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उपन्यास कैसे लिखें? ऐसे— पढ़िए: उमा शंकर चौधरी के उपन्यास 'अंधेरा कोना' के अंश

जन॰ 7, 2019



उपन्यास कैसे लिखें? ऐसे — पढ़िए: उमा शंकर चौधरी के उपन्यास 'अंधेरा कोना' के अंश ... पता नहीं, लेकिन हो सकता है कि आपने भी कभी मेरी तरह यह सोचा हो कि कोई कथाकार आपका प्रिय लेखक क्यों हो जाता है। उमा शंकर को जितनी दफ़ा पढ़ता हूँ बस यही लगता रहता है उससे अधिक सच किसी और लेखक को हो सकता है पता हो लेकिन उससे अधिक उस सच को उसके पूरे दुःख समेत लिख और कोई नहीं पाता। 

ये ज़रा देखिये
नागो ने कलम से उस रजिस्टर को भरना शुरू कर दिया। नाम पता के साथ समस्या पर लिखा- ‘सूरज के पास कामे नहीं है। उ खड़े खड़े मर रहा है। नांय काम है, नांय खाना। क्या करें हम उसका, हमारी समझ में नहीं आता।’


नागो रजिस्टर पर अपनी समस्या लिखकर आकर बैठ गया। कुर्सी कोई खाली नहीं थी। वह नीचे जमीन पर बैठा। बाहर बारिश जैसा मौसम था। रोशनी कम हो गई थी। बहुत सारी औरतें घूंघट ओढ़े वहां बैठी थीं। छोटे छोटे बच्चे उन घूंघट काढ़े औरतों के शरीर से चिपके हुए थे। वे रो रहे थे और पूरे माहौल में एक चिल्ल पों मची हुई थी। लोग जो वहां मौजूद थे उनमें से कुर्सियों पर बहुत सारे बूढ़े बैठे हुए थे। बहुत सारे ऐसे लोग जो अब जवान रहे नहीं और अभी बूढ़े हुए नहीं हैं वे या तो जमीन पर बैठे थे या फिर वे इधर उधर खड़े थे। जो शामियाने के अंदर बैठे थे उनमें से बहुत सारे लोग उस दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए थे जिधर वह बड़ा सा हाॅल था और जहां मुख्यमंत्री बैठने वाले थे। बहुत सारे लोग जो उस दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठे थे वे बीच में कभी कभी अपना सिर उपर उठाकर आसमान की ओर देख लेते थे। लेकन ऊपर आसमान नहीं शामियाना था ऐसा उन्हें हर बार अहसास होता होगा लेकिन थोड़ी थोड़ी देर पर ऐसा बहुत से लोग करते ही रहे।  

उमा शंकर चौधरी के उपन्यास 'अंधेरा कोना' से

लम्बी रेस का घोड़ा, उपन्यास 'अँधेरा कोना' के ये अंश पढ़ना, उमा शंकर की स्टाइल में उन सचों को महसूस करना, जिनके होने का मुझे पता है, नहीं पता था, वही अजीब-सी कशमकश दिये हुए है जिसमें मैं सचों के बीच यह सोच रहा होता हूँ कि कोई कथाकार आपका प्रिय लेखक क्यों हो जाता है।
उपन्यास और कहानी में अंतर! छोड़िये, पढ़िए — उमा शंकर चौधरी के उपन्यास 'अंधेरा कोना' के अंश..

भरत एस तिवारी
6-01-2019


उमा शंकर चौधरी के उपन्यास 'अंधेरा कोना' के अंश

घोड़ों के बारे में आपने इतिहास में बहुत पढ़ा और सुना होगा। घोड़ों ने आर्यों को गतिशीलता दी थी। घोड़ों ने इतिहास में नायकों को नायकत्व दिया था। लेकिन घोड़े कई बार इतिहास को झुठला देते हैं और खुद बन जाते हैं नायक।






चुनाव, सड़क, गिट्टी और अलकतरा  


जब पूरे इलाके में अलकतरा की गंध घुल गई तो गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। वर्षों गड़ढे में सड़क को ढूंढने वाले गांव के लोगों को अब यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कभी ऐसा भी होगा कि एक दिन इस गांव की सड़क मखमली बन जायेगी। लेकिन आज जब अलकतरा की गंध फिजाओं में चारों तरफ फैल गई तो लोगों को लगा जैसे सपना साकार होने वाला है।

      सुबह होते ही यह खबर आग की तरफ फैल गई कि रातांे रात जहां-तहां गिट्टियां गिरा दी गई हैं। थोड़ी-थोड़ी दूर पर अलकतरा के ड्रम। लगता है अंधेरे ही काम भी शुरू हो गया। और रातांे रात ही कम से कम तीन जगहों पर एक एक बोर्ड लगा दिया गया। ’इस पथ के निर्माण का कार्य विधायक छुई देवी के फंड से हो रहा है उनके अथक प्रयास के लिए उनका साधुवाद।’ साथ ही विधायक छुई देवी की फोटो और उनका चुनाव चिह्न भी। उस फोटो में छुई देवी अपने सिर पर साड़ी का आंचल लिये हुए थी और मुस्करा रही थी। उस साड़ी में कई फूल थे।

पच्चासी साल की उम्र में फूलो बाबू ने तो जैसे आस ही छोड़ दी थी कि इस जिन्दगी में कभी वे इस सड़क को सड़क कह भी पायेंगे। फूलो बाबू कहते ‘‘जब से बुढापा आया है तब से कभी ऐसा नहीं हुआ कि टिशन से घर पहुंचे और दो दिन खाट पर न गुजारें।’’ बहुत दुखी होते तो कहते ‘‘सार जिन्दा में तो मारा ही मर के भी इहे गड्ढा होयके जाय पड़ी। अरे कम से कम हमरे लास क त सुकून मिल जाय।’’ सड़क बन रही है यह खबर सुनते ही सबसे पहले उन्होंने अपने मुंह से निकाला ‘‘चलो हमरे लहास क त सांति नसीब हुआ। इ देस में साला लास क भी सुकून नसीब हो जाये त कम बड़ी बात नांय है।’’

अभी बिहान तरीके से हुआ भी नहीं था कि सार लल्लनवां चिल्लाने लगा। ‘‘अब देखो इ गांव के सन्त लोग हमरे गांव में कैसे बनता है हेमा मालिनी क गाल।’’ एकदम बौरा गया था साला। धोती फाड़के रुमाल तो नहीं बनाया था हां अखबार को मोड़कर माइक जरूर बना लिया था। ‘‘सुनो भाइयो, भोर हो गया है। एक खुसखबरी के साथ अपन अपन आंख खोलिए। अरे मुरगा बांग दे न दे घर को चला गया है सारा तारा। इ है छुई देवी का वादा सबको मिलेगा ओमपुरिया के गाल से छुटकारा।’’ लल्लनवा पैरेडी करने में बड़ा माहिर है।

शिवधरवा को रोज जाना पड़ता है ट्रेन पकड़कर सरैया बाजार। इस सड़क से बहुत दुखी रहता है वह। कहता है ‘साला आते आते जो बैंड बजता है इ शरीर का कि कुछ पता नहीं रहता है कि कौन सा अंग कहां है। रोज जाने का पड़े तो कौनो काम के रह नहीं जायेंगे भाई। रोज जाना पड़ता ही है तब साला बीवी के साथ सोने के लिए कौनो और आयेगा क्या? साला कमर का इ हाल हो जाता है कि उठा ना जाये, बैठा न जाये। बिछौना पर जाते ही सुध कहां रहता है कि कहां है बीवी।’

अखबार वाले भोंपू से जब यह आवाज गूंज कर निकली तब सबको तो पहले लगा साला इ लल्लनवा पगला गया है। लेकिन जब सबने इस आवाज की गूंज के मैटर को सुना तो सबकी बांछें खिल गई।

दिन निकला तो लोग झुंड बना कर निकले देखने। पुरुष अलग। महिलाएं अलग। कौवों का झुंड भी अलग। गायों ने सड़कों की तरफ मुंह करके एक खास किस्म की आवाज निकाली। अतिया देवी प्राथमिक विद्यालय, तेतरी में अपने मोटरसाइकिल से शिक्षक प्रशांत सिंह पहुंचे तो अपने साथ अलकतरे की थोड़ी सी खुशबू भी साथ ले आये। शिक्षक नियुक्त होने के बाद अभी हाल ही में शादी हुई है। दहेज में मिली यह मोटरसाइकिल के साथ साथ बांये हाथ की तीसरी उंगली में सोने की अंगूठी भी चमक रही है। यहां अलकतरे की खुशबू के साथ बोले ‘स्पीड तो बहुत है भाई। ऐसे ही चुनाव हर साल आवे तो मजा आ जावे।’ विद्यालय में चार मास्टरनी पर अकेले मास्टर हैं इसलिए भाषा थोड़ी मुम्बइया हो गई है। कुछ लौंडों ने छुई देवी के उस बोर्ड के साथ सेल्फी दे मारा। कुछ ने आग पर गर्म हो रहे अलकतरा के साथ तो कुछ ने बनते हुए सड़क को अपनी सेल्फी में शामिल कर लिया। अभी पिपरी तक ही खंभा गड़ा है इसलिए वहां के लौण्डे जरा ज्यादा फ्रेंडली हो गए हैं मोबाइल के साथ। वैसे मोबाइल तो तेतरी और उससे आगे झुनरी तक के लौण्डे लपाटे इस्तेमाल करते हैं लेकिन हां चार्ज करने की समस्या है। तो यहां सेल्फी लेने में पिपरी तक के लड़के ज्यादा थे।

विदो बाबू अपना राग अलापते दिखे। ‘कब तक काम नहीं करेंगे आखिरकार यह लोकतंत्र है। हम भी कोई चुगद नहीं बैठे हुए हैैं। आपको जवाब देना पड़ेगा। आखिर हमारे इतने सारे सवालों का जवाब तो उनको देना ही था।’

