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Hindi Story: "इफ़्तार" — डॉ सच्चिदानंद जोशीजी का सफ़रनामा, क़िस्सा, कहानी...



दरअसल, हिंदुस्तान छोटे-छोटे उन क़िस्सों का देश है जो इसके निवासियों की तरह ही मासूम है। और हिंदुस्तान के बाशिंदों को ही, अपनी मासूमियत के बीच, दिमाग़ का इस्तेमाल करते हुए, इस देश की मासूमियत बनाये और बचाए रखनी होगी, इसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए। डॉ सच्चिदानंद जोशीजी का यह सफ़रनामा, यह क़िस्सा, कहानी "इफ़्तार" हिंदुस्तान को समझने के लिए सटीक इशारा है। साधुवाद साधुवाद! ... भरत एस तिवारी/शब्दांकन संपादक

इफ़्तार

— डॉ सच्चिदानंद जोशी


रायपुर से जब ट्रेन में बैठा तो कूपे में अकेला ही था। भोपाल में एक सेमिनार था, सोचा माँ पिताजी से भी मिलना हो जाएगा। एक दिन सेमिनार, एक दिन घर, इस हिसाब से दो दिन की तैयारी से निकला था। नीचे की बर्थ थी इसलिए सामान सजा कर लेट गया और किताब पढ़ने लगा। शाम के चार बजे होंगे। खाली डिब्बा हो तो किताब पढ़ने का आनंद बढ़ जाता है। किताब पढ़ने में समय कब निकल गया पता ही नही चला और दुर्ग स्टेशन आ गया। जब चाय वाला चाय पूछने आया तो पता चला कि दुर्ग आ गया है। ट्रेन में पेंट्री होते हुए भी स्टेशन वाले वेंडर्स का अंदर आकर चाय या नाश्ते खाने की चीजें देने का तमाशा इसी स्टेशन पर दिखाई देता है। 

तंद्रा भंग हुई तो देखा सामने वाली बर्थ पर भी एक सज्जन आ गए थे। उनकी उम्र मेरे ही बराबर रही होगी। उनके पास भी ज्यादा सामान नही था। लगता था मेरी ही तरह एक दो दिन के सफर पर ही निकले हैं। आरंभिक हैलो हाय में मालूम पड़ा कि उनका नाम अतहर अली है और इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में इंजीनियर हैं। रहते तो जबलपुर में हैं। किसी काम से भिलाई आये थे। अब सारणी जाना है, जिसके लिए वो घोड़ा डोंगरी उतरेंगे। 

"अरे घोड़ा डोंगरी तो आधी रात को आएगा", मेरे मुँह से निकला। 

"जी हाँ, ट्रेन सही समय हुई तो दो-ढाई बजे आएगा। लेकिन आप चिंता न करे, आपको डिस्टर्ब किये बगैर उतर जाऊंगा", अतहर अली बोले। 

"अरे नही मेरा मतलब वो नही था। मैं तो सोच रहा था कि आपकी नींद पूरी कैसे होगी।" 

" जी कल थोड़ा सा ही काम है। बाकी पूरा दिन तो सोना ही है। सारणी जैसी जगह में और कुछ है भी नही।" 

इधर-उधर की बातों में राजनांदगांव निकल गया। "थोड़ी देर कमर सीधी कर लेता हूँ। कल रात भी सफर किया था। ट्रेन में नींद पूरी नही हुई," अतहर अली बोले और लेट गए। कूपे में हम दोनों ही थे। टीटीई ने बताया कि नागपुर तक हम दोनों ही हैं इसमें। 

डोंगरगढ़ से आगे निकलने के बाद ट्रेन की गति धीमी हो गयी। बीच-बीच में रुकने भी लगी। और फिर सलेकसा पर आकर तो बिल्कुल ही थम गई। ज्योही ट्रेन रुकी अतहर अली हड़बड़ाकर उठे। उन्होंने घड़ी देखी और फिर उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें बढ़ गयी। 

