उत्कृष्ट कला के विविध रूपों में वह रूप भी होता है, जो सहजता से हमारे अंतर को स्पर्श कर लेता है। अनामिका अनु की कहानी “एक चित्रकार की वापसी” कला के उसी रूप का एक ऊँचा शिखर है। कहानी का रस लीजिए और उनकी कलम के रंगों का आनंद उठाइए।
सादर
भरत तिवारी
(संपादक)
मैंने आख़िरी बार उन्हें लाल आँखों से देखा था। अब उन्हें बुझी और शांत आँखों से देखना चाहता था। क्षमा करते वक़्त आँखें बादामी हो जाती हैं। क्रोध शांत होने पर आँखें राख-रंग की हो जाती हैं। प्रतीक्षा में पीली और मिलन में हरी, प्रेम करते वक़्त हल्की गुलाबी। विरह का रंग आसमानी और आँसू का रंग बारिश का रंग है।
एक चित्रकार की वापसी
(गहरा प्रेम हिंसा की छाया में व्यभिचार हो जाता है)
रंग प्रवेश: स्मृतियाँ रंग को चुनौती दे रही हैं
स्मृति की नज़र से देखो तो रिक्त कितना स्पष्ट और मारक हो जाता है। पोंछ दिया गया कोलाहल, मिटा दी गई उपस्थितियाँ और बदल दी गई चीज़ें सीधे कलेजे पर निशाना साधती हैं। एक चित्रकार रंग में लथपथ होकर अपने घर लौटा है। वह उम्रदराज़ घर को रौशन-निगाह से देखता है और घर उसके भीतर खींची गई तमाम रेखाओं को पंक्तिबद्ध कर देता है। बारहवीं फेल वह विद्यार्थी खुली कॉपी के खाली पन्नों की तरह छटपटा उठता है। समय आँधी की तरह गुज़र रहा है। नए दृश्य, नए संबोधन, नए आश्चर्य उसमें जुड़ते जा रहे हैं। अब रिक्त नहीं रहेगा सब कुछ। कुछ जगहें तो बहुत-सी चीज़ों से लद जाएँगी…
रंग-ख़ुश्क: बचपन के रंग सोख गया एक सादा 'न'
जीवन आश्चर्य की भाषा में लिखा गया है। आदमी सुख की भाषा पढ़कर आता है और दुःख का चश्मा पहनकर उसे देखता है। वह न ढंग से अचंभित होता है, न सलीके से जीता है, न सुकून से मरता है।
मैं मीठी चाय पीते हुए, तैरते हुए, चित्र बनाते हुए, वर्ज़िश करते हुए, हर वक़्त 'जीवन और मृत्यु' के बारे में ही सोचता रहा हूँ। आज भी समंदर कितना उफन रहा है, बादाम और नारियल के वृक्ष कितने शांत हैं। इनकी पत्तियाँ न हिलें तो कौन मानेगा कि इन वृक्षों को भी प्यास लगती है। ये भी साँस लेते हैं। ये भी ताप और ठंड से व्याकुल होते हैं।
अगर ध्वनि उपस्थिति का उत्सव है तो मौन प्रार्थना है। पृथ्वी मेरे भार को सहन कर रही है। मैं पृथ्वी के प्रति अपनी कृतज्ञता रेखाओं और रंगों में व्यक्त किए जा रहा हूँ। चित्र की मनोदशा अच्छा दर्शक पढ़ पाता है, अच्छा श्रोता उससे निर्गत ध्वनियों को पहचानता है। मगर चित्र की गूढ़ार्थना / चित्र का उद्वाचन केवल अन्वेषी कर पाता है।
मैं चित्रकार हूँ… मैं बचपन से चित्र बना रहा हूँ। मेरे जीवन में लकीरें, रंग, तूलिका और कैनवास के अलावा कुछ भी सुंदर नहीं रहा है।
रंग-भंगिमा : रंग नचावत, रंग ही गावत, रंग पी-पी सब जन बहुराए। रंग छूटे, सब मिटे; जन रो-रो नहीं अघाए।
लोग कहते हैं —
सीतापुर का रूक्ता बड़ा चित्रकार बन गया। न तो मैं सीतापुर का हूँ, न ही मेरा नाम रूक्ता है।
कैनवास का कोई नाम नहीं होता, चित्र का नाम होता है। रंग को यश नहीं मिलता, चित्र प्रसिद्ध होता है।
तूलिका को कोई नहीं पहचानता, चित्र को सब पहचानते हैं।
कूंची, कैनवास और रंग की कद्र चित्रकार को होती है। दर्शक को चित्र की कद्र होती है। वह सुंदर चित्र और अच्छे चित्रकार को जानता-पहचानता है।
मेरे जीवन में रंग का प्रवेश अबोली के फूल से हुआ। एक दिन सुबह अबोली के पीले-नारंगी फूलों को देखते हुए मैं माँ को याद कर रहा था। अचानक मेरा मन किया कि मैं अबोली के फूल को कागज़ पर जस का तस उतार लूँ और अपने कलेजे से लगा लूँ। मैंने बड़े मनोयोग से अबोली के फूलों का गुच्छा बनाया और उसे बायीं छाती के पास वाली पॉकेट में रख लिया, ताकि सोते हुए भी अबोली के फूल मेरे हृदय से लगे रहें। पीला मेरे लिए प्रतीक्षा का रंग है और मैं उम्र भर मृत माँ की प्रतीक्षा करता रहा हूँ।
अबोली… पीला-नारंगी… माँ… मृत्यु… मौन और प्रतीक्षा…
मैंने अपना घर अठारह साल की उम्र में छोड़ा। उस दिन मैं एक फलों के ट्रक पर बैठकर बहुत दूर निकल आया था। एक दिन शराब के नशे में धुत होकर ट्रक ड्राइवर ने मुझे बेरहमी से पीटा। उसे लगा, मैं हर रात उसका फल चुराता हूँ। मैं किसी का फल क्या ही चुराता? मेरे नसीब में तब फल कहाँ था? मन में कई तरह के फूल खिले थे, मगर डगर पर काँटे ही काँटे थे।
उस दिन से मैं बेतहाशा भागा जा रहा था। मेरी साँस फूल रही थी। मैं भागते-भागते बहुत दूर आ गया था। मुझे प्यास और भूख लग रही थी। मेरा कंठ सूख रहा था। मैं जिस जगह थककर ठहरा था, उस जगह मुझे कोई नहीं जानता था। मैं किससे पानी और रोटी माँगता?
बिना कुछ खाए-पिए, नहाए-धोए दो दिन गुज़र गए। मैं यूँ ही भटकते-चलते एक दिन सीतापुर गाँव के गेहूँ के खेतों के बीच पहुँच गया।
खेत के पास एक वृद्ध स्त्री बैठी थी, जो अपनी चरती बकरियों से ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रही थी। दर्जन भर मैनाएँ वहीं फुदक रही थीं। वह स्त्री बीच-बीच में उन मैनाओं से भी बातें किए जा रही थी।
मैं देर तक उसका संवाद सुनता रहा। अचानक भूख के मारे मेरे पेट में असह्य पीड़ा होने लगी। मैं उस स्त्री की तरफ़ लपकता हुआ भागा। मैंने आँखें नीची करके उससे कहा —
"मैं बहुत भूखा हूँ। मुझे कुछ खाने के लिए मिल सकता है?"
