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'प्रेमियों के बीच मैं' — दिव्या श्री की कविताएं | Divya Shri Hindi Poetry

दिव्या श्री, कला संकाय में स्नातक कर रही हैं। बेगूसराय बिहार की दिव्या श्री कविताएं लिखती हैं और अंग्रेजी अनुवाद में रुचि रखती हैं। उनकी कविताएं प्रकाशित होती रही हैं, शब्दांकन पर उनका स्वागत है। ~ सं० 


दिव्या श्री की कविताएं | Divya Shri Hindi Poetry 


प्रेमियों के बीच मैं

जब सारे प्रेमी लिख रहे होंगे
अपने प्रेमियों के नाम खत
मैं लिखूँगी तुम्हारे लिए कविता 

जब वे एक-दूसरे से कह रहे होंगे
सिर्फ प्रेम की बातें
मैं कहूँगी सुनो पक्षियों की मधुर आवाज

जब वे बिंदास घूम रहे होंगे
अपने प्रेमियों के साथ बगिया में
मैं कहूँगी बैठो मेरे साथ, देखो उस सुनहरी तितलियों को

जब वे दे रहे होंगे
एक- दूसरे को लाल गुलाब
मैं माँग लूँगी तुमसे उसकी टहनियाँ

जब वे सारे प्रेमी
नींद की आगोश में होंगे
मैं देख रही होऊँगी तुम्हारे माथे की सिलवटें।


ठोकर और विश्वास

वह जो अभी-अभी रोई है न
उससे नहीं पूछना रोने की वजह
हो सके तो देना अपना कंधा
जहाँ वह पूरी तसल्ली से रो सके

तुम जानते हो
उसके रोने पर भी बंदिशें लगी हैं
उसकी मुस्कान तो देखो
हंसी की लेप चढ़ाये आखिर कब तक हँसती रहेगी वह

वह जो खूब बोल रही है न
उसे बोलने देना मन भर
मत टोकना बीच में
बस उसकी कुंठा भरी बातों को सुनना

तुम जानते हो
उसे नहीं दिया जाता है बोलने
नहीं सुना जाता उसकी बातों को विचार विमर्श में
आखिर कब तक अपने हक के लिए चुप रहेगी वह

वह जो अपने मन का कर रही है न
करने देना उसे अपने मन का
हो सके तो उसकी ख्वाहिश को समझना
लेकिन कभी उसका हाथ मत पकड़ना

तुम जानते हो
वह नहीं करती विश्वास किसी पर
जरूर किसी से ठोकर खा चुकी है
आखिर कब तक ठोकर और विश्वास के द्वंद में उलझी रहेगी वह।

हे सिद्धार्थ

हे सिद्धार्थ!
जब तुम कपिलवस्तु की सैर पर थे
तुमने चार दृश्य देखे
एक बूढ़े व्यक्ति को देखकर 
तुमने क्या कल्पना की होगी

बीमार व्यक्ति को देखकर 
तुम्हारी अंतरात्मा तो रोई होगी
शव को देखकर
तुम्हारा हृदय तो काँपा होगा

संन्यासी को देखकर 
तुम्हें भिक्षुओं की अवश्य याद आई होगी

महाभिनिष्क्रमण करते हुए
प्रथम गुरु अलारकलाम से शिक्षा ग्रहण किये

रुद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण कर 
उरुवेला में तुम्हें पाँच साधक मिले
कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा और अस्सागी

बिना अन्न-जल ग्रहण किए
छह वर्षों की कठोर तपस्या के बाद
बैशाख की पूर्णिमा को
फल्गु नदी के किनारे बोधिवृक्ष के नीचे 
तुम सिद्धार्थ से बुद्ध बन गए
तुम्हें वहीं उसी दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई
वह जगह बोधगया बन गया

तुमने प्रथम उपदेश सारनाथ 
ऋषिपतनम्, में पालि भाषा में दिये
जिसे बौद्ध ग्रंथों में धर्मच्रक प्रवर्तन कहा गया

