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कोल्ड वार की यादें — विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा - 29: | Vinod Bhardwaj on 'Cold War'

जून 6, 2020

हिंदी के एक नामी उपन्यासकार ने गाइड को कमरे में बुलाने की कोशिश की, तो उनकी शिकायत दूतावास को कर दी गई थी।  — विनोद भारद्वाज



कोल्ड वार की यादें 

— विनोद भारद्वाज संस्मरणनामा

1979 और 1980 में मुझे पत्रकार और लेखक की हैसियत से दो बार यूरोप जाने का मौक़ा मिला। मैं अभी उप संपादक ही था, उम्र भी विदेशी मेहमान बनने के लिए काफ़ी कम थी। सब कुछ अलग तरह से हुआ। एक पश्चिम जर्मन दूतावास की पार्टी में विष्णु खरे ने जर्मन प्रेस काउन्सलर प्लायगर से मिलाया, यह कह कर कि इन्हें समकालीन जर्मन फ़िल्मों की अच्छी जानकारी है। मैं उन दिनों ब्रिटिश फ़िल्म पत्रिका साइट एंड साउंड को चाट जाता था। मुझे नए जर्मन फ़िल्मकारों के नाम धड़ाधड़ लेते देख वे बोले, मैं जून में आपको दो हफ़्ते के लिए पश्चिम जर्मनी भेज सकता हूँ। मैं इस शानदार निमंत्रण से हैरान था, बढ़िया होटेल और हर शहर में एक गाइड मर्सिडीज़ टेक्सी ले कर हवाई अड्डे पर आपका इंतज़ार कर रही हो। उन दिनों निर्मल वर्मा भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद् की सलाहकार समिति में थे, उन्होंने पूर्व यूरोपीय देशों की यात्रा का प्रबंध करा दिया, हालाँकि मैं चेकस्लोवाकिया और पोलैंड जा अगले साल पाया। पर पूर्व हो या पश्चिम, पत्रकार सरकारी जासूसों से घिरा रहता था। 

मेरा अनुभव दिलचस्प है। 

नवभारत टाइम्स के यशस्वी संपादक स ही वात्स्यायन अज्ञेय का स्वागत कर चुकी यहूदी लड़की मुझे देख कर हैरान थी, यह लड़का मेहमान बन कर कैसे आ गया। उससे पहले फ़्रैंकफर्ट हवाई अड्डे की सिक्युरिटीज़ पुलिस मेरे हवाई टिकट में हर दूसरे दिन एक नए शहर की फ़्लाइट देख कर काफ़ी पूछताछ कर चुकी थी। उन दिनों पश्चिम जर्मनी जाने के लिए वीज़ा नहीं लेना पड़ता था। 

उस लड़की को जैज़ म्यूज़िक पसंद था, और मेरे संगीत प्रेम को देख कर वह दो दिन का अच्छा दोस्त बन गयी। रात देर तक किसी क्लब में ले जा कर जैज़ सुनवाना उसकी ड्यूटी का कोई हिस्सा नहीं था। पर उसने मुझे ख़ूब घुमाया। यहाँ यह भी बता दूँ, ये गाइड आपके कमरे में नहीं आती थीं। रिसेप्शन पर ही आपका इंतज़ार करती थीं। हिंदी के एक नामी उपन्यासकार ने गाइड को कमरे में बुलाने की कोशिश की, तो उनकी शिकायत दूतावास को कर दी गई थी। 

ख़ैर, वह दूसरा क़िस्सा है। उस शहर में आख़िरी शाम को कॉफ़ी पिलाते हुए मुझे उस लड़की ने एक लंबा चौड़ा फ़ॉर्म दिखाया। वह हँस कर बोली, आपकी विचारधारा क्या है यह भी बतानी है, और न जाने क्या क्या भरना है। 

दूसरे शहरों में किसी गाइड ने इस गुप्त फ़ॉर्म की कोई जानकारी मुझे नहीं दी। वह लड़की अपनी नई ख़रीदी कार को दिखाने के लिए उस दिन टैक्सी में नहीं आई थी। उसे मुझे बॉन की ट्रेन पकड़वानी थी। उस ट्रेन में फ़र्स्ट क्लास में बैठे महापुरुष मुझे अपनी नात्सी निगाहों से घूर रहे थे। उन्हें शक था कि इस बंदे के पास ज़रूर सेकंड क्लास का टिकट होगा। 

पोलैंड का क़िस्सा और भी मज़ेदार है। अस्सी के मार्च के महीने के अंतिम दिन। स्कैंडिनेवियाई तेज़ हवाएँ चल रही थीं। बाहर निकलते ही सरदर्द करने लगता था। वहाँ के लोग एक गिलास में बिना दूध की गरम चाय का एक घूँट लेते नज़र आए, और दूसरे गिलास में रम का घूँट लेते हुए। मुझे भी यही करना पड़ा। 