"गोंदिया कितनी दूर है भाई साहब?", उन्होंने मुझसे पूछा। 

" =इसका राइट टाइम तो छह बजे का है। लेकिन अब पता नही कब पहुंचे।" 

मेरा जवाब उन्हें और ज्यादा अस्वस्थ कर गया। वे उठे और कूपे के बाहर टीटीई को खोजने चले गए। ट्रेन अचानक बीच मे रुकने से थोड़ा चिंतित तो मैं भी हुआ था, लेकिन अतहर अली तो बहुत ज्यादा परेशान नज़र आ रहे थे। 

पांच मिनट बाद जब वे लौटे तो उनके चेहरे पर टीटीई मिलने का तो भाव था पर उससे संतोषजनक उत्तर न मिल पाने का भाव ज्यादा स्पष्ट था। 

"बताइये ! रेलवे वालो को ही नही पता कि ट्रेन क्यो रुकी है।"

"जरूर कोई गंभीर बात होगी वर्ना ऐसे जंगल मे ट्रेन क्यो खड़ी करते। " 

तभी वहाँ टीटीई आया, और उसने बताया कि आगे मालगाड़ी का इंजन खराब है। जैसे ही मालगाड़ी हटेगी ये ट्रेन चल देगी। लेकिन मालगाड़ी कब हटेगी कहा नही जा सकता था। अतहर अली और परेशान हो गए। तभी उनका मोबाइल बजा, उन्होंने फौरन उसे उठाया 
"हाँ, बोलो आरिफ बेटा। हाँ हाँ ट्रेन लेट हो गयी है। अब कब चलेगी कहा नही जा सकता। हाँ तुम वही रुको। "
उन्होंने फ़ोन काट दिया और फिर बोले "मेरा भतीजा है। गोंदिया पर खड़ा है टिफिन लेकर। दरअसल मेरा रोजा है न।" 

अब मुझे समझ मे आया कि वो इतने बैचेन क्यो हो रहे थे। 

"इफ़्तार का समय क्या है?" मैंने पूछा। 

"साढ़े छह का है।" 

मैंने घड़ी देखी, छह तो बज ही रहे थे। 

"वो क्या है कि आज ही सुबह जबलपुर से भिलाई आया था काम से। शाम को निकालना था। गोंदिया में छोटा भाई रहता है। इसलिये उससे कह दिया था कि इफ़्तार और सेहरी का इंतज़ाम कर देना। अब भतीजा स्टेशन पर खड़ा है, लेकिन ट्रेन वहाँ पहुंचे तब न ।"

मेरे पास आज टिफिन में कोई खास चीज नही थी। दोपहर को खाना देर से हुआ था इसलिए रात के लिए मैंने ही नेहा से हल्का खाना देने को बात कही थी। उसने दो रोटी और थोड़ी करेले की सब्जी बांध दी थी। अब दिनभर का रोजा रखने के बाद अतहर अली को करेले की सब्जी खिलाना तो अन्याय होता। तभी ध्यान आया कि नेहा ने कल के लिए मोदक भेजे है। कल चतुर्थी थी वो भी मंगलवार वाली अंगरिका। नेहा ने सोचा यही से मोदक बना कर भेजेगी तो माँ का श्रम बच जाएगा मोदक का डिब्बा बैग में रखते हुए नेहा ने कहा भी था "गिनकर इक्कीस ही बन पाए। अब मैं मांजी की तरह एक्सपर्ट तो हूँ नही।"

"अरे माँ तो इसी में खुश हो जाएंगी की उनकी बहू ने मोदक बना कर भेजे है", मैंने नेहा का उत्साहवर्धन करते हुए कहा था। 

मैं पसोपेश में था क्या करूँ। 

"चिन्ता मत कीजिए ऊपर वाला कोई इंतेज़ाम कर ही देगा।" 

मैं बस इतना ही कह पाया। 

"नही साहब चिंता कुछ नही है। रोजा तो पानी पीकर भी खोला जा सकता है। अब जैसा ऊपर वाला चाहेगा होगा।" 

