कुबेर दत्त और पीने की कुछ अन्य यादें — विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा - 31 | Vinod Bhardwaj on Kuber Dutt


कुबेर दत्त और पीने की कुछ अन्य यादें 

— विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा

मेक्सिको की चर्चित चितेरी फ्रीडा काल्हो ने कहा था, मैंने अपने दुख दर्द डुबोने के लिए पीना शुरू किया पर कमबख़्त उन सब पीड़ाओं ने तैरना भी सीख लिया। 

मैंने अपने जीवन में कई पियक्कड़ों का बुरा हाल देखा है पर शायद सबसे ज़्यादा दुख अपने मित्र टेलीविज़न प्रोड्यूसर , कवि और चित्रकार कुबेर दत्त के लिए हुआ। यमुना नगर से मैं अशोक चक्रधर और उनकी पत्नी के साथ कार से दिल्ली आ रहा था, तो रास्ते में बातचीत के दौरान उन्होंने एक विडीओ की क्लिपिंग दिखायी। कुबेर अकेले इस दुनिया को छोड़ कर फ़र्श पर पड़े हैं, उनकी बिल्लियाँ आसपास परेशान घूम रही हैं। उस क्लिपिंग को याद कर के ही दिल दहल जाता है। 




कुबेर को मैं दूरदर्शन के एक लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में काफ़ी पहले से जानता था। शुरू में उनका व्यक्तित्व सौम्य और मुस्कुराता हुआ था। वह निश्चय ही हैंडसम थे, पर शराब उनका चेहरा बिगाड़ती चली गई। मुक्ता श्रीवास्तव के साथ वे दूरदर्शन के दर्शकों के सवालों का बहुत मीठा मुस्कराहट से भरा जवाब देते थे। 

लेकिन मैंने कुबेर के साथ शाम से ले कर देर रात की बहुत बुरी यादें भी झेलीं हैं। एक रात एक जनवरी 1989 की थी, अस्पताल में हुसेन ने मेरी किताब लोकार्पित की और बाद में उसके उत्सवरूपी तत्व चिंतन ने हॉरर शो का रूप ले लिया। वह रात सचमुच बहुत अजीब थी। कुबेर पीते चले गए, और मुझे वह छोड़ने को राज़ी नहीं थे। उनके पास दूरदर्शन की गाड़ी रहती थी, कहते थे तुम्हें छोड़ दूँगा। चिंता क्यूँ करते हो। रात तीन बजे उन्होंने छोड़ा, और फिर आधे घंटे बाद फ़ोन पर रोने लगे, उन्हें सफ़दर हाशमी की हत्या की ख़बर मिल गयी थी। वे फ़ोन ही नहीं छोड़ रहे थे। 

उनके साथ मैंने दूरदर्शन पर कला और साहित्य के अनगिनत कार्यक्रम किए थे। उन दिनों दूरदर्शन की पहुँच बहुत दूर तक थी। एक बार मैं राजस्थान के एक छोटे से शहर में क़िला देखने के चक्कर में घूम रहा था, वहाँ मुझे एक लड़की मिली जो पत्रकारिता के एक लेक्चर के कारण मुझे जानती थी। वह बोली, मेरे घर चलिए, मेरी माँ कला परिक्रमा के कारण आपकी फ़ैन है, वे बहुत ख़ुश हो जाएँगी। मैं दिल्ली में अपने कार्यक्रम कभी देख नहीं पाता था। उसकी माँ शायद कलाकार थीं, उन्होंने मेरा स्टार की तरह स्वागत किया। वे सब कार्यक्रम। चाव से देखती थीं। 

कुबेर को जो पसंद था, उसके कार्यक्रम को बनाने में वे बहुत बुरी तरह से डूब जाते थे। जब मेरा कला कोश आया, और उन्हीं दिनों एक अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म ज्यूरी में मेरे चयन की ख़बर छपी, तो वह बोले, मैं आप पर आधे घंटे का प्राइम टाइम का प्रोग्राम बनाऊँगा। मेरे घर आ कर मेरी अनुपस्थिति में वह मेरे लड़के की बचपन की अल्बम को भी शूट कर के ले गए। वह प्रोग्राम जब प्रसारित हुआ, तो मुझे बाद में उसकी रिकॉर्डिंग देख कर लगा, जैसे मैं कोई महान काम करके दुनिया से विदा ले चुका हूँ। 