उसने झिलमिलाती आँखों से मुझे देखा और अपने साथ ले आई।
रोटी, बैंगन की सब्ज़ी, आलू की भुजिया और मूली के टुकड़े एक एल्युमिनियम की थाली में परोसकर उसने बड़े प्यार से मुझे थमा दिए। मैं खाता रहा, वह प्यार से मुझे देखती रही। मैं खाना क्या खा रहा था, मैं माँ को कमा रहा था।
उसने मुझे नहाने को कहा।
मेरे पास कपड़े नहीं थे, तो उसने अपनी धोती बाँधने को दे दी।
दस दिन वहीं रुका रहा। न उसने नाम पूछा, न घर का पता। बस खाते वक्त आवाज़ लगाती — "रूक्ता।" वह न जाने क्यों मुझे "रूक्ता" कहकर पुकारती थी। मैं खेतों-बगीचों में घूम-फिरकर दिन काटता रहा। थककर उसके पास जाता, तो वह बिना कुछ पूछे, बिना कुछ कहे, चुपचाप एल्युमिनियम की थाली में गरमा-गरम भोजन परोस देती। मुझसे और रोटी खाने का आग्रह करती। मैं खाता, सोता और खेतों में घूमता-फिरता रहता था। किसी को आता-जाता देखकर छिप जाया करता था। मैं डरा हुआ था।
रूक्ता : मनुष्य से डरा हुआ आदमी…
एक दिन खड़ी दुपहरिया में न जाने क्यों मैंने सीतापुर से जाने का निर्णय लिया। वह बूढ़ी अम्मा चूल्हे पर रोटियाँ पका रही थी। मैं खाट पर उदास बैठा था। उसने पास बुलाया और गरमा-गरम भोजन की थाली मुझे थमा दी। सुवा, पालक, मेथी और सरसों को मिलाकर बने साग को उस दिन मैंने बड़े चाव से खाया। तिलकोर के पत्ते का तरुआ खाकर मन तृप्त हो गया। लगा, जन्म-जन्मांतर का भूखा मैं इसी भोजन को खाकर तृप्त होने के लिए पैदा हुआ था। और आख़िरी कौर मुँह में लेते हुए मेरा मन फफक-फफककर रोने जैसा हो गया।
मैंने स्वयं को संभाला और अपनी आवाज़ को दृढ़ बनाकर उनसे कहा —
"…अब मैं निकलूँगा।"
संबोधन खाली चला गया। संबोधन की जगह मैं भर ही नहीं सका। जीभ छटपटा कर रह गई। कंठ पहाड़-सा सख़्त हो गया। मन में तो वह ही वह थी उस क्षण, मगर जिह्वा और कंठ ने साथ नहीं दिया।
उसने मुझे जिस भावुकता के साथ देखा, वह मारक थी।
मैंने थरथराते हाथों से जूठी थाली उठाई। उसने वह थाली मुझसे ले ली और धीरे-धीरे चापाकल की तरफ़ चली गई। मैं थोड़ी देर आँगन में चहलकदमी करता रहा। उसने पथ का पाथेय मुझे थमाते हुए कहा —
"अपना ख़्याल रखना।"
सीतापुर के पास ही एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन था।
इस छोटे-से मनोरम रेलवे स्टेशन का नाम था — पसवी।
आँसू को भागना होता है। वह आँखों के भीतर कब से कैद पड़ा होता है और मुक्ति की प्रतीक्षा में प्रार्थना करता रहता है। दुख उसे आज़ाद करता है, कभी-कभी अपार हर्ष भी। आँसू इसलिए तो अति का पूजक है।
रंग मिलन: मुझसे मिलकर सब रंग झूठा, मुझसे बिछड़कर रंग तुम्हारा आया है। रंगरेज़ कब आकाश से उतरकर नीचे आया है? कब रंग बरसा, कब रंग बिका बाज़ारों में? बेरंगों के इस जग में हुनर रंग मोल कर लाया है।
रंग मिली कुछ इस तरह हथेलियों से कि रेखाएँ गहरी, मनोरम घाटियाँ बनती चली गईं। अब आकाश पहले से अधिक नीला था। हरियाली थी, मगर चिड़ियों का कलरव कर फुदकना और पशुओं का हँसकर उछलना अभी बाकी था।
उसी दिन मैं पसवी रेलवे स्टेशन से ‘सहोदरी पैसेंजर ट्रेन’ पकड़कर रेता चला आया। रेता इसलिए कि रेल के शौचालय के पास ही बैठकर मैंने वह सफ़र तय किया था। अहले सुबह से शौच करने वालों और मुँह पानी से पखारने वालों के आने-जाने की बारंबारता इतनी अधिक बढ़ गई कि मुझे ट्रेन के रुकते ही शौचालय के पास से उठकर बाहर निकलना पड़ा।
संयोग था कि जिस छोटे-से रेलवे स्टेशन पर मैं उतरा, वहाँ और रेलवे स्टेशनों की तुलना में कम कोलाहल और अधिक सफ़ाई थी। वहीं नीम के घने वृक्ष के नीचे मैं पाँव पसारकर सो गया। बरसों बाद ऐसी थकान, ऐसी नींद नसीब हुई थी मुझको। मेरी नींद दोपहर के एक बजे खुली। वह भी तब, जब मुझे घेरकर खड़े लोगों की बातचीत का ध्वनि-आवेग मेरी कनपट्टी पर कठोर आघात करने लगा।
वे लोग मुझे लंबे समय से बेसुध सोया देखकर मृत समझ बैठे थे। मैं धड़फड़ाकर उठा और स्टेशन से लगभग हड़बड़ाता हुआ बाहर निकला। बाहर जेठ की हठहठ धूप मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। भटकते बैलों के साथ मैं भी हो लिया। वे कचरे में खाने की चीज़ें ढूँढ़ रहे थे, मैं बाज़ार में काम ढूँढ़ रहा था।
रेता में मैं क्या करूँगा? यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। मैं किससे कहूँ कि मुझे माँ की प्रतीक्षा करने के अलावा कुछ नहीं आता। मैं अक्षरों से भागकर रेखाओं की शरण में आया हूँ। मैं बेरंग ज़िंदगी से ऊबकर, घबराकर रंगों की छाँव में आया हूँ।
मैं काले अक्षरों से भरे पन्नों से भय खाकर सफ़ेद और खाली कैनवासों की शरण में आया था। मैं व्यक्त से घबराकर अव्यक्त की शरण में आया था, मगर रंग, रेखा, कैनवस और कूंची ने मुझे अव्यक्त नहीं रहने दिया।
रेता बाज़ार में एक सेठ के यहाँ मुझे काम मिल गया। उसने नाम-गाँव पूछा तो मैंने अपना नाम ‘रूक्ता’ बताया और गाँव का नाम ‘सीतापुर’।
सुब्ह-नफ़स वह सेठ बहुत सौम्य, मिलनसार और उदार था। वह विवाहित था। उसके दो बेटे थे। सेठ की पत्नी का नाम पूर्णिमा था। वह महँगी साड़ियाँ, सोने-हीरे के गहने पहनकर साक्षात् सरस्वती लगती थी। वह राजा रवि वर्मा की रची सरस्वती की तस्वीर जैसी दिखाई देती थी। मगर सेठ किसी और स्त्री से प्रेम करता था।
सेठ यह जानता था कि मैं उसका यह रहस्य जानता हूँ, इसलिए वह हमेशा मेरे पास अपनी ऊहापोह व्यक्त किया करता था।
मैंने यहाँ रहते हुए फिर से चित्र बनाना शुरू कर दिया था। शुरू-शुरू में तो हर बार माँ का ही चेहरा बनाता रहा — हर बार पहले से अधिक करुणा से भरा, हर बार पहले से अधिक विचलित। जब मैंने माँ की सैकड़ों तस्वीरें बना डालीं, तो एक दिन बस यूँ ही उन्हें सड़क के किनारे बेचने लगा। मगर आश्चर्य मुझे तब हुआ, जब मेरे सभी चित्र धीरे-धीरे बिक गए। इसके बाद न जाने क्यों मैंने माँ की तस्वीर बनाना छोड़ दिया।
अब मैं नित्य नए चित्र बनाने लगा था। सेठ मेरे प्रति नरम और उदार रहता था। वह मुझे रंग और कूंची खरीदने के पैसे दिया करता था। उसे मेरी प्रतिभा और कला पर भरोसा था। वह मुझे चित्र बनाने के लिए प्रोत्साहित करता था। मेरी हर पेंटिंग की मुक्तकंठ से प्रशंसा करता था। यहाँ मैं केवल प्रोत्साहन ही नहीं पा रहा था, मैं अपने हिस्से का पिता भी थोड़ा-थोड़ा कमा रहा था।
विक्टोरिया वॉटर लिली की पत्तियाँ हैं — पत्तियाँ ही सही, मगर वे एक इंसान का भार समेट लेती हैं। चित्रकला ने वैसे ही मुझे संभाला। मैं रंगों से खेलने लगा, और सेठ अपने जीवन का रंग बचाता रहा। जो बात सुकून की थी, वह यह कि हम दोनों एक-दूसरे के रंग का सम्मान करते थे।
वह अक्सर कहता था —
“एक ही तो जीवन है। ऊपर न स्वर्ग है, न नरक। न किसी का बुरा करो, न किसी से क्रूरता। जो कोमल है, जो सुंदर है, उसे बचा लो बस… वगैरह, वगैरह।”
सेठ यूँ तो बड़े पते की बातें करता था, मगर मैं न जाने किस धुन में था। किस रंग में रमा हुआ था, कैसे रंग में भीगा-डूबा पड़ा था कि मैं उसकी बातों को उस तरह से नहीं सुनता था, जिस तरह वे सुनी जानी चाहिए थीं।
मैं उसकी बातें वैसे ही सुनता था, जैसे दुकान में चलते पंखों की आवाज़ सुनता था, जैसे चाय की दुकान से उठते शोर को सुनता था, जैसे सड़क पर चलते वाहनों की आवाज़ सुनता था।
मैं उस दौर में केवल रंग और रेखाओं को सुन पा रहा था।
वह सेठ यूँ तो देखने में बेहद साधारण था, मगर उसकी आँखों में बहुत पानी था। उसका देखना इतना कोमल था कि वह किसी को भी अपना-सा लगने लगे। एक दिन वह रात भर दुकान पर ही बैठा रहा। सुबह-दम जब मैं जगा, तो मैंने उसे काउंटर की सीट पर बैठकर सुबक-सुबककर रोते हुए देखा। मैंने उससे पूछा, "क्या हो गया, सेठ?"
