहयोग करना चाहिए क्योंकि उनके बच्चे बड़े हो गए हैं और उनका खर्चा बहुत बढ़ गया है। मैं कैसे मना करता। मां का मामला था। भइया मां को लेकर चले आए। लेकिन मेरी जिस नौकरी के बूते मां का इलाज होना तय हुआ, वही छिन गई।

हुआ यह कि मुझे अपने अखबार में फीचर से उठाकर न्यूज में भेज दिया गया था। इस तरह रिपोर्टिंग करने की मेरी बहुत पुरानी इच्छा पूरी हुई। लेकिन मुझे क्या पता था कि सचाई और ईमानदारी के साथ ड्यूटी निभाना मेरे लिए इतना महंगा पड़ेगा।

दरअसल दिल्ली के एक ग्रामीण इलाके में एक बिल्डर ने अपना बैंक्वेंट हॉल बनाने के लिए दलित समुदाय के कुछ लोगों की जमीन हथिया ली थी। गांव के लोग उसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। इस खबर की कवरेज किसी ने नहीं की, सिर्फ मैंने ही इस पर लिखा। मेरी गलती यह मानी गई कि मैंने बिल्डर का नाम लिख दिया। दलील दी गई कि मुझे नाम की जगह सिर्फ ‘एक नामी बिल्डर’ लिखना चाहिए था। मुझे फिर फीचर में वापस भेज दिया गया। यह मेरे लिए बेहद अपमानजनक था। दो कौड़ी का एक बिल्डर एक बड़े अखबार के मामले को इस तरह प्रभावित कर सकता है, यह मेरी सोच से बाहर की चीज थी। दरअसल उस बिल्डर ने अखबार के कुछ वरिष्ठ लोगों को बहुत सस्ते में प्लॉट दिए थे। इसलिए उसके खिलाफ कोई खबर हमारे यहां नहीं छप रही थी। एक दिन इसी सवाल पर मेरी अपने एक सीनियर से कहासुनी हो गई। मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए मुझे बर्खास्त कर दिया गया।

अगर मुझे सिर्फ अपना पेट पालना होता तो मैं चिंता नहीं करता। कुछ भी कर लेता लेकिन अब मां के इलाज में काफी पैसे लगने थे। पर समस्या यह थी कि अब इस उम्र में मेरे लिए नई नौकरी मिलना कठिन था। अब धीरे-धीरे मेरे दोस्त मुझसे कन्नी काटने लगे। न जाने कैसे मेरी हालत का पता नंदलाल को भी चल गया। एक दिन मेरी अनुपस्थिति में ही वह मां से मिलने चला आया।

दूसरे दिन उसने फोन करके कहा कि मैं चाहूं तो उसके साथ काम कर सकता हूं। मैंने कहा कि मैं दलाली में हिस्सेदार नहीं हो सकता। उसने हंसकर कहा, ‘मैं कहां कह रहा हूं कि तुम दलाली वाला काम करो। तुम वह करो जो तुम कर सकते हो। तुम्हें जानकर खुशी होगी कि इस बीच मैंने एक बहुत बड़ा काम किया है। मैंने एक शोध संस्थान की स्थापना की है जो आदिवासियों पर शोध करेगा और उनके प्राचीन तथा समकालीन साहित्य के प्रचार-प्रसार का कार्य करेगा। अरे बड़े-बड़े विद्वान लोग इससे जुड़ रहे हैं। तुम सोचते हो कि मैं केवल चिरकुट टाइप काम करता हूं। देखना जल्दी ही मैं एक बड़े स्कॉलर और इंटेलेक्चुअल के रूप में सामने आऊंगा।... वैसे मुझे तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे और समझदार लोगों की जरूरत है। तुम मेरे संस्थान में आ जाओ। एक किताब लिखो देश के आदिवासी नायकों पर। तुम्हें अखबार से ज्यादा तनख्वाह मिलेगी।’

