मधु कांकरिया की नयी #कहानी: जंगली बिल्ली - #Shabdankan
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मधु कांकरिया की नयी #कहानी: जंगली बिल्ली

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इस वहशी हिंसक समय ने भक्ति के किसी भी रूप को उसके मूल सुन्दर सच्चेपन से नहीं दूर किया हो, ऐसा लगता नहीं. देशभक्ति भाई सामान मित्र को हटा गयी, निकट पड़ोसी को दुश्मन बता गयी...जाने तो क्या क्या परिभाषाएं गढ़ दी जा रही हैं. कहानीकार  मधु कांकरिया साहित्य की बड़ी भक्त हैं, आपने उनकी कहानियाँ पढ़ी होंगी तो यह ज़रूर जानते होंगे, वर्ना इस कहानी को पढ़ने से... तो मधुजी की इस भक्ति को कोई विश्व सम्मेलनकारी कीटाणु छू तक न सका है...यह सच और जंगली बिल्ली का सच जिसकी एक लाइन यह है — मैडम जी हिटलर भी खुद को देशभक्त कहता था। मेरी भ्रष्ट बुद्धि कहती है कि काश वह देशभक्त नहीं होकर बांसुरी बजाता, प्रेम गीत गाता तो दुनिया इतनी तबाह नहीं होती — पढ़िए और अपनी भक्ति की कंडीशन मुताबिक हो सके तो  (वैसे यह समय कईयों का डरपोक-पना सबके सामने ले आया है) राय भी दीजिये.  

आपका भरत एस तिवारी, संपादक शब्दांकन


short essay on bhartiya sena in hindi


जंगली बिल्ली

मधु कांकरिया


चंडीगढ़ से कुछ दूर किसी उपवन सा शांत और सुन्दर चंडी मंदिर कैन्ट। कैन्ट के एक हिस्से में फौजी छावनी। सारे घर फौजियों के। एक अलग ही दुनिया। अलग ही भाषा उनकी। कहीं मेजर विकास लॉन में अखबार पढ़ते तो कहीं कर्नल रणेंद्र जोगिंग करते हुए तो कहीं कैप्टेन सोलकर कुत्तों के साथ टहलते हुए। कहीं मिसेज कुलकर्णी साईकिल चलाती हुई तो कहीं ले। कर्नल अमरिंदर सिंह का नन्हा सबको अपनी नकली एके फोर्टी सेवन से डराता हुआ। मन को महकाती दूर दूर तक फैली हरियाली। खिलखिलाते फूल। उड़ान भरते रंग बिरंगे परिंदे और हवा में झरते पीले पत्तों का हल्का संगीत। इस जीवनदायी सौन्दर्य को घूँट घूँट पीने की बजाय मैं उलझी हुई थी अपने भतीजे मेजर विक्रम से।

बात कश्मीर पर हो रही थी। वे कह रहे थे। सत्य मर चुका है। घूम फिर कर झूठ ही सच बनकर सामने आ रहा है। तह तक कोई नहीं पंहुचना चाहता। कश्मीर में जिसे देखो फ़ौज के पीछे पड़ा है। अरे भाई फ़ौज तो सत्ता के हाथों की कठपुतली भर है। सारे निर्णय तो ऊपर से आते हैं। हमने कश्मीर में क्या अपनी इच्छा से पैलेट गन चलायी? अपनी इच्छा से हम मूत तो सकते नहीं... गोली क्या चलाएंगे…बोलते बोलते मेजर विक्रम ने कैप्टन अरूण की ओर ताका इस उम्मीद में कि शायद वह उनके समर्थन में कुछ बोलेंगे।



कैप्टन अरूण कुछ नहीं बोले और चौतरफा बिखरी पड़ी जिन्दगी का आनन्द लेने लगे। इसकारण गरमागरम बहस का तापमान अवरोही मोड़ लेने ही लगा था कि सामने से मेजर आदित्य राजा आ धमके। उनके दृश्य में आ जाने भर से ही माहौल में दिलचस्पी भरा बदलाब आ गया, कोयल कूकने लगी, हवा तेज चलने लगी। पिछले दो साल से थे वे यहाँ। इसके पूर्व असम राइफल्स में थे वे। इस पूरी कोलोनी में सबसे अधिक सम्मानित क्योंकि पिछले साल ही उन्हें अपनी बहादुरी के लिए शौर्य चक्र राष्ट्रपति के हाथों मिल चुका था जो कॉलोनी के हर वाशिंदे की जुबान पर था।

— हमारे वीर बहादुर जवान! मेजर विक्रम की पत्नी गरिमा ने आर्मी अंदाज़ में परिचय कराने की शुरुआत की ही थी कि ललाट पर तीन शिकन उभर आई कार्तिक राजा के। कुर्सी पर बैठते बैठते खिन्न से हुए वो और आधी अधूरी हंसी हँसते हुए कहने लगे – प्लीज भाभी, मेरा परिचय इस प्रकार न कराएं। जाने क्यों मुझे वीर और बहादुरी दोनों ही शब्द अब उतने अच्छे नहीं लगते जैसे पहले कभी लगा करते थे... सच कहूं तो चिढ सी हो गयी है अब!