उदासी में लीन वह धीमे से बुदबुदाया —
"क़मर को बर्फ बनाया और चिलचिलाती धूप में गलने के लिए छोड़ दिया। मैं कितना नाशुक्रा हूँ, रूक्ता? सुकोमल उस पुष्प को मैंने उस नज़र से देखा कि वह नए रंग में अनूदित हो गई। यही रंग-प्रवेश अब उसे बदरंग कर रहा है। जिस नैतिकता की परवाह प्रेम में प्रवेश करते वक्त नहीं की, उसी नैतिकता का हवाला देकर प्रेम को न निभाने की दलील देता आया हूँ। मैं उसकी रौनक और हँसी उसे वापस करना चाहता हूँ…"
प्रेम के प्रभाव से बचना नामुमकिन है। इसमें आध्यात्मिक प्रभाव से अधिक प्रबलता और गहराई होती है। वह जिस स्त्री से प्रेम करता था, उसका नाम रेवती था। वह अक्सर उसे छोड़कर जाते वक्त उदास हो जाया करती थी। वह प्रेमी के पास भोर-सी आती थी और जब लौटती, उदास शाम-सी लौटती थी। सड़क तक पहुँचते-पहुँचते उसकी आँखें एकदम गीली हो जाती थीं। वह बेहद साधारण साड़ियों में भी अप्रतिम सुंदरी लगती थी।
सेठ की साड़ी की दुकान थी। जाने क्यों, वह उसे बढ़िया साड़ियाँ पहनने के लिए नहीं देता था। कभी-कभी सेठ भी अपनी प्रेमिका रेवती को विदा करते हुए फफक-फफककर रो पड़ता था।
दोनों के बीच क्या था और कितना प्रेम था, वे दोनों ही जानें। कल की चिंता नहीं करने वाले कम रोते हैं।
मैं कल की चिंता नहीं करता था। सेठ ने एक दिन मेरी मुलाकात कलकत्ता से आए 'रैग एंड रैम्प कंपनी' के मालिक सुदेश भंसाली से करवाई, जो कलात्मक चीज़ों के व्यापार, प्रदर्शनी, निर्माण और मार्केटिंग से जुड़ा था।
लाल पतलून, गहरे हरे रंग की शर्ट, पीला कोट और सुग्गापंखी मोतियों से सजे बालों वाला सुदेश एक झक्की किस्म का आदमी था। मगर कला से उसका लगाव बड़ा गहरा था। वह कलाकृतियों को आँखों से पीता था। उसकी चेतना में कला रची-बसी थी। आँखों में खूब काजल लगाता था और दाहिने हाथ में काँच की रंग-बिरंगी चूड़ियाँ पहनता था।
उसने मेरी पेंटिंग को देखा नहीं, पढ़ा। कुछ दंग हुआ। क्या जोड़ा, क्या घटाया, वह ही जाने, मगर सभी चित्रों को देखने के बाद उसने मुझे गले लगा लिया। उसने कलकत्ता में मेरी पेंटिंगों की प्रदर्शनी लगवाने की बात कही। बात बन निकली। उसने मुझे एक नई पेंटिंग बनाने को कहा, जो प्रदर्शनी-स्थल के मुख्य द्वार पर लगाई जानी थी।
मैं रात भर अपनी चित्र-प्रदर्शनी के बारे में सोच-सोचकर इतना उद्वेलित रहा कि नींद ही नहीं आई। कैनवास निकालकर चित्र बनाने लगा। एक ऐसा चित्र रात भर में बना, जिसमें आधी तस्वीर मेरे पिता की थी और आधी मेरी।
दोनों के चेहरों पर विचित्र तरह की मायूसी फैली थी।
सेठ ने चित्र को देखते ही मुझसे पूछा, "आधी तस्वीर तो तुम्हारी है। आधी किसकी है?"
मैंने कहा, "सपने में एक आदमी आता है, जो बार-बार मेरी गर्दन मरोड़ता है। उसी आदमी की तस्वीर है।"
सेठ मुझे मिर्च-भरी आँखों से देखता रहा। मैं चेहरा नीम किए वहीं खड़ा रहा।
एक के बाद एक प्रदर्शनी सफल होती चली गई।
रुक्ता प्रसिद्ध हो गया। सीतापुर में उसे कोई नहीं जानता था, सिवाय एक वृद्ध स्त्री के। मगर 'सीतापुर का रूक्ता' बहुत बड़ा चित्रकार बन गया था।
वह वृद्ध स्त्री, जो मेरे जीवन का 'जी' थी, जिसे मैं 'आजी' कहना चाहता था मगर कह न सका, मेरे जीवन का केंद्र बन चुकी थी। उसका दिया नाम, उसका दिया गाँव, उसका दिया नेह, उसकी जगाई भूख, उसका दिया भोजन, उसके द्वारा थमाई गई थाल… सब मेरे जीवन में रंग की तरह रच-बस गए।
रंग परिचय: नये रंग से मैंने पुरानी तस्वीर खींच ली, सही-सही
मोबाइल हाथ में, जेब में, तकिए और किताब के बीच — हर जगह रहता था। सोते, उठते-बैठते वह हमेशा साथ ही होता था। कलयुगी मानव-देवता का अस्त्र है मोबाइल। एक दिन यूँ ही उदास होते-होते थक गया तो अपने पड़ोस में रहने वाली मिनाची का ध्यान आया।
मैंने मिनाची को फ़ेसबुक पर जल्दी ही ढूँढ़ निकाला। दस साल बाद भी वही आँखें…। मैंने धीरे-धीरे उसे फ़ॉलो करना शुरू किया। उससे मैसेंजर पर बातें होने लगीं। फिर उससे फ़ोन नंबर लिया और अब हमारे बीच खूब बातचीत होने लगी।
मिनाची एक साधारण-सी लड़की थी, जिसकी आँखों में अद्भुत स्वप्नों का आना-जाना था। वह हरे रंग के आकाश और हल्के नीले रंग की माटी का सपना देखती थी। वह भूरे रंग के सूरज और कत्थई रंग के चाँद का ख़्वाब देखती थी। उसे पानी के रंग के फूल चाहिए थे। वह रूकन और सल्वा की इकलौती संतान थी। वे मिनाची को दिलो-जान से चाहते थे। गोला बाज़ार में रूकन और सल्वा के फलों की छोटी-सी दुकान थी।
रूकन के पिता सेवल, मेरे बाबा के कार-ड्राइवर थे। उनकी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता से मेरे बाबा बहुत खुश रहा करते थे। बारिश, आँधी-तूफ़ान हो या बुखार — सेवल का समय पर आ जाना, बिना मौसम और अपनी परवाह किए, बाबा को उसके प्रति कृतज्ञ बनाता चला गया।
एक बार बाबा किसी काम के सिलसिले में कार से यात्रा कर रहे थे। आदमी की ख़्वाहिशों की एक नवजात सड़क जंगल से होकर जा रही थी। उसी सड़क पर देर रात कार ख़राब हो गई। काली तारकोल पर पसरी अमावस्या की उस रात में शेरों के एक जोड़े ने कार पर हमला बोल दिया। शेरों की नज़र से दूर चले जाने के बाद रुकी हुई कार को धक्का देने का साहस सेवल में ही था। फिर पास की बस्ती तक बाबा को सुरक्षित पहुँचाना सेवल के अलावा किसके वश की बात हो सकती थी?
