सावित्री : एक प्रेम कथा
प्रेम, साहस, तर्क और स्त्री-आत्मविश्वास की पौराणिक कथा का समकालीन नाट्य रूपांतरण
‘सावित्री : एक प्रेम कथा’ सुमन केशरी का ऐसा नाटक है जो महाभारत की प्रसिद्ध सावित्री-सत्यवान कथा को समकालीन दृष्टि से देखने का प्रयास करता है। नाटक सावित्री को केवल पतिव्रता स्त्री के पारंपरिक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम, ज्ञान, तर्क, साहस और आत्मविश्वास से संपन्न स्त्री के रूप में सामने लाता है।
पौराणिक कथा और वर्तमान समय की एक स्त्री स्वाति की निजी पीड़ा को समानांतर रखकर नाटक यह सवाल उठाता है कि प्रेम केवल त्याग का नाम है या उसमें बराबरी, संवेदना, समझ और सक्रिय सहभागिता भी शामिल है।
नाटक : सावित्री : एक प्रेम कथा
दृश्य 1
स्वाति नाम की एक स्त्री एक पेड़ के नीचे बेंच पर बैठी है। अपने कपड़ों-गहनों से वह संभ्रांत कुल की स्त्री लगती है, पर बेहद परेशान और लगभग हताश-सी उसकी मुखमुद्रा है। तभी पार्क में कुछ दूर से उस स्त्री को कुछ आवाजें आती हैं। कुछ नौजवान लड़के-लड़कियाँ गोला बनाए बैठे हैं। उनमें एक प्रौढ़ स्त्री भी है जो उन्हें कुछ निर्देश दे रही है।
नीलोफ़र: कुसुम मैडम! बात कुछ समझ में नहीं आ रही... हम सावित्री... उस सती-सावित्री पर नाटक करेंगे... वही जिसे अपने पति की सेवा करने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं था? नो वे... वो इतनी बैकवर्ड और आउटडेटेड कैरेक्टर है... (फिर ग्रुप की ओर देख कर) गाइज़! तुम लोग क्या सोचते हो?
निखिल: मुझे भी यही लग रहा है... इन दिनों तो यह फैशन हो गया है कि कोई माइथोलॉजिकल कैरेक्टर उठा लो... मै’म... अगर ऐसा है भी तो वाय सावित्री? हम कोई और कैरेक्टर भी तो ढूँढ सकते हैं?
नीलोफ़र: यस मै’म... सावित्री एन्थ्यूज़ नहीं करती। शी इज़ टू बोरिंग... एकदम स्टीरियोटिपिकल!
कुसुम: मुझे पता था कि आप लोगों का रिएक्शन ऐसा ही होगा। आप लोगों ने इस कैरेक्टर को पति के पीछे-पीछे चलने वाली दकियानूसी औरत की तरह ही तो जाना है। एक्चुअली मैंने सावित्री की कहानी इसीलिए चुनी है कि आप लोग जान सकें कि उस पुराने ज़माने में, यानी कि हजारों साल पहले भी ऐसी स्त्रियाँ होती थीं, जो बहुत पढ़ी-लिखी, साहसी और ज्ञान और तर्क में निपुण होती थीं। मॉडर्न एज में ही औरतों ने पढ़ना-लिखना नहीं सीखा। सावित्री तो अपने प्रेम के लिए यमराज से लड़ गई!
रागी: लव! रियली? हाँ कुछ सुना तो है कि सावित्री यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी थी अपने हसबैंड को ज़िंदा करने के लिए!
रागी यह बात ऐसे बोलती है कि सबको हँसी आ जाती है। स्वाति बेंच पर बैठी बातें सुन रही है, किंतु कुछ-कुछ शब्द पूरी तरह सुनाई नहीं पड़ रहे, अतः वह वहाँ से उठकर ग्रुप के कुछ पास एक अन्य बेंच पर बैठ जाती है। कुसुम की निगाह उस पर पड़ती है। उसकी उत्सुकता को देखकर वह कहानी आगे बढ़ाती है।
कुसुम: वही हसबेंड यानी कि सत्यवान, जिसे सावित्री ने खुद चुना था और जिसे देखकर सावित्री के मन में इतना प्यार उमड़ा कि...
निखिल: मै’म सावित्री का स्वयंवर नहीं हुआ... जैसा उन दिनों सबका होता था!
रागी: वेरी फ़नी! स्वयंवर कहते थे और शर्तें फ़ादर की होती थीं और प्रॉस्पेक्टिव ग्रूम्स को भी वे ही बुलाते थे!