कुछ लोग तो साफ मानते हैं कि यह आगामी चुनाव का नतीजा है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि विदो बाबू की बात में भी दम है। विदो बाबू कहते थे कि ‘इस लोकतंत्र में देर है मगर अंधेर नहीं।’ उन्होंने ढेर सारे पत्र लिखे थे। वे कहते थे ‘एक दिन उन्हें जवाब देना ही होगा।’ इसे अब वे अपना जवाब मानते हैं। यह अलग बात है कि उनके बहुत सारे पत्र आज भी अनुत्तरित ही हैं।

शाम को ठकुरवारी के प्रांगण में लैला-मजनू पेड़ के नीचे मंडली बैठी। मौसम सुहावना था और बहुत गर्मी नहीं थी। यह मंदिर बहुत पुराना था और इसमें कई भगवान थे। अहाते के भीतर यह लैला-मजनू पेड़ था। लैला-मजनू यानि पीपल और बरगद एक साथ। आप देख लेंगे तो हैरान। दोनों के जड़ एक साथ। दोनों की टहनियां और पत्ते तक एक-दूसरे में गंुथे हुए। एकदम एक-दूसरे में लिपटा हुआ पेड़, खजुराहो की मुर्तियां सरीखा। ये दोनों कैसे साथ हुए किसी को नहीं पता। साथ लगाये गये या साथ हो गये नहीं पता। हां लेकिन ये पक्का है कि ये पेड़ हैं बहुत पुराने। पुराने इतने कि ठीक-ठीक यह पता करना मुश्किल कि ये पेड़ ज्यादा पुराने हैं या यह मन्दिर। कभी लगता है कि मन्दिर था इसलिए यहां ये पेड़ लगाऐ गए होंगे। कभी लगता है यह अजीब किस्म का पेड़ था इसलिए यहां मन्दिर बन गया होगा। खैर.........। इस पेड़ के चारो तरफ गोलाई में सीमेन्ट का चबूतरा बना दिया गया है। ठकुरवारी की तरफ इस गोलाई को बढाकर ठकुरवारी से मिला दिया गया है जिससे बैठने के लिए चौरस सी अच्छी खासी जगह निकल आयी है। इस चबूतरे पर दिन में लोग सुस्ताते हैं और मंगल, बृहस्पतिवार और शनिवार शाम को चौरस की जगह पर मंडली बैठती है और भजन होता है। चबूतरे के बगल में चापाकल है जिसका पानी बहुत मीठा है। इन पेड़ों के बीच से बरगद की लताएं लटकी हुई हैं जिनसे बच्चे लटकते रहते हैं।

                आज दिन सोमवार है लेकिन मंडली बैठी है। मंडली बैठी और पूरा गांव उमड़ पड़ा। लेकिन आज सिर्फ भजन नहीं हुआ। कुछ मस्ती और कुछ रोमांस। दुक्खन ने गीत गाया तो सारा गांव जैसे झूूम गया। दुक्खन कपड़े की सिलवायी हुई बनियान पहिने हुए था और मटमैली सी धोती। धोती कुछ मटमैली हो गयी थी और कुछ रंग ही ऐसा था। बैठते वक्त धोती को अक्सर वो ऊपर की ओर समेट लेता था, इसलिए अर्धनग्न सा बैठता था। मुंह में ऊपर के लगभग सारे दांत टूट गए थे इसलिए वह बोलता तो उसके मुंह से हवा बिना रुकावट के बाहर निकल आती थी। स्वर वर्ण के उच्चारण में तो कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन व्यंजन ध्वनि में पर्याप्त संघर्ष नहीं हो पाता था इसलिए शब्द तुतला कर ही बाहर निकल पाता था। जब वो बोलता है तो शब्दों के साथ एक खास तरह की फुस्स की आवाज निकलती है। आम दिनों में दुक्खन गीत गाता था तो लोग हंसते थे। परन्तु आज दुक्खन की आवाज में गाना सुनकर लोग पागल हुए पड़े थे। ढोलक की थाप पे आज दुक्खन अपने रंग में था और गांव के लोग उसी थाप पे नाच रहे थे। गांव वाले नाच रहे थे तो नागो भी नाच रहा था। गंजी लुंगी पहने नागो के इस नाच को पहले किसी ने देखा नहीं था। नागो को नाचना नहीं आता पर वह नाच रहा था। आज खुशी का दिन जो था।

तू लगावे ला जब लिपिस्टिक, हिलेला सारा डिस्टीक, जिला टाॅप लागे लू, कमरिया.........






कुछ सवाल और उनके उत्तर का इंतजार


इस तेतरी गांव के लिए विदो बाबू एक उपलब्धि की तरह हैं। यह इस गांव का सौभाग्य है कि इस गांव में विदो बाबू हैं।

‘इ गांव में गाय भैंस, जानवर से लेकर इंसान तक सभै उनके ही त भरोसे हैं। डागडर त भगवाने का रूप होता है।’

‘उनका नाम सम्मान से लीजिए उ खाली डागडर ही नहीं हैं। उ का कहते हैं। उ त कारकर्ता हैं।’

‘अरे सार उ कारकर्ता नहीं होता है आन्दोलनकारी होता हैं।’

विदो बाबू वेटेनरी डाॅक्टर थे। यहां के लोग भेटेनरी डागडर कहते हैं। इस तेतरी गांव से लगभग चौदह किलोमीटर दूर जो काजरा ब्लाॅक है वहीं वेटेनरी अस्पताल है। वे ताउम्र वहीं डाॅक्टर रहे और ताउम्र अपनी साइकिल से जाते रहे। अभी साढे चार वर्ष होने को आये जब वे अपनी नौकरी से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। लेकिन डाॅक्टर भी क्या कभी अवकाश प्राप्त करता है। विदो बाबू जब नौकरी में थे तब भी उनकी इस काबिलियत का फायदा इस गांव को मिलता रहा था।  अब तो खैर वे गांव के होकर ही रह गए हैं।

इस गांव में कम ही लोग होंगे जो फुलपैंट और शर्ट पहनते होंगे। विदो बाबू उनमें से एक थे। और शायद यह भी कारण है कि वे अपनी उम्र से कम से कम दस वर्ष कम लगते हैं। सिर के बाल अभी पूरी तरह सफेद नहीं हुए थे। खिचड़ी बाल उनकी उम्र को कुछ हद तक ढंकता था। मूंछ के बाल भी खिचड़ी ही थे। शरीर उनका बहुत दुबला नहीं था लेकिन वे बहुत मोटे भी नहीं थे। जब वे साइकिल की सवारी करते थे तब ऐसा लगता नहीं था कि साइकिल उनके बोझ से दब जायेगी। वे साइकिल आराम आराम से चलाते थे और पीछे कैरियर में एक बैग खोंस के रखते थे। उस बैग में उनके बहुत सारे औजार होते थे, कुछ दवाइयां, कुछ इंजेक्शन।

विदो बाबू का कद छोटा था इसलिए अपनी साइकिल पर मेढक की तरह फुदक कर चढ़ते थे। उनको साइकिल चलाते हुए देखने में हमेशा ऐसा महसूस होता जैसे उनके दोनों पैर दोनों तरफ की पाइडिल के चक्र को पूरा नहीं कर पायेंगे। कई बार लोग सड़क किनारे खड़े होकर यह देखने में लग जाते थे कि उनके पैर इस चक्र को पूरा कर पा रहे हैं या नहीं। और यह एक रहस्य की तरह ही तबतक रहता था जबतक कि यह चक्र पूरा नहीं हो जाता। परन्तु विदो बाबू लोगों के सारे अंदेशों को धता बताते हुए पाइडिल के चक्र को पूरा करते थे और उनकी साइकिल आगे बढती थी। हां इसमें कोई शक नहीं है कि साइकिल पर चढ़ना-उतरना उनके लिए थोड़ा मुश्किल अवश्य था। वे अक्सर साइकिल पर चढने के लिए थोड़ी ऊंची जगह की तलाश में रहते थे जिस पर एक पांव रखकर वे साइकिल पर चढना चाहते थे। और जब ऐसी कोई ऊंची जगह नहीं मिलती तब वे अपनी साइकिल पर फुदक कर चढते थे। हां अचानक ब्रेक लगाकर साइकिल से उतरने में उन्हें आज भी दिक्कत ही होती है।

विदो बाबू अक्सर उदास रहते थे। वे हंसते थे तब भी उदास ही दिखते थे। या उनका चेहरा ही उदास था। जब वे बोलते थे तो वे अपनी उदासी को और घना कर लेते थे। वे ऐसा जानबूझकर करते थे या उनका चेहरा ही ऐसा था यह तो किसी को नहीं पता, परन्तु उनकी उदासी उनकी पहचान सी हो गयी थी। लोगों को कभी यह समझ में नहीं आता था कि अब इस गांव में सड़क, बिजली, अस्पताल नहीं है तो यह अच्छी बात तो नहीं है परन्तु इसमें इतना दुख मानने वाली कौन सी बात है।

विदो बाबू सड़क के गड्ढों को देखते और उदास हो जाते। विदो बाबू यहां के लोगों को देखते और उदास हो जाते। वे पेड़ों को देखते और उदास हो जाते। वे पेड़ों पर बैठी चिड़ियों को देखते और उदास हो जाते। वे अक्सर कुंओं को देखते, उसमेें झांकते और उदास हो जाते। वे पोखरों को देखते और उदास हो जाते। वे खेतों को दूर तक देखते और उदास हो जाते। उस गांव के लोग विदो बाबू को देखते और उलझन में पड़ जाते। सड़क किनारे खड़े विदो बाबू  पेड़ पर बैठी चिड़िया को उदास होकर देखते रहते और लोग उदास खडे विदो बाबू को देखते रह जाते। विदो बाबू उदास हो जाते तो उनके माथे पर एक खास तरह की सिकुड़न आ जाती थी जिससे उनकी दोनों भवें आपस में नजदीक आ जाती थीं। 

विदो बाबू जानवर के डाॅक्टर थे परन्तु गांव के लोग अक्सर अपना इलाज कराने आ जाया करते थे। गांव में कोई डाॅक्टर उपलब्ध नहीं था इसलिए लोग जानवर के डाॅक्टर को भी अपने लिए वरदान ही मानते थे।