कुछ दर्द सा था जो उनकी अधूरी हंसी के पीछे से झाँक रहा था।

कैप्टन अरूण को एकाएक कुछ काम याद आ गया, सीटी बजाते हुए बाहर निकल गए वे।

— पर क्यों? गरिमा ने दुप्पटे को नीचे खींचते हुए पूछा,

— बुरा मत मानना भाभी पर मैं सचमुच आजतक तय नहीं कर पाया हूँ कि वह मेरी वीरता थी या कायरता या अँधेरे में अँधेरे से लड़ना था। जब दोस्तों और महफ़िल में रहता हूँ तब लगता है कि शायद वह बहादुरी जैसा कुछ था लेकिन जब... बोलते बोलते एक लम्बी सांस खींची उन्होंने और खामोश हो गए।

हम सकते में थे। एक ठंडी सी लहर शिराओं में रेंग गयी। फौजी तो पंचम स्वर में अपनी बहादुरी का बखान करते नहीं थकते और ये कह रहे हैं।

— लेकिन क्या। रुक क्यों गए? निहायत मुलायम शब्दों में बर्फ तोड़ी गरिमा ने।

वे शायद द्वंद में थे।

बोलूँ न बोलूँ की धूप छाँव!

कुछ लम्हों की खामोशी के बाद अपने सूखे ओंठों पर जीभ फेरते हुए शब्दों को चबा चबा कर कहा उन्होंने — एक बात समझ नहीं आती भाभी कि यदि वह मेरी वीरता थी तो मुझे नींद क्यों नहीं आती? सोने की कोशिश करता हूँ पर दिमाग साला पीछे का दरवाज़ा खोल अतीत की उन्ही अँधेरी सुरंग में घुस जाता है। क्यों हर रात सोने से पहले मुझे उस घटना को भुलाने के लिए, बदमाश बेचैनियों को मार डालने के लिए दो पैग जाम लेने पड़ते हैं। बोलिए, भाभी बोलिए, क्यों?

क्यों?

मुझे महाभारत का एक संवाद याद आया जिसमें धृतराष्ट्र विदुर से पूछते हैं कि – क्यों मुझे रात रात भर नींद नहीं आती? तो विदुर जबाब देते हैं कि महाराज नींद कामी पुरुष, चोर और उस आदमी को नहीं आती जिसका अपने से अधिक बलवान से वैर हो गया हो। काम की आपकी आयु नहीं है राजा होने के कारण आप चोर हो नहीं सकते तो तीसरा कारण ही आपको सोने नहीं देता होगा।

तो क्या अपने शत्रुओं के चलते सो नहीं पाते मेजर?

मेजर राजा के बारे में सुन चुकी थी। मणिपुर पोस्टिंग के दौरान कई खतरनाक ओपरेशन को अंजाम दे चुके थे वे, इसलिए मैंने भी चाय के घूँट भरते हुए कहा – बहादुरी तो वह नो डाउट थी ही।

मन की पीड़ा को भरसक दबाने का प्रयत्न किया उन्होंने पर पीड़ा थी कि झलक ही पड़ी। चाय के प्याले को परे सरकाते हुए कहा उन्होंने — मैडमजी, युद्ध और जोश के उन जादुई पलों में, वातावरण के प्रभाव में, कड़क फौजी वर्दी में जब देशभक्ति का ज्वार आपके चैतन्य पर छाया रहता है, दुश्मन का सफाया कड़क चाय की तरह लगता है। शायद मुझे भी लगा कि वो मेरी बहादुरी थी, मुझे क्या देशभक्ति के मारे हर कोई को यह लगा होगा पर आज जब सब कुछ गरज बरस कर थम गया है, आंधी तूफ़ान शांत हो गए हैं और मैं अपनी लहू लूहान, चोटिल, उधड़ी और पाबंद लगी आत्मा के पास वापस लौट आया हूँ अकेला तो क्यों बहादुरी का वह भाव वह आवेग लौट कर नहीं आता मेरे पास? क्यों मन के अन्दर सिर्फ एक सन्नाटा भर रह गया है? क्यूं लगता है कि वह बहादुरी, वह जश्न। वह किला फतह कर लेने की सी अनुभूति बहादुरी नहीं, बहादुरी का सिर्फ एक छलावा था। एक फंदा था, वातावरण का तात्कालिक प्रभाव था जिसमे फंस गया था मैं। यदि वह बहादुरी थी तो फिर रात रात क्यों सो नहीं पाता मैं? वह क्या है जो मुझे सोने नहीं देता है। क्यों हर रात अँधेरे के साथ साथ एक लाल दरिया मेरी आँखों के सामने फ़ैल जाता है? रुमाल से मुंह पोंछते हुए वे क्षण के क्षणांश भर रुके और फिर टेबल पर तीन मुक्के मारते हुए जोर से बोले।

क्यों? क्यों? क्यों?

बेचैनी काँटों की तरह उग आई थी उनके चेहरे पर। अपने प्रवाह में बोलते गए वे — सत्य था कि मैंने चार उग्रवादियों को ढेर किया पर हुआ क्या?



— सिर्फ मोगेम्बो खुश हुआ!

— यह वो सत्य था जो न शिव था और न ही सुन्दर। क्योंकि कोई भी वध तभी न्यायसंगत है जब वह लोककल्याण में हो, असत्य और अन्याय के विरुद्ध हो। क्या मैं दावा कर सकता हूँ कि वे जीवन जो मैंने या मेरी टीम ने लिए वे लोकहित में थे? मैडमजी आज अच्छा बुरा सब एक साथ इस कदर घुल मिल गया है कि किसी एक दूरबीन से आप सब कुछ नहीं देख सकते। जब मैं अपनी सोच के झरोखे से उस घटना को देखता हूँ तो सोचता हूँ कि उन मरते क्षणों उस बन्दे को क्या याद आया होगा। उसे न बाट जोहती पत्नी, न किलकारी मारते बच्चे याद आए होंगे, न कोई खुदा। न जन्मदायिनी माँ, न मणिपुर का सौन्दर्य। उसे सिर्फ याद रही होगी एक दुश्मनी... एक अफ़सोस कि वो मुझे नहीं मार सका। एकाएक वे अतीत के गलियारे में भटकने लगे और दूर देखते हुए आत्मलीन हो कहने लगे,

