संगीतज्ञों के संस्मरणों का शहदाबा : ‘शब्द उठान सुर तिहाई’

देव प्रकाश चौधरी की पुस्तक पर डॉ. ओम निश्चल की समीक्षा

‘शब्द उठान सुर तिहाई : ऑफ बीट आलाप’ में संगीतज्ञों, गायकों और वाद्ययंत्र साधकों के जीवन से जुड़े रोचक संस्मरणों के बहाने संगीत की दुनिया की एक विरल यात्रा।
देव प्रकाश चौधरी और उनकी पुस्तक ‘शब्द उठान सुर तिहाई : ऑफ बीट आलाप’
देव प्रकाश चौधरी की पुस्तक ‘शब्द उठान सुर तिहाई : ऑफ बीट आलाप’ पर डॉ. ओम निश्चल की समीक्षा। फोटो: भरत तिवारी

पेश है देव प्रकाश चौधरी की हाल में प्रकाशित पुस्तक ‘शब्द उठान सुर तिहाई : ऑफ बीट आलाप’ में संगीतज्ञों के जीवन और संगीत-साधना से जुड़े रोचक संस्मरणों पर डॉ. ओम निश्चल की सरस समीक्षा। ~ भरत तिवारी

संगीतज्ञों के संस्मरणों का शहदाबा

(“शब्द उठान सुर तिहाई” : ऑफ बीट आलाप - देव प्रकाश चौधरी)

डॉ. ओम निश्चल

दुनिया चाहे जितनी बेसुरी हो, कोलाहल हो, विश्वयुद्ध हो—संगीत एक ऐसी कला है जो जिंदगी को एक बड़ा सुकून देती है। दुनिया-जहान की दुश्वारियों से लड़ने की शक्ति देती है। संगीत की दुनिया में जिन्होंने सुरों को साधा है, वाद्ययंत्रों को साधा है, सरगम को साधा है, राग और रस को साधा है, जिनके पास संगीत से जुड़े रोचक और प्रेरक किस्से हैं, जिन्हें सुनकर लोग आनंद और जुनून से भर जाते हैं। जिस दुनिया को ये कलाकार निरंतर अपनी गायकी से बेहतर और वाद्ययंत्रों से सुरीला बनाते हैं, ऐसे अनेक संगीतज्ञों के जीवन के रोचक प्रसंगों को देव प्रकाश चौधरी ने अपनी नई पुस्तक “शब्द उठान सुर तिहाई” में एक तरतीब देकर उसे एक गल्पगोई में बदल दिया है।

देव प्रकाश चौधरी एक चर्चित कलाकार हैं और चित्रकला के विभिन्न पहलुओं पर लिखने और सोचने वाले भी। कवि भी हैं जिनकी कविताओं में कला की खूबियाँ दिखाई देती हैं। अनेक महत्त्वपूर्ण कला-प्रदर्शनियों में उन्होंने हिस्सेदारी की है और पुस्तकों के आवरण बनाने में उन्हें महारत हासिल है। बिहार की लोककला पर उन्होंने पुस्तक लिखी है तो अन्ना हजारे, ओसामा बिन लादेन पर भी और अपर्णा कौर की कला-यात्रा पर बेहतरीन पुस्तक लिखी है। और अब जिस विशेष पुस्तक से वे विशेष चर्चा में हैं, वह यही पुस्तक है—“शब्द उठान सुर तिहाई”।

इसे उन्होंने सात अध्यायों में विन्यस्त किया है—षड्ज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। अध्यायों के ये नाम भी यह संकेत करते हैं कि सब कुछ संगीत की पारिभाषिकी में उपनिबद्ध है।

‘फरिश्ता गा रहा है’ और उस्ताद फैयाज खान

तरतीबवार देखें तो पहला अध्याय “फरिश्ता गा रहा है” एक रेलवे स्टेशन से शुरू होता है जो पीली बत्तियों से प्रकाशित है। प्लेटफॉर्म पर नींद और इंतजार की मिली-जुली खामोशी है। चायवाले की अंगीठी सुलग रही है और ट्रेन में बैठे एक गायक अपने सुरों के साथ राग दरबारी की पहली तान छेड़ रहे हैं। यह गायक थे उस्ताद फैयाज खान।

जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाले उस्ताद फैयाज खान की कहानी अनूठी है। देव प्रकाश चौधरी लिखते हैं—

1886 में जन्मे फैयाज खान आगरा घराने की उस विराट परंपरा के प्रतिनिधि थे जिसमें ख्याल गायकी की ठसक, द्रुत तानों की चमक और बोल-बनाव की गहरी संवेदना एक साथ मिलती है।

वे ट्रेन में राग दरबारी में डूबे हुए हैं कि अचानक उनके कूपे से होकर एक अंग्रेज गार्ड गुजरता है और वह राग दरबारी सुनकर हरी झंडी लिए हुए अचानक रुक जाता है। स्टेशन मास्टर पूछता है, “गार्ड साब, ट्रेन का समय हो गया है पर हरी झंडी नहीं दी दिख रही।” गार्ड साहब धीरे से कहते हैं, “अंदर फरिश्ता गा रहा है।” कहते हैं उस दिन ट्रेन 15 मिनट देर से चली। यह है संगीत का करिश्मा।

और इसी तरह अनेक रोमांचक आख्यानों से जुड़ी हुई यह पुस्तक तमाम संगीतज्ञों की रोमांचक दास्तान है।

जब सुर का आसन राजसी आसन से ऊँचा हुआ

पंडित मोतीराम का एक रोचक वाकया भी है, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मेवाती घराने के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। हैदराबाद के निजाम के यहाँ एक महफिल सजी जिसमें पंडित मोतीराम की गायकी होनी थी। पंडित मोतीराम महफिल में पहुँचे तो देखा उनके बैठने की व्यवस्था जमीन पर है। एक गद्दी पर केवल एक चादर बिछी है।

पूछा, “मंच कहाँ है?” उत्तर मिला, “पंडित जी, हुजूर के सामने कोई ऊँचे तख्त पर नहीं बैठ सकता।” फिर भी पंडित जी ने कहा कि बस थोड़ा सा ऊँचा कर दीजिए, गाने में सुविधा रहेगी। पर मंच पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

निजाम साहब महफिल में आए। अपने नियत राजसी आसन पर बैठे। पंडित मोतीराम जी ने बंदिश उठाई। हाल गूँजने लगा। माहौल बदलने लगा। कुछ ऐसा प्रभाव पैदा होना शुरू हुआ कि निजाम उठे और नीचे जमीन पर उनके सम्मुख बैठ गए। अब गायक और श्रोता एक ही धरातल पर थे। उस दिन दरबार नहीं, सुर का आसन ऊँचा था।

अन्नपूर्णा देवी और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया

देव प्रकाश चौधरी मशहूर गायिका अन्नपूर्णा देवी और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की भी चर्चा करते हैं। वे उस्ताद अन्नपूर्णा देवी से बांसुरी वादन की दीक्षा लेने पहुँचे तो पहले तो उन्होंने इनकार किया और फिर जब मानीं तो यह कहते हुए कि बांसुरी का हाथ बदलना होगा।

और दाहिने हाथ से बांसुरी बजाने के सिद्धहस्त चौरसिया जी ने अंततः दूसरे हाथ से नए सिरे से बांसुरी को साधना शुरू किया। देव प्रकाश चौधरी लिखते हैं—बरसों बाद दुनिया ने जिस बांसुरी को सुना, उसमें सिर्फ फूँक नहीं थी, उसमें धैर्य था; उसमें गुरु के सामने झुकी हुई विनम्रता की आवाज थी।

संगीत की दुनिया के अनेक सुर

“शब्द उठान सुर तिहाई” सितार उस्ताद विलायत खान और तबला उस्ताद अहमद जान थिरकवा के प्रसंग से भी संपन्न है। देखें तो ये कुछ प्रसंग बहुत सामान्य प्रसंग हैं पर संगीत की दुनिया ऐसी फरिश्तों से बनी-बुनी है जहाँ आवाज शोर नहीं मचाती, इस शोरीले होते संसार को सुरीला बनाती है।