       पहले शुरू में तो विदो बाबू ने लोगों को समझाना चाहा कि वे जानवर के डाॅक्टर हैं और जानवर और इंसान में बहुत फर्क होता है। लेकिन लोग कहते ‘जानवर और इंसान में काहे का फर्क। हम भी जीते हैं और वह भी जीता है। हम भी खाते हैं वह भी खाता है। हम भी सांस लेते हैं और वह भी लेता है। और इससे आगे ना हम कुछ करते हैं और ना ही वह।’

और इस तरह विदो बाबू ने इस गांव की आवश्यकता के लिए इंसानों का इलाज भी सीखा। फिर वे थोडे़ पतले वाले इंजेक्शन भी ले आये जो इंसानों को दिये जा सकें।

विदो बाबू बहुत ही नैतिक इंसान थे। एकदम सच्चे अपने कर्तव्य के प्रति। इसलिए वे अपनी नौकरी में भी सब को अखरते रहे। जब तक नौकरी किया एकदम सच्चाई से किया। जो भी उनका कर्तव्य था उन्होंने उसमें कभी कोताही नहीं की। और अपने संज्ञान तक जो कोताही करने वाले थे उनके खिलाफ शिकायत भी की। यही कारण है कि ऊपर से लेकर नीचे तक सभी लोग विदो बाबू से नाराज रहते रहे।

‘इ युधिष्ठिर की औलाद जबे तक रहेगा साला जिन्दगिये बरबाद है।’ सारे स्टाफ कोशिश करते रहे कि उस अस्पताल से उनका तबादला हो जाए। लेकिन तबादला के लिए पैसा चाहिए। और पैसा तो पहले कमाना पड़ता। पैसा विदो बाबू कमाने नहीं देते। इसलिए वे सब एक ऐसे चक्र में उलझ गए थे जिसका समाधान सिर्फ विदो बाबू के रिटायरमेंट में था। विदो बाबू रिटायर हुए तो सबकी चांदी हो गयी लेकिन तब तक में कइयों की जिन्दगी पूरी ही हुई समझिये।

विदो बाबू ने ढेर सारे पत्र लिखे। कुछ अपने साथ नौकरी करने वालों के खिलाफ। कुछ उस विभाग की अनियमितता के खिलाफ और कुछ उस विभाग के सुधार के लिए।

इससे सुधार तो कुछ नहीं हुआ और न ही उनकी शिकायतों या सुझावों पर कोई सुनवाई हुई। हां यह जरूर हुआ कि उनके ढेर सारे दुश्मन पैदा हो गए। ढेर सारा या कहें लगभग सारे ही। जब विदो बाबू रिटायर हुए तब उनकी पेंशन से लेकर सारे कागज-पत्तर तक संभालने में काफी दिक्कतें आईं। उनका उस वेटनेरी अस्पताल में जाना लगभग बन्द कर दिया गया था। लेकिन विदो बाबू को न तो कोई फर्क ही पड़ा और न ही उन्हांेने अपने आप को बदला।

इस गांव की समस्या को लेकर विदो बाबू यहां-वहां शिकायत लिखते रहे थे परन्तु रिटायरमेंट के बाद जब उन्होंने तेतरी मंे रहना शुरू किया तब इस गांव की समस्याओं को अपनी जिम्मेदारी बना लिया और उसपर जम कर लिखना शुरू कर दिया। पटौना रेलवे स्टेशन से लेकर तेतरी और आसपास के कई गांवों की ढेर सारी समस्याओं पर उनकी निगाह थी।

पटौना रेलवे स्टेशन के उस पार जो स्कूल था वहां बच्चे कैसे जायंे। पूछा विदो बाबू ने। बच्चे जाएं तो कोई रेलवे फाटक क्यों नहीं है वहां। पूछा विदो बाबू ने। बच्चे जब उस रेलवे लाइन को पार करें तो दायें देखें कि बायें। पूछा विदो बाबू ने।

‘इन बच्चों की जान की चिंता सरकार नहीं करेगी तो कौन करेगा।’

विदो बाबू ने सूखते जा रहे पोखर के बारे में सवाल पूछा। इस खस्ता हालत सड़क के बारे में सवाल पूछा। पेड़-पौधे, हवा, पशु-पक्षी के बारे में पूछा। विधायक का जो फंड आता है वह कहां गया पूछा विदो बाबू ने। इ गांव में कौनों काम विधायक के फंड से काहे नहीं हुआ पूछा विदो बाबू ने।

वे सवाल पूछते लेकिन लिखित में। वे चिट्ठियों में सवाल पूछते रहे और सारी चिट्ठियां हवा में तैरती रहीं।

ऐसा नहीं है कि छुई देवी या फिर घुटर यादव से विदो बाबू की कोई व्यक्तिगत अनबन है। हां यह जरूर हुआ कि छुई देवी इस बार जीत कर सत्ता में आई और कुछ ही दिनों में विदो बाबू रिटायर हो गए। ऐसा भी नहीं है कि जबतक विदो बाबू नौकरी में थे तब तक वे इस गांव की समस्याओं के बारे में शिकायत नहीं लिखते थे। लेकिन जब से उन्होंने अवकाश प्राप्त किया उनके सामने गांव की सारी समस्याएं उनके सामने मुंह बाए खड़ी हो गयी। विदो बाबू द्वारा किए गए इन शिकायतों से पिछलेे साढे चार सालों से छुई देवी जूझ रही है। छुई देवी क्या जूझेगी जूझ तो रहा है इ घुटर यादव।

विदो बाबू ने भी सीधे इस घुटर यादव पर ही अटैक भी किया। ऊपर तक यह लिखा कि इ घुटर यादव कौन है। कैसे उसने अपनी गाड़ी में लाल बत्ती लगा रखी है। कैसे उसने अपनी गाड़ी में विधायक लिखवा रखा है। कैसे हर टेंडर को वही देखता है और कैसे अपने साथ वह इतने गनमैन को रखता है। एक दिन तो गुस्से में यहां तक लिख दिया कि यह घुटर यादव सीना इतना चौड़ा करके क्यों चलता है।

छुई देवी परेशान रहती रही। घुटर यादव ने दिल से बहुत चाहा कि विदो को खत्म कर दें। लेकिन विदो बाबू इस गांव के चहेते थे। और लोग यह जानते थे कि विदो बाबू और घुटर यादव के बीच जोरदार टकरार है।

‘इ सब आपलोग का भरम है। घुटर दा चाह लें त इ विदवा का चीज है! दू मिनटे में कहां चल जायेगा पता भी नांय चलेगा।’ लल्लनमा एकदम छुई देवी का चमचा है। छुई देवी का नहीं घुटर दादा का। घुटर दा उसको देशी पिलाता है। एकदम रंगीन।

‘आप ढहाएंगे घुटर दादा का लंका त उ बजा देंगे आपका डंका।’ लल्लनमा चिल्लाता रहा। लेकिन ना तो विदो बाबू ही घुटर यादव का कुछ बिगाड़ पाए और ना ही घुटर यादव विदो बाबू का कुछ बिगाड़ पाए।






काली नागिन और बारिश की बूंदें 


नागो का टमटम पहुंचता है स्टेशन पर और चिड़िया का दिल धक से रह जाता है। चिड़िया इस चिलचिलाती धूप में नागो के लिए अपने उस लाल डिब्बे से ठंडा पानी निकालती है। नागो चिड़िया के हाथ से पानी की बोतल लेता है पानी को गले के नीचे उड़ेलता है पर कहता कुछ नहीं है। जितनी देर चिड़िया सामने खड़ी रहती है नागो उस ठंढे पानी को पेट में जाने को महसूस कर रहा होता है। फिर वह सिर उठाकर देखता है चारों तरफ। हलुआई महंत ही नहीं सबकी निगाह उस पर टिकी है।

नागो कुछ कहता नहीं है लेकिन कभी मना भी नहीं करता है।

नागो एकदम गउ जैसा सीधा है।

ऐसा नहीं है कि चिड़िया इस चौक पर आई और इस धाक के साथ यहां अपनी दुकान चलाने लगी और नागो को पता न चला हो। ऐसा भी नहीं है कि नागो यह नहीं जानता है कि चिड़िया पर इस चौक के सभी मर्द फिदा हैं। चिड़िया के बाल घुंघराले हैं। चिड़िया की आंखों में काजल लगा हुआ है। चिड़िया के दांतों में एक दांत उठा हुआ है जो मोती जैसे है। वहां की फ़िजाओं में तैरती इन बातों को नागो भी सुनता रहता था। लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं कि नागो ने चिड़िया की तरफ तरीके से आंख उठाकर देखा भी हो।

नागो अपने टमटम से आता है, सवारी को उतारता है और अपने टमटम पर बैठ जाता है। नागो कभी कभी इस पीपल के पेड़ के नीचे भी बैठता है। पीपल के पत्ते बहुत गझिन हैं। पेड़ पर अक्सर ढेर सारी मैना बैठी होती हैं। मैना ऊपर से बैठकर सब देखती है। मैना नागो के मन को भी पढ लेती है।

नागो का टमटम लगा रहता है। गाड़ी आती है और सवारी नागो के टमटम पे बैठ जाती है और नागो अपने घोड़े को हांक लेता है।

नागो के मन में भी चिड़िया को लेकर कई सवाल हैं। मन करता है एक दिन उ पिपरी वाला पोखर की सीढी पर बैठाकर पूछे सारे सवाल का जवाब। लेकिन नागो कुछ कहता नहीं है।

नागो कुछ कहता नहीं है। और यही चुप्पापन चिड़िया के कलेजे को चीर देता है। ‘काहे रे माधो एतना काटा काहे उगा रखे हो अपने मन में। तेरे मन में कौनो गुलाब का पंखुरी नहीं है का।’

‘एतना मरद हमरे लिए पागल है त तू कौन से मिट्टी के बने हो हे महादेव।’

‘अरे हम कौन से मांग रहे हैं तुमसे पूरा जिनगी बस अपन आंख के समंदर में हमको डूब जाने द।’

चिड़िया देखती है उसको और बह जाती है। मन में ढेर सारी बातें हैं लेकिन चिड़िया भी कह कहां पाती है। मन बातें करता है लेकिन जुबान कहां। मुंह पे तो जैसे किसी ने लट्ठा लगा दिया हो। लेकिन इ तन और इ मन। चिड़िया क्या करे इस मन का और क्या करे इस शरीर का ।