— मैडम, बचपन में मैंने एकबार एक निरीह कबूतर को बिल्ली के पंजे से मरने से बचाया था। तब फ्लैट सिस्टम नहीं थे, मैं पेशाब करने के लिए कमरे से बाहर आया तो एकाएक देखता हूँ बिल्ली के मुंह में फडफडाता कबूतर! मैंने देखा बाहर सींक झाडू रखी हुई थी, मैंने आव देखा न ताव वह झाडू उठायी और भरपुर वार से बिल्ली को दे मारा। बिल्ली का मुंह खुला और कबूतर देखते ही उड़न छू। मैं रहा होगा यही कोई दस ग्यारह साल का। लेकिन आज भी वह निहायत ही छोटी सी घटना की स्मृति मन के परदे पर ताजा है। मैं उस घटना को याद करता हूँ, करते रहना चाहता हूँ क्योंकि मैंने एक जीवन बचाया था। जबकि मणिपुर की वह घटना तो राष्ट्रीय महत्त्व की है फिर भी मैं उसे भूल जाना चाहता हूँ, चाहता हूँ कि यादों का वह नाला सूख जाए, मिट जाए जेहन से। स्लेट पर गलती से लिखे अक्षर की तरह मिटा देना चाहता हूँ उसे।

— बताइए क्यों?

— क्यों लगता है मैडम कि असाम पोस्टिंग के बाद मौसम ही बदल गया। एकदम से शुरू हो गया पराजित और आहत भावनाओं का मौसम। इस बदलते मौसम में देशभक्ति की मेरी मजबूत इमारत ही डावांडोल हो गयी। यादगार पलों को आदमी हमेशा जीना चाहता है पर मैं उन पलों को भूल जाना चाहता हूँ। आजतक पीछा करती है वह आवाज़। नहीं, नहीं लगता कि मैंने कोई बहादुरी की।

— कैसी आवाज़? गरिमा की आँखें चौड़ी हुई।

वे उसी भावदशा को याद कर उसी में थोड़ी देर के लिए खो गए, सिली बासी गंध के साथ। थोडा नीचे हो आए चश्में को ऊपर उठाते हुए और गला खंखारते हुए कहा उन्होंने,

— मैडमजी, यह बहुत ही निजी और आतंरिक घटना है, इसे बाहर से समझाना मुश्किल है, फिर भी मैं चेष्टा करता हूँ। मैडमजी जब गोली लगती है न तो बड़ी तेजी से खून बहता है गड गड जैसी आवाज़ के साथ। जैसे पूरे वेग से बह रहा हो नाले में पानी। मैडमजी आज भी उस आवाज़ को भूल नहीं पाता मैं। किसी काली छाया की तरह अवचेतन में छा गए हैं वे दृश्य... वह वह आवाज़। प्राण छोड़ती गाय की सी वे खौफजदा अधमुंदी आँखें। वह हों हों कर टूटती सांस की डोर... उस समय वह मेरा दुश्मन नहीं था। वह सिर्फ एक इंसान था। मर्मान्तक पीड़ा का एक चरम। उस इंसानी पीड़ा को आगे बढाने में मेरा भी योगदान था। मैडमजी जब भी दर्पण देखता हूँ, बचपन के उस चेहरे को खोजता हूँ जो कभी अपना था। स्थिर चित्त से जब उस घटना का विश्लेषण करता हूँ तो ढह जाता हूँ मैं। मैडमजी, होता यह है कि हम जवानों के भीतर नफरत का एक नकली ज्वार पैदा कर दिया जाता है और उसे हमारे कच्चे मानस में रोप दिया जाता है, जब तक नफरत का वह बिरवा जिन्दा रहता है हमें लगता है कि हमने वाकई बहादुरी का कारनामा किया है पर जैसे ही हम अपने स्वभाव की जिन्दगी जीने लगते हैं, सैनिक की खोल से बाहर आकर एक इंसानी खोल में दुबक जाते हैं, नफरत का वह ज्वार हमारे भीतर ढह जाता है तब हमारी वह नकली बहादुरी भी ढह जाती है। और तब परिंदे की तरह रूह फडफडाती है। हाय मैंने क्या कर डाला। मैं भी ऐसे क्षणों में अपने को भुलाने के लिए दो पैग जाम चढ़ा लेता हूँ। कराहना। तड़प, छटपटाहट तो बहुत देखी थी लेकिन ठीक अपनी ही गोली से ढेर हुए आतंकी के शरीर से इसप्रकार गड गड की आवाज़ के साथ तेजी से बहते खून को पहली बार देखा सुना था।

छोटी सी ख़ामोशी के बाद उन्होंने भी फिर बोलना शुरू किया,



— जी, 21असम राइफल्स में थी मेरी पोस्टिंग, २००८—११ के दौरान। नहीं यह इंडियन आर्मी के अंतर्गत नहीं आती है, सिर्फ कुछ ऑफिसर्स इंडियन आर्मी से, जैसे मैं, वहां आयातित होते हैं। जवान खुद वहीँ के होते हैं। जी अफ्सपा(AFSPA) वहां भी था। लगभग कश्मीर जैसे ही हालत थे। जनता वहां की भी एंटी फ़ौज थी। हमारा काम था लोगों के दिल और दिमाग पर काबू पाना और अलगाववादियों के होश ठिकाने लगाना। दो टूक शब्दों में कहें तो हमारा काम था बन्दूक की नोंक पर उग्रवादियों की अकडू गर्दन को दबोच डालना और इसप्रकार मिलिटेंसी का सफाया करना। लेकिन मिलिटेंट की पहचान सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण काम होता है। सब देखने में एक जैसे लगते हैं। नियम के अनुसार भी जब तक बन्दे के हाथों में हथियार नहीं है हम उसे आतंकी नहीं मान सकते। वे स्थानीय लोगों में इस कदर घुले मिले रहते हैं कि बहुत चुनौतीपूर्ण होता है, उनका सफाया करना। इसलिए हम खबरियों पर निर्भर रहते थे, जैसे ही कोई खबर मिलती ऑपरेशन के लिए निकल पड़ते।