मैं मरता क्या न करता। सोचा, नौकरी के लिए पता नहीं कहां-कहां भटकना पड़ सकता है। हो सकता है लंबा इंतजार करना पड़े। मां का इलाज प्रभावित हो सकता है। मैं समझ गया, यही वो स्थितियां होती हैं, जब आदमी किसी के सामने भी सिर झुकाने के लिए तैयार हो जाता है। जब समझौता करना ही है तो नंदलाल ही क्या बुरा है। कुछ दिन उसके यहां काम किया जा सकता है। फिर काम भी मन लायक था।

तो मैं इस तरह नंदलाल का कर्मचारी बन गया। शोध-संस्थान में मुझे एक अलग कंप्यूटर दिया गया और एक खास लॉगिन। मुझे उसी में सब कुछ लिखना था। उसके अलावा मुझे कहीं नहीं लिखना था। मेरे लिए दफ्तर में बैठना अनिवार्य भी नहीं था।

मेरे साथ जो कुछ घट रहा था, उसकी व्याख्या करने बैठता तो मेरा दिमाग चकरा जाता था। अब इसे क्या कहा जाए कि एक दिन मैं नंदलाल को नौकरी दिलाने के लिए परेशान रहा करता था, आज उसने मुझे नौकरी दी थी। एक तरह से उसने मेरा कर्ज उतार दिया था।

मैं कड़ी मेहनत करने लगा। दोस्तों से, परिचितों से, लाइब्रेरियों से किताबें इकट्ठा कीं, कई विद्वानों के लंबे साक्षात्कार लिए। अखबारों को खंगाला। फिर लिखना शुरू कर दिया। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह किताब मुझे बौद्धिक क्षेत्र में मेरी पहचान कायम कर देगी और इसकी वजह से मेरे लिए एक नया रास्ता खुलेगा।

नंदलाल अक्सर मेरी सीट पर आता और किताब के बारे में पूछता। जब मैं किसी अध्याय के बारे में बताने लगता तो वह बोर हो जाता और बात बदल देता।

एक दिन मैं बड़ी देर तक काम करता रह गया। दूसरे सारे स्टाफ जा चुके थे। नंदलाल मेरे पास आया और बैठकर इधर-उधर की बातें करना लगा। फिर उसने अचानक उस लड़की के बारे में पूछा जो ऑफिस असिस्टेंट का काम करती थी। उसका नाम रीना कुजूर था। वह मेरे ही कमरे में बैठती थी। उसका काम अखबार वगैरह संभालकर रखना और लोगों को स्टेशनरी उपलब्ध कराना था। नंदलाल ने पूछा, ‘क्या वह आई थी?’

‘आई थी, चली गई।’ मैंने जवाब दिया।

‘परेशान तो नहीं लग रही थी?’ उसने एक अजीब सा प्रश्न किया। मैंने कहा, ‘अब मैं उसे इतना गौर से नहीं देखता कि..।’

नंदलाल ने हंसते हुए कहा,’
है वह आदिवासी लेकिन देख कर नहीं लगती। जरूर अपने बाप की नहीं किसी और की बेटी होगी वह।’

मुझे नंदलाल का उसके बारे में यूं बोलना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। लेकिन मैं चुप रहा। फिर उसने कहा, ‘बहुत गरीब है बेचारी लेकिन फिर भी थोड़ा पढ़-लिख गई। बाप मर गया। एक भाई था, वह भी गायब हो चुका है। लोग कहते हैं माओवादी बन गया है। मां बीमार रहती है।’

मैंने तो रीना कुजूर का चेहरा भी ठीक से देखा न था। जब उसके बारे में सुना तो उसके प्रति गहरी सहानुभूति से भर गया। लेकिन उसके तुरंत बाद नंदलाल ने जो कहा उससे करंट सा लगा। नंदलाल ने कहा, ‘है मजेदार चीज...कल मैंने ठीक से उसका स्वाद लिया।’