चिड़िया मन में सोचती है कि कौन सा व्रत कर लें, कौन सा उपवास कर लें या कौन सा मन्नत मांग ले कि इ भोलेबाबा के इ पत्थर जैसा मन में थोड़ा सा प्यार जग जाये। चिड़िया इतनी मुंहफट है कि कोई उसकी तरफ तिरछी निगाह करके भी तो देख ले तो गालियों से उसको नंगा कर दे लेकिन उसकी जुबान यहां उसका साथ छोड़ देती है।

चिड़िया अपने ग्राहकों में व्यस्त रहती है। एगो सिगरेट। एगो गुटखा। कोल्ड ड्रिंक तो चिप्स, कुरकुरे। तभी देखती है नागो का टमटम आके लग गया है। चिड़िया की आंखें फिर उसके वश में कहां रह पाती हंै? चिड़िया कई बार सोचती है आज वह कुछ कहेगी लेकिन हर बार यह पीपल का पेड़ बैरी बन जाता है। चिड़िया बढती है नागो की तरफ और इस पीपल के पत्तों में जंुबिश आ जाती है। उसके पत्तों में एक सरसराहट आ जाती है। सूखे पत्तों से खडखडाहट की आवाज निकलती है। पेड़ पर बैठी सारी मैना एकटक देखने लगती है चिड़िया को और चिड़िया एकदम से घबरा जाती है। चिड़िया जाती है और उसको पानी देकर आ जाती है। या कभी ऐसे ही खाली हाथ। 

नागो उसकी तरफ देखता नहीं है। लेकिन कब तक? यह नजर है कि अब बरबस उस ओर जाने ही लगी। लेकिन जब कभी उसकी तरफ देखती निगाह को देख लेती है चिड़िया, एकदम से सकपका जाता है नागो। मन में सोचता है ‘हे भोलाबाबा, काली नागिन की तरह काहे हमरे मगज में घुसती जा रही है इ।’

चौक के लोग कहते हैं ‘इ चुडै़ल ढूंढ ली है अपना शिकार। नगवा अब जायेगा तेलहंड में।

चुड़ैल एक मकसदे से आती है। इ चौक पे आयी थी जिस मकसद से बस वह पूरा होने ही वाला है। मिल गया उसको अपना शिकार।

और नागो ने सोचा सचमुच की चुड़ैल ही निकली इ चिड़िया।

उस दिन दिन के ढाई बजे के करीब जब नागो तीन बजे की गाड़ी की सवारी लेकर आ रहा था तो मौसम बहुत खराब था। आसमान में काले काले बादल थे। पक्षी अपने घर की तरफ लौट रहे थे। नागो को रास्ते में ही लग रहा था कि कहीं बहुत तेज बारिश ना हो जाये। उसे अपने घोड़े सूरज को लेकर काफी दुख हो रहा था कि वह इसे लेकर आज निकला ही क्यों। लेकिन उसके पास अब कोई रास्ता नहीं था।

उसने टमटम को ज्यों ही स्टेशन पर पहुंचाया बूंदाबूंदी शुरू हो गयी। और फिर संभलने का मौका भी कहां मिला। नागो ने सूरज को बरसाती से ढंकना चाहा। बरसाती को बांधते हुए उसने देखा चिड़िया भी अपनी दुकान को पन्नी से ढंक रही है। लेकिन अचानक से बारिश की बौछार ने नागो को लगभग आधा भिगो दिया। नागो मन्दिर के बरामदे की तरफ दौड़ा। मन्दिर में कई लोग अपना सिर छुपा चुके थे। नागो ने देखा चिड़िया अभी अपनी दुकान को ढंक ही रही है। चिड़िया लगभग भीग चुकी थी। वह सीधी खड़ी हुई और बारिश से छुपने की तलाश में सिर उठाकर देखा। नागो उसको देख रहा था। चिड़िया ने नागो को देखा और एक क्षण को दोनों की निगाहें टकरा गयीं। नागो ने अपनी नजर को दूसरी तरफ मोड़ लिया। चिड़ि़या उसकी तरफ दौड़ पड़ी।

पीपल के पत्तों में आज फिर से जुंबिश आ गयी। परन्तु उसकी आवाज आज बारिश की आवाज में घुल गई। पीपल के पेड़ पर आज एक भी मैना नहीं थी। चिड़िया के मन में जरूर आया कि वह एक बार पीपल के पत्तोें की तरफ देख ले पर बारिश के कारण वह ऐसा कर नहीं पायी। मन्दिर के बरामदे में घुस जाने के बाद वह ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि पीपल के पेड़ के नीचे ही यह मन्दिर था।

चिड़िया जब उस बरामदे पर पहुंची तो वह बरामदा पूरी तरह भरा हुआ था। नागो आगे की पंक्ति में था। उसके ठीक सामने अगड़ी से पानी की तेज धार बह रही थी।

जब चिड़िया भागती हुई उस तरफ आयी तो उस अगड़ी से गिरने वाले पानी के इस पार वह एक पल को रुकी। नागो ने उसको देखा और वह सकपका गया। और फिर चिड़िया अगड़ी से गिरने वाले उस पानी को परे धकेलते हुए नागो के ठीक सामने घुस गई। नागो ने जबरन अपने को पीछे धकेला और चिड़िया वहां समा गई। पीछे जगह नहीं थी और चाहकर भी नागो कोई खास जगह बना नहीं पाया। अगड़ी से गिरने वाले पानी से बचने के लिए चिड़िया लगभग नागो की देह पर झुक गई। नागो ने अपने को जबरन रोक रखा था नहीं तो वह चिड़िया के वजन से तिरछा हो जाता। चिड़िया ने अपने वजन को लगभग उसके ऊपर छोड़ रखा था।   

नागो के दोनो पैरों के बीच चिड़िया का पैर था और नागो के चेहरे के ठीक सामने थोड़ा नीचे चिड़िया की गरदन। चिड़िया के बाल भीगे हुए थे और उसकी गरदन पर पानी की कुछ बूंदें टिकी हुई थीं। चिड़िया के ब्लाउज से उसकी गरदन और पीठ का कुछ हिस्सा नागो के सामने था। नागो ने देखा चिड़िया के बालों से पानी की बूूंद उसकी गरदन पर गिरकर ब्लाउज के अंदर समा रही थीं। नागो के शरीर में सिहरन सी होने लगी। 

नागो को अचानक से पंडित जगन्नाथ मिश्र की बात याद हो आई। उसे लगा ठीक कहते थे पंडित जी जब तक मरद के जांघ में दम है तब तक मरद मरद है। उसने सोचा ठीक कहते थे पंडित जी औरत ही मरद की असली छांह है। औरत के बिना मरद का कौनो वजूद नहीं है।

उसके पिता कहते थे कबे तक खटिया के दोनों तरफ से उतरोगे बेटा। नागो ने सोचा बाबू भी ठीके कहते थे।

नागो ने उस गरदन की तरफ फिर से देखा वहां अब भी पानी की बूंदें मौजूद थीं। बाहर बारिश अपनी रफ्तार में थी। नागो की निगाह बाहर गिर रही बारिश पर गई। गिरते हुए पानी में बुलबुले बन और फूट रहे थे। नागो के मन में आया अभी और बारिश होगी। नागो मदहोश सा होता जा रहा था। उसे ऐसा लगा कि वह पानी की उस बूंद पर अपने ओंठ रख दे।

नागो ने अपने आप को जज्ब किया। और मन में सोचा सच में इ काली नागिन है। भोले बाबा इ नागिन से तो बचना मुश्किले है।

नागो का मुंह चिड़िया के कान के ठीक पीछे था। और नागो के मुंह से एकबारगी निकल गया ‘भगजोगनी’। चिड़िया ने पीछे मुड़कर देखा। नागो एकदम सकपका गया।






मचान, गुल्लर का पेड़ और विदो बाबू की अनुपस्थिति


विदो बाबू गायब हो गए।

अभी चुनाव का रिजल्ट आये मुश्किल से पंद्रह दिन ही गुजरे होंगे कि यह खबर पूरे गांव में आग की तरह फैल गयी।

गायब हो गए, मतलब? पूरे गांव में जो सुनता उसके मुंह से पहला सवाल उठता। ‘ अरे सार उ कौनो बच्चा हैं कि गायब हो जायेंगे। सुतल-पटायल होंगे यहां वहां कहीं और का।’ परन्तु ऐसा नहीं था। वे सचमुच गायब हो गए थे।

एक-दिन दो-दिन तक तो इंतजार होता रहा फिर पुलिस तक बात पहंुची लेकिन कुछ पता नहीं चला। पुलिस आती रही पूछताछ होती रही लेकिन कोई खास मतलब निकला नहीं।

‘इ तो साला होना ही था।’ जब यह तय हो गया कि विदो बाबू सचमुच में गायब हो गए हैं तब सबसे पहली प्रतिक्रिया लोगों की यही थी। लेकिन आगे बात बढ़ी तो बात में से बात भी निकली। अब इतना बड़ा इलाका है तो कौन सा एक बात ही रह जायेगी। जितने लोग उतनी तरह की बातें।

‘उ जो चिट्ठिया लिख दिये थे ना वही काल बन गया उनके लिए। उ तो चुनाव था तो घुटर यादव खून का घूंट पी के रह गया था लेकिन छोड़ कैसे देता।’ लोग कहते इसे दबी जुबान से थे लेकिन कानाफूसी के मारफत मालूम सबको था।

लेकिन लल्लनमा फाड़ा कसके लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। ‘सार इ गांव में एगो कबूतरो उड़ जायेगा तो का उसका दोषी घुटरे दा होंगे। घुटर दा को यह सब करना होता तो बाबू इ चुनाव से पहले ही कर लेते। घुटर दा तो इ खबर सुनके खुदे बहुत दुखी हैं। उ तो खुदे दरोगा को फोन किए हैं कि विदो बाबू को तुरंते ढूंढिये।’

कई तरह की बातें चल रही थीं। किसी ने कहा कि यह चुनाव वाला सदमा वे बरदास्त नहीं कर पाये। जब से रिजल्ट आया है, बहुते उदास थे।