मणिपुर के लोग हमसे खफा क्यों हैं? क्यों है वहां मिलिटेंसी? एकाएक मेरे मुंह से निकल गया था।

चाय ठंडी हो जाएगी। गरिमा ने आँखों से चाय की ओर इशारा किया। पर मेजर ने उन्हें अनसुनी करते हुए अपनी बात जारी रखी — मणिपुर में जो मिलिटेंसी है उसमें कश्मीर की तरह विदेशी तत्व का उतना हाथ नहीं है। वहां के लोग हमारे खिलाफ हैं तो इसलिए कि हमने उनके लिए कभी कुछ किया ही नहीं। बुरी तरह उपेक्षित किया है उन्हें। वहां विकास के कोई लक्षण ही नहीं। कोई सड़क नहीं, मार्किट नहीं, रास्ते नहीं। मछलियां बहुत महँगी। एक गैस सिलिंडर का भाव है २००० रुपये। मैंने खुद वहां कई बार पेट्रोल ४५०/ रूपये प्रति लीटर खरीदा था। माचिस की तीली तक वहां बर्मा से आती है और बर्मा में चीन से। और तो और हमने उग्रवाद पर काबू पाने के लिए गावों के बीच कंटीले बाड़े लगा दिए जिससे गाँव एक दूसरे से कट गए और उनका सारा सामजिक और आर्थिक ढांचा ही चरमरा गया... अब कोई बताए कि ऐसे हालात में वे हमारा विरोध नहीं तो और क्या करेंगे?

बात हो रही थी बहादुरी की। मैं जानने को मरी जा रही थी की जिसके लिए उनको शौर्य चक्र मिला क्या वह बहादुरी नहीं थी? मैं पूछने से खुद को रोक नहीं सकी। मैंने फिर पूछा – परन्तु वह बहादुरी क्यों नहीं थी?

थोड़े तल्ख़ शब्दों में आया जबाब — वह बहादुरी थी लेकिन नहीं थी।

— क्या मतलब? दुपट्टे को उँगलियों में लपेटते हुए पूछा गरिमा ने।

— मतलब यही कि एक समय मैं अपने को बहुत बहादुर समझता था मैडमजी। मुझे लगता था कि मेरी बहादुरी देश के काम आनी चाहिए इसीलिए मैंने फ़ौज ज्वाइन की। लेकिन असम राइफल्स की पोस्टिंग के बाद मैं यह सोचने को विवश हुआ हूँ कि जो मैंने किया और मेरी जिस बहादुरी के लिए मुझे शौर्य चक्र मिला क्या वह सचमुच वीरता थी? मक्खी की तरह हर वक़्त भिनभिनाता रहता है यह सबाल मेरे चारों तरफ? हाँ मैंने एक नहीं चार चार उग्रवादियों को मारा और वह भी बिना किसी केजुअलिटी के।

दरअसल फ़ौज के ही किसी भूतपूर्व कमांडर सुरमई ताम्खुल की हत्या उग्रवादियों द्वारा कर दी गयी थी, बाकायदा घोषणा कर। मैंने सोच लिया था कि इस हत्या का बदला मुझे लेना है। मैडमजी छह महीने लग गए मुझे उनकी संभाल लायक जुबान सीखने में और स्थानीय लोगों के बीच घुलने मिलने में। इस बीच उनके सांस्कृतिक आयोजनों मे आता जाता रहा। लोगों को विशेषकर बुजुर्गों को अपनी कंपनी में आमंत्रित करता और १५ अगस्त के मौके पर उनसे ही झंडा फहराता था जिससे लोगों के बीच एक सन्देश जाए। मैं तंदरुस्त युवकों को फ़ौज में भरती होने के लिए प्रोत्साहित करता और युवतियों को एयरहोस्टेस बनने का सुझाव भी देता जिससे उनके जीवन स्तर में कुछ तो सुधार हो। अलगाववादियों के भी सौ से ज्यादा ग्रुप थे। उद्देश्य एक – आजादी या पैसा। बहरहाल इन्ही दोस्तियों के जरिये मुझे पता चला कि मुझे ‘पिपुल्स लिबरेशन पार्टी ‘ नामक उग्रवादी संगठन से बदला लेना है। हरेक उग्रवादी संगठन की तरह इस संगठन की भी अपनी वर्दी और अपनी आर्मी थी। सारी वर्दियां और हथियार वाया बर्मा चाइना से आते थे। सरे आम बाज़ार में बिकते। उस संगठन के सारे पद इंडियन आर्मी जैसे। मेरे पास धमकी से भरा एक फोन आया। फोन करने वाले ने कहा ‘मैं अमुक कर्नल बोल रहा हूँ ‘। हमारे पास यह भी खबर थी कि वे अमुक दिन अमुक समय पैसों से भरी सरकारी गाडी लूटने जा रहे हैं। इक्कीस नवम्बर की रात एक बजकर बारह मिनट पर हमने भी घने जंगलों से होकर जाना तय किया। एक टीम मेरे साथ थी, एक टीम मैंने अपने जेसीओ के साथ रवाना की। एक और टीम को दूसरे रास्ते से आने का निर्देश दिया। घने जंगल के बीच हुआ घमासान। पहली गोली उनकी तरफ से चली। मेरा एक जूनियर जो मेरे साथ था वह फ्रीज़ हो गया। वह पहली बार फायरिंग और खून खराबा देख रहा था। मैंने उसे एक थप्पड़ लगाया और कहा – तू नहीं मारेगा तो वे तुम्हे मार डालेंगे। पर वह हिला तक नहीं। मैंने उसे अलग किया और तीन घंटे तक चले उस ओपरेशन में मेरी अगुआई में मेरी टीम ने तीन आतंकियों को ढेर किया। इसके बाद मैंने उन्हें रोक दिया था। अंतिम आतंकी को मैं जिन्दा पकड़ना चाहता था लेकिन उसने फायरिंग जारी रखी। मैं भी फायरिंग के लिए विवश हुआ। पल भर में ही मेरी गोली से उसका जीवन शेष हुआ। मैंने साफ़ अपनी गोली उसे लगते देखी थी। टीम के साथ पता नहीं चलता है कि कौन किसकी गोली से मरा, लेकिन वह मेरी गोली से मरा था। उसके बाद का समय तो व्यस्तता में, पीठ ठुकवाने में, जय हो नुमा सेलिब्रेशन में और पोस्टमार्टम के दस्तावेज तैयार करवाने में पता नहीं चला कैसे निकल गया। यह सेंस ऑफ़ टोटल ओब्लिवियन था। अपने काम में ही इतनी एकाग्र निष्ठा। अपने को पूरी तरह भूल जाने की यह स्थिति थी। ऐसे में कुछ भी सोचने की ताकत को ही देशनिकाला मिल गया था, इसलिए मैं वही सोच रहा था जो मेरी यूनिट मुझसे सोचवा रही थी।