मैंने किसी तरह अपने ऊपर काबू करते हुए कहा, ‘तुम किसी लड़की के बारे में इस तरह बात करते हो।’ मेरी बात पर ध्यान दिए बगैर नंदलाल कहने लगा, ‘कई दिन से मैं लगा हुआ था, हाथ ही नहीं आती थी। कल भी नखरा मारना शुरू किया उसने। मैंने साफ कह दिया कि नौकरी करना है तो सरेंडर करना ही होगा। वह समझ गई।’

यह कहकर नंदलाल ने जोर से ठहाका लगाया। जी में आया कि नंदलाल को उठाकर नीचे फेंक दूं। लेकिन बड़ी मुश्किल से मैंने खुद पर नियंत्रण किया। वह मुझसे कुछ और भी कहना चाहता था, पर इस वक्त मैं उसे देखना भी नहीं चाहता था। मैं यह कहकर कि मुझे देर हो रही है, निकल भागा।

उस दिन मैंने तय कर लिया कि किताब पूरी होते ही यहां से निकल भागूंगा। पता नहीं मुझे यहां क्या-क्या देखने और सुनने को मिले।

किताब पूरी होने में एक साल का वक्त लग गया। लेकिन किताब पूरी होने के साथ ही मैंने अपनी मां को खो दिया। उसके क्रियाकर्म के लिए मैंने पंद्रह दिनों की छुट्टी ले ली। छुट्टी से लौटा तो मुझे एक मेल मिला जिसमें हमारे संस्थान के एक कार्यक्रम की सूचना थी। उसे देखकर मेरे होश उड़ गए। उसमें लिखा था: प्रख्यात शिक्षाविद् और समाजशास्त्री श्री नंदलाल प्रसाद द्वारा लिखित पुस्तक ‘जंगल का हक’ का लोकार्पण होगा। यानी मेरी किताब का लेखक नंदलाल बन गया था।

उस समय पहला ख्याल यही आया कि पंखे से लटक जाऊं। मेरे लिए जीने का कोई कारण नहीं बचा था। मेरा सब कुछ छिन चुका था। पत्नी, बच्चा, मां और अब अपनी पहचान भी।

खैर, मैंने बड़ी मुश्किल से अपने को संभाला। सोचा जाते-जाते उसे बेनकाब करके जाऊंगा। फिर मन में उत्सुकता जागी कि देखूं कि वह क्या कहता है। मैंने उसे फोन मिलाया। कई बार मिलाने पर उसने मेरा फोन उठाया।

मैंने पूछा, ‘यह क्या है?’

उसने अनजान बनते हुए कहा, ‘क्या?’

‘यार किताब मैंने लिखी है, तो इस पर तुम्हारा नाम कैसे चला गया।’

‘बस चला गया। बात एक ही है।’

‘बात एक ही कैसे है। सारा काम मैंने किया है तो क्रेडिट भी मुझे मिलना चाहिए न।’

‘उसके बदले तम्हें वेतन मिला न। अरे भाई, जैसे हमारे दफ्तर में कुछ लोग सफाई करते हैं, कुछ लोग खाना बनाते हैं, कुछ अखबार की कटिंग काटकर रखते हैं, वैसे ही तुम किताब लिखते हो। तुमने किताब लिखकर इस संस्थान को दे दिया। अब संस्थान इसे कूड़ा में फेंके या किसी और के नाम से छपवा दे, इससे तुम्हें क्या मतलब।’

‘लेकिन यह तो तुम्हें पहले बताना चाहिए था।’

‘मैंने समझा कि तुम समझदार हो। समझ रहे हो। ...अरे, यह सब छोड़ो। आओ आज के फंक्शन में।’

मैंने कहा, ‘ठीक है, मैं आ रहा हूं।’

उसी समय मेरे दिमाग में एक योजना कौंधी। मैंने तय कर लिया कि आज सबके सामने नंदलाल की सचाई बताऊंगा। पोल खोल दूंगा इसकी।