मैं पहला अध्याय खत्म करता हूँ और लेखक के शब्द-सम्मोहन में घिर जाता हूँ जैसे आकाश में घने बादल घिर आए हों और बरसने को मचल रहे हों। भीतर ऐसे ही बेसुरे हृदय के भीतर संगीत जन्म लेने लगता है, धरती कुछ और नम और प्रसन्न होती हुई दिखती है।

“शब्द उठान सुर तिहाई” में कलाकारों-संगीतज्ञों—गौहर जान, बेनजीर बाई, पंडित भीमसेन जोशी, उस्ताद अब्दुल करीम खान, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, गिरिजा देवी, पंडित राजन-साजन मिश्र, संतू बाबू, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, पंडित किशन महाराज, पंडित बिरजू महाराज, गुदई महाराज, ध्रुपद उस्ताद नासिर मोइनुद्दीन डागर और उस्ताद नासिर अमीनुद्दीन डागर, सरोद के प्रख्यात उस्ताद अमजद अली खान, पंडित जसराज, उस्ताद अमीर खान और टैक्सी ड्राइवर, विदुषी किशोरी आमोनकर, कर्नाटक संगीत की शिखर संगीतज्ञ एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, संगीतकार रोशन, नुसरत फतेह अली खान, मशहूर गायक मन्ना डे, संगीतकार एस.डी. बर्मन, पंडित शिवकुमार शर्मा, जानी-मानी गायिका लता मंगेशकर, गजल गायक जगजीत सिंह, गीतकार गुलजार, मशहूर संगीतकार जयदेव, सचिन देव बर्मन, संगीतकार शंकर-जयकिशन, उस्ताद जाकिर हुसैन आदि के खूबसूरत और रोमांचक प्रसंगों से भरे हैं।

जिनके आख्यान को रचने और सिरजने के लिए देव प्रकाश चौधरी ने अनेक संदर्भ स्रोतों का आश्रय ग्रहण किया है जिसमें लगभग दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें शामिल हैं।

पंडित ओंकारनाथ ठाकुर : संगीत जो सीधे हृदय से संवाद करता है

रोचक संस्मरणों को याद करूँ तो पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का एक वाकया याद आता है। वे “जोगी मत जा” भजन गा रहे थे जो भाव की सघनता को छूता हुआ आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा को छू रहा था। कुछ इस तरह कि लोग तन्मय होकर उस भजन में डूब गए थे। सुनकर लोगों को लगा कि संगीत केवल कानों से नहीं, सीधे हृदय से संवाद कर रहा था।

बनारस, स्वाद और राजन-साजन मिश्र

संगीत की दुनिया का जिक्र हो और बनारस अछूता रहे, ऐसा हो नहीं सकता। गिरिजा देवी के कई रोचक प्रसंग इस पुस्तक में हैं लेकिन सुर और स्वाद के गहन रिश्ते को लेकर पंडित राजन मिश्रा और साजन मिश्रा का एक किस्सा है।

कहा जाता है दोनों भाई यह मानते रहे हैं कि जब तक पेट तृप्त न हो, मन एकाग्र नहीं होता और जब मन एकाग्र न हो तो सुरों में वह गहराई नहीं आती जो आत्मा को छू सके।

एक बार दोनों भाई अमेरिका और यूरोप के दौरे पर थे। वे अपने साथ जहाँ भी जाते बनारसी पोटली साथ ले जाते जिसमें घर का पिसा शुद्ध गरम मसाला, राई वाला आम का अचार और थोड़ी सी अरहर की दाल और बनारसी घी। वे कहते थे—यह खाना शरीर तो चला सकता है पर गाने के लिए जो ऊर्जा चाहिए वह तो दाल-तड़के से ही आएगी न।