मृत्यु उपरांत शरीर के अवशेषों को
आठ भागों में बाँटकर
स्तूपों का निर्माण कराया गया

संयोग तो ऐसा कि
तुम्हारा जन्म, ज्ञान की प्राप्ति और अंततः तुम्हारी मृत्यु 
एक ही दिन हुआ था

विश्व दुखों से भरा है 
यह सिद्धांत तुमने ही उपनिषद से लिया था

हे बुद्ध
तुम मुझे हर मनुष्य में 
थोड़ा-थोड़ा दिखते हो

सच कहूँ तो
प्रेम में पड़ी हर स्त्री में 
मुझे तुम दिखते हो

मोह, माया का त्याग करना
स्त्रियों ने तुम्हीं से सीखा।


प्रेम रहेगा धरती के सीने पर 

एक दिन
जब हम नहीं रहेंगे
प्रेम रहेगा धरती के सीने पर
नमुराद खर-पतवार की तरह

हमारा प्रेम बन जाएगा
किसी कहानीकार की कहानी
हमारी पीड़ा उकेर दी जायेगी
किसी कविता की मुख्य बिंदु बनाकर

हमारी वेदना रह जायेगी
प्रेमियों के लिए रहस्य बनकर
हमें दर्शाया जायेगा
किसी फिल्म में प्रेमी जोड़े बनाकर

एक दिन
जब हम नहीं रहेंगे
प्रेम रहेगा धरती के सीने पर
नामुराद खर-पतवार की तरह

जंगल का सबसे बूढ़ा वृक्ष बरगद का
हमारे प्रेम का रहस्य लिये
एक दिन सूख जायेगा
उसके जड़ों से निकलेगा रहस्यमय मोती

हमारे प्रेम का साक्ष्य है
पुराना किला, जहाँ छुपन-छुपाई खेलते थे हम दोनों
और शहर का पुराना गिरजाघर
जहाँ प्रार्थनाओं के स्वर एक जैसे निकलते थे

एक दिन
जब हम नहीं रहेंगे
प्रेम रहेगा धरती के सीने पर
नामुराद खर-पतवार की तरह

गंगा का पवित्र जल
हमारे प्रेम की गवाही देगा
और किनारे रेत पर
हमारे पांव का निशान अवश्य मिलेगा

जब सूर्य अस्त होने को हो
देखना क्षितिज की ओर
कोई जा रहा होगा
अपने प्रेम को खर-पतवार में छोड़कर।

दुःख की स्मृति

दुनिया की सारी कविताएँ 
दुःख की स्मृति भर हैं 
कवि प्रेम के पर्याय 

मनुष्य से अधिक कागज़ ढोता है दुःख 
मैंने जाना कविता लिखते हुए 
स्याह रंग से लिखे गये शब्द
आँखों में चुभते हैं कंकड़-से 

लिखते हुए कई-कई बार छटपटाता है वह
जल विहीन मछली की तरह 
बेमौत मरता है बारंबार  
और लिखता ही जाता है 
जब तक दुःख है अवशेष  

अंततः लिखता है अपनी कविता में 
जिस दिन खत्म हो जाएगी पीड़ा 
कविता स्वतः ही नष्ट हो जाएगी।

जब मैं लिखती हूँ कविता

जब मैं लिखतीं हूँ कविता स्त्री पर
याद आती हैं आधुनिकतावाद की श्रेष्ठ लेखिका वर्जीनिया वूल्फ 
और पढ़ती हूँ उनकी सबसे मह्त्वपूर्ण कृति "अपना एक कमरा"
अपने कमरे में
जहाँ मैं, मेरी किताबें और मेरे साथ रहतीं हैं वर्जीनिया वूल्फ 
मेरी सोच में, मेरे कमरे में और मेरे अंतर्मन में।

