उषाकिरण खान — मैथिली कथा — 'नींबू का स्वाद' | #Kahani #Shabdankan

दादी का बागीचा समृद्ध था। केला, पपीता, नींबू और आँवले के पेड़ थे। नींबू खूब फलता। चोरी होने के भय से नींबू काँटों की बाड़ से घिरे थे। भोजन के वक्त जितने पुरुष थे उतना ही फाँक के हिसाब से तोड़कर रसोई में पहुँचाये जाते। दोनों किनारे वाले तीनों पुरुषों को और बीच वाले भाग लड़कों को दिये जाते। शंखद्राव नींबू की सुगंध स्त्रियों के मुँह में पानी लाने को काफी होता। जमीरी नींबू का चटकार पागल बना देता। स्त्रियाँ नींबू चुराने को फेरा लगाती रहतीं....


यह पता चलना कि वह सामाजिक सच, जो हद बुरा हो, और जिसे अब  ख़त्म हो गए माना जा रहा हो, आज भी अपनी पूरी विभत्सता लिए बिलबिला रहा है... अगर हम मध्यवर्गियों की आँखों को खोले(?) तो साहित्य अकादमी सम्मानित मैथिल कथाकार आ० उषाकिरण खान की लेखनी का कुछ क़र्ज़ उतरे। न जाने कब से लेखक इस पीड़ा को अपने भीतर छुपाये रहा, और कैसे छुपाये रख सका ऐसी पीड़ा जिसकी कहानी भर पढ़ पाठक ‘अब कहाँ ऐसा होता है ‘ सोच, सच को झुठलाने लगे?      मगर यह सच है हज़रात! 

मैथिली से हिंदी अनुवाद स्वयं उषाकिरण खान दीदी द्वारा...कहानी पढ़िए!

भरत तिवारी

नींबू का स्वाद

— उषाकिरण खान

मैथिली कथा

बिना कोई रचना किये इस धरती से विदा होने वाली स्त्री भी तो होती है। समझदार और मनस्वी लोगों का कहना है कि विधाता पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य को कुछ न कुछ करने के लिए ही भेजते हैं। लेकिन खुजली वाली दादी को इस धरती पर कौन सा काम सम्पन्न करने भेजा पता नहीं। मेरी समझ से कोई तो नहीं। खुजली वाली दादी ने किसी प्रकार का सृजन न तो किया न वो उसकी माध्यम बनी।

उनका नाम क्या था हमें पता नहीं। होगा जगतारिणी या मन्दाकिनी। चिन्ता या मनतोरी भी हो सकता है। पर हम बच्चे उन्हें खुजली दादी कहा करते। कारण कि वे सदा अपने हाथ पैर देह खुजलाती रहती। वो एक बड़े आंगन की सबसे बड़ी बहू थीं। उनके विशाल आंगन के तीन बड़े—बड़े भाग थे। बीच वाले आंगन में चौका चूल्हा था, चौका की खिड़की मेरे आंगन में खुलती थी। उसी खिड़की से हम उन्हें देखते। दादी सुबह—सुबह सूप डगरा में चावल लेकर चुनतीं फटकतीं। आंगन में सुबह से ही हलचल शुरू हो जाती। स्कूल से लेकर काॅलेज तक पढ़ने जाने वाले लड़के थे उस घर में। बहुत से लोगों का परिवार था उनका। खेत खलिहान से लेकर कोर्ट कचहरी जाने वाला प्राणी भी था घर में। गाँव के नामी गिरामी परिवार की सबसे बड़ी बहू थीं खुजली दादी।

उस नामी गिरामी परिवार की जो अमीर भी था और अति व्यस्त भी उसकी फालतू वस्तु थीं दादी। दादी विधवा थीं, दादी निपुत्तर थीं। उनकी कोई सन्तान नहीं थी। देखने में काली और कुरूप कही जाने योग्य थीं। कौआलोल जैसी नाक और पौआ भर ओठ। नेवले की आंख और दिया जैसा कपाल, यही था जिसे कह कर दादी की सास उन्हें चिढ़ाती रहतीं। पर मजाल था कि कभी दादी ने अपनी सास को कोई जबाव दिया हो, नः; कभी नहीं।