सेवल से खुश होकर, कृतज्ञतावश, बाबा ने अपने घर के बगल वाली ज़मीन पर सेवल के लिए एक बढ़िया-सा घर बनवा दिया था। मेरे घर से बिल्कुल सटा, मेरे घर की दाहिनी ओर वही घर था। इसी घर में सेवल का बेटा रूकन अपनी पत्नी सल्वा और बेटी मिनाची के साथ रहा करता था।
मिनाची के घर की पूर्वी दीवार से सटकर आकाशचंपा के तीन वृक्ष खड़े थे। उनके फूल जब सड़क पर गिरते, तो उसके घर के सामने की सड़क पर फूलों की सफेद-सी चादर बिछ जाती थी। अख़बार वाला रासो अक्सर उस सड़क पर अपनी खटारा साइकिल चलाकर दुखी हो जाया करता था। वह अक्सर कहा करता था —
"फूलों पर साइकिल चलाने जैसा निर्मम काम मैं हर दिन सुबह-सुबह करता हूँ। ये फूल, ये वृक्ष मुझे कभी माफ़ नहीं करेंगे।"
मिनाची को कहानियों की किताबें पढ़ना बहुत पसंद था। उसकी अंग्रेज़ी हमउम्र बच्चों से कहीं अधिक अच्छी थी, मगर अन्य विषयों को पढ़ने में उसका ज़रा-सा भी मन नहीं लगता था। हमारी लाइब्रेरी से उसके बाबा उसके लिए तरह-तरह की किताबें ले जाया करते थे। वह घर में बैठकर उन्हीं किताबों को पढ़ा करती थी। स्कूल जाकर पाठ्यक्रम की किताबें पढ़ने में उसका ज़रा-सा भी दिल नहीं लगता था। हर साल किसी-न-किसी विषय में वह फ़ेल हो जाती थी और कुछ विषयों में बमुश्किल पास हो पाती थी। वह गणित के लिए नहीं, साहित्य के लिए बनी थी। उसे सबसे अधिक पसंद थीं जासूसी किताबें।
अगाथा क्रिस्टी की 'एंड देन देयर वेयर नन' और 'द मर्डर इन द र्यू मॉर्ग' में खोई मिनाची को यह ख़बर ही नहीं थी कि एक दिन उसके जीवन में उदासी और तकलीफ़ रहस्यमय ढंग से अवतरित होगी। 'हवाना रेड' और 'द बिग स्लीप' सिरहाने रखकर सोने वाली मिनाची, माँ-बाप के गुज़र जाने के बाद, फिर कभी अच्छी तरह सो नहीं पाई।
'ए स्टडी इन स्कारलेट' जिसकी प्रिय किताब थी, उससे स्कूली पढ़ाई पार नहीं लगी। छोटी-सी उम्र में उसका परिवार बिखर गया। उसकी दुकान बिक गई।
जिस मिनाची की प्रिय किताब 'द नेम ऑफ द रोज़' थी, उसका जीवन माता-पिता के बिना 'ब्लैक डाहलिया' हो चुका था। 'द साइलेंस ऑफ द लैम्ब्स' उसके जीवन में मौत-सा काला रहस्य बनकर फैल चुका था।
ऐसे में एक दिन वह मदद माँगने मेरे पिता राघवन के पास पहुँची। उन्होंने उसे अंग्रेज़ी टाइपिंग के लिए रख लिया, मगर वे स्वयं मिनाची से सम्मोहित हो गए।
तेरह साल की मिनाची अभी-अभी किशोरावस्था में आई थी। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण उसके भीतर अभी-अभी पनपना शुरू हुआ था। सामने बस एक ही विकल्प था। नन्ही, कोमल लता उस पुराने दरख़्त पर टुक-टुक कर, हौले-हौले चढ़ने लगी। धीरे-धीरे वह मेरे पिता की विद्वता, उदारता और सौम्यता से प्रभावित होती चली गई। उसकी कृतज्ञता उसे उस कुंज तक ले गई, जो बाद में नरक की सेज तक पहुँचा। तब उसके भीतर विरोध के स्वर ध्वनित होने लगे। वह मृत नहीं थी, न ही प्रज्ञाविहीन। संसाधनों और विकल्पों के अभाव में वह लड़की विपरीत समय में फँस गई थी।
वह अपने बारे में सब कुछ मुझे बताती जाती और मैं बड़े धैर्य से सब सुनता जाता था।
हम आपस में खूब बातें करते थे, मगर मैं उसे यह नहीं बताता था कि मैं वही रिज़वान हूँ, जो दस साल से लापता है।
बातों-बातों में मुझे एक दिन पता चला कि आज ही मेरे पिता की मृत्यु हुई है।
समय और प्रकाश का घनत्व चेहरे पर चिपकाए मैं प्रश्नवाचक दृष्टि से दर्पण को देखता रहा। अतीत की धूसर चमक वर्तमान के चटख रंग पर भारी पड़ रही थी।
मैं दस साल पहले के रिज़वान को ढूँढ़ रहा था, मगर रूक्ता उसे ढूँढ़ नहीं पा रहा था। हेकड़ का रिज़वान, सीतापुर का रूक्ता, चमोली के प्रसिद्ध आर्ट स्टूडियो 'द पोटेटो ईटर्स' का मालिक…
दर्पण की परावर्तक सतह मेरे भीतर तरंग और कंपकंपी पैदा कर रही थी। मैं भीतर-ही-भीतर हिल रहा था। भीतर से आती प्रतिध्वनि मुझे भीतर बुला रही थी। मैं और कितना भीतर जाता? दर्पण में दिख रही तस्वीर मुझे बाहर बुला रही थी। मैं और कितना बाहर निकलता?
दर्पण समूचा चेहरा खा जाता है, और अंतर्ज्ञान का कोई चेहरा नहीं होता है। मृत्यु, घृणा और आक्रोश पर जैसे कोई ताला कस रहा था। मेरा उससे संबंध असुंदर था, इसलिए वह मुझे कभी सुंदर नहीं लगा। देवताओं ने अपने बरामदे पर हम जीवों को बैठा रखा है और वे हमें भीतर-बाहर करते रहते हैं। भीतर से आवाज़ आई होगी और पापा चले गए होंगे। मेरा नाम कब पुकारा जाएगा?
काश! दर्पण हमारा व्यंग्यचित्र बना पाता।
दर्पण दुख को जितना स्पष्ट दिखा पा रहा था, करुणा को उतना साफ़-साफ़ व्यक्त क्यों नहीं होने दे रहा था?
स्वर्ग से चाँद को छीन लो, तो क्या स्वर्ग, स्वर्ग रहेगा?
धरा से सूरज को छीन लो, तो क्या जीवन रहेगा?
कलाकार से तूलिका और रंग छीन लो, तो क्या वह बच सकेगा?
पापा ने मुझसे रंग, तूलिका, कैनवस छीनकर मुझे किताबों के साथ बंद कर दिया था। जलते बल्बों के बीच मैं उबल रहा था। मेरे भीतर घना अँधेरा फैल चुका था।
माँ से बिछड़कर प्यासा रिज़वान… आजी से मिलकर तृप्त हुआ रूक्ता… कला में डूबा, यश में लिथड़ा चित्रकार…
अकेला रिज़वान… भागता और भटकता रूक्ता… एक प्रतिष्ठित चित्रकार…
ये तीनों दिखते अलग हैं। क्या ये तीनों सच में अलग हैं?
क्या उदास रिज़वान रंग भरते ही प्रफुल्लित चित्रकार में बदल गया? मेरी वे लकीरें कहाँ गईं, जो मुझे जगह-बेजगह मिलती रहीं? मैं कितना चिकना हो गया हूँ! रंग मेरी बहुत-सी लकीरों को, उजाले को और सफेदी को खा गया। मैं जहाँ-जहाँ सफेद और उजला था, अब कितने ही रंगों से भर गया हूँ।
मैं क्यों हेकड़ जा रहा हूँ?