‘अबे सार त उ खुश कब रहते थे उ त उदासे रहते थे। उ त दुर्गा-दिवाली-होलियो में उदासे रहते थे। उससे आगे कुछ है त बताव।’

लेकिन लोगों ने कहा ‘नांय नांय इ बार का उदासी थोड़ा डिफरेंट था। रिजल्ट के बाद उ ज्यादाहि उदास हो गए थे। उदास एतना कि लगा चेहरवे फट जायेगा।’

रिजल्ट के बाद किसी ने उन्हें गांव में घूमते कभी नहीं देखा। उसके बाद वे मचान पर जो चढ़े तो कभी उतरे ही नहीं।

‘खाली दिशा-फरागत के लिए ही उतरे तो उतरे नांय तो चुपचाप वहीं पर बैठे रहते थे।’ बेटे ने पहले लोगों को बतलाया फिर बाद में पुलिस को भी यही बतलाया। कई लोगांे ने भी इस बात की पुष्टि की कि वे वास्तव में मचान पर ही बैठे रहते थे और कभी भी कहीं नहीं जाते थे।

‘नहीं नहीं एक दिन तो मंदिर पर आये थे। वहे दस मिनट के लिए। लेकिन गमछा से अपना मुंह छिपाये हुए थे। दुक्खन से मिले थे। कह रहे थे सांस लेने में तकलीफ हो रही है। कह रहे थे कि ऐसा लग रहा है जैसे सांस के बदले काला धुआं भीतर ले रहे हंै।’ दुक्खन से पूछा गया तो दुक्खन ने सहमति जताई कि हां वे मंदिर पर आये थे और उससे उन्होंने ऐसा कहा भी था।

किसी ने कहा कि वे घुटर यादव के जीतने से इतने आहत थे कि वे बार बार कहते थे कि अब यह जगह रहने लायक नहीं है। वे अपने मन में कुछ कुछ बड़बड़ाते रहते थे। सदमा को बरदास्त नहीं कर पाये थे।

किसी ने कहा दो दिन पहले सुबह सुबह ही जब अंधेरा ठीक से छंटा भी नहीं था तब वे उधर स्टेशन की तरफ जाते दिखे थे। लोगों ने पूछा, कन्फर्म हो कि वही थे तो वह बताने वाला पीछे हट गया। ‘लग तो ऐसे ही रहा था लेकिन अंधेरा था तो बढिया से देख नहीं पाये।’

बेटे ने कहा ‘रात को खाना खाके सोये थे भोरे जब बहुत देर तक नहीं उठे तो लगा कुछ हो तो नहीं गया फिर मचान पे चढके देखे तो हइये नहीं थे। सोचे कहीं गए होंगे लेकिन तब से लौटे ही नहीं।’

बेटे ने सफाई दी तो लोगों ने एक शक यह भी जाहिर किया कि कहीं बेटों ने ही तो नहीं मार दिया। ‘बहुते परेशान रहता था उनसे। घुटर यादव से कुछ चाहिए तो बिना विदो बाबू के हटाये तो संभव था नहीं। बस सारों ने कर दिया काम तमाम।’

‘इ घटना में पूरा परिवार साथ है इसलिए देखते नहीं हो कि कैसे सब एक सुर में बात कर रहा है। अरे कहीं गायब हो गए या कोई कुछ कर दिया तो तुम लोगों को पता कैसे नहीं चला।’

‘नहीं नहीं आज तक इ गांव में तो ऐसा कभी नहीं हुआ। अरे कोई भी कितना भी परेशान क्यों ना हो लेकिन एतना अनर्थ नहीं हो सकता है। अरे झगड़ा झंझट कौन सा घर में नहीं होता है, इसका मतलब इ थोड़े ना है कि एतना बड़ा अनर्थ हो जायेगा।’

‘भैया अब वह जमाना नहीं रहा। सब बदल गया। इ दुनिया अब वह दुनिया नांय रहा जहां सुकून से लोग रहते थे। अब बहुते अविश्वास है इ दुनिया में।’

फुलो बाबू को पता चला तो बोले ‘अरे ये तो कुछ भी नहीं है इ सालों ने तो सफदर हाशमी को दिन दहाड़े मार दिया था। जो भी आवाज उठायेगा वह मारा ही जायेगा। सवाल यह है ही नहीं कि किसने मारा, किसने गायब किया, कब मारा, कब गायब हुआ। सवाल इ सब नहीं है। बस जो बोलेगा वह ऐसे ही गायब हो जायेगा। और जो करता है उसका कोई शक्ल थोड़े ना होता है। बिना शक्ल के लोग हैं। अब भैया शक्ले नांय है तो पकड़ोगे किसको। सालांे पूछोगे किसको।’ आहत थे फूलो बाबू तो काफी लम्बा बोल गए बिना इस बात की चिंता किए कि लोगों को क्या समझ में आया होगा। इतना लम्बा बोलने से या फिर दुख से उन्हें खांसी आ गयी। वे खांसने लगे और इसी बीच लोग यह सोचने लगे कि इ सफदर कौन था। और किसने मारा था उ सफदरवा को।

‘घनघोर पाप है यह। बस यही होना बाकी था। अब कौन सा मुंह दिखाएगा इ गांव का लोग।’

जब से विदो बाबू गायब हुए हैं पूरे इलाके में यही खबर चल रही है। मुंह खोलकर कोई कुछ नहीं कहता लेकिन अपनी ओर से अंदाज लगाने की कोशिश सब कर रहे हैं। हां यह जरूर है कि पूरे गांव में एक उदासी का माहौल छा गया है। कम से कम एक महीना तक मन्दिर में कीर्तन मंडली नहीं बैठी। इकट्ठे होते तो बस यही चर्चा चल निकलती। लेकिन इंसान हैं तो अवसाद में कब तक रह सकते। कहीं न कहीं तो दिल लगाना ही था।

नागो यह जानकर बहुत दुखी हुआ कि विदो बाबू कहीं गायब हो गए हैं। नागो विदो बाबू को बहुत पसंद करता था। वह इस बात को जानता था कि विदो बाबू ने घुटर यादव का बहुत विरोध किया था तो वह भी इस घटना को इस चुनाव से जोड़ के ही देख रहा था। घुटर यादव ऐसा कर भी सकता है ऐसा सोच कर भी नागो को अपने ऊपर बहुत शर्म आ रही थी कि उसने भी घुटर यादव को जिताने में साथ दिया था।

घोड़ा, वोट देने का अधिकार और बारिश की बूंदें


‘लिखना आता है जी।’ जब उस सरकारी मुलाजिम ने रजिस्टर को आगे करके पूछा तो नागो को अपने ऊपर गर्व हो गया। उसे अपने पिता पर गर्व हुआ जिन्होंने अपने सारे बच्चों को कम से कम उस क्लास तक तो पढ़वाया ही जिस क्लास तक का स्कूल गांव में मौजूद था। नागो ने गर्व से सिर को हां में झुकाया तो उस सरकारी मुलाजिम ने रजिस्टर को उसकी ओर घुमा दिया। नागो ने अगंूठा लगाने वाली स्याही को खिसका कर कलम उठा लिया।

‘अपना नाम पता के साथ विस्तार से अपनी समस्या लिखिये। और आपका नम्बर है 96। इसे भर करके आप जाके बैठिये वहां जाकर, जब आपका नाम पुकारा जायेगा तब आइयेगा।’

नागो रजिस्टर को अपनी ओर घुमाकर अपनी नजर को चारों तरफ घुमाता है। यहां बहुत शोर है। एक शामियाना लगा हुआ है। प्लास्टिक की ढेर सारी कुर्सियां रखी हुई हैं। लेकिन फिर भी आदमी इन कुर्सियों की तुलना में लगभग तिगुना हंै। यह कुर्सी टेबुल बरामदे पर रखी हुई हंै जिसके सामने अभी नागो खड़ा था। उस कुर्सी पर वह सरकारी कर्मचारी बैठा था। इस बरामदे के पीछे एक बड़ा सा हाॅल है। उसमें भी कुछ कुर्सियां रखी हुई हैं। एक बड़ा सा टेबुल और एक कुर्सी हाॅल के मुख्य जगह पर रखा हुआ है। उस कुर्सी पर एक सफेद मेजपोश है और उसपर एक गुलदस्ता रखा हुआ। अभी उस कुर्सी पर मुख्यमंत्री बैठे नहीं थे। इस कुर्सी टेबुल के साथ एक और कुर्सी टेबुल रखा हुआ था जिसपर एक कम्प्यूटर रखा था। उस कुर्सी पर एक लड़का बैठा था और उस कम्प्यूटर पर कुछ कर रहा था।

‘ओ महाशय ऐतना टाइम नहीं है। नजारा बाद में देख लीजिएगा पहले यहां अपना ब्याह के लिए डिटेल भर दीजिए।’ नागो ने देखा कि उस सरकारी कर्मचारी के मुंह में पान है और वह उससे गिरने गिरने को है। उसने बहुत ही कलाकारी से उसे संभाल रखा था।

‘अरे हटो हो कुछ समस्ये नहीं है तो काहेल आ जाते हैं यहां पर।’ यह आवाज पीछे से आयी। नागो ने पीछे पलटकर देखा। अरे बाप रे इतनी लम्बी लाइन कब बन गई।

‘समस्या कैसे नहीं है। बहुते विकराल समस्या है। उ वहां खड़े खड़े मरा जा रहा है और आप कहते हैं समस्ये नहीं है।’ नागो ने अपने हद तक इतनी तेज बोला था कि वहां खड़े लोगों को सुनाई पड़ जाये लेकिन वहां शोर बहुत था और सारे लोग इस जनता दरबार में अपनी समस्या के साथ थे इसलिए किसी की रुचि भी नहीं थी उसे सुनने में।

नागो ने कलम से उस रजिस्टर को भरना शुरू कर दिया। नाम पता के साथ समस्या पर लिखा- ‘सूरज के पास कामे नहीं है। उ खड़े खड़े मर रहा है। नांय काम है, नांय खाना। क्या करें हम उसका, हमारी समझ में नहीं आता।’