लेकिन इसके बाद जो हुआ वह आत्मा को सुन्न कर देने वाला था... बोलते बोलते चेहरा धुंआ धुंआ हो गया था उनका। ठंडी हो चुकी चाय का अंतिम घूँट भरते हुए बोलना जारी रखा उन्होंने – जबतक मैं चेन्नई अपने घर वापस आया, दुनिया अपने में व्यस्त हो चुकी थी। विजय, बहादुरी, सेलिब्रेशन, प्रशंसा, शोहरत। सबका तूफ़ान उतर चुका था। तब मैंने जाना कि मैं लौट कर भी वापस नहीं लौट पाया हूँ। तब मैंने जाना कि मैं वही नहीं रह गया हूँ जैसा मैं गया था। इस पोस्टिंग ने मेरे दिल और दिमाग में जाने कितना गोला बारूद और जाने कितनी कुरूपता भर दी थी। पिछली बार आया था तो सारी कायनात संगीत से भरी लगती थी। आज कहीं टायर भी फटने की आवाज़ आती तो लगता जैसे कहीं बम फूटा है। रात तकिये पर सर रखता हूँ कि वह गड गड आवाज़। वे टूटती सांस की डोर... वे अधमुंदी आँखें। घायलों की दारुण चीख जैसे मेरे सामने की दीवार पर चिपक जाती हैं। क्यों होता है ऐसा? शायद इसीलिए कि जब निपट एकांत में आप अपनी काया से बाहर आ अपना होना देखते हैं तब आप सारी चकाचौंध, गर्जन तर्जन और शोरगुल से दूर अपने अंडर ग्राउंड अँधेरे में अपने सारे मेकअप और वर्दी उतार कर अपने आप से रूबरू होते हैं तभी आप जो घट चूका है उसपर सिर्फ और सिर्फ एक इंसान की हैसियत से सोच भी पाते हैं... बोलते बोलते फिर खामोश हो गए मेजर और सामने कतार में खड़े पेड़ों को देखने लगे।

बोलिए न... मैं और गरिमा एक साथ बोले।






रुक रुक कर हलकी हलकी सी बारिश होने लगी थी। हम सब भीतर आ गए थे। मेजर विक्रम ने एक लम्बी सी जम्भाई ली और बाहर निकल गए। मेजर आदित्य राजा शायद संवाद के उस बिंदु पर आकर ठहर गए थे जहाँ बोलना भीतर के खदबदाते लावे को बाहर निकालने जैसा जरूरी हो गया था। अपने प्रवाह में बहते रहे वे।

लेकिन असली कहानी तो अब शुरू होने वाली थी। बहादुरी का रहा सहा भ्रम भी तब टूट गया जब मुझे शौर्य चक्र के लिए चुना गया। शांति के दौरान मिलने वाला काफी प्रतिष्ठित इनाम है यह। और तभी मुझे सूचित किया गया कि तमिलनाडु राज्य की सरकार मुझे इस उपलक्ष में २० हजार रुपये की आर्थिक राशि देगी। मैं आसमान से गिरा, क्योंकि पंजाब और हरियाणा की सरकार शौर्य चक्र के साथ २० लाख की राशि देती है। तो क्या तमिलनाडु के जवान की जान की कीमत पंजाब के जवान की जान की कीमत से कम है? क्या यही मेरा महान देश है जो मेरी जान की कीमत २० हजार लगा रहा है? बहादुरी का सारा सोना झड़ गया — मुझे नहीं चाहिए ये भी। मैंने सरकार को निवेदन किया कि वह यह राशि भी मुख्य मंत्री फंड में मेरी तरफ से रख ले। मैं अभी जीवित हूँ और अपने परिवार का भरण पोषण कर सकता हूँ पर सोचिये यदि मेरी जगह कोई दूसरा सैनिक शहीद हो गया होता तो सरकार क्या उसकी विधवा को भी सिर्फ २० हजार देकर अपने दायित्व से मुक्त हो जाती? जिस बन्दे ने देश के लिए अपनी जान दी क्या उसकी विधवा और बच्चे रोटी के मोहताज ओ जाए? मैडम इसी पल मेरी बहादुरी, मेरी जान और मेरा शौर्य चक्र सब झूठे पड गए। सारे परदे हट गए। कहाँ था सम्मान? मुझे यह भी ताज्जुब हुआ कि मेरे पहले किसी ने भी इस गैर बराबरी का विरोध क्यों नहीं किया? मैंने राज्य सरकार को यह भी लिखा कि अब कोई भी सैनिक आपके राज्य से सेना में क्यों जाएगा? जब आप उसकी जान की कीमत सिर्फ २० हजार लगाएंगे? मैडमजी पहली बार मुझे लगा की जिस आदर्श राष्ट्रवाद के नाम पर मैं सेना में गया वह कितना बड़ा छलावा था। मैडमजी जब भी हम किसी ओपरेशन में जाते हैं न तो सबसे खरतनाक कदम होता है हाउस ओपनिंग ड्रिल यानी आतंकी के छुपे ठिकाने का दरवाज़ा खुलवाना। क्योंकि उसको तो मरना ही मरना है। अपनी टीम मैं मैंने आज तक यह काम किसी दूसरे को करने ही नहीं दिया। हमेशा मैंने ही किया और देखिये हमेशा बचा रहा। मणिपुर में भी जब तक रहा आतंकियों के निशाने पर रहा, क्योकि जिन चार आतंकियों को ढेर किया था मैंने उनमें से एक पिपुल्स लिबरेशन पार्टी के कमांडिंग अफसर का इकलौता बेटा था। वह हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गया था लेकिन हर बार उसे ही मुंह की खानी पड़ी। इस पोस्टिंग के दौरान कई बार ऐसा भी हुआ कि मुझे लगा ‘अब मरा’।