एक बार वे न्यूयॉर्क के एक पाँच सितारा होटल में रुके। वहाँ दुनिया भर के व्यंजन थे। लेकिन उन्हें बनारसी भोजन की याद आ रही थी। खासतौर से कचौड़ी-सब्जी और दाल-चावल की। संयोग से उनके पास एक राइस कुकर था जिसमें उन्होंने चुपचाप चावल बनाया और दाल भी और उसे बहुत चुपके से छौंक लगाई कि बाहर पता न चले।

और जब जमीन पर बैठकर दोनों भाइयों ने दाल-चावल खाया तो उस दिन उन्हें गंगा किनारे बैठकी जैसा आनंद आया।

बिस्मिल्लाह खान : “मेरा सुर न फटे”

एक किस्सा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से जुड़ा है। सुबह की महफिल में बनारस में किसी मंदिर में वे शहनाई बजाने बैठे जहाँ नीरव एकांत जैसी शांति व्याप्त थी। किसी ने कहा, “उस्ताद! श्रोता तो बहुत कम हैं।” तो खान साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे भाई, श्रोता कम कहाँ है? गंगा मैया भी तो सुन रही हैं, बाबा विश्वनाथ भी तो सुन रहे हैं। हम बजा रहे हैं। बस इतना ही काफी है।”

फिर तो जो बजाया तो आसपास के घाटों से लोग खिंचे चले आए।

उनका एक संस्मरण और है जिसमें एक शिष्य के कहने पर कि “बाबा, कुर्ता तो आपका फटा है, लोग क्या कहेंगे कि भारत रत्न खान साब का कुर्ता तो फटा है?” इसे सुनकर वे बोले, “पगली! भारत रत्न तो शहनाई पर मिला है, फटे कुर्ते पे नहीं। मालिक से यही दुआ है कि कुर्ता भले फट जाए, मेरा सुर न फटे।”

यह प्रसंग सुर बारादरी में यतींद्र मिश्र ने भी दर्ज किया है।

अमीर खान : स्वर और खामोशी

संगीत में आलाप के मध्य विराम और मौन का क्या संबंध है, इस बारे में एक बार उस्ताद अमीर खान के शिष्य ने पूछा कि “उस्ताद, आप आलाप के बीच इतना लंबा विराम क्यों लेते हैं? इससे संगीत का प्रवाह नहीं टूटता?”

अमीर खान साहब ने अपने अंदाज में कहा, “बेटा, संगीत केवल स्वर से नहीं बनता; स्वर और खामोशी मिलकर संगीत रचते हैं। खामोशी ही वह जगह है जहाँ राग साँस लेता है।”

एक बार यही अमीर खान कोलकाता में थे। टैक्सी से कहीं जा रहे थे। डैशबोर्ड पर रेडियो पर उनकी ही गाई एक गजल चल रही थी पर ड्राइवर को वह गजल पसंद नहीं आई। उसने कहा, “क्या बेकार गाना है।”

लेकिन उस्ताद पीछे बैठे चुप रहे। धीमी लय उनकी गायकी की पहचान थी। टैक्सी ड्राइवर को नहीं मालूम था कि रेडियो पर जो गजल चल रही है वह इसी आदमी की गाई हुई है।

वे टैक्सी से उतरे। किराया दिया और मुस्कुराए, “भाई, अगली बार एक बार फिर ध्यान से इस गजल को सुनना। शायद तुम्हें समझ में आए।” जब ड्राइवर को पता चला कि यह गजल तो इन्हीं की गाई हुई है तो वह शर्मिंदा हो गया।

नौशाद : जब अपनी ही धुन बारात में बजती मिली

संगीतकार नौशाद के जीवन का एक अहम किस्सा भी यहाँ दर्ज है जो उनकी शादी से जुड़ा है। हुआ यह कि उनके ससुर फिल्मी पेशे को अच्छा नहीं मानते थे। इसलिए उन्हें यह न बताया गया कि नौशाद फिल्मी संगीतकार हैं। बल्कि नौशाद ने अपने को दरजी बताया।

जब बारात चली और बैंड बजने लगा तो बैंड पर उन्हीं के बनाए एक गाने की धुन बज रही थी—“अँखियाँ मिला के, जिया भरमा के”। उनके ससुर खुशी से कहने लगे, “देखो कितना अच्छा गाना बज रहा है।” नौशाद चुपचाप मुस्कुरा रहे थे।