क्या मेरे पिता को और देख लेने की चाह मुझमें बची थी? क्या मैं उन्हें मृत जानकर सिर्फ़ इसलिए जा रहा था कि वे अब मुझे न लज्जित कर पाते, न ही मुझ पर हाथ उठा पाते? मैं उनकी निरीहता देखना चाहता था, या थोड़ी करुणा से उन्हें देखना रह गया था? क्या उस करुणा से उन्हें देख लेने का संतोष पाना चाहता था मैं?
मैंने आख़िरी बार उन्हें लाल आँखों से देखा था। अब उन्हें बुझी और शांत आँखों से देखना चाहता था। क्षमा करते वक़्त आँखें बादामी हो जाती हैं। क्रोध शांत होने पर आँखें राख-रंग की हो जाती हैं। प्रतीक्षा में पीली और मिलन में हरी, प्रेम करते वक़्त हल्की गुलाबी। विरह का रंग आसमानी और आँसू का रंग बारिश का रंग है।
मैं हेकड़ जाने की तैयारी करने लगा। मैंने ढंग से शर्ट-पैंट पहनी, जूते-मोज़े ठीक किए। वैसे ही, जैसे मेरे पिता मुझे कपड़े पहनने का निर्देश देते रहे थे, बिल्कुल उसी तरह। फिर उसी तरह तनकर चलने लगा, जैसे मेरे पिता चला करते थे। मैं तैयार होकर फिर से आईने के पास खड़ा हो गया। मैं आईना देखते-देखते रो रहा था। स्मृतियाँ वसंत की जेब में आ गई थीं। समय कान में कुछ फुसफुसा रहा था। बाहर चिड़ियों का कलरव चरम पर था। सतबहिनी चरखी कब से कलरव किए जा रही थी।
मैंने खिड़की से झाँककर देखा। प्योली खिली हुई थी। चार पंखुड़ियों वाली प्योली। किसी प्यारी-सी लड़की का पिता अपनी मृत बेटी को इस पीले पुष्प में देखता था और मरते दम तक उसकी आँखों में बेटी की प्रतीक्षा रही। जो गया, फिर कहाँ लौटा है? अपने मृत पिता को मैं किस फूल में, किस रंग में देखूँगा?
एक दृश्यमान कोर… भीतर अनुभव और करुणा में भयंकर द्वंद्व मचा था। हज़ार तरह की बातें सोचते-सोचते मैं घर से बाहर निकला। यह सफ़र धुँधली तस्वीर को नज़दीक से देखने के लिए तय होना था। क्या नज़दीक पहुँच जाने के बाद तस्वीर साफ़ हो पाएगी?
मैं न जाने क्यों हेकड़ लौट आया।
रंग प्रत्याशा: कुम्हलाई आग का रंग था उसका। इतना तो पता था मुझको, वह राख तो नहीं थी।
तब तक ठंड दिमाग़ में जलकुंभी की तरह फैल चुकी थी। पूस की ऐसी ही अलसाई, सिकुड़ती, संभलती, थरथराती, सुगबुगाती, जमी-जमी-सी सुबह में हल्की-सी भोर की धूप एकतार की चाशनी की तरह उतरी।
मैंने उस कुत्ते को देखा, जो मेरे पिता को मुझसे अधिक प्रिय लगता रहा था, हमेशा। उसकी आँखों की गरम ओस का खारापन मेरे भीतर के मनुष्य को नम्र आमंत्रण दे रहा था।
पिता का यह अनुशासित और आज्ञाकारी कुत्ता किसी निर्दोष दुनिया से आकर उनके साथ सदा के लिए रह गया था। वह परेशान और दुख-ज़ब्त आँखों से मुझे टटोल रहा था। गनीमत यह थी कि वह मुझ पर भौंक नहीं रहा था, उस तरह से, जिस तरह दूर-दराज़ के रिश्तेदार भौंक रहे थे।
दुर्भावना से भरी सभी आँखें टूटा हुआ दर्पण हो गई थीं। उनमें अपना चेहरा देखा नहीं जा रहा था। इतना टूटा और गहरी दरारों से भरा चेहरा…
बैंगनी झालरों से सजा घर और झालरों से लटकते शहद के रंग के मोती।
यह झालर माँ ने क्रोशिया से बनाया था। शहद की बूँद जैसे इन मोतियों को मुँह में लेकर मैं चूसने लगता था। माँ मध्यमा और तर्जनी डालकर उन्हें निकालती… गुनगुनी आवाज़ में कहती, "कंठ में फँस जाएगा, पेट में चला जाएगा।"
मैं पैर पटक-पटककर इन मोतियों के लिए रोता था।
एक दिन छप्पन भोग, एक दिन दूध-भात, फिर लंबा उपवास। प्रेम को जल हो जाने दो, ख़ुदा… मैं रो रहा था और पानी परिभाषा से बाहर निकलकर खेल रहा था…
आँसू को भागना होता है। वह आँखों के भीतर कब से कैद पड़ा होता है और मुक्ति की प्रतीक्षा में प्रार्थना करता रहता है। दुख उसे आज़ाद करता है, कभी-कभी अपार हर्ष भी। आँसू इसलिए तो अति का पूजक है।
ये दूज के चाँद-से रिश्तेदार, जो मृत्यु के क्रिया-कर्म के बाद कभी दुबारा नहीं दिखते, जाने कहाँ और कैसे इन्हें मृत्यु की गंध लग जाती है और दौड़े चले आते हैं। मगर मैं ज़िंदा हूँ, यह जानकर वे हैरान और परेशान थे।
अब न रोने की लगन उनमें बची थी, न ही कुछ पा लेने की आस। पा लेने वालों को देना कब ज़रूरी लगा है?
बाबा ने उड़ती मौत को शराब का धागा फेंककर लपेटा था और जब वह मौत को अपनी तरफ़ खींच रहे थे, बस उसी क्षण मिनाची नामक नन्ही चिड़िया का प्रवेश उनके जीवन में हुआ था। बाद के दिनों में वही वह पिंजरा बने, जिसमें मिनाची बेइंतहा छटपटाती रही। बाबा ने मौत को अपनी तरफ़ ज़ोर से खींचा। नाज़ुक-सी मौत उस विशालकाय आदमी को धीरे-धीरे निगल गई।
रसोईघर से आती आवाज़ों में कई तरह की फुसफुसाहटों का मिश्रण था।
मेरी माँ मुसलमान थी और मेरे पिता हिंदू थे। मैं कुछ भी नहीं हूँ।
मुझे उनके शव को न जलाने का मन था, न दफ़नाने का। नदी में बहाने का मन था।
मैं जंगल के अँधेरे में छिपकर भाग्य नामक जीव को हस्तरेखाओं से बुने जाल में फँसाना चाहता था।
जंगल के अँधेरे में सुगंध के पन्नों की फड़फड़ाहट थी। कविता कलरव में व्यक्त हो रही थी।
क्रिस्टल की तरह शुद्ध और चमचमाती मेरी ईर्ष्या को वह अपनी मृदुता से घिसना चाहती थी। वह घिसकर उत्तरी ध्रुव की ठंडी हवा बन गई थी। मैं अब भी अपनी कुंठाओं के साथ चमकता, दमकता, जलता, मरता हुआ अपनी उपस्थिति पर बेहूदगी की हद तक जाकर गर्व कर रहा था।
चिमनी से धुआँ बाहर निकल रहा था। भीतर की ठंड को आग से निरस्त करने की कृत्रिम कोशिशें ज़ोरों पर थीं।
भुने हुए आलू को तश्तरी में रखकर वह मेरी तरफ़ मुख़ातिब हुई।
रात में ताँबा मिल गया था। ठंड में पक्षाघात के रोगाणु थे। मैंने उसे नमकीन आँखों से देखते हुए पूछा,
"तुम्हारी इस रात से क्या उम्मीद है?"
उसने मुझे करुणा की दृष्टि से देखा और एक पीतल जैसी रोशनी उसके आस-पास फैल गई, मानो वह कोई देवी हो।
मैं भुने आलू के साथ शराब पीना चाहता था। मैं नमक की बोरियाँ निगल लेना चाहता था।
उसने रहस्यमयी आवाज़ में कहा,
"अब क्या करोगे?"