अब आप ही बताइये कि यदि वह बहादुरी थी तो क्या उसका इस प्रकार मोल भाव हो सकता था? हमें घूंटी में ही पिलाया जाता है कि दुश्मन का सफाया ही बहादुरी है। पर यह कौन तय करेगा कि दुश्मन कौन दोस्त कौन? काश हम पर इतिहास का बोझ और उसकी क्रूरता नहीं होती। अब तो लगता है कि कश्मीर हो या पूर्वोत्तर... इतिहास से बाहर निकल कर ही हम मुक्ति पा सकते हैं।

उनकी निगाहें डूबते सूरज की ओर उठी हुई थीं। गरिमा ने सामने की खिड़की खोल दी थी। मोगरा फूलों की खुशबू से घर भर गया था। लेकिन मेजर आक्रोश और भावना के ज्वार में बहने लगे थे। बाहर आने में कुछ समय लगा उन्हें। कुछ खामोश पल के बाद फिर एक गहरी सांस ली उन्होंने और अपने बालों पर हाथ फेरते हुए बेहद उदास स्वरों में धीरे-धीरे कहने लगे — परिवार की इच्छा के विरुद्ध फ़ौज ज्वाइन की मैंने, क्यों? क्योंकि मैं श्रेष्ठ का वरण करना चाहता था। पर आज १४ सालों की देश सेवा के बाद विशेषकर असाम राइफल्स की पोस्टिंग के बाद यह सवाल लगातार मेरा पीछा कर रहा है कि क्या मैं श्रेष्ठ जीवन जी रहा हूँ? अब तो हालत यह है कि मार्च पर निकालता हूँ तो पाँव आगे और मन पीछे डोलता रहता है।

— अब क्या चाहते हैं आप?

— क्या चाहता हूँ। व्यंग से ओंठ टेढ़े हो गए थे उनके। फिर भी हंसने की नाकाम चेष्टा में उनका चेहरा हलके से कांपा। मुलायम स्वरों में आँख से आंख मिलाते हुए कहा उन्होंने — किसी शायर ने कहा है 'मेरे रोने का जिसमें किस्सा है / उम्र का बेहतरीन हिस्सा है’ तो मैडम उम्र का बेहतरीन हिस्सा तो निकल गया अब तो बस जल्दी से जल्दी बूढ़ा हो जाना चाहता हूँ जिससे यह वर्दी मेरे बदन से उतर जाए... बोलते बोलते वे बिना बात ही हंस दिए, एक खोखली हंसी।

— अरे! ऐसा भी कोई चाहता है क्या? हम दोनों एक साथ फूट पड़े।

— मैडमजी, आप चाहें तो मुझे एक सनकी फौजी समझ लीजिये पर सच्चाई यही है कि मैं जीने के हाथों मर रहा हूँ। जीवन यदि बेहतर की खोज है तो मैं हर दिन बदतर हो रहा हूँ और मर रहा हूँ। असाम पोस्टिंग के बाद से तो यह हाल कि मन को संभालने के लिए कभी नदी किनारे। कभी झरनों के पास चला जाता हूँ। ऊपर से गिरते पानी की आवाज़ सुनता हूँ। सूखे पत्तों का शोर सुनता हूँ। तो कभी पाखियों की चहचाहट को सुनता हूँ। पल भर के लिए मन बहलता भी है लेकिन फिर सभी आवाज़ों के ऊपर एक आवाज छा जाती है वही बहते खून की गड गड... गड गड। क्या करूं? यादें साली मरती भी तो नहीं। लगता है जैसे दुनिया में मादाचो… बस एक ही आवाज़ रह गयी है। वही गड गड। यहाँ तक कि तेज पंखें के शोर में भी वही आवाज़ गूंजती है। सच मैडम, कोई भी सत्य सार्वकालिक नहीं होता, चढ़ती जवानी का वह सत्य। देश के लिए कुछ कर गुजरने का वह ज़ज्बा। एक अर्थपूर्ण जीवन जीने की चाहत में पूरे जीवन को ही देश के नाम बंधक रख देने की वह भोली भावुकता। पर मिला क्या? बस यह समझ कि अपने लिए स्पेस रखकर ही आप दूसरों के लिए कुछ कर सकते हैं, अपने ‘स्व’ को नकार कर नहीं। नहीं तो यही होगा। अँधेरे में अंधेरों के साथ लड़ते रहेंगे और आत्मा पर लगे इंसानी खून के इन छींटों के साथ जीते रहेंगे? कितना चाहता हूँ कि छूटती जिन्दगी को थाम लूं और अपने मन की जिन्दगी जियूँ पर अब तो यह भी नामुमकिन है। 18 वर्ष की कच्ची उम्र में ही जिस जज्बे से विवाह कर लिया उसे चाहकर भी नहीं तोड़ सकते हम। अब तो इस झूठ के साथ ही जीना होगा और धीरे धीरे देखिएगा सबकुछ वैसा ही रहेगा लेकिन नहीं रहेगा। मैं भी जीता रहूँगा लेकिन नहीं रहूँगा और यह आग भी बुझ जाएगी एक दिन और यह झूठ ही सत्य बन जाएगा। वे जैसे मुझसे नहीं, पीड़ा से पके अपने मन से ही बतिया रहे थे।

