कई बार देखना, संजू —अशोक चक्रधर | #Sanju @ChakradharAshok @duttsanjay @RajkumarHirani



रणवीर ने निर्देशक-दृष्टि से अभिनय किया और वह संजू के अंदर के दस-बीस आदमियों के अंदर सफलता से चला गया

—अशोक चक्रधर

चौं रे चम्पू!


  • चौं रे चम्पू! सुनी ऐ, तू आजकल्ल डबल रोल की फिलम बनाय रह्यौ ऐ?

राजू हीरानी एक समाज-मनोवैज्ञानिक हैं

डबल रोल! आप अपने आप से पूछिए कि एक जीवन में एक आदमी कितने रोल करता है, या कर सकता है। शायर निदा फाज़ली कह गए हैं, ‘हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।’ एक आदमी के दिल-दिमाग की परत-दर-परत भेदते हुए अंदर तक जाओ, तब भी न समझ पाओगे कि यह आदमी कुल मिलाकर है क्या! चेहरों पर चेहरे लगे रहते हैं। देखेंगे कुछ, कहेंगे कुछ, सोचेंगे कुछ और करेंगे कुछ। फ़िल्में क्यों अच्छी लगती हैं? क्योंकि दूसरों के जीवन में झांकने का मौक़ा देती हैं। ऐसा भी होता है कि डबल आदमी मिलकर एक आदमी का रोल करे।

जाकौ का मतलब भयौ?

—अब बायोपिक का चलन चल पड़ा है न! दिवंगतों की जीवनियां तो अनेक देखीं, अब जीते-जी की जीवनी आ रही हैं। मैरी कॉम, फोगाट, डॉ. मनमोहन सिंह, धोनी सब जीवित हैं। संजय दत्त के होते हुए रणवीर कपूर ने ‘संजू’ का रोल किया। क्या अद्भुत अभिनय किया है चचा। ख़ूब सराहना हो रही है। ’संजू’ ऐसी फ़िल्म बन गई है, जिसने न्यूनतम समय में सर्वाधिक कमाई करके दिखाई है। रणवीर ने निर्देशक-दृष्टि से अभिनय किया और वह संजू के अंदर के दस-बीस आदमियों के अंदर सफलता से चला गया। मैं ट्रेलर देखकर ही समझ गया था कि फ़िल्म अद्भुत होगी। राजू हीरानी एक समाज-मनोवैज्ञानिक हैं। समाज भी अब ‘पाप’ स्वीकारोक्तियों का स्वागत करने लगा है! ये जो नया बनता हुआ समाज है न, साफगोई से प्यार करता है। रमानाथ अवस्थी जी कहते थे ‘पाप किया, पुण्य किया, किया पूरे मन से।’ बच्चन जी ने कहा, ‘कह रहा जग वासनामय हो गया उद्गार मेरा, मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता।’ सबके अंदर अच्छाई और बुराई का संघर्ष चलता है। अंदर के भोलेपन के साथ बिगड़ैल संजू, एक आदमी! अपराधों की सजा पाने को तैयार संजू, दूसरा आदमी! उसके अंदर के अन्य दस-बीस आदमी भी देखने हों तो चचा फ़िल्म को कई बार देखना। आदमी बीस मिलें न मिलें, फ़िल्म हर बार इक्कीस मिलेगी।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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