मैंने उसकी तरफ़ बेचैन नज़रों से देखते हुए पूछा,
"तुम यह घर लेना चाहती हो?"
सपाट-सा उत्तर तीर की भाषा में देते हुए उसने कहा,
"नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ आश्चर्य से देखा।
मानो मैं पूछना चाहता हूँ, "क्यों?" मगर वह बर्फ़ हो गई थी। मेरी ठिठुरन चरम पर थी।
वह पिता, जो मुझे संभाल नहीं सका या जिससे मैं नहीं संभला, वह मरते वक़्त मेरे लिए क्या सोच रहा था?
ईंट के भट्टे जैसी उसकी ज़िंदगी से कच्ची संतान का निकलना उसे आक्रोशित करता था?
वह अपनी मरी हुई माँ को याद करते हुए अपनी इच्छाओं को दबा लेने वाला इंसान नहीं था। वह गर्मजोशी से स्त्रियों से मिलता था। वह हर दिन दोस्तों की मजलिस लगाता था। उसने मेरी माँ की कमी को शोर और कई तरह की आवाज़ों से भर लिया था।
मैं उस शोर से बार-बार पटकनियाँ खाता था। मैं हर तरफ़ से टूट-फूट चुका था। बेहोश लोगों के बीच जाकर खाली शराब की बोतलें इकट्ठा करते-करते रात गुज़ारना मेरी नियति का हिस्सा बन चुका था।
बची हुई शराब पीने से ज़िंदगी ठहर-सी गई थी। यह ठहरना संभलना नहीं था।
मैं न माँ का धर्म जानता हूँ, न पिता का। जी जाने का कोई पंथ होता, तो मैं उसका अनुयायी था।
माँ ने अपने लिए जो कुछ कपड़े-गहने जोड़े थे, वे रिश्तेदारों के शरीर पर बिल्कुल नहीं जँचते थे।
मेरा मन न किताबों में लगता था, न घर में। मैं ज़्यादा समय सड़क पर गुज़ारता था। जब तक थकता नहीं था, घर नहीं लौटता था।
घर में कोको (हमारा कुत्ता) के अलावा कोई मेरी प्रतीक्षा करता हुआ मुझे नहीं मिलता था।
पिता देर शाम घर लौटते थे।
"मैं स्कूल नहीं जाता हूँ", इस बात की ख़बर उन्हें उत्तेजित करती थी। शुरू-शुरू में वह मुझे प्रेम से पास बैठाकर समझाते रहे, फिर डाँटने लगे, फिर पीटने लगे, फिर भूखा रखने लगे। मैं नहीं बदला, ज़िद पर अड़ा रहा और एक दुपहरिया भूखे-प्यासे, नंगे पाँव चलते-चलते बहुत दूर निकल आया। इस भागने की ज़िद में मैं बेतरतीब भागते हुए एक दिन सीतापुर आ पहुँचा। सीतापुर से रेता और फिर रेता से अपने शहर हेकड़। रेता से हेकड़ लौटना कई तरह की वापसी और प्रस्थान का हेतु बना।
पिता की मृत्यु के बाद मैं हेकड़ लौट आया। रिश्तेदार ना-नुकर, आश्चर्य, जिज्ञासा और कलह के बीच मुझे बेमन से रिज़वान मानने को तैयार हो गए।
पिता ने वसीयत में वारिस का नाम रिज़वान लिखा था। घर तो मेरा ही होगा, पैसे भी — यह सोचकर बहुत से लोगों को सदमा लगा था।
मिनाची मुझे करुणा की दृष्टि से देखती रही। मैं उसे किसी अनुपयोगी सामान की तरह।
वह मरते वक़्त चीखा था?
नहीं।
वह मृत्यु के दिन कैसा था?
बेहद खुश… मगर आख़िरी रात थोड़ा परेशान था।
उसका कभी किसी से झगड़ा हुआ?
नहीं। वह प्रायः शांत और चुप रहा करता था। आख़िरी रात वह मुझसे शराब माँग रहा था।
वह किसी स्त्री से प्रेम करता था?
हाँ! बहुत-सी स्त्रियों से।
वह ऑफिस से देर शाम लौटता था?
हाँ।
तुम उसके पास आया-जाया करती थी?
हाँ। मैं उसके जीवन में आई आख़िरी स्त्री थी।
वह मेरी चर्चा करता था?
नहीं।
यहाँ मेरी और माँ की तस्वीर हुआ करती थी। वह तस्वीर… कहाँ गई?
वह गोदाम की स्टील वाली अलमारी में है।
उसने तुम्हें बताया कि वह मुझे बेरहमी से पीटता था?
नहीं बताया, मगर मैं समझती हूँ।
कैसे?
मिनाची ने अपनी पीठ और छाती उघाड़कर दिखलाई।
उन पर ताज़े चोटों के निशान थे।
वह हैवान था।
नहीं, वह उतना बुरा भी नहीं था।
तो तुम मनुष्य नहीं हो।
वह ‘न’ को नहीं समझ पाता था।
लड़की, तुम अपना भी सम्मान नहीं करती हो।
वह ‘न’ के जाल में इस तरह जकड़ जाता था कि उस बेचैनी में हाथ उठा लेता था।
तुम एक पागल को डिफेंड कर रही हो, मिनाची।
तुम उसे किस बात के लिए ‘न’ कहती थी?
शराब के लिए…
तुम उसे किस बात के लिए ‘न’ कहते थे?
स्कूल के लिए…
वह तुम्हें हर दिन पीटता था?
नहीं। जिस दिन वह बेहद थका और उदास होता था, जिस दिन वह सिर्फ़ और सिर्फ़ शराब के साथ रात गुज़ारना चाहता था।
तुमने उस आदमी से क्या सोचकर… मिनाची?
दुख एकदम से उतरता है और सभी रास्ते एक बार में बंद कर देता है। फिर जो बचता है, वह कोई एक दलदली गली भर होती है — बालिश्त भर जगह, पिल्लू-से सिहरते दुख, आफ़त के हज़ार फतिंगों से भरी गली। दुख में चीखने पर कोई हाथ भर बढ़ा दे, तो मन उसके प्रति इतना नम हो जाता है कि आदमी उसका असली रंग देख ही नहीं पाता। वह मुझे एक समय में अच्छा लगा था। मुझे लगा, जितना दिख रहा है, उतना भर ही है वह। मगर उसके भीतर तरह-तरह के लोग थे। मैंने उसके कई स्वरूपों को देखा। शुरू-शुरू में वह मुझसे बड़ी सौम्यता और धैर्य के साथ मिलता था। उसकी दुधिया हँसी, मीठा चुंबन, तीखी नज़र, किताबों में सनी आँखें, दूध-से उफनते बाल मुझे भले-भले से लगे। मैं धीरे-धीरे उसके प्रति आसक्त होती चली गई। मगर जब आसक्ति से प्रेम की सीढ़ी पर चढ़ी, तो उसके स्वास्थ्य और जीवन की चिंताएँ मुझे घेरने लगीं। मैं उसे शराब पीकर मरते हुए नहीं देखना चाहती थी। मैंने अधिकारवश उसे रोकना-टोकना शुरू किया, मगर उसे ‘न’ सुनने की आदत ही नहीं थी। मैंने उसे सिगरेट पीने से रोका, तो उसने मुझे धक्का दिया। मैंने उसे शराब पीने से रोका, तो उसने मुझ पर हाथ उठाया। ‘न’ ने उसके भीतर के हिंसक पुरुष से मेरा परिचय करवाया। वह एक नहीं था; उसके भीतर अनेक तरह के लोग थे। मैं भी अपनी ‘न’ पर अड़ी रही और वह भी अपनी हिंसा पर। वह मेरी आर्थिक ज़रूरत पूरी करता रहा, मैं उसकी… पता नहीं किस प्रभाव से बीते साल से उसने शराब पीना बिलकुल बंद कर दिया था। मगर मृत्यु की रात उसने मुझसे शराब माँगी और मना करने पर वह मुझे तरह-तरह से आहत करता रहा। मैं हारकर घर से बाहर निकल गई। सुबह आई, तो वह बिस्तर पर मृत पड़ा था।
तुमने अपने जीवन के महत्वपूर्ण पाँच वर्ष ग़लत व्यक्ति के साथ ख़राब किए, मिनाची। हिंसा को अवसर देना भी अपराध है। सच बताओ, मिनाची, तुम्हें क्या ऐसे ही लोग पसंद हैं?