मगर आयोजन में पहुंचते-पहुंचते मुझे देर हो गई। रास्ते में मेट्रो खराब हो गई, जिस वजह से वह बड़ी देर रुकी रही। मुझे बीच रास्ते में उतरकर बस लेनी पड़ी। वह जाम में फंस गई। खैर, जब मैं पहुंचा तो एक विद्वान का भाषण चल रहा था, जो नंदलाल की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। उसे अपने समय का प्रमुख जनपक्षधर बुद्धिजीवी और आदिवासियों का उद्धारक बता रहे थे। उनका भाषण खत्म होते ही मैंने संचालक को अपने नाम की एक चिट थमाई। संचालन मेरे संस्थान का ही एक कर्मचारी कर रहा था। चिट लेते ही उसने नंदलाल की ओर देखा। नंदलाल ने कुछ इशारा किया। संचालक ने कहा, ‘स्टाफ के लोगों को नहीं बोलना है।’ मैंने संचालक को हल्के से धक्का दिया और माइक के सामने खड़ा हो गया। फिर मैंने बोलना शुरू किया, ‘उपस्थित विद्वानों और मित्रो, मैं क्षमा चाहता हूं कि इस तरह आपके बीच आना पड़ा। बिना किसी खास भूमिका के मैं कहना चाहूंगा कि आप लोग एक गलत व्यक्ति को सम्मानित कर रहे हैं। और जो किताब यहां लोकर्पित की गई है, उसके लेखक श्री नंदलाल नहीं हैं, मैं हूं। जी हां, करीब एक साल की कड़ी मेहनत के बाद मैंने यह किताब लिखी है।’

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया था। कुछ लोग एक-दूसरे को देख रहे थे तो कुछ नजरें नीची किए हुए थे। नंदलाल के चेहरे पर कोई भाव न था।

मैंने कहा, ‘मैं अभी नंदलाल जी से इस किताब के बारे में कुछ सवाल पूठता हूं, मेरा दावा है वे नहीं बता पाएंगे। फिर मैंने नंदलाल की ओर देखकर कहा, बताइए, इसमें कितने अध्याय हैं और उप अध्यायों के लिए कौन सा शब्द आया है?’

नंदलाल के होंठों पर वही खतरनाक हंसी थी, जो अक्सर रहा करती थी। मैं बोलता हुआ कांप रहा था। तभी नंदलाल उठा और मेरी तरफ बढ़ने लगा। मैंने जोर से कहा, ‘यह आदमी फ्रॉड है। अरे, ये क्या लिखेगा, ये तो बीए पास भी नहीं है। इसे एक लाइन शुद्ध-शुद्ध लिखना नहीं आता। यह हम जैसे पढ़े-लिखे लोगों का शोषण करता है। हमारी मजबूरी का फायदा उठाता है। यह अपनी महिला कर्मचारियों का यौन शोषण करता है। ..... यह संस्थान इसने दलाली के पैसे से खड़ा किया है। इसमें भ्रष्ट नेताओं का पैसा लगा है।’

यह सब बोलने के बाद मैं थोड़ी देर शांत हुआ। सभा में बैठे लोग एकटक मुझे देख रहे थे। कुछ मंद-मंद मुस्करा भी रहे थे। मैंने इस स्थिति की कल्पना ही नहीं की थी। मुझे लग रहा था कि यह सब कहने के बाद यहां हंगामा हो जाएगा। या तो मुझे निकाल दिया जाएगा या यहां बैठे लोग उठकर चल देंगे। या वे नंदलाल से जवाब मांगेगे। पर यहां तो सब कुछ सामान्य था। ऐसा लग रहा था जैसे सबको पता हो कि यहां क्या होने वाला था।