नागो रजिस्टर पर अपनी समस्या लिखकर आकर बैठ गया। कुर्सी कोई खाली नहीं थी। वह नीचे जमीन पर बैठा। बाहर बारिश जैसा मौसम था। रोशनी कम हो गई थी। बहुत सारी औरतें घूंघट ओढ़े वहां बैठी थीं। छोटे छोटे बच्चे उन घूंघट काढ़े औरतों के शरीर से चिपके हुए थे। वे रो रहे थे और पूरे माहौल में एक चिल्ल पों मची हुई थी। लोग जो वहां मौजूद थे उनमें से कुर्सियों पर बहुत सारे बूढ़े बैठे हुए थे। बहुत सारे ऐसे लोग जो अब जवान रहे नहीं और अभी बूढ़े हुए नहीं हैं वे या तो जमीन पर बैठे थे या फिर वे इधर उधर खड़े थे। जो शामियाने के अंदर बैठे थे उनमें से बहुत सारे लोग उस दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए थे जिधर वह बड़ा सा हाॅल था और जहां मुख्यमंत्री बैठने वाले थे। बहुत सारे लोग जो उस दरवाजे पर टकटकी लगाए बैठे थे वे बीच में कभी कभी अपना सिर उपर उठाकर आसमान की ओर देख लेते थे। लेकन ऊपर आसमान नहीं शामियाना था ऐसा उन्हें हर बार अहसास होता होगा लेकिन थोड़ी थोड़ी देर पर ऐसा बहुत से लोग करते ही रहे।

जब मुख्यमंत्री आकर बैठे और लोगों को अंदर बुलाया जाने लगा तब यह चिल्लपों वाला शोर फुसफुसाहट में बदल गया। लोग आपस में अपनी समस्याओं पर विचार करने लगे कि उसे मुख्यमंत्री के सामने किस तरह रखा जाना चाहिए। तभी एक चपरासीनुमा आदमी ने नागो का नाम पुकारा। नागो को उम्मीद नहीं थी उसका नम्बर इतनी जल्दी आ जायेगा। वह उठा और उस व्यक्ति के पीछे चल दिया। वह आदमी उसे मुख्यमंत्री के पास नहीं बल्कि फिर से उस टेबुल के पास ले आया जहां नागो ने रजिस्टर में अपने बारे में सारी जानकारियां लिखी थीं। नागो ने देखा अब उस टेबुल के पास बिल्कुल भी भीड़ नहीं थी। वह आदमी जो उस समय बहुत व्यस्त था अब वह वहां खाली बैठा हुआ रजिस्टर का निरीक्षण कर रहा था।

‘कवि महोदय यहां इ कविता काहे लिखे हैं। अपनी समस्या लिखनी थी कविता नहीं।’ नागो इस बार सचमुच उसकी बात को समझ नहीं पाया था। उसने बहुत ही आश्चर्य से उस सरकारी मुलाजिम की ओर देखा। उस आदमी के मुंह में अब पान नहीं था। और वह अब साफ साफ बात कर पा रहा था।

‘और यहां बेरोजगारी का हल नहीं निकलता है। रोजगार नहीं है, काम नहीं है त इस समस्या का हल अगर मुख्यमंत्री साहब निकालने लगे फिर तो पूरा राज्य अगले जनता दरबार में यहीं खड़ा दिखेगा। किसको किसको नौकरी देते फिरेंगे। अरे नौकरी तो हर को चाहिए। कोई और समस्या है तो लिखिए। नहीं तो यहां से उत्तर दिशा का टेªन पकड़ लीजिए।’ उस कर्मचारी ने उत्तर दिशा का ही ट्रेन क्यों बोला नागो समझ नहीं पाया। नागो ने सोचा हो सकता है यह गुस्से में बोला गया उसका तकियाकलाम हो।

‘अरे कैसन बात कर रहे हैं वहां उ बिना काम धाम के मरने की हालत पे आ गया है और आप कहते हैं कि सरकार हमारा बात ही नहीं सुनेंगे। इ लोकतंत्र है हमारा बात तो उनको सुनना ही पड़ेगा।’ नागो की आवाज में तल्खी आ गई और उसकी आवाज थोड़ी ऊंची हो गई।

‘अच्छा सुनना ही पड़ेगा! बराती बुलाएं आपको ले जाने के लिए यहां से या आप ऐसे ही चले जायेंगे।’ उस सरकारी मुलाजिम ने इसे बहुत ही सामान्य रूप से बोला इससे ऐसा लगा जैसे इस तरह की समस्या से वह अक्सर निपटता ही रहा है। उसने ऐसा कहते हुए अपनी निगाह उस बरामदे से बाहर उसी अहाते में खड़ी पुलिस पर जमा ली।

नागो पुलिस के नाम से नहीं इस बात से डर गया कि उसे बिना अपनी समस्या को रखे यहां से जाने को कहा जा रहा है। नागो का गुस्सा एकदम से झड़ गया और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने हाथ जोड़ लिए।

‘ऐसा जुलुम मत कीजिए साहब आप नहीं जानते हम केतना कष्ट में हैं। एक बार प्रयास तो कर लेने दीजिए। आपका बहुते एहसान होगा। नहीं तो उ मर जायेगा।’

वैसे तो इस तरह के जितने भी अवसर आए होंगे उनमें एक-दो को ही उस सरकारी मुलाजिम ने बख्शा होगा और शायद नागो उन्हीं एक-दो में से था।

‘चल चल समस्या को कुछ और लिख दे। इ समस्या के साथ तो तू नहीं जा पायेगा वहां तक। वहां जाके साहब को अपनी समस्या कह लेना, बाद बाकी तुम्हारी किस्मत।’ अभी तक वह नागो को आप कह रहा था लेकिन अब वह तुम पर उतर आया था।

नागो को अजीब लगा लेकिन वह शांत रहा।

‘यहां लिख दो लइका का तबीयत खराब है। और इलाज के लिए पैसा नहीं है।’

‘बताओ लइका का उमर कितना है?’ उस आदमी ने नागो को कहा तो नागो कुछ समझ नहीं पाया। वह चुप्प होकर उस बात को समझने की कोशिश करने लगा।

‘अरे बेटवा का उमर बताओगे तभी तो कुछ बिमारी सोच के लिखेंगे महोदय।’

‘अरे साहेब उ मेरा बेटवा नहीं है उ त हमरा घोड़ा है।’ वहां पर उस सरकारी कर्मचारी के साथ जो दो-तीन लोग थे सब भौचक रह गए थे।

‘मतलब?’

‘हां साहब उ तो हमरा घोड़ा है जो हमारे साथ ही रहता है।’ अब उन तीनों-चारों लोगों के मन में इस कहानी को जान लेने के लिए जिज्ञासा सी जग गई।

नागो ने अपनी सीमा तक पूरी कहानी को संक्षेप में सुनाया कि किस तरह उस घोड़े ने वर्षों तक उसके परिवार का पेट पाला है और कैसे एक दिन वहां चुनाव से ठीक पहले सड़क बननी शुरू हुई और कैसे सड़क बनते ही वहां ई रिक्शा चलने लगे और कैसे सारे घोड़े बेकार हो गए। और कैसे अब उसके घर की हालत बहुत ही जर्जर है। कैसे वह उस घोड़े को खाना नहीं खिला पाता। कैसे वह उसका इलाज नहीं करवा पाता, कैसे वह एक झोपड़ी के नीचे पड़े-पड़े गलता चला जा रहा है।

नागो ने जब इन घटनाओं को सुनाना शुरू किया था तब उसने अपने मन में सोचा था कि बहुत संक्षेप में वह सुना कर निकल लेगा लेकिन जब उसने देखा कि सारे लोग उसमें रुचि ले रहे हैं तब उसने उसे थोड़ा विस्तार दे दिया था। वह सुना रहा था और और वे तीनों लोग बहुत ध्यान से उसे सुन रहे थे। नागो को लगा कि उसकी समस्या उन लोगों को समझ में आ गयी है।

तभी हुआ इसका ठीक उलटा। वह सरकारी मुलाजिम जो बहुत ध्यान से सुन रहा था, इस कहानी के खत्म होने के बाद थोड़ी देर तक शांत रहा। फिर अचानक लगभग चिल्लाते हुए कहा ‘सार भाग यहां से। घोड़ा, बकरी, गदहा, सांप, छुछुन्दर की बात सुना रहा है। हमको का सार चूतिया समझ रखे हो। यहां चीफ मिनिस्टर बैठे हैं तुमरा सांप छुछुन्दर की कहानी सुनने।’

‘छुछुन्दर नहीं उ घोड़ा है। और उ का इ राज्य में नहीं रहता?’ नागो ने पहले वाक्य में जबाव था और दूसरे में प्रश्न।

‘रहता है तो का करें। उ वोट तो नहीं न देता है। पहले उसका वोट देने का नियम बनवा लीजिए धर्मराज महराज फिर ले आइयेगा अपने अश्व को। तब तक के लिए अपनी तशरीफ को यहां से ले जाइये।’

‘अब उ मर रहा है त हम कहां जाएं।’

‘आप भगवान विष्णु के पास जाइये वही आपका समाधान निकालेंगे।’ ऐसा कहकर वह सरकारी मुलाजिम अपने फाइल को समेट कर वहां से चलता बना। उसने नागो को डांटते हुए उसे भगवान विष्णु के पास ही जाने को क्यों कहा नागो यह भी समझ नहीं पाया। परन्तु नागो के पास अब कोई उपाय बचा नहीं रह पाया था। कोई उम्मीद नहीं देखकर नागो एकदम हताश हो गया।

नागो ने बाहर देखा अंधेरा और घना हो गया था कुछ बूंदें भी गिरने लगी थीं। उसके पेट में मरोड़ उठा। दर्द की एक लहर। उसने अपने पेट को पकड़ लिया और शामियाने से बाहर नीचे जमीन पर बैठ गया। बारिश की बूंदें उसके शरीर पर गिर रही थीं।