अतहर अली मुस्कुराकर बोले "मेरी चिंता तो ये है कि वो बेचारा बच्चा स्टेशन पर खड़ा परेशान हो रहा होगा।"
उन्होंने सफाई देते हुए कहा। 

ट्रेन अभी भी खड़ी ही थी। इस बीच उन्होंने एक दो बार और अपने भतीजे को फ़ोन किया। फिर घड़ी देखी और बाथरूम चले गए। इफ़्तार का समय हो चला था। बाथरूम से आने पर उन्होने फर्श पर चटाई बिछाई और घड़ी देख कर नमाज़ अदा करने लगे। बहुत सोच विचार करने के बाद मैंने बैग खोला और मोदक के डिब्बे में से दो मोदक निकल कर कागज़ की प्लेट पर रख दिये। नमाज़ पूरी करने के बाद ज्योही वो पानी लेने अपनी बोतल की ओर बढ़े मैंने वो मोदक की प्लेट उनके आगे कर दी

"लीजिये अली साहब अफ्तार लीजिये।" 

उन्होंने आश्चर्य से देखा "ये क्या है और कहाँ से आया"। 

"पहले आप अफ्तार तो लें।" 

मैंने मुस्कुराते हुए कहा उनका अफ्तारना चल रहा था और मैंने उन्होंने चतुर्थी और मोदक का किस्सा सुना दिया। मोदक शायद उन्होंने पहली बार ही देखे थे। 

उनके चेहरे पर विस्मय की लकीरें और बढ़ गयी। "यानी भगवानजी को लगने वाला भोग आपने हमे दे दिया।" 

"तो क्या हुआ ये भी तो भगवान का ही काम है", मेरे मुँह से निकल गया। मानो ट्रेन मेरे ही इस वाक्य का इंतज़ार कर रही थी। मैंने इतना कहा और ट्रेन चलने लगी। आधा घंटे की इधर उधर की बातचीत मे गोंदिया आ गया। घड़ी साढ़े सात बजा रही थी। 

ट्रेन रुकते ही आरिफ एक बड़ा सा स्टील का टिफिन और एक मिठाई का पैकेट लेकर आया। चाचा भतीजे का मिलाप हुआ। अतहर जी ने आरिफ से मेरा भी परिचय करवाया। आरिफ उन्हें समझा रहा था दो डिब्बे अभी के लिए और नीचे वाले दो सेहरी के लिए हैं। आरिफ उतरा और ट्रेन चल दी। रात में अतहर अली जी ने भुना गोश्त और रोटी खाई। उन्होंने मुझे भी ऑफर किया लेकिन शाकाहारी होने के कारण मैं अपने साथ लाये करेलों से ही संतुष्ट था। 

सुबह जब भोपाल स्टेशन आने को हुआ, तो नींद खुली। सामने की बर्थ खाली थी, यानी अतहर अली घोड़ा डोंगरी उतर चुके थे। पानी पीने के लिए बोतल की तरफ हाथ बढ़ाया उसके पास मिठाई का एक पैकेट रखा था और बोतल के नीचे एक कागज रखा था। कागज़ खोला तो एक छोटी सी चिट्ठी थी जो अतहर अली ने लिखी थी। मजमून कुछ यूँ था:

"भाई साहब, ये सफर ताज़िन्दगी याद रहेगा। रात को आपको डिस्टर्ब करना मुनासिब नही समझा। आरिफ से गोंदिया की मशहूर दुकान से स्पेशल मलाई पेढ़े मंगवाए थे खास आपके लिए। ये मत समझना कि हिसाब किताब कर रहा हूँ। वो सब तो ऊपर वाला ही करेगा। बस एक गुजारिश है आज शाम मांजी से कहकर इनका भी भोग लगवा देना और हमारे लिए भी दुआ मांग लेना। 

आपका अतहर"


ट्रेन भोपाल में रुकी और मैं अपना सामान लेकर उतर गया। उस शाम गणेश जी को दो-दो भोग लगे माँ और नेहा के बनाये मोदक का और अतहर अली के भेजे गोंदिया के स्पेशल मलाई पेढ़े का। 


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