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शार्टकट कवितइ — कविता का कुलीनतंत्र (5) — उमाशंकर सिंह परमार

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उन्हें विश्वास है कि दिल्ली में रहता हूँ इसलिए कवि हूँ

कविता का कुलीनतंत्र (5) — उमाशंकर सिंह परमार 

जब तक कवि अपनी जमीन में नहीं खड़ा होता तब तक वह अपनी परम्परा में नहीं जुड़ता न परम्परा का विकास करते हुए समकालीन होने की अर्हता हासिल करता है

समकालीन कविता के कुलीनतंत्र में एक विशेषता और गौर करने लायक है कि यहाँ "सौदेबाजी" का प्रचलन भी बढ़ा है। तुम हम पर लिखो हम तुम पर लिखें इस "सौदेबाजी आलोचना" ने भी कुछ कवियों को एक समय चर्चा में लाने की कोशिश की मगर जैसा मैं कहता आया हूँ यह स्थिति थोडे समय के लिए होती है। ऐसे लोग और उनकी कविताएँ गूलर के फूल की तरह बहुत जल्द अदृश्य हो जाती हैं। कविता तभी टिकाऊ होती है जब वह लोकभूमि से उत्पन्न हो असंगत और सामान्ती चेतना का लेखन, कितनी भी स्तुति की जाये, आम पाठक के बीच अपनी पहचान नहीं बना पाता है।

ऐसे कवियों में इलाहाबाद के रतिनाथ योगेश्वर और श्रीरंग हैं। दोनो पुरस्कार देते हैं और साहित्य भण्डार के प्रचारक के रूप में जाने जाते हैं। रतिनाथ योगेश्वर के पास लय और भाषा विन्यास की ताकत है मगर विचारधारा का संकट है। इनका कविता संग्रह "थैंक्यू मरजीना" है इसकी कविताओं में कलावादी भाषा विन्यास का भावहीन उथला अप्रभावी रूप देखा जा सकता है। नाटकीयता और चमत्कार की इन्हें बुरी लत है। जिसके कारण यह अक्सर कथ्य से भटक जाते हैं। इस कविता संग्रह के बाद कुछ दिन तक अपने आपको दोहराते रहे और कुछ दिन बाद लिखना ही बन्द कर दिया। इनके परम मित्र और सहयोगी कवि हैं श्रीरंग इनका कविता संग्रह है "मीर खाँ का सजरा" है इस कविता संग्रह की शीर्षक कविता जो कि पहली कविता भी है में श्रीरंग सामन्ती ऐशो आराम और शोषण व स्त्री के दैहिक व्यापार की जबरदस्त वकालत करते नजर आते हैं। अतीत के सामन्ती आकर्षण से ये इतने प्रभावित हैं कि वेश्यावृत्ति को जस्टिफाई करते हुए आधुनिक विमर्शों में पलीता लगा देते हैं। श्रीरंग की दूसरी विशेषता है कि यह कानून और संविधान की धाराओं व अनुच्छेदों को भी कविता बना देते हैं इनकी एक कविता है "हम भारत के लोग" यह कविता इनके कविता संग्रह मीर खाँ का सजरा में संग्रहीत है। इसमें भारतीय संविधान की उद्देशिका को कविता की तरह लिख दिया गया है न एक अक्षर कम न एक अक्षर ज्यादा। ये दोनो शार्टकट कविता के उस्ताद हैं। समझते हैं कि हमारी यह शैली कोई पहचान नहीं सकता और हम अपने पुरस्कार की बदौलत अपने "घालमेंल" को भी कविता सिद्ध कर सकते हैं और यही कर रहे थे मगर कुछ सजग पाठकों ने इनकी मिलावटी कविताओं को पकड़ लिया तो कविता की बजाय आलोचना लिखने लगे हैं। और इसमें भी कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती का कुनबा जोड़ा वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं।
दिल्ली की नब्बे फीसदी पत्रिकाएँ दिल्ली के बाहर निकलकर नहीं देखना चाहती। उनके लिए समकालीन का मतलब दिल्ली का रहबासी होना है। और पहल जैसी पत्रिका में भी दिल्ली का दबदबा रहता है। वागर्थ अपने गुट को छापती है। दिल्ली अकादमी की पत्रिका इन्द्रप्रस्थ भारती को मैत्रेयी पुष्पा ने सीग्रेड की पत्रिका बनाकर रख दिया है। 
ऐसे लोग अध्ययन नहीं करते कविता की रीति और परम्परा का बोध नहीं रखते बस लिखते रहते हैं और चाहते हैं कि सभी हमें महान कहें । समकालीन कविता में इधर आए युवा कवियों और कवयित्रियों का यह बहुत बड़ा दोष है। जब तक कवि अपनी जमीन में नहीं खड़ा होता तब तक वह अपनी परम्परा में नहीं जुड़ता न परम्परा का विकास करते हुए समकालीन होने की अर्हता हासिल करता है। श्रीरंग और रतिनाथ जैसे एक और कवि हैं रवीन्द्र के दास। यह दिल्ली में रहते हैं। कलावादी है और कलावादी के अतिरिक्त अतिवादी भी हैं। इनकी कविता में गुम्फित अतिवाद ही इन्हें कवि नहीं बनने दे रहा है। स्त्रीविषयक कविताएँ लिखते हैं इनका एक कविता संग्रह "स्त्री उपनिषद" नाम से हैं जो कई खण्डों में है. फिर भी दिल्ली का कोई भी इन्हें कवि नहीं मानता और लोकधर्मी आलोचकों में तो कोई मानता ही नहीं है। इनका अतिवाद केवल कहन का नहीं है बल्कि रूपगत प्रयोगों में भी उपलब्ध हैं। मिथकों की गलत व्याख्या, यथार्थ में कल्पना का चरम, जहाँ भावुकता और सहानुभूति की जरूरत है वहाँ अप्रस्तुत विधानों की झडी लगा देते हैं। अपनी इन कमियों के बावजूद भी वह कवि होने के दम्भ से मुक्त नहीं हैं उन्हें विश्वास है कि दिल्ली में रहता हूँ इसलिए कवि हूँ। इसके लिए दास साहब भी एक पुरस्कार संस्था चलाने लगे हैं।