गाँव में अनेकानेक वृद्धा से लेकर युवती विधवायें थीं। उन्हें कोई दुख है यह हमें कहाँ मालूम था? खुजली दादी को अक्सर देखती कि गरम गरम भात, झोलवाली सब्जी और तेल भीजे आम के अॅंचार सबसे पहले लेकर खाने बैठ जातीं। एक मुट्ठी भात बचा रहता तभी मॅंझली देवरानी कहती — “जरा रूकिये बहिनदाई, थोड़ा दही का पानी दूँ।“ इधर—उधर देखकर चुपके से मोटी मलाई वाली दही परोस देतीं पानी के नाम पर। खुजली दादी तृप्त होकर खातीं। जिस दिन छोटी देवरानी की पारी होती उस दिन ऐसा नहीं होता। दादी स्नान कर तुलसी चौरा के पास आकर पैर के नीचे खढ़ दबा, दोनों हाथ सूर्य की ओर उठा ओठ पटपटा कुछ बुदबुदातीं और अपने गोल फूल के चमकते पानी भरे लोटे के साथ आकर बरामदे पर बैठ जातीं। छोटी देवरानी थाली परोसती बुदबुदातीं — “बहे बैल और हकमे कुकुर, जैसे सबसे बड़ी कमउआ ये ही हैं, इन्हें ही पहला ग्रास मिलना चाहिए; हुंह।“ — बोलती जरूर पर थाली में सबकुछ परोसकर देती। भोजनान्त में दही जरूर देतीं। सो, किसी प्रकार का दुःख कहाँ दीखता। गाँव में बोली—ठोली चलता रहता पर जबतक रगड़ा झगड़ा न हो किसी के विषय में अधिक नहीं जान पाते हम बच्चे।

खुजली दादी बच्चों की बेहद प्रिय थीं। क्योंकि उनके पास कथा का सागर था। शाम होते ही दादी को घेर कर बच्चे बैठने लगते। दादी के पास कथारस होता, नायाब प्रस्तुतिकरण से हम मुग्ध रहते। जैसे बरहकेसी रानी की कहानी कहने लगतीं तो कहतीं — “बरहकेसी रानी गोरी चिट्टी थीं बिल्कुल गंगा की माँ सी, उसके केश बेहद लंबे थे, नवादा वाली जैसे।“ — बच्चों को उनका तरीका पसन्द था। वयस्क होने तक मैं भी उनकी चौपाल में बैठती।

धीरे—धीरे मैं उनकी पीड़ा समझने लगी। उन्हीं का नहीं सारे गाँव की स्त्रियों की पीड़ा समझने लगी। वयस्क होने पर ही पता चला सवर्ण बड़े घरों की स्त्रियाँ कूटना पीसना और खाना बनाना मात्र करतीं जबतक पुरूष खेत जाते, कोर्ट कचहरी करते। पति समागम की शारीरिक और आर्थिक विवशता, सन्तानोत्पत्ति की विवशता समझने लगी थी फिर भी खुजली दादी की विवशता का भान नहीं हुआ था।

लोगों से सुना था कि खुजली दादी हरमुराही हैं अर्थात् वंचिता, माता—पिता नहीं थे, भाई बहन नहीं थे विवाहोपरान्त जल्दी ही विधवा भी हो गईं। विधाता के इस विधान में निश्चित रूप से इनका कोई हाथ नहीं था। किसी कारण से खुजली की बीमारी हुई होगी सो ठीक नहीं हुई। कब से यह बीमारी है यह मुझे जरूर याद है। दादी को खाँसी हो गई थी। कहानी नहीं सुना पाती थीं। उनकी कहानी सिर्फ बच्चे ही नहीं सुनते, मकई की डंठल की आग में कटहल के बीज की सब्जी पकाती मॅंझली काकी और फुल्के उतारती छोटकी काकी भी सुनतीं। खाँसती बेहाल होती दादी को देखकर मॅंझली ने कहा था

बहिनदाई, ये क्या, काढ़ा आज ही औंटती हूँ, देखिये तो क्या हालत बना रखी हैं आपने अपनी?

एक मुट्टी धान ले कर परमेसर की दूकान से लौंग खरीद लाइये, भुना और कच्चा लौंग साथ दाँत बीच दबाकर रखने से आराम होगा।“ — छोटी काकी ने अपना ज्ञान दिया।

पिछले बड़े आँगन में पचास—साठ मन धान का ढेर लगा था। खुजली वाली दादी ने लगभग आधा सेर उसमें से उठा लिया था। उसी वक्त छोटे देवर पहुंच गये थे। देवर ने उन्हें लात से मार मार कर लगभग बेहोश कर दिया, भांति—भांति की गालियों से अलग छलनी कर दिया। धान के ढेर के निकट मृतप्राय पड़ी रहीं देर तक। उनके आंगन की किसी स्त्री की औकात नहीं थी कि सामने से जाकर उन्हें होश में ला कर उठा लाये। कोई स्त्री किसी मामले में टिप्पणी दे यह भी संभव नहीं था। शाम ढले जब बच्चे कहानी सुनने आने लगे तब मंझली काकी ने कहा — “आज दादी की तबियत अधिक खराब है, कहानी नहीं सुना सकेंगी, जाओ तुमलोग, ठीक होंगी तब आना।