नहीं, मुझे शांत, धैर्यवान, मीठे और पारदर्शी लोग पसंद हैं।
फिर इतने उम्रदराज़, कठिन, क्रोधी और कई लोगों में बँट चुके इंसान के साथ रहना और इतने लंबे समय तक ठहरना तुमने क्यों स्वीकारा?
शायद पैसों के लिए… मुझे इतने पैसे मिल जाते थे कि भर पेट खा सकूँ।
तुम कुछ और भी कर सकती थी।
मेरा मन स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई-लिखाई में बिल्कुल नहीं लगता था।
तो सिलाई सीख लेती, मिनाची…
मुझे सिलाई-कढ़ाई भी पसंद नहीं थी। स्त्री होने भर से रसोई, सिलाई-कढ़ाई-बुनाई में रुचि पैदा हो जाती है क्या?
अब क्या करोगी?
पता नहीं…
फिर पूछता हूँ तुमसे, क्या यह घर तुम्हें चाहिए?
नहीं। मेरे पास पहले से घर है। उसका बिजली का बिल, हाउस टैक्स भरना ही मुश्किल है। उसे रंगना, साफ़-सुथरा रखना — सब मेरे लिए चुनौती बन चुका है। मैं तुम्हारा घर लेकर क्या करूँगी?
तो अब तुम अपनी जीविका चलाने के लिए क्या करोगी?
फलों की दुकान लगाऊँगी। कुछ पैसों से तुम मेरी मदद कर सकोगे?
फलों की दुकान कहाँ लगाओगी?
घर के दालान पर…
कोई नहीं खरीदेगा।
तुम बाज़ार में एक जगह देख लो। वहीं फल और दूध की दुकान खोल लो। मैं मदद करूँगा।
इस मदद के बदले मुझे क्या करना होगा?
मैं तुम्हारी एक तस्वीर बनाऊँगा।
हेकड़ के रिजवान की पहली पेंटिंग ताज़े ज़ख़्मों में लिपटी एक स्त्री है।
रंग संवाद: रंग मितानी का। शब्द भी रंग है, जिसमें हम भाव उतारते हैं।
सीतापुर के रूक्ता ने हेकड़ के रिजवान बनने में कोई फुर्ती नहीं दिखाई। समय के साथ धीरे-धीरे ज़ख़्मों का रंग और आकार बदलने लगा।
एक दिन मिनाची ने मुझसे कहा —
"मेरी और तुम्हारी चोट में फ़र्क है। तुम अपने मन का करने के लिए चोट खा रहे थे, मैं पेट भरने के लिए।"
मैंने आकाश में धूप को टटोलते हुए कहा था —
"मन के लिए कुछ करना अपनी देह के देवता को प्रसन्न करना है। पेट के लिए वैसी चोट, वह भी उस तरह से खाना… सब कुछ क्रांति नहीं होता, कुछ बचे रह जाना भी होता है।"
"यह सच है।"
अभी उसके (राघव) जाने के बाद भी स्थिति वैसी ही हो गई थी, जैसी पिता के न रहने के बाद पैदा हुई थी।
"तुम उसे शराब पीने से नहीं रोकतीं, तो शायद वह तुम्हें नहीं मारता।"
"हाँ।"
"सुनो, मिनाची… तुम्हारे पिता कैसे मरे?"
उसने चेहरा सख़्त कर लिया, गला पूरा खोलकर, दीवार को भेदती आँखों से देखते हुए कहा —
"शराब की लत से…"
"तुम इतने दिन दूर रहे, फिर अपने पिता की मौत के बाद वापस क्यों आए?"
"तुम्हारी कहानी सुनने।"
"मेरी कोई कहानी यहाँ होगी, यह तुम कैसे जानते थे?"
"नियति जानती थी।"
"सीतापुर की जिस बूढ़ी स्त्री की बातें तुम अक्सर किया करते हो, उस स्त्री का नाम भी पूछना तुमने उचित नहीं समझा?"
"उसने थोड़े ही समय में नाम से कहीं बड़ा परिचय खड़ा कर दिया था। नाम जान लेने की चाह उस विराटता में खो गई।"
"तुम उससे मिलने क्यों नहीं गए?"
"दुर्लभ को दुहराया नहीं जा सकता…"
"मिनाची! तुम अपनी माँ के बारे में बताओ।"
"नाम?"
"नाम में क्या रखा है?"
"वह बीमार थी। परेशान थी। पिता उसकी नहीं सुनते थे। उसे पिता की ही सुननी पड़ती थी। घर्षण गहरा था, तो घिसकर ख़त्म होना भी त्वरित हुआ। वह एक अस्त-व्यस्त, उदास स्त्री की मौत थी।
सोफ़े पर लेटे-लेटे एक दिन वह चल बसी। सिरहाने कुशन था। कुशन पर मलाई और अरहुल रंग के फूल बने थे। सामने पलंग पर पापा घरघराती साँसों के साथ सो रहे थे। पास में एक छोटा-सा टेबल पड़ा था। उस पर नाश्ते का बस्ता रखा था। प्लास्टिक की बोतल और समस चुके अखरोट पुराने अख़बार पर लुढ़क रहे थे। क्रिसमस के पेड़ के बगल में भेड़शाला थी। छोटे-बड़े भेड़ों के बीच नवजात यीशु थे।
फ़्रिज में छोटे-बड़े कई पात्रों में बेहद ग़ैरज़रूरी चीज़ें यूँ ही पड़ी थीं। फ़्रीज़र में पावभाजी से लेकर चाट मसाले तक ठंड उगलते कोनों को टुकुर-टुकुर निहार रहे थे। वॉशिंग मशीन में स्कूल ड्रेस और दूसरे कपड़े पड़े थे। आम के पेड़ के नीचे नल के पास डस्टबिन धुलने की प्रतीक्षा में था। मिक्सी का छोटा नया डिब्बा ख़राब पड़े माइक्रोवेव पर रखा था। बड़े टेबल पर किताबें, टिफ़िन और कपड़ों के झोले पड़े थे, और कमरे की फ़र्श पर बहुत-सा सामान बिखरा हुआ था। रसोई के बेसिन में जूठे बर्तन पड़े थे। स्लैब पर प्याज़, आलू के छिलके और हरी सब्ज़ियों की कतरनें बिखरी पड़ी थीं।
माँ चल बसी, और मैं बिखरती चली गई।"
"ओह! यह एक उदास स्त्री की मौत थी।"
रंग भारी: उठाए लीब-लीब जाए मन
एक भारी दिन मैं और मिनाची अतीत के दृश्यों से वर्तमान का ज्ञान बढ़ाने बैठे। उस दिन के पेट में टिक-टिक करती घड़ी थी। मिनाची तर्पण के मंत्रों-सी अपनी कहानी बुदबुदा रही थी। उसने न जाने कब अपने मन का मुंडन कर दिया था। मिनाची का गला सूख रहा था और वह पास की टेबल से पानी का गिलास उठाकर एक ही बार में गटक गई। लगा, सच को एकदम से गटक रही है। उदासी में सना चेहरा और फूल से लदी डाली-सी झुकी आवाज़ में उसने कहा —
रूप, रंग, उम्र, सगुन, अपसगुन, भाग्य, दुर्भाग्य, सुनिर्धारित कर्तव्य, परिभाषित वर्ज्य के चक्रव्यूह से निकलना कठिन था। मैं भूखी थी और पेट एकदम खाली था।