कवि बनाने का कारखाना

दिक्कत यह है कि कुलीन लेखकों का वैचारिक भटकाव नारेबाजी में दब जाता है। और संपादक भी नारेबाजी की गरिमामय अभिव्यक्ति में अपने विवेक को भूलकर कमजोर कवियों को "महान" कह देता है। दिल्ली की नब्बे फीसदी पत्रिकाएँ दिल्ली के बाहर निकलकर नहीं देखना चाहती। उनके लिए समकालीन का मतलब दिल्ली का रहबासी होना है। और पहल जैसी पत्रिका में भी दिल्ली का दबदबा रहता है। वागर्थ अपने गुट को छापती है। दिल्ली अकादमी की पत्रिका इन्द्रप्रस्थ भारती को मैत्रेयी पुष्पा ने सीग्रेड की पत्रिका बनाकर रख दिया है। समस्त पत्रिकाएँ एक दूसरे से इस बात में सहमत दिखाई देती हैं कि एक भी मौलिक कविता और मौलिक कवि जिसके पास अपनी भाषा हो विचार हों समकालीन धारा में नहीं होना चाहिए। अभी आलोचना पत्रिका का समकालीन अंक आया था बेहद घटिया कविताएँ थी। असद जैदी जलसा में यही काम कर रहे हैं। इन सबका एक ही लक्ष्य है ऐन केन प्रकारेण कमजोर कवि को आगे करके मजबूत कविता को पीछे धकेलना। इस काम में एक और पत्रिका का नाम जुड़ गया है समावर्तन का। इस पत्रिका ने कवि बनाने का कारखाना खोल रखा है। थोक भाव से कवि बनाती है इस पत्रिका का वैचारिक स्तर जनवादी प्रगतिशील नहीं है और चाहे जो कुछ हो। "युवा द्वादस" नामक श्रंखला में इस पत्रिका ने समकालीन कविता का गलत प्रमाणन किया है। इस पत्रिका के एक युवा द्वादस में चढाए हुए कवि मिले नित्यानन्द गायेन। दिल्ली में रहते हैं। शुद्ध हिन्दी लिखने से परहेज है और इन्हें उलझाव से अधिक लगाव है यही उलझाव इनकी कविता में भी उतर आया है। हलांकि इनका एक कविता संग्रह अपने हिस्से का प्रेम प्रकाशित हो चुका है फिर भी ये कविता नहीं लिख पाते और वैचारिक रूप में देखा जाए तो बेहद आपत्तिजनक स्थिति है। जैसे अपनी एक कविता "मेरे देश में" लिखते हैं कि