एक अंधेरा कोना, कुछ सामान और कुछ जब्त आवाज़ें 


नागो को वह जगह, वह बूढ़ा, वे सामान सब बहुत रहस्यमय लग रहे थे। वह मुंह से भले ही कुछ नहीं कह रहा हो लेकिन वह अंदर से बहुत घबरा रहा था। वह रहस्यमय बूढ़ा उसके साथ था जिसके कारण उसे कुछ हिम्मत बंध रही थी लेकिन उसी बूढ़े के कारण उसे डर भी लग रहा था।

वह बूढ़ा चलते चलते फिर रुक गया था और उसके साथ नागो भी। नागो रुका और उस बूढ़े को देखने लगा। उस बूढ़े ने अपने हाथ के इशारे से अपनी बांयी तरफ इशारा किया। उस बूढ़े की सांस शायद खत्म हो गयी थी इसलिए उसने अपने मुंह से कुछ नहीं निकाला, सिर्फ इशारा ही किया। नागो ने उन पायों के पीछे देखा वहां कुछ अजीब अजीब से जानवर थे। ऐसे जानवर जिन्हें नागो ने अपनी आंखों से कभी देखा नहीं था। सारे जानवर वहां सुस्त पड़े हुए थे। वह आगे बढ़ा और भांैचक रह गया। वहीं उसका सूरज बैठा हुआ था। उसने अपने सूरज को पहचान लिया था।

नागो सूरज के पास गया लेकिन सूरज बिना हिले-डुले शांत बैठा हुआ रहा। नागो ने देखा घोड़ा एक महीने में ही कंकाल सा हो गया था। उसका चेहरा काला पड़ गया था। उसकी आंखें धंस गयी थीं। वह बैठा हुआ था और उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि उसमें उठने की क्षमता ही नहीं है। उसके वे बाल जिसपर नागो कभी एक भी गंदगी तक बैठने नहीं देता था वे झड़ रहे थे। नागो ने उसे देखा और विचलित हो गया। उसने उस घोड़े को प्यार करना चाहा लेकिन उस घोड़े को देखकर सचमुच में उसे प्यार नहीं आया। सूरज ने भी नागो को देखा लेकिन शायद उसकी पहचानने की शक्ति बिल्कुल खत्म हो गयी थी। इसलिए उसके चेहरे में कोई बदलाव नहीं आया। सूरज ने नागो को देखकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो नागो का कलेजा एकदम फट गया। वह अभी चिंतित खड़ा ही था कि वह बूढ़ा पीछे से आया और ठीक उसके कान के पीछे आकर कहा ‘देखो तुम्हारा घोड़ा यहां कितना सुरक्षित है।’

नागो ने सुरक्षित शब्द को सुना और तिलमिला गया। उसके मुंह से अचानक निकला ‘उसे शायद प्यास लगी है।’ और फिर वह चुप हो गया।

‘प्याऽऽस!’ इस शब्द को उस बूढ़े ने लम्बा खींच कर रहस्यमय बना दिया।

फिर नागो की शक्ल को देखकर कहा ‘लगता है कि तुम खुश नहीं हो।’ फिर थोड़ी देर चुप रह कर वहा बोला ‘वैसे सही मायने में देखा जाए तो खुश तो मैं भी नहीं हूं।’

नागो फिर भी चुप रहा।

‘तो तुम्हें क्या लगा था कि तुम्हारे घोड़े को प्रधानमंत्री अपनी शाही सवारी में लगायेंगे।’ जब बूढ़े ने ऐसा कहा तो अचानक नागो को पंडित मिश्र की याद आ गयी। उसे याद आया कि पंडित मिश्र ने भी ठीक यही बात उससे कही थी। नागो ने सोचा काश उसने पंडित मिश्र की बात मान ली होती।

नागो को पंडित मिश्र की याद आयी तो अचानक अपने गांव, अपने मां-पिता और सबसे अधिक चिड़िया की याद आयी। चिड़िया की याद आयी तो अचानक उसके मन में आया कि पता नहीं इस वक्त चिड़िया क्या कर रही होगी। जब मन में यह आया कि पता नहीं वह क्या कर रही होगी तो उसने सोचा इस समय दिन का कौन सा पहर है। उसने छत की तरफ देखा लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आया कि अभी दिन का कौन सा पहर है।

खैर अपनी उदासी के साथ फिर से उस बूढ़े की तरफ लौटा। वह उदास था तो बूढ़ा उसकी तरफ देख रहा था।

‘तुमने सरकार से कुछ ज्यादा उम्मीदें पाल नहीं रखी है?’ बूढ़े ने ऐसा कहा और हंसने लगा। नागो उदास था और भीतर से बहुत खिन्नाया हुआ था उसका मन किया कि वह धक्का देकर उस बूढ़े को नीचे गिरा दे। नागो ने उस बूढ़े की तरफ देखा। और देखा नहीं उसकी तरफ वह  बढ़ा भी फिर अचानक उसकी निगाह बूढ़े पर गयी और वह सहम गया। बेहद कमजोर और बेहद लाचार सा वह बूढ़ा उसके सामने खड़ा था। नागो एकाएक पीछे हट गया। उस बूढ़े ने कुछ नहीं समझा और ना ही वह जान पाया कि नागो उदास है और गुस्से में है। वह बूढ़ा एमदम सामान्य था और उसके सामने खड़ा था।

नागो एकदम से घबराकर उन जानवरों के बीच से बाहर आ गया और एक पाये के साथ खड़ा हो गया। नागो ने कुछ बोलना चाहा तो उस समय वह बूढ़ा लम्बी सांस लेने लगा इसलिए नागो कुछ सैकेण्ड के लिए चुप हो गया। फिर नागो ने कहा, ‘लेकिन सरकार से हमारा शर्त हुआ था घोड़ा को बढिया से रखने का।’

‘सरकााााार!’ बूढ़े ने इस शब्द को भी थोड़ा लम्बा खींचा और इसे भी रहस्यमय बना दिया।

‘बहुत बड़ा देश है। सरकार वायदे भूल जाती है।’ यह बनिस्पत थोड़ा धीरे से बोला गया वाक्य था लेकिन इतना ही धीरे जितने में नागो सुन जरूर ले। नागो अब शांत हो गया था उसे अचानक से लगने लगा था कि जिस बूढ़े पर वह इस कदर गुस्सा रहा था वह भी एक सताया हुआ इंसान ही है।

नागो दीवार से पीठ लगा कर पहले खड़ा था अब उसी दीवार से अपने शरीर को घसीटते हुए वह नीचे बैठ गया। वह बूढ़ा पहले खड़ा रहा फिर वह भी बैठ गया। वैसे वहां इतनी बदबू थी कि बैठना संभव नहीं था लेकिन उस समय नागो इतना दुखी था कि उसे कुछ पता नहीं चल रहा था।

‘इ कहां आ गए हैं हम? इ कौन जगह है?’ नागो बार बार कोशिश कर रहा था कि वह टूटी फूटी ही सही लेकिन हिन्दी बोले ताकि उसकी बात वह बूढ़ा आसानी से समझ जाए।

‘मुझे कैसे पता होगा कि यह कौन सी जगह है, मैं तो बस यहां इन सभी चीजों की देखभाल करता हूं। जैसे मुझे यह तक नहीं मालूम है कि मैं यहां कहां से लाया जाता हूं और कहां मैं चला जाता हूं। लेकिन यहां मैं हूं तो यहां मेरे साथ चमगादड़ भी तो हैं, कुछ आवाजें भी तो हैं।’ वह बूढ़ा ऐसा कहकर थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला ‘तुमको मालूम है सूर्य को मैंने सिर्फ बचपन में एक बार देखा था। क्या पता अब बाहर वह है भी या नहीं।’

नागो सुनता रहा, तब बूढ़े ने कहा-

‘बस इतना समझो कि सरकार को इस इतने बड़े देश को आरामदायक रूप से चलाने के लिए ऐसे गुप्त स्थान बनाने पड़ते हैं। और ऐसी जगहें कोई एक नहीं होती हैं। पता नहीं इस देश में ऐसी कितनी जगहें सरकार ने निर्माण कर रखी होंगी।’

‘सरकार आगे की तरफ बढती है और उस आगे बढने के रास्ते में जो भी आता है उसे रौंदना सरकार का कर्तव्य है। अब लोकतंत्र में हमेशा क्रूरतम तरीके से रौंदना संभव नहीं है इसलिए सरकार उन्हें ओझल कर देती हैं। अब वह कोई चुका हुआ सामान हो, कोई कला, कोई शब्द या फिर कोई आदमी।’

‘तुम चाहो तो इसे सरकार का एक अंधेरा कोना कह सकते हो। एक ऐसा अंधेरा कोना जहां कुछ भी उपयोगी नहीं है या कह लो कि वे यहां रखे हुए हैं यही उनका उपयोग है। ऐसा नहीं है कि सरकार उन्हें सीधे सीधे नष्ट करना चाहती है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार उनका सम्मान नहीं करती है। बस उनका अंदाज अपना है। जितनी भी चीजें यहां रखीं हैं वे यहां सुरक्षित ही तो हैं।’

‘यहां वे सामान हैं जिनसे हमने कभी न कभी बहुत अधिक मोहब्बत की होगी और जो अब हमारे इस्तेमाल की नहीं हैं। हम जिसे बहुत मोहब्बत करें और एक समय के बाद अगर वह हमारे उपयोग की ना रहे तो उसको अपने हाथों से नष्ट करना कितना मुश्किल है यह तो तुम भी जानते ही होगे। यह बेतरतीब सी बनी जगह हमें उस अपराधबोध से बचाती है।’ वह बूढ़ा बोल रहा था और नागो चुपचाप सुन रहा था। नागो जमीन की तरफ अपनी आंखें गड़ाए हुए था। बूढ़ा इतना बोलकर सांसों को अपने भीतर भरने लगा। वह अभी सांस को पूरा भर भी नहीं पाया था कि बीच में ही उस सांसों के क्रम को तोड़कर धीरे से बोल पड़ा।

‘मोहब्बत तो समझते हो तुम?’ बूढ़ा फिर सांस इकट्ठा करने लगा। सांसों को इकट्ठा करके वह उससे बाहर निकला और नागो के चेहरे की तरफ देखते हुए एक लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा ‘मोहब्बत कौन नहीं करता। तुमने भी तो किसी न किसी से मोहब्बत की ही होगी। अब यह घोड़ा भी तो तुम्हारी मोहब्बत ही है जिसके लिए तुम आज यहां खड़े हो।’