चुपचाप दोनों देवरानी उनके पैरों में गरम तेल की मालिश कर देंती। पर उस दिन स्वयं होश आने पर घिसटकर अपने बिस्तरे तक आना पड़ा था। याद है मुझे, हफ्ते भर कथा कहानी बंद रहा, फिर वैसे ही शुरू हो गया। दादी की गोष्ठी के पात्र बदलते रहते। बच्चे थोड़े बड़े होते तो आवासीय विद्यालय में पढ़ने चले जाते। नये बच्चों की जमात जुटती रहती। यह एक कारण था कि लड़कों से अधिक—लड़कियों की संख्या उनकी श्रोताओं में थीं। मैं भी अपनी बड़ी बहन के पास शहर पढ़ने चली गई थी। मेरे बहनोई शहर में नौकरी से लग गये थे, बहन समझदार थीं। उनके मन में स्वयं न पढ़ पाने की कसक थी, तो मुझे ले गईं।

दादी इन दिनों बहुत कमजोर हो गई थीं। दादी अब पहले जैसी मानिनी नहीं रहीं। लौंग इलायची मिश्री खरीदने के लिए धान नहीं चावल ही चढ़ा आतीं दूकान पर। देह में लगाने के लिए नारियल तेल और कपूर की गिट्टी खरीद लातीं। देवर लोगों की डांट फटक और गालियों का तनिक भी बुरा नहीं मानतीं। दूसरे घर के लोग उनकी दुरवस्था पर सहानुभूति दिखाते तो यह कहतीं —

जाने दो जिसे जो मिलना है प्राप्त होगा ही, जिसे भुगतना है वह भुगतेगा ही।

दादी इन दिनों कहानी में ही बहुत बातें कह जातीं सो हम समझ रहे थे अब, हो सकता है पहले भी कहती रही हों मैं ही नादान थी। इधर देखती कि गुड़फॅंकनी मौसी और गौरैया की कहानी कहती वे सिर्फ दीवार की ओर ताकती और आत्मालाप सी करतीं — “गुड़फॅंकनी मौसी ने मन ही मन विचार किया कि बूढ़ी हुई अब कितने दिन जीयेगी, क्या इस जाड़े की मुलायम धूप में अपनी केथरी ओढ़ झोपड़ी की ओलती में सोने का आनन्द ले सकेगी? तो क्यों न इस नन्हीं गौरैया को इस चांडाल किसान से मुक्त कराने की चेष्टा करूँ? धर्म भी होगा।“ — मैं समझने लगी थी कि गुड़फॅंकनी के माध्यम से दादी अपनी व्यथा कह रही है; अपना मनोभाव व्यक्त कर रही हैं। गांव घर के लोग स्वयं जो करे, दूसरे की गलतियाँ खूब निकालते हैं। सो वे लोग दादी के देवरों की जमकर शिकायत बतियाते। यह सब उनके परोक्ष में होता। वे लोग तो न सुनते परन्तु हमारे सरीखे बच्चों के मन को क्षुब्ध जरूर करता। ओढ़ना बिछौना नहीं देते, साबुन तेल की उन्हें क्या जरूरत है, ऐसा सोचते। देवर लोग उनकी जरूरतों के विषय में बिल्कुल नहीं सोचते। यदि वे नहीं सोचते तो न सोचे पर उस विशाल सम्पत्ति के चतुर्थांश की मालकिन को यह हक नहीं था कि वे स्वयं खरीदारी कर सकें ? — यह मेरा कैशोर्य मन सोचने लगा था। मैं अपनी दादी, काकी और माँ से जब पूछती तो यह कह कर चुप कर देती — “तुम्हें क्या पड़ी है यह सब सोचने की; उनकी तकदीर ही खराब है।“ — बहुत बाद में मुझे ज्ञान हुआ कि उनका टुअर — बे माँ बाप की होना — उनका विधवा होना और उनका सन्तानहीन होना तकदीर की खराबी ही तो थी। उस गाँव में तथा किसी भी सवर्ण गाँव में विधि की सतायी स्त्रियों के साथ ऐसा ही तो व्यवहार होता। अब मैं कारण समझ सकती हूँ। गाँव की स्त्रियों को उनसे कोई भय नहीं था, पुरुष उनकी ओर देखते ही नहीं थे। देवरानी सब प्रसन्न कि शाम को जब वो लोग लकड़ी के धुंएँमें रसोई में व्यस्त रहतीं तब बच्चों को कहानी में दादी उलझाये रहतीं। एक और बात गौरतलब है कि उस पुरुष प्रधान घर में स्त्रियों का एक अघोषित-सा संगठन था। आपस में खटपट होती पर मामूली। स्त्रियाँ एक दूसरे के लिए एकजुट थीं।