जब मैं लिखतीं हूँ कविता प्रेम पर
याद करती हूँ सुनहरे दौर के प्रिय कवि जॉन डन को 
और पढ़ती हूँ बार-बार उनकी कविता "स्वीटेस्ट लव आइ डू नॉट गो"
जिसमें वह सूर्य से भी अधिक तेजी से लौट आने का वादा करते हैं
कहते हैं प्रिय महबूबा
मैं जा रहा हूँ इसलिए नहीं कि तुमसे उब गया हूँ
या इस उम्मीद में कि यह दुनिया मुझे तुमसे अधिक प्यार देगी 
लेकिन इसके बाद भी 
एक-न-एक दिन हम सबको जाना है
फिर क्यों न मृत्यु का वरण करके देखूँ
मैं हो जाती हूँ भयमुक्त दुनिया के मोहपाश से
करती हूँ प्रेम मनभर अपने प्रिय से
जहाँ मैं, मेरी प्रिय कविता और मेरे साथ रहते हैं अध्यात्मिक कवि जॉन डन 
मेरी कविता में, मेरे मन में और मेरे प्रेम में।

जब मैं लिखतीं हूँ कविता बच्चों पर
बेसाख्ता याद आ जाते हैं सत्रहवीं शताब्दी के महान कवि हेनरी वाॅन 
और पढ़ती हूँ उनकी अप्रतिम कविता "द रिट्रीट"
शनैः शनैः मैं चली जाती हूँ अपने बचपन में
और खो जाती हूँ उन पवित्र यादों में
जहाँ नफरत, ईर्ष्या, लोभ और क्रोध के माने तक न जानती थीं
वह पवित्र हृदय, जो ईश्वर का निवास स्थल हुआ करता था
और मैं लिखती हूँ अपनी कविता में
बच्चे ईश्वर का घर है
यह लिखते हुए मेरे साथ रहते हैं धार्मिक कवि हेनरी वाॅन
मेरे शब्द में, मेरे बचपन में और मेरे धर्म में।

जब मैं लिखतीं हूँ कविता देश के सिपाहियों के नाम 
याद आ जाते हैं प्रथम विश्व युद्ध के महानकवि रूपर्ट ब्रुक
और पढ़ने लगती हूँ उनकी अद्भुत रचना "द सोल्जर"
संसार में जहाँ कहीं भी हमारी मृत्यु होगी
जहाँ हमें दफनाया जायेगा
वह देश हमारी मातृभूमि होगी
और मैं लिखतीं हूँ अपनी कविता में
ये जो दूब कभी जड़ से खत्म नहीं होता
वह तुम्हारे लहू का निशां है
यह लिखते हुए मेरे साथ रहते हैं प्रथम विश्व युद्ध के महान नायक रूपर्ट ब्रुक
मेरी भाषा में, मेरी शक्ति में और मेरे आत्मविश्वास में।

जब मैं लिखतीं हूँ कविता प्रकृति पर
याद करती हूँ प्रकृति प्रेमी कवि एंड्रयू मारवेल को
और पढ़ती हूँ उनकी प्रिय रचना "थट्स इन द गार्डन"
वह कहते हैं प्रकृति से बड़ा कोई प्रेमी नहीं 
अकेलापन अभिशाप नहीं 
ईश्वर का दिया अद्भुत वरदान है
वह जो लिखता है पेड़ के तने पर अपने प्रेमी का नाम 
उससे बड़ा कोई मूर्ख नहीं 
और मैं लिखतीं हूँ अपनी कविता में 
प्रेमी के नाम एक पेड़ तो लगाएँ 
जब तक रहेगी धरती
तब तक रहेगा प्रेम ईश्वरीय वरदान में
यह लिखते हुए मेरे साथ रहते हैं प्रिय कवि एंड्रयू मारवेल
मेरे स्वर में, मेरे अध्ययन में और मेरी मनोवृत्ति में।

 

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