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इसके बाद मैं क्या कहूं। तभी संचालक ने मुझे पीछे कर दिया और अगले वक्ता के नाम की घोषणा कर दी। मैं धीरे-धीरे मंच से उतरा और बाहर आ गया। यह मेरी एक और पराजय थी। नंदलाल ने मुझे एक बार फिर चित कर दिया था। अगर वह मुझ पर भड़कता, मुझे मारता या निकलवा देता तो शायद मुझे इतना बुरा नहीं लगता जितना अब लग रहा था। बार-बार की हार मेरे लिए बर्दाश्त से बाहर थी। मैं हॉल के बाहर सड़क पर खड़ा हो गया। मेरी सांस अब भी बहुत तेज थी। तभी मुझे किसी के जूते की आहट सुनाई पड़ी। लगा कि कोई पीछे से बहुत हड़बड़ाया हुआ चला आ रहा है। मैंने घूमकर देखा तो दंग रह गया। सामने नंदलाल था। उसने कहा, ‘तुम यहां हो। चलो, चाय-नाश्ता लो।’

मैंने कुछ कहना चाहा पर मेरे मुंह से कोई आवाज न निकली। फिर उसने पैशाचिक ठहाका लगाया और कहा, ‘अरे तुम क्या अंड-बंड बक रहे थे। वह सब कहके भी तुम मेरा कुछ नहीं उखाड़ पाओगे। अरे वहां जो कोई भी बैठा था, वह क्या हमको जानता नहीं है। सबको पता है कि मैंने किताब खुद नहीं लिखी है। हर किसी को मालूम है कि बीए पास नहीं हूं। और औरतें मेरी कमजोरी हैं, यह भी सबको पता है। वहां जितने महान लोग बैठे थे, सबके लिए मैंने कुछ न कुछ किया है। किसी को विदेश यात्रा कराई है, किसी के बेटे को इंजीनियरिंग में एडमिशन दिलावाया है, किसी के दामाद को नौकरी दिलवाई है। उन सबको पता है कि मैं भविष्य में भी उनके काम आऊंगा। फिर वे लोग भला हमसे पंगा क्यों लेंगे। वे सब मुझे महान विद्वान क्यों नहीं कहेंगे। अब तुम कुछ भी कर लो, तुम उनके लिए किसी काम के नहीं हो, तो वे तुम्हारी बात क्यों सुनेंगे? है कि नहीं? तो इसलिए किताब लिखोगे तुम, विद्वान कहलाऊंगा मैं।’

‘मी लॉर्ड, यह सुनते ही मुझे लगा कि उसने मुझे मार डाला हो। मैं सोचता था कि अब तक मेरे साथ मेरी आत्मा तो है। लेकिन उसने तो मेरी आत्मा को भी बंधक बना लिया। अब मेरे पास एक ही रास्ता था कि मैं एक कीड़े की तरह उसके दिए टुकड़े पर पलता रहूं। ...जज साहब, मुझे लगा कि मुझे बदला लेना ही होगा। मैं हजारों गरीब नौजवानों की तरफ से बदला लेना चाहता था, जिनके साथ छल हो रहा है। जिनके कीमती दिमाग को किसी फरेबी ने खरीद लिया है और उस पर अपनी मुहर लगा दी है।... सर, एक नकली आदमी को जब समाज में स्वीकृति मिलती है तो इसका मतलब यह है कि सैकड़ों प्रतिभाओं की जमीन छीन ली गई है। एक बहुरुपिया अगर विद्वान कहला रहा है तो इसका मतलब है कि देश के कई नए संघर्षशील विद्वानों की संभावनाएं खत्म कर दी गई हैं।.. मैं रीना कुजूर की तरफ से बदला लेना चाहता था। उन सैकड़ों गरीब लड़कियों की तरफ से जो दो वक्त की रोटी के लिए नंदलाल जैसे घटिया आदमी के साथ सोने के लिए मजबूर होती हैं। वे चुप रहती हैं मी लॉर्ड क्योंकि उन्हें पता है कि इस न्यायिक तंत्र को पावरफुल लोग अपने हिसाब से मैनेज कर लेते हैं। कुछ नहीं बिगड़ता ताकतवर लोगों का।’ यह कहते हुए मैं जोर-जोर से हांफ रहा था।

मजिस्ट्रेट साहब मेरी बातों में खो गए से थे। अचानक उनकी तंद्रा टूटी तो उन्होंने पूछा, ‘जब आपके मन में बदले का ख्याल आया तो आपने किया क्या?’