फिर अचानक वह बूढ़ा घुटन महसूस करने लगा और खड़ा हो गया और आह भरते हुए कहा ‘पता नहीं मैं फिर सूरज की रोशनी कब देख पाउंगा।’ नागो को जब लगा कि अब उठना पड़ेगा तो वह बूढ़ा फिर से बैठ गया और इस बार उसके शरीर में थोड़ी फुर्ती थी। शायद अभी अभी सांसों को इकट्ठा करने के कारण ऐसा हुआ था।

‘यह मोहब्बत भी अजीब चीज है। हरेक की मोहब्बत अलग अलग है। कोई अपनी पत्नी से मोहब्बत करता है कोई अपनी प्रेमिका से। कोई सत्ता से, कोई आंसू से, कोई नशे से और कोई अपनी कुर्सी के नशे से, तो कोई अपने विचार से।’

‘इसलिए चाहे तुम इसे पागलघर कह लो, कूड़ा घर कह लो, अंधेरा कोना या फिर सरकार चलाने के अन्य अनेक क्रूरतम तरीकों में से एक। इस तर्ज पर यहां वह सब कुछ मिल सकता है जिससे या तो तुम बहुत मोहब्बत करते हो या फिर यह सत्ता जिससे बहुत नफरत करती हो। जैसे हवा, पानी, आग, लोहे का कोई टुकड़ा, कोई पत्थर, कोई औजार, कोई मशीन या फिर आंसू या कोई शब्द।’

अचानक वह बूढ़ा उठा और फुर्ती से एक किनारे गया जहां ढेर सारे इलैक्ट्रिक सामान बिखरे पड़े थे। वह उस ढेर में कुछ ढूंढने लगा। नागो वहीं से बैठा उसे देखता रहा। वह बूढ़ा वहां से एक छोटी सी मशीन उठा लाया। बिल्कुल छोटे वाले मोबाइल के आकार का। और नागो को दिखाते हुए कहा ‘इसे पहचानते हो।’ नागो ने देखा उसमें एक छोटी सी स्क्रीन थी। उसका रंग काला था और उसमें सामने एक दो छोटे छोटे बटन थे।

नागो ने नहीं में सिर हिलाया तो उस बूढ़े ने कहा ‘अब कोई क्यों इसे जानेगा। एक समय था जब यह इस समाज की रानी थी। लोगों को इसने दीवाना बना रखा था। लोग अपनी प्रेमिका के लिए अपने दिल के भीतरी कोने में जो सोचते थे वह उसकी प्रेमिका तक पहुंचाने का यह एक सशक्त माध्यम था। प्रेमी अपनी प्रेमिका को कहता था तुम मेरी पुरबइया हो और प्रेमिका तुरंत उसी पुरबइया में उड़ जाती थी।’

उस बूढ़े ने उस औजार को उसी ढेर की तरफ फेंकते हुए कहा ‘अब कोई नहीं पूछता इसे, तो यह यहां कूड़े के ढेर में पड़ा है।’

‘अब तुम अपने आप को ही देखो क्या करते अपने टमटम का और टमटम में जुते इस घोड़े का। तुमने इससे मोहब्बत की थी इसलिए तुम इसे अपने हाथों नष्ट कैसे करते। लेकिन सोचो यह वही घोड़ा है जिसपर बैठा आदमी एक समय में इस समाज का सबसे बड़ा नायक हुआ करता था। आज तुम इस घोड़े को लेकर शर्म में गड़ते चले जा रहे थे। तब फिर इसी कबाड़खाने ने तो उस शर्म से तुम्हें उबारा है। सरकार विकास चाहती है तो इस टमटम, घोड़े और कुल मिलाकर तुम जैसे आदमी को कुर्बानी देनी ही होगी।’

लम्बा भाषण देकर चुप होकर उस बूढ़े ने अपने चेहरे का रंग अचानक बदल लिया और अपने चेहरे पर थोड़ा बचपना लाकर कहा ‘बाहर बारिश की बूंदे भी छोटी हो गयी हैं क्या? क्या बारिश में खड़े होकर लोग अभी भी भीगते हैं या नहीं?’

नागो ने ऐसा रहस्यमय व्यक्ति कभी देखा नहीं था। उसे वह बूढ़ा पागल नहीं रहस्यमय लग रहा था। नागो का दिमाग चकरा गया था। बदबू से उसके सिर में तेज दर्द हो रहा था। उसके पेट में मरोड़ हो रहा था। लग रहा था उसके पेट में जैसे कोई चकरी चल रही हो।

‘केतना बड़ा है इ आपका कबाड़खाना?’ नागो ने अपने सिर को ऊंचा करके पीछे की ओर देखना चाहा।

‘अब मुझे क्या मालूम। मैंने कौन सा देखा है। होने को तो यह बहुत बड़ा हो और होने को यह उस पाये के बाद खत्म हो जाए। मैंने कभी इसका अंत देखा नहीं है। और अगर मैंने इसका अंत देखा भी होगा तो मुझे अब याद नहीं है। और अगर मुझे याद भी होगा तो तुमको यह पूछने का अधिकार भी किसने दिया। हो गया तुमने देख लिया अब अपने घोड़े को अब तुम जा सकते हो।’ नागो को वह बूढ़ा खिझा हुआ सा लगा।

नागो को ऐसा लगा जैसे शायद वह बूढ़ा अपने इस लम्बे लेक्चर पर उसकी सहमति चाहता था या फिर उससे भी कुछ और ज्यादा उस लम्बे भाषण के लिए अपनी तारीफ। नागो चुप था इसलिए शायद वह बूढ़ा खीझ गया था। लेकिन वह बूढ़ा था ही अजीब उसे नागो से कोई अपेक्षा भी नहीं थी।

नागो उठा और चलने को हुआ तो बूढ़ा फिर अपने आप ही बोला,  ‘ये आवाजें सुन रहे हो तुम। कैसी लगती हैं तुम्हें ये आवाजें।’ अब वह बूढ़ा एकदम सामान्य था।

नागो तब से आवाजें वहां सुन तो रहा था जिसमें उसे लग रहा था कि कई आवाजें घुली हुई थीं। चूहा, चमगादड़, मशीनें, और कुछ मनुष्य की आवाजें, कुछ रोना, कुछ आंसू, पानी की टपटप, कुछ थोड़े से शब्दों के आपस में टकराने की आवाजें। लेकिन सब कुछ गड्डमड्ड, कुछ भी स्पष्ट नहीं।

‘मैं इन आवाजों का दीवाना हूं। मैं अक्सर यहीं आकर सो जाता हूं। इन आवाजों के बीच मुझे सोने में बहुत आनन्द आता है।’

‘इन आवाजों में क्या मनुष्यों की भी आवाजें हैं?’

‘नहीं! यहां मनुष्य तो हैं लेकिन उन्हें आवाज निकालने की आजादी नहीं है।’ बूढ़े ने बहुत ही नाटकीय अंदाज में अपने मुंह पर उंगली रखकर कहा।

‘ऊपर और इन दीवारों पर रखीं जो ये पोटलियां तुम देख रहे हो ये इनकी आवाजें ही तो हैं।’

नागो यह सुनकर एकदम सहम गया और दीवार में सट गया।

‘डरो नहीं ये आवाजें यहां आराम से सो रही हैं। तुम्हारी स्मृति में बहुत सी आवाजें नहीं रह पायें इसलिए उन्हें यहां कैद कर लिया गया है। तुम अपनी स्मृति में से उन आवाजों को निकाल ना लो इसलिए उन आवाजों को यहां रख लिया गया है। तुम्हारी स्मृतियों को रोज नई नई आवाजों से भर दिया गया है। कोई भी सरकार यह नहीं चाहती है कि तुम अपनी स्मृतियों को याद रखो इसलिए उन्हें वहां से हटा कर यहां रख दिया जाता है। तुम्हारी स्मृतियां खाली नहीं रहें इसलिए बहुत सारी आवाजों को उसके बदले वहां रख दिया जाता है। तुम्हीं सोचो अब तुम्हें कहां याद होगा कि तुमसे जिंदा रहने के लिए सांसें देने का वायदा किया गया था।’

‘तुम्हें याद नहीं है कि तुमसे क्या क्या वायदे किए गए थे लेकिन वे सारे वायदे यहां कैद हैं।’

वह बूढ़ा उठ कर नागो के सामने खड़ा हो गया और उसके बहुत पास आ गया, एकदम उसके चेहरे के पास और कहा ‘जानते हो तुम्हारे पास जो एक चीज है जो और सरकार के लिए सबसे खतरनाक है वह क्या है?’ बूढ़ा एक मिनट चुप रहा और नागो उसकी तरफ देखता रहा। वह बूढ़ा उसके इतना नजदीक खड़ा था कि उसकी सांसों की आवाज नागो सुन पा रहा था।

‘तुम्हारी स्मृति।’ वह बूढ़ा ऐसा कहते हुए जोर से हंसने लगा।

‘जब तक तुम्हारे पास तुम्हारी स्मृति है तुम खतरनाक हो, इसलिए तो..................।’ वह बूढ़ा इस वाक्य को अधूरा ही छोड़कर फिर से हंसने लगा। हंसते हुए वह चारो तरफ घूम गया।

थोड़ी देर तक शांति रही। दोनों चुप थे। बूढ़ा उसको एकटक घूरे जा रहा था। फिर वह वापस जिधर से आया था, बिना नागो की परवाह किए, वापस उधर चलना शुरू कर दिया। नागो के पास कोई और उपाय नहीं था। उसने एक बार कोशिश की कि उस जगह का अंत वह देख सके लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उसे अंत कहीं नजर नहीं आया। उसने सूरज की तरफ देखना चाहा लेकिन वह जहां खड़ा था वहां से सूरज थोड़ा दूर था। वह चाहता तो उस बूढ़े से कहकर दुबारा सूरज से मिलने जा सकता था परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वह उस बूढ़े के साथ चलने लगा।

उमा शंकर चौधरी
मो.-9810229111

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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