सांत्वना का हाथ फेरने की हलकी सी कोशिश की मैंने — चलिए वीरता या बहादुरी न सही, देशभक्ति तो वह नो डाउट थी ही। क्योंकि देश की अखंडता के लिए अलगाववादी ताकतों का संहार तो जरूरी है न! इसलिए आप ने जो भी किया देश के लिए किया। पीड़ा की दबी हुई एक लहर फिर से उठी उनके भीतर,

— तो फिर मुझे नींद क्यों नहीं आती रात रात, मैं भ्रमित क्यों हूँ? फिर सबसे बड़े अलगाववादी तो हम खुद हैं।

— क्या बोल रहे हैं?

— दिल पर हाथ रखकर कहिये कि क्या हमने मनुष्यता से, इंसानी भाईचारे से अलगाव नहीं ले लिया? क्या है यह? हिंसा के बदले हिंसा। आँख के बदले आँख। दुनिया कहाँ पहुँचेगी। चश्मे के कांच को पोंछते हुए धीमे से बोले वे।

उनकी उदासी का रंग और गहरा गया। गंदुमी चेहरा और पनीला हो गया। बड़ी बड़ी बिल्लोरी आँखें नम हुई। रुक रुक कर निकलने लगे उनके शब्द, टूटी माला के बिखरे मानकों की मानिंद।

— मैडमजी हिटलर भी खुद को देशभक्त कहता था। मेरी भ्रष्ट बुद्धि कहती है कि काश वह देशभक्त नहीं होकर बांसुरी बजाता, प्रेम गीत गाता तो दुनिया इतनी तबाह नहीं होती! कहीं पढ़ा था कि देशभक्ति दुष्टों की अंतिम पनाहगाह है। यदि यह देशभक्ति है तो ऐसी देशभक्ति भी किस काम की जो आप के भीतर के मिजाज से मेल ही न खाए, जो आदमी को आदमी ही न रहने दे। ऐसी देशभक्ति देशभक्ति नहीं, बबासीर है जो बचाने को नहीं मारने को वीरता कहती है। जो जितने को मारे उसे उतना ही बड़ा सम्मान! मैडम मेरा एक दोस्त था भानुप्रताप पांडे। उसकी पोस्टिंग राष्ट्रीय राइफल्स ४४ में कश्मीर में हुई। उसने मुझे कहा था कि उसका सबसे बड़ा स्वप्न है कि कम से कम एक मिलिटेंट को अपनी बन्दूक से मार गिराऊं। सोचिये स्वप्न यह नहीं कि मैं कम से कम एक जीवन बचाऊँ कि कोई भी जीवन मामूली नहीं होता। स्वप्न यह नहीं कि एक आतंकी को सही राह पर लाऊँ या उससे समर्पण करवाऊं। स्वप्न है कि एक को मार गिराऊँ!

— तो फिर पूरा किया उसने अपना सपना? हम दोनों ने एक साथ पूछा।

— हाँ मारा ना! उसने खुद ने ही कबूल किया कि उसने उसे वीरता से नहीं छल से मारा था। दरअसल जिस घर में मिलिटेंट जख्मी हालत में छिपा पड़ा था उसी घर के मुखिया के बेटे ने उसे खबर दी थी और बाद में उसे छल से मरवा कर मुखिया के बेटे ने डेढ़ लाख का इनाम भी पाया था।

— वो खुश है?

— हाँ हाँ। वो भी मेडल पाने की लाइन में है... दरअसल वीरता के ऐसे ही तमगे के नीचे हम अपने आधे अधूरेपन को छिपा लेते हैं और अपने मन को पालतू बिल्ली की तरह बहलाए फुसलाए रखते हैं। मेरे साथ दुर्भाग्य यह कि मेरा आदिम बंजारा मन पालतू की बजाय जंगली बेलगाम और बेकाबू बिल्ली बन गया है जो न बहलाए बहलता है और न समझाए समझता है।