मुझे अपने गाइड का नाम आज भी याद है, उकलांसकी। वह अमेरिकी स्टाइल की अंग्रेज़ी बोलने की कोशिश करता था। राजधानी वॉर्सा में वह निहायत शरीफ़ रहा। लेकिन ज्यूँ ही हमने वूज (लोद्ज) के लिए ट्रेन पकड़ी, वह बदल गया। बोला, एक रात के लिए मेरी गर्ल फ़्रेंड साथ रहेगी। मैंने कहा, उसका स्वागत है। एक सेब सरीखे गालों वाली लड़की ट्रेन में बैठी लाल सेब खा रही थी। वूज  का फ़िल्म इंस्टिट्यूट बहुत मशहूर था। पर शहर बहुत फीका। 

अगला पड़ाव क्राकोव था। वहाँ उकलांसकी काफ़ी बदल गया। बोला, कैब्रे देखने का मन हो, तो चला जाए। आपके देश में ये सब होता है क्या? बोला, राजधानी में ज़्यादा बंदिशें हैं। तो रात को हम दोनों एक क्लब में पहुँचे। बाहर खड़े सिक्योरिटीज़ इनचार्ज ने कहा, आधा प्रोग्राम हो चुका है। टिकट लेकिन पूरा ही ख़रीदना पड़ेगा। उकलांसकी उससे बहस करता रहा, आधा पैसा दूँगा। और हम उस दुर्लभ शो से वंचित रह गए। 

अगले दिन भरी सड़क में एक दाढ़ी वाला मुझे खींच कर बार में ले गया। बोला, मैं माओवादी हूँ। मैं हिंसा से समाज में परिवर्तन का पक्षधर हूँ। और वो जो गाइड आपके साथ है, उससे बच कर रहिए, वह सरकारी जासूस है। कल आप अकेले यहीं ग्यारह बजे मिलिए। आप भारत से हैं, मुझे आपसे ज़रूरी बातें करनी हैं। 

मैंने कहा, ठीक है, कल मिलते हैं। 

उकलांसकी मेरा बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। बोला, वो आदमी मुझे कोई सरकारी जासूस लग रहा है, ख़तरनाक हो सकता है। 

ज़ाहिर है मैं सोच में पड़ गया, दोनों ही जासूस हो सकते हैं। पर उकलांसकी ज़्यादा प्यारा जासूस है। कैब्रे में भी दिलचस्पी लेता है। अगले दिन मेरी उस माओवादी से मुलाक़ात हुई, उसके विचार मैंने ध्यान से सुने। 

वारसा लौटते हुए, ट्रेन की पैंट्री कार में दो बुज़ुर्ग बैठे चाय के प्याले, कैटल आदि सजाए बैठे बतिया रहे थे। उकलांसकी ने वहाँ बैठने की अनुमति ले ली। वार्तालाप पोलिश में हो रहा था। पता चला बाप क़रीब नब्बे साल का है, बेटा पैंसठ साल का। दोनों चाय में व्हिस्की मिला कर यात्रा का आनंद ले रहे थे। हमें भी उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी व्हिस्की पिलाई। जोड़ा अनोखा था, उनका साथ आज भी याद है। 

जब मैं पोलैंड छोड़ रहा था पेरिस के लिए, तो होटेल के रिसेप्शन पर बैठी लड़की से मैंने पूछा, पोलिश फ़िल्म संस्थान से मेरे लिए फ़िल्म पोस्टरों का बंडल आना था। 

पोलिश पोस्टर

पोलिश पोस्टर दुनिया भर में मशहूर हैं। 

वह लड़की बोली, आपके लिए कुछ आया तो है नहीं। 

मुझे पीछे एक कोने में पोस्टरों का बंडल दिखाई दिया। उसने शर्माते हुए उसे मुझे दिया। 

आज कोल्ड वार के ये जासूस बहुत याद आ रहे हैं। 

मेरे वामपंथी भाई दिल्ली में ये सब क़िस्से मानने को राज़ी नहीं थे। वे मुझसे कह रहे थे, आप सी आइ ए के प्रॉपगैंडा का शिकार हैं। 

पर जासूसी दोनों तरफ़ हो रही थी। 

हाल में नेटफ्लिक्स पर एक मार्मिक पोलिश फ़िल्म देखी, कोल्ड वार। उस दुनिया की ख़ूब याद आयी। 

बुदापैश्त, हंगरी कई साल बाद जाना हुआ, तो एक मित्र ने बताया वहाँ के टॉपलेस बार मशहूर हैं। मुझे उकलांसकी की ख़ूब याद आयी। कहाँ होगा वह?

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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