दादी का बागीचा समृद्ध था। केला, पपीता, नींबू और आँवले के पेड़ थे। नींबू खूब फलता। चोरी होने के भय से नींबू काँटों की बाड़ से घिरे थे। भोजन के वक्त जितने पुरुष थे उतना ही फाँक के हिसाब से तोड़कर रसोई में पहुँचाये जाते। दोनों किनारे वाले तीनों पुरुषों को और बीच वाले भाग लड़कों को दिये जाते। शंखद्राव नींबू की सुगंध स्त्रियों के मुँह में पानी लाने को काफी होता। जमीरी नींबू का चटकार पागल बना देता। स्त्रियाँ नींबू चुराने को फेरा लगाती रहतीं। एक दिन मॅंझली ने हाथ में कपड़ा लपेटकर काँटों के बीच नींबू तोड़ने का उपक्रम किया ही था कि एक लाठी कहीं से उड़ता हुआ आया और कलाई चोटिल करता गिर गया। बिना कुछ तोड़े हाथ थामे दूसरे हाथ से गाली देती आंगन लौटीं। उनकी कलाईयों को गरम पानी में सेंकती मालिश करती दादी गाली देतीं — “जवानी नहीं रहेगी सब दिन, कहो तो नींबू इतना अनूप है कि हाथ तोड़ दिया। अब भात का उतना बड़ा हंडा कौन उतारेगा? रहे भूखें।“ — आक्रोश में दादी कह रही थीं, एक तरह से मॅंझली छोटकी को ढाढस दे रही थीं पर वे जानती थीं कि इसी रूप में काम करती रहेंगी ये। छोटकी को आठवाँ महीना लगा था, इनसे रसोई के पाक का काम कभी नहीं होता।

दादी के अनुशासनप्रिय एकबग्गे घर का भी बँटवारा हुआ। परन्तु उससे दादी को कोई नफा नुकसान नहीं हुआ। पहले की तरह वो शाम ढलते ही बरामदे की बड़ी सी चौकी पर बैठ जातीं और नये बढ़ते बच्चों को कहानी सुनातीं। उसी प्रकार एक माह मझली और एक माह छोटकी के बरामदे पर गोल पेंदी वाला फूल का लोटा लेकर बैठ जातीं और गरम गरम दाल भात तरकारी, एक छौ दही खाती। उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता। गाँव में जैसे कोसी कमला बलान की बाढ़ हर साल आने का रूटीन था वैसे ही नयी नयी खेप कथा रसिक बालकों के हुजूम का भी सिलसिला था। अभी भी गाँव में कोई स्कूल नहीं दिखता, एक अदृश्य स्कूल जरूर था। किन्हीं का दालान स्कूल नाम से अमिहित था और एक सज्जन मास्साब नाम से पुकारे भी जाते थे। बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी। इसमें गाँव में पूरा समाजवाद था माने सामाजिक न्याय। ब्राह्मण से लेकर मल्लाह तक, कलवार से लेकर मुसहर तक सभी निरक्षर। जिनके सम्बंधी गाँव से बाहर नौकरी पा गये थे वे पढ़ते जिनके पास मास्टर दालान पर रखकर पढ़ाने की औकात थी वे खानगी—पढ़ाई करते। यह 1990 तक का अपना अनुभव साझा कर रही हूँ। सालों पहले खुजली वाली दादी अपने जीवन का छिहत्तर शरद देख पूस माह में मर गईं। गाँव की स्त्रियों ने सरके आँचल को दाँत ओठ तक खींच दबी जुबान से कहा — “कितनी खोटी तकदीर थी, मरीं भी तो पूस माह में सुगति भी नहीं होगी, आत्मा भटकती रहेगी।