हमें जल पीता है। वायु निगलती है। माटी खाती है। गर्मी गलाती है और हम एक दिन ख़त्म हो जाते हैं, यह सोचते-सोचते कि हमने जल पिया, हमने वायु ली, हमने माटी घिसी, हमने पसीना बहाया। जब हम अन्न नहीं खा रहे होते हैं, तब अन्न हमें खा रहा होता है। हम पशु, पंछी, जीव का भक्षण नहीं करते, वे हमें खा रहे होते हैं। जितना जल ने हमको पिया, हमने भी बस उतना ही जल पिया है। जल फिर भी बचा रहता है, हम ख़त्म हो जाते हैं। मेरी माँ कभी कुंदरी नहीं पकाती थी। उस दिन पापा के मित्र कुंदरी ले आए। उन्होंने ही उसकी सूखी सब्ज़ी बनाने का तरीका बताया। अपने जीवन में पहली बार हमने कुंदरी खाई और उसी दिन हृदयाघात से मेरी माँ की मौत हो गई। तेरह अगस्त का वह दिन मैं भुलाए नहीं भूल पाती हूँ, रिज़वान। मेरे स्वप्न में यह सब्ज़ी अक्सर आ जाया करती है और मैं सिहर उठती हूँ। ऐसा फल, जो मेरी आत्मा के टुकड़े-टुकड़े कर देता है। मैं इस सब्ज़ी से भय खाने लगी हूँ।
निर्दोष सब्ज़ी को न कोसो, मिनाची। तुम्हारे मनोमस्तिष्क को बुरी तरह प्रभावित करने वाले उस दुख का कारण सब्ज़ी के सिर पर थोपकर तुम कितने तरह के लोगों, कितनी तरह की परिस्थितियों और कितने तरह के दुखों को आरोप से लगभग बरी कर रही हो।
किसी भले, मायूस आदमी का चेहरा ही तो भगवान का चेहरा है। हमारी सौ भटकन, एक प्रेम के लिए…। एक प्रेम है, जो किसी के लिए नहीं भटकता। सब उसे पा लेना चाहते हैं, वह किसी का होना नहीं चाहता। हम छोटे-छोटे अहंकारों से जो एक परिधि बनाते हैं, प्रेम सबसे पहले उसी के अतिक्रमण के लिए हमें उकसाता है, क्योंकि वह परिधि के भीतर कभी न आ सकने के लिए प्रतिबद्ध है। मैं मिनाची की तरफ़ आकर्षित हो रहा था।
हम मनाएँगे वे सारे उत्सव, जो हमारे धर्म को बचाएँगे। हम कुछ भी ऐसा नहीं जताएँगे, जिससे हमारी मनुष्यता बची रहे। बारिश से सड़क, मंगौरी, पापड़, लाल सूखी मिर्च — सब ख़राब हो जाएँगे, इस बात की चिंता है आम आदमी को; मगर हिंसा एक कोमल इंसान की बोटी-बोटी खा जाती है, इसका कोई अफ़सोस और मातम नहीं है।
मिनाची की आकांक्षाएँ, इच्छाएँ, संकल्प और उसका जिया हुआ जीवन — सब आँखों पर से कई मोटे-पतले पर्दों को धीरे-धीरे उठा रहे थे।
"मिनाची! तुम मेरे पिता को छोड़कर किसी और को चुन सकती थीं।"
"बार-बार लज्जा उतारने का अर्थ समझते हो तुम? दूसरी जगह चोट न मिलती, इसकी क्या कोई गारंटी थी? एक बार नरक में पाँव रखा, कितनी-कितनी बार और कहाँ-कहाँ रखती… मन, आत्मा और देह का 'नरक-निवेश' आसान है क्या?"
"रिज़वान, तुम्हें अपनी माँ अब भी याद है?"
"हाँ, याद है। वह बहुत डॉमिनेटिंग थी। बाबा उसके अनुयायी थे। माँ को शराब पीना पसंद था। सलीके से पीती थी। बाबा भी उनका साथ देते थे। फिर वह चली गई। पापा सलीका भूल गए।"
"क्या शराब इतनी बुरी है?"
"नहीं। आदमी बहुत बुरी चीज़ है।"
रंग वितान / विवर्तन / परिवर्तन: ऐसो रंग और नहीं देखी
मैंने पुराने घर को तुड़वाकर नया घर बनाया है। उस घर में न तो मेरी माँ की कोई पेंटिंग है, न ही मेरे पिता की कोई पेंटिंग है।
सीतापुर की उस वृद्धा की पेंटिंग है, जिसने एल्यूमिनियम की थाली में मुझे गरमागरम खाना परोसा था।
ड्रॉइंग रूम की दाहिनी दीवार पर भोजन से भरी एल्यूमिनियम की थाली की तस्वीर है।
दुख रंग से भी मिटाया जा सकता है…
मिनाची को फल और दूध बेचते हुए दो दशक बीत गए। मगर अतीत है, जो बिकता ही नहीं है। न उसकी चमक कम होती है, न उसे कोई मोल लेकर जाता है।
जिसे किस्मत बड़ा 'न' कहती है, वह हर 'न' को हथौड़ा बना लेता है। इसे-उसे, न जाने किसे-किसे ठोकता रहता है उस 'न' से…
जो 'न' को नल की टोंटी बना लेता है, वह कितने ही प्यासों की तृप्ति का कारण बनता है।
'न' बरतना सबको नहीं आता।
गहरा प्रेम हिंसा की छाया में व्यभिचार हो जाता है।
हिंसा संक्रामक है और सुंदर-से-सुंदर चीज़ों को रुग्ण कर देती है।
एक दिन मैंने मिनाची से पूछा —
"तुम अपने लिए लड़ते हुए मर सकती थीं।"
उसने धीमे से कहा —
"मैं जीना चाहती थी।"
"मज़दूरी कर लेती।"
"नहीं कर सकी।"
"तुम अपने ज़ख़्मों को क्या उत्तर दोगी?"
"पश्चाताप…"
"तुम मुझे कैसे देखती हो?"
"दुःख से भागा हुआ…"
"मैं तुम्हें जीता हुआ आदमी नहीं लगता हूँ?"
"जो भी जीवन में बना हुआ है, वह हारा हुआ नहीं है…"
"सब विजेता हैं?"
"हाँ।"
"मेरे जितने बड़े?"
"हाँ।"
"तुम मज़ाक अच्छा कर लेती हो।"
"मज़ाक सिर्फ़ और सिर्फ़ जीवन करता है। मनुष्य की क्या औकात… समय ने बिसात बिछाई है। हम सब आँखों पर पट्टी बाँधे टेढ़े-सीधे भागे जा रहे हैं। कहाँ पहुँचेंगे, कोई ख़बर नहीं। अगर मैं तुम्हें आज से शराब पीने न दूँ तो…"
"तुम्हें ताज़े ज़ख़्मों का शौक़ तो नहीं?"
"तुम कितने अधिक हारे हो, देख लो। तुम्हारे सफ़र में रिज़वान नहीं बच सका। वह राघव हो गया।"
"नहीं। यह झूठ है।"
"यह सच है।"
"नहीं, उस पेंटिंग में आधा मैं था। आधा ही वह था।"
"वह तुम्हें निगल गया।"
"मैं नहीं मानता।"
मिनाची ने चुप्पी से मेरे अंतिम वाक्य का उत्तर दिया —
"तुम एक दिन मानोगे।"
मैं बढ़ते समय के साथ घटते अपने मनुष्य को पहचान गया। मैं जहाँ-जहाँ से जितना-जितना घटा था, मैंने वहाँ-वहाँ स्वयं को जोड़ना शुरू किया। कितना जोड़ सका, इसका पता नहीं…
रंग समाधि: चार पल से गुज़र गए वे चौबीस वर्ष
चौबीस वर्ष बाद…
कोमलता, कोमलता को पहचानती है।
मैंने एक बार फिर माँ की तस्वीर बनाई है। इस बार तस्वीर में माँ पहले से अधिक युवा और प्रसन्न लग रही है। उसकी गोद में मैं बैठा हुआ हूँ। मेरे हाथ में तूलिका है। मैं खिलखिलाकर हँस रहा हूँ। हँसता हुआ बच्चा लौटने लगा है।
अब मुझे किसी नशे, किसी भाषा, किसी स्कूल की ज़रूरत नहीं है। मैं बढ़ता जा रहा हूँ और एक दोस्त अक्सर मुझे कविताएँ सुनाती है।
फल और दूध बेचते हुए भी लिखी जा सकती हैं सुंदर कविताएँ…
सुकून-ए-क़ल्ब था कहाँ?
सुकून-बख़्श रंग ने सुकून-ज़ार गढ़ दिया।
मैं खींचता रहा लकीरें, रंग भरता चला गया…
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