‘मैंने इधर-उधर देखा। मुझे सामने फुटपाथ पर नारियल वाला नजर आया। हरे-हरे फलों के ढेर के आगे खड़ा वह एक चाकू से एक डाभ छील रहा था। मैंने आव देखा न ताव, दौड़कर उससे चाकू छीन लिया और नंदलाल की तरफ दौड़ा। नंदलाल मुझे आते देखकर भागा। मैंने उसे खदेड़ा और बायें हाथ से उसकी कमीज पकड़ ली और दायें हाथ से उसकी पीठ पर चाकू से वार किया। फचाक से खून निकला और उसकी कमीज पर फैल गया। कुछ बूंदें मेरे चेहरे पर भी पड़ीं। मैं दूसरा वार करने ही वाला था कि मेरे पीछे भागे चले आ रहे सिक्युरिटी गार्ड ने मेरा हाथ पकड़ लिया...।’

मजिस्ट्रेट साहब ने एक लंबी सांस ली और कहा, ‘नंदलाल जी बच गए। क्या आपको इसका अफसोस है?’

‘नहीं, मुझे खुशी है।’

सरकारी वकील ने मुझे आश्चर्य से देखा। मैंने कहा, ‘सर, जब से ये केस शुरू हुआ है, मैं जेल में बैठकर सोचता रहा हूं। मुझे लगा कि नंदलाल को मारने का ख्याल गलत था। मुझे तो उन सब लोगों को मारना चाहिए था, जो उस दिन हॉल में बैठे थे- समाज के तथाकथित संभ्रांत लोग, विद्वान, लेखक, अध्येता। अगर मेरे पास उस समय एके 47 होता तो मैं उन सबको भून डालता।’

मजिस्ट्रेट का चेहरा लाल हो गया।

मैंने कहा, ‘उस दिन उस समारोह में कुर्सी से चिपके बैठे लोग ही जिम्मेदार हैं इन सबके लिए। उन्होंने ही नंदलाल को यहां तक पहुंचाया। अपने छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए इन्होंने नंदलाल को मान्यता दी। एक आदमी बकवास करता हुआ निकलता है और समाज उसे सिर पर बिठा लेता है। एक झूठ के आगे समाज नतमस्तक हो जाता है। सब कुछ समझता हुआ भी वह एक झूठे को अपनी स्वीकृति दे देता है। लेकिन कमजोर और साधनहीन व्यक्ति की आवाज वह नहीं सुनता। अगर आप किसी का स्वार्थ नहीं साध सकते तो आप व्यर्थ हैं इस समाज के लिए। आपका ज्ञान, आपकी प्रतिभा, आपके संघर्ष का कोई मोल नहीं।... पर सवाल है कि किसको-किसको मारा जाए। अगर समाज में कोई गड़बड़ी है तो क्या पूरे समाज को ही खत्म कर दिया जाए? नहीं। यह संभव नहीं। .....लेकिन आप बताइए मी लॉर्ड कि अगर समाज दोषी है तो फिर उसे कैसे सजा दी जाए। मैं पूरे समाज के खिलाफ याचिका दायर करना चाहता हूं। क्या आपकी अदालत स्वीकार करेगी यह याचिका? क्या आईपीसी में ऐसी कोई धारा है जिसके तहत समाज को सजा दी जाए?’

मजिस्ट्रेट साहब की नजरें मेरे ऊपर स्थिर थीं, जैसे वह मुझे समझना चाह रहे हों। फिर मुझे लगा कि जैसे उनका शरीर जमता जा रहा हो।

‘सर, सर...।’ मैंने आवाज दी। उनके बदन में कोई हरकत नहीं हुई।

फिर मेरी चीख निकल गई। मेरे सामने कुर्सी पर मोम का पुतला बैठा था।



संजय कुंदन
सी-301, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012 (उप्र)
मोबाइल: 9910257915




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