निखिल: लो पढ़ाकू पंकज भी आ गया... मै’म सब आ गए अब तो...
पंकज कुछ लंबा-तगड़ा पर गंभीर किस्म का पढ़ा-लिखा युवक है। उसकी आवाज़ गहरी और भारी है।
कुसुम: पंकज फिर से लेट हो गए तुम! खैर इन शॉर्ट... मैं चाहती हूँ कि इस साल का नाटक सावित्री पर हो... तुम क्या सोचते हो?
पंकज: मै’म! वेरी गुड आइडिया! कल ही मैंने सावित्री पर कुछ बहुत अच्छी कविताएँ सुनी थीं, यू-ट्यूब पर... और फिर मैंने पापा से भी बात की। बहुत ही कमाल की कैरेक्टर है! लव मैरिज़ की थी उसने!
कुसुम: बिल्कुल सही कहा! कमाल ही की कैरेक्टर है सावित्री!
पंकज: फ़्रेंड्स! मै’म तो बताएंगी ही, बट लेट मी स्टार्ट! सावित्री की कहानी महाभारत में है। मै’म वन पर्व में न!
कुसुम: हाँ, वनपर्व में। दरअसल जुए में सारा राजपाट, धन गँवा कर जब पांडव और द्रौपदी वन में रह रहे हैं, तब युधिष्ठिर, ऋषि मार्कंडेय से कहते हैं कि वे द्रौपदी के प्रति बहुत लज्जित हैं। उन्हें जुआ नहीं खेलना चाहिए था और राजपाट एवं द्रौपदी को तो दाँव पर बिल्कुल नहीं लगाना चाहिए था। तब ऋषि उन्हें समझाते हैं कि द्रौपदी के अपमान के लिए क्षमा माँगते हुए ही महाराज धृतराष्ट्र ने उन्हें वर दिए थे। और जैसा कि पूर्वकाल में सावित्री ने अपने पति, ससुराल और मायके का भला किया था, वैसे ही द्रौपदी भी पांडवों का भला करेगी। इसके बाद ऋषि युधिष्ठिर को सावित्री की कथा विस्तार से सुनाते हैं।
पंकज: उस कविता में भी यही था—
हे कल्याणी... कुलनन्दिनी!
तारोगी तुम पति और पिता के कुलों को...
निखिल: पंकज यार तुझे तो याद ही हो गई है कविता!
रागी: अच्छा ऐसा! हैरान ही कर दिया आपने तो... मै’म! और बताओ न सावित्री के बारे में...
कुसुम: सावित्री मद्रदेश के राजा अश्वपति और उनकी रानी मालवी की बेटी थी। बरसों सूर्यदेव व सावित्री देवी की आराधना व तपस्या करने के बाद उनकी बेटी हुई, तो उन्होंने अपनी बेटी का नाम सावित्री रख दिया।
नीलोफ़र: सावित्री का मतलब क्या होता है?
सभी कुसुम की ओर गहरी उत्सुकता से देखते हैं।
कुसुम: सविता सूर्य की ऊर्जा या किरण को सावित्री कहा जाता है। यह प्रेरणा देने वाली शक्ति है। तुम लोग सुनते हो न गायत्री मंत्र?
रागी, पंकज, नीलोफ़र (समवेत स्वर में): यस्स मै’म!
कुसुम: तो ऋग्वेद के उस प्रसिद्ध गायत्री मंत्र को ‘सावित्री मंत्र’ भी कहा जाता है क्योंकि यह सूर्य देव (सवितृ) को समर्पित है।
पंकज: यह बात नहीं मालूम थी मुझे!
शाम गहरा गई है। हल्का अँधेरा हो चला है।
रागी: मै’म! अब कल मिलें हम?
कुसुम: हाँ अब जाओ... पढ़कर आना सावित्री के बारे में। मैंने नाटक लिख कर रखा है। सबको मेल कर दूँगी। पंकज! वो सारी कविताएँ तुम मुझे मेल करना... मैं पढ़ना चाहती हूँ!
पंकज: जी मै’म!
कुसुम आगे बढ़ती है तो उसे स्वाति रोकती है।
स्वाति: मेरा नाम स्वाति है! बहुत अच्छी लगी आप लोगों की बातें... ये मेरा कार्ड (कार्ड देती है)... आप चाहेंगी तो हम बात कर सकते हैं... पता नहीं... (कुछ कन्फ्यूज़्ड-सी) शायद कोई रास्ता मिल जाए... थैंक्यू... (जल्दी से बाहर की ओर बढ़ जाती है।)
कुसुम कार्ड को ध्यान से देखती है और पर्स में डाल लेती है।
दृश्य 2