रवींद्र जैन : स्मृति के कागज पर उतरी धुन

संगीतकार रवींद्र जैन को कौन नहीं जानता। वे गीतकार और संगीतकार दोनों थे। एक बार हवाई यात्रा के दौरान बाहर बादलों का संसार देख उनके भीतर एक धुन बजने लगी—“अँखियों के झरोखों से मैंने देखा जो सांवरे”।

क्योंकि वह देख नहीं सकते थे इसलिए कागज पर लिख नहीं सकते थे, लेकिन वह धुन स्मृति के कागज पर उतर आई थी। वह स्टूडियो में सीधे पहुँचे और जैसे टीम को यह धुन सुनाई, धुन बहुत पसंद की गई।

जाकिर हुसैन और “वाह ताज!”

विज्ञापन फिल्मों की भी अपनी एक अलग दुनिया है। जब ब्रूक बॉन्ड चाय के लिए विज्ञापन फिल्म की जरूरत महसूस हुई तो एक समारोह में प्रसिद्ध निर्देशक एलेक पदमसी की निगाह तबला वादक जाकिर हुसैन पर पड़ी।

वे उनके तबला वादन से अभिभूत हो गए और सोचने लगे कि ब्रूक बॉन्ड टी का विज्ञापन यदि उस्ताद जाकिर हुसैन करें तो कितना अच्छा हो। उनसे उन्होंने कहा कि आप जैसे तबले के उस्ताद हैं वैसे ही यह चाय स्वाद की उस्ताद। हम चाहते हैं कि इससे आपकी कला का उत्सव भी दिखे और चाय का परोक्ष विज्ञापन भी हो जाए।

यह विज्ञापन फिल्म निर्माता प्रह्लाद कक्कड़ ने बनाई। जाकिर हुसैन साब की उंगलियों के क्लोजअप लेता हुआ कैमरा जब ठहरता है तो तबले की थाप के साथ चाय की चुस्की का स्वाद भी सुनाई देता है—“वाह ताज!”

संगीत-संस्मरणों का ‘शहदाबा’

ऐसे जीवंत संस्मरणों की श्रृंखला दर श्रृंखला यहाँ पर मौजूद है। जिस तरह ‘नाना पुराण निगम आगम’ से तुलसी की रामचरितमानस संपन्न है, इसी तरह विभिन्न प्रसंगों से संगीतज्ञों, गायकों की संगीत साधना के छोटे-छोटे प्रसंग से बनी-बुनी यह पुस्तक संगीत की दुनिया के अनेक साधकों की संगीतचर्या का एक विरल उदाहरण बन गई है।

अनुवादकों को जर्मन कवि रिल्के ने अदृश्य का मधु-संचयी कहा है। एक चित्रकार-लेखक-संपादक जब संगीतज्ञों के जीवन और उनके जीवन-संगीत में उतरता है तो ऐसे प्रसंग भी मधु-संचय की तरह ही होते हैं और वह जो रचता है उसे भी हम ‘शहदाबा’ कह सकते हैं।

यह पुस्तक निश्चय ही संगीतज्ञों, गायकों, वाद्ययंत्रों के साधकों के रोचक और सरस वृत्तांतों का शहदाबा बन गई है।


पुस्तक परिचय

पुस्तक : “शब्द उठान सुर तिहाई” : ऑफ बीट आलाप

लेखक : देव प्रकाश चौधरी

प्रकाशक : सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली

संस्करण : 2026

मूल्य : ₹225/-

समीक्षक परिचय

डॉ. ओम निश्चल
जी-1/506ए, दाल मिल रोड
उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059
फोन : 9810042770
मेल : dromnishchal@gmail.com

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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शब्द उठान सुर तिहाई : ऑफ बीट आलाप — देव प्रकाश चौधरी
शब्द उठान सुर तिहाई : ऑफ बीट आलाप
देव प्रकाश चौधरी

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