दिन में अक्सर कुबेर के पास कुछ सांस्कृतिक स्त्रियाँ उनके कमरे में बैठी मिलती थीं। एक शाम ऐसी ही एक सुंदरी भी कुबेर के साथ देर रात समय बिताने का जोखिम उठाने को तय्यार हो गयी। वह पीती भी नहीं थी, बस अपने स्टार के साथ समय बिताना चाहती थी। रात का अंत चार बजे दुखद हुआ। राजदूत होटेल के बार में जब हम घुसे थे, बार के कर्मचारियों ने अपने स्टार कुबेर का बढ़िया स्वागत किया। सब उनके आगे पीछे घूमते रहे। लेकिन बार बंद होने का समय हो गया, पर कुबेर उठने को राज़ी नहीं थे। कर्मचारी हाथ जोड़ कर खड़े थे, साहब हमें अपने घर जाना है। कुबेर ने अपने हाथ की शराब कार्पेट पर उँड़ेल दी। बड़ी मुश्किल से हम कुबेर को गाड़ी तक लाए। एक प्यारा इंसान पी कर ऐसा हो जाता था। तोल्सतोय की एक कहानी में तीन स्टेज हैं, पहली में आदमी ख़रगोश जैसा प्यारा होता है, दूसरी में लौमड़ी की तरह चालाक हो जाता है और तीसरी में बस सुअर होना ही आदमी की नियति है। 

नए साल की एक पार्टी में फ़िल्मकार अनवर जमाल के साथ रित्वान घटक मेरे घर बैठे थे, शायद मंगलेश भी थे। कुबेर का फ़ोन आया, सब उन्हें शाम का हिस्सा बनाने के ख़िलाफ़ थे। पार्टी ख़त्म हो गयी, कुबेर देर रात मेरे घर पहुँचे, ओंठ पर कुछ ख़ून लगा था। पता चला बाहर गेट पर सिक्योरिटी गार्ड के साथ मारपीट हो गयी थी। दिन में कुबेर देवता थे, देर रात को वे एक विलेन बन जाते थे। पर उन्होंने दूरदर्शन के लिए मन से काम बहुत किया। अंत तक आर्काइव की महत्वपूर्ण रिकॉर्डिंग करते रहे। कुँवर नारायण की एक ऐसी ही रिकॉर्डिंग मैंने करवाई थी उनके निर्देशन में। 

अच्छे इंसान को शराब ने बर्बाद कर दिया। 

अब मैं आपको मार्च अस्सी के प्राग की बर्फ़ गिरती शाम में ले चलता हूँ। मेरा वाइन पीने का भयावह अनुभव। मेरे प्यारे शहर में वह आख़िरी शाम थी। उन दिनों आम तौर पर बर्फ़ गिरती नहीं थी। वह वाइट ईस्टर था। राइटर क्लब में मेरी मुलाक़ात मशहूर चेक कवि योसेफ़ हांजलिक के साथ तय थी। मेरे पास पेंग्विन से प्रकाशित तीन चेक कवियों के संग्रह में उनकी कविताएँ थीं। अगली सुबह मुझे पोलैंड की फ़्लाइट पकड़नी थी। बाहर बर्फ़ गिर रही थी। दिल्ली वाले के लिए तो सब स्वप्न सरीखा था। मुझे ग़लतफ़हमी थी कि सफ़ेद वाइन कम नशा करती है। और मेरा मेरा प्रिय कवि मुझे पिलाता चला गया, वह बहुत कुछ जानना चाहता था, इंदिरा गांधी के बारे में, इमर्जन्सी के बारे में। 

क्लब बंद हो गया, हांजलिक मुझे दूसरे क्लब ले गए। वहाँ एक फ़ौजी अफ़सर कवि से मिलवाया। अंत में मैंने उन चेक कवियों से हाथ जोड़ कर विदा ली। 

सुबह उठा ही न जाए। मेरे होटेल के सामने चेक हिंदी स्कॉलर सारका लित्विन रहती थीं। उन्होंने कहा था, मुझे अपनी जे एन यू की सहेलियों के लिए गिफ़्ट भेजने हैं। सुबह सुबह आ कर दे जाऊँगी। 

मैंने किसी तरह से अपने को ख़ुद उलटी करवाई और नीचे जा कर वे गिफ़्ट पैक लिए। 

हवाई अड्डे पर सिक्योरिटी वाले ने बेरहमी से कहा, अपना सूटकेस खोलिए। उसने गिफ़्ट पैक खुलवाए। लड़कियों की स्टॉकिंक्स भरी पड़ी थीं। उसने मुझे घूर कर देखा। उसे मैं शायद पियक्कड़ नहीं पर्वर्ट लग रहा था। 

और उसके बाद चिराग़ों में रोशनी न रही। 

मेरा सारा नशा उतर गया। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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