ठुड्डी पर हाथ धरे चिन्तक की मुद्रा में बैठे थे वे। धीरे धीरे जैसे खुद को खोल रहे थे कि खुद से ही उलझ रहे थे। जी बांग्लादेश युद्ध की एक सच्ची घटना बताता हूँ आपको… दो सगे भाई अपने अपने वतन के कमांडिंग अफसर की हैसियत से अपनी अपनी यूनिट के आमने सामने थे। एक भारतीय था और एक पाकिस्तानी। १९४७ के देश विभाजन के समय दोनों अलग अलग हो गए थे। बहरहाल दोनों ने दोनों को पहचान लिया था। फायरिंग के आर्डर के पहले भारतीय कमांडिंग अफसर के मुंह से निकला – भाईजान सावधान। उस भयंकर बमबारी में वह पाकिस्तानी अफसर मारा गया। युद्ध जीतने के बाद उस भारतीय कमांडर पर आत्मग्लानि का वह दौरा पड़ा कि उसने सेना की नौकरी से ही त्यागपत्र दे दिया। मैडमजी जीवन की ऐसी ही चरम स्थितियां सारे पर्दे हटा देती हैं। सारी काई हट जाती है। अब आप ही बताइए कि यदि वह देश भक्ति थी तो कमांडिंग अफसर भाई के मारे जाने के बाद भयंकर आत्मग्लानि का शिकार क्यों हुआ? जो पहले देशभक्ति थी वह बाद में आत्मग्लानि में क्यों बदल गयी। देशभक्ति का कीड़ा भयंकर पीड़ा में क्यों बदल गया? बोलिए। क्या है सत्य? कई बार स्वप्न देखता हूँ कि मैं आसमान में उड़ रहा हूँ। एकाएक मेरे पंख टूट गए हैं, मैं नीचे धरती पर औंधा पड़ा हूँ और गिद्ध मेरे ऊपर मंडरा रहे हैं। क्यों आते हैं ऐसे स्वप्न मुझे? मैडमजी मानता हूँ कि जो धरती के धब्बे हैं, उन्हें साफ़ करना ही पड़ता है, पर जिनको मैंने मारा क्या मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि वे धरती के धब्बे थे? क्या मैं अपने लिए कोई ऐसा तर्क दे सकता हूँ कि मैंने इंसान को नहीं शैतान को मारा? मेरे लिए वे अलगाववादी थे पर अपने विश्वास के अनुसार तो वे अपने पर हुए अन्याय का विरोध ही कर रहे थे। जब जब वे मरी हुई जवान लाशें। वो बहते खून की गड गड आवाजें पीछा करती हैं तो जाने कहाँ से दबा हुआ सत्य सामने आ खड़ा होता है और भीतर से जबरदस्त तलब उठती है कि कोई ऐसी जगह हो जहाँ भाग जाऊं। जहाँ कोई देश नहीं हो और न ही कोई सीमा हो। जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच के तार इतने बेसुरे और बेजुडे न हो क्योंकि देश की रक्षा और सत्य और सौन्दर्य की रक्षा दो अलग चीजे हैं। और सत्य यह भी कि जब तक मनुष्य मनुष्य से नहीं जुड़ेगा वह न किसी राष्ट्र से जुड़ सकता है न किसी भगवान् से और न ही वीरता से।

वे फिर चुप हो गए थे। शाम का झुटपुटा स्याही में बदलने लगा था। बिजली की हलकी रोशनी में ध्यान से देखा उनका चेहरा। निर्मलता में तैरता एक उदास चेहरा। मैं भर गयी। वे उठने को हुए पर उठते उठते उन्होंने मुझसे कहा — मैडम आपने इतने सवाल पूछे, एक सवाल मैं भी पूछना चाहता हूँ, हो सके तो जवाब दीजियेगा।

— हाँ हाँ। पूछिए ना। गरिमा की आँखें चमक गयी। क्षण के क्षणांश में हमने जाने क्या क्या सोच लिया था। पर हमारे सोचे सभी संभावित सवालों को अंगूठा दिखाते हुए धीमे से कहा उन्होंने — मैडम, मैं जिन्दा होने का अहसास खो चूका हूँ। वापस जिन्दा होकर इंसान हो जाना चाहता हूँ, आसमान बन पूरी धरती पर फ़ैल जाना चाहता हूँ! पर क्या हो सकता हूँ? बोलिए। कहते कहते एक छाया चेहरे पर थिरक कर गुजर गयी उनके। देखा भी ऐसी नजर से उन्होंने मुझे जैसे मेरे जवाब पर ही निर्भर हो उनकी जिन्दगी की नियति।

क्या कहती उनसे जो दोपहर की धूप में ही ढलती शाम जैसे हो गए थे। संवेदनशील इंसान के लिए शायद हर जीवन एक ट्रेजेडी है। कहना चाहती थी कि जबतक यह गड गड आपके भीतर जीवित है, एक इंसान के रूप में आप सुरक्षित हैं। कि जिसके भीतर जो है उसे ही वह बाहर खोजता है। उसी में वह आनन्द पाता है! यही आपकी त्रासदी है कि आपके भीतर सत्य और सौन्दर्य भरा हुआ है। कहना चाहती थी कि शायद ही कभी आपके ये अनुभव और विलक्षण सोच जो आम फौजियों और समाज की सामूहिक चेतना से कितने भिन्न हैं इतिहास में दर्ज हो... पर कुछ न कह सकी। जानती थी कि मेरे कोई भी शब्द उनपर फाहे का काम नहीं ही करेंगे इसलिए खामोश रही मैं।

उनकी आवाज़ का तीखापन चाकू की तरह चीर रहा था मुझे और उन्हें उनका मोबाइल परेशान कर रहा था जो बार बार बज रहा था। शायद पत्नी का था। शायद उन्हें कहीं जाना था। वे उठने को हुए। जाते वक़्त हाथ जोड़े उन्होंने। हम दोनों ने भी। जाने कब फिर मिलना हो। हो भी या न हो। वेदना और संवेदना की पाकीजगी भरी उदासी तारी थी उनके चेहरे पर। हम भी ग़मगीन थे। शायद हम दोनों ही अपने अपने दुखों के घरों में थे!

मन किया कह दूं — भाई साहब अपनी जंगली बिल्ली को संभाल कर रखियेगा, सारे उत्पात की जड़ वही है। पर जाने क्यों कह न सकी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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