गति यदि सर्वाई श्राद्ध होने से होता हो, गति यदि साँढ़ दागकर छोड़ने से होता है तो अवश्य हुआ होगा क्योंकि उनका श्राद्ध दोनों देवरों ने अलग—अलग तामझाम के साथ किया। जिन्हें लौंग के नाम पर लात लगता था उनके नाम का भोज खा तृप्त होते ब्राह्मणगण लौंग खोंसा हुआ बंगाली बीड़ा पान गाल के नीचे दबाते प्रस्थान कर रहे थे। सब कुछ बेमिसाल। मैं खुजली दादी की कथा कहने को क्यों व्याकुल थी सो तो भूली जा रही थी। श्राद्ध में महापात्र सपत्नीक घर बनाकर रखे गये थे। जाते समय टायर गाड़ी पर सारा असबान लादा गया था, घर का छप्पर खंभा वहीं किसी को कीमत वसूल कर दे गये।

पंडितगण, आप संतुष्ट होकर जा रहे हैं न? “ — छोटे देवर ने हाथ जोड़कर विनम्र भाव से पूछा। — मूड़ डोला।

पंडिताइन प्रसन्न हैं न?“ — पुनः पूछा छोटे देवर ने

पंडिताइन को एक वस्तु की लालसा है ...।“ — महापात्र ने कहा

किस वस्तु का कृपया कहा जाये ..............।

आपके बगान के शंखद्राव नींबू की मैं अक्सर इनके पास प्रशंसा किया करता था, इस समारोह के हलचल में ये चख न सकीं, यही लालसा है, यदि गाछ में हो तो एकाध देते।

छोटे देवर खुलकर हॅंसे — पर नींबू तोड़कर उन्हें दिया और पुनः पूछा

प्रस्थान से पहले कहें प्रसन्न हुए? हमारी माता समान भौजी की आत्मा संतुष्ट हुई न?

अहा हा, उसमें क्या कोई सन्देह बाकी है? आपने जयजय कर दिया” — आभार से दुहरा होता महापात्र दाँत निपोर कर बोला। अपना पात्र दुपट्टा संभालता टैरगाड़ी पर चढ़कर चला गया।

एक दिन की बात मुझे याद है। दोनों भाईयों की जूठी थाली उठाकर मॅंझली धोने जा रही थीं कि दादी ने नींबू का छिल्का उठा लिया। अपनी फूलवाली गोलपेंदे का लोटा से पानी लेकर छिलकों को धोकर हाथ में दबाया। छोटकी ने भात परोसकर थाली सामने रखी — दादी ने नींबू छिलके का एक टुकड़ा गरम भात में दबा दिया और दूसरा गरम दाल में हेला दिया। थोड़ी देर बैठी रहीं; मैं अचम्भित हो खिड़की से सबकुछ देखती रही। छोटकी पंखा लेकर पास बैठीं। उन्हें और स्वयं को झलने लगीं।

सीताराम सीताराम बहिनदाई, यह आपने अच्छा नहीं किया। कहाँ से नींबू तोड़ लाई? हाथी जैसा मतवाला आपका देवर देख लेगा तो पिट जायेंगी। जीभ के कारण हाड़ टूटेगी।“— छोटी ने नींबू के छिल्कों को देखकर कहा। तब तक मॅंझली थाली धो मांज कर आ चुकी थीं। उन्होंने कहा —

कहाँ हो तुम ? दोनों भाईयों की जूठी थाली से बहिन दाई ने नींबू का छिल्का उठा लिया था, उसी को धोकर सॅंजोये थीं। पता नहीं कैसे इनका मन मानता है।

सीताराम सीताराम, हे भगवान!“ — भावुक छोटकी की आँखे भर आईं। दादी के लिए मानो कुछ हुआ ही नहीं।

ऐजी, आपलोग कुछ न बोलें; मेरे देवर लोग मेरे बच्चे हैं। उनका जूठा खा ही लिया तो क्या हुआ ? हाथ तो उनलोगों का बचपन से ही छूटा हुआ है। जाने दीजिऐ। आंह—आह करके मेरे मुंह का स्वाद न बिगाड़िये।“— दादी सचमुच परितृप्त भाव से भात दाल खा रही थीं। उनके श्राद्ध में नींबू का दान कर छोटे देवर ने महादान कर दिया। पूस माह में जीर्णशीर्ण सुजनी के नीचे देह नोंचती नोचती चली गई दादी। उनके नाम पर मंझले देवर ने रेशमी रजाई, लाल इमली का कम्बल दान दे इलाके में नाम कमाया। विधवा निपुत्र भौजाई के लिए कौन करता है इतना, पूरा इलाका गुण गा रहा है।

गाँव अब भी वैसा ही है। गाँव है, गाँव में हैं तकदीर की मारी स्त्रियाँ। ये न समझें कि गाँव गाँव रेडियो ट्रांजिस्टर और बैटरी वाला टेलीविजन चला गया है तो दादी का अस्तित्व समाप्त हो गया है। नः सो नहीं हुआ है।


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