"मेरे देश में / उसे पाला जाता है / जिसने किया था हमला / मुम्बई पर" 
 (चौथा युवा द्वादस ) कवि को पता होना चाहिए आतंकियों को संरक्षण पाकिस्तान देता है। मगर ऐसा नहीं यह उन चरमपंथियों के कुप्रचार को प्रमाणित कर रहा है जो यह कहते हैं कि मुसलमान आतंकवादियों को संरक्षण देते हैं। मुसलमानों के प्रति घृणा से भरी हुई इनकी बहुत सी कविताएँ हैं। ऐसे कवियों को सरकार खूब बढ़ावा देती है क्योंकि ये लोग विवेक और साझा संस्कृति की बजाय जीन्यूज जैसे टीवी चैनलों से रचनात्मकता ग्रहण करते हैं। यही कारण है कहीं वामपंथ से घृणा कहीं दलित से घृणा तो कहीं गरीब से घृणा कविता में उतर आती है। ऐसी ही एक कवयित्री हैं विपिन चौधरी। इनके भी दो कविता संग्रह हैं अन्धेरे के मध्य से और एक बार फिर। ये दोनों कविता संग्रह औसत से भी ज्यादा कमजोर हैं। मात्र लिखना, कुछ भी लिखना कविता है तो यह भी कवयित्री हैं। इन्हें भी पत्रिकाओं ने प्रमोट किया है। विचारधारा और आधुनिकता का अभाव इनकी रचनात्मक विशिष्टता है। चौथे युवा द्वादस में इन्होंने अपनी कविता "रंगों की तय शुदा परिभाषा के विरुद्ध" में सारी आधुनिकता को नकार दिया है। सामाजिक लक्ष्यों और सरोकारों के प्रति अस्वीकार की यह घोषणा होने के बावजूद भी पत्रिकाएं इन्हें कवयित्री कह रही हैं यह बात आश्चर्य जनक मगर सत्य है "नीले रंग की कहानी ने भी इसी तरह / मुझे देर तक छला" नीला रंग दलित आन्दोलन का प्रतीक है। इन्हें दलितों की पीड़ा में भी "छल" दिखाई देता है। यही हालत वरिष्ठ कवयित्री रंजना जायसवाल की है। वह भी खूब छपी है और लगभग आधा दर्जन कविता संग्रह हैं मगर वैचारिक परिणति और स्पष्टवादिता का घोर अभाव है। औसत कवयित्रियों जैसी फूल पत्ती महक सपने प्रेम जैसी भाषा के साथ लोक वस्तु विन्यास में भी पकड़ है जिससे पाठक को भ्रम होता है कि रंजना लोकधर्मी कवयित्री हैं। कविता को यदि गहराई से देखा जाए तो यह लोक महज एक "कला" ठहरता है। आत्मीयता लोकधर्मिता की पहचान है लोक के प्रति संवेदना का कारण है और वही इस कवयित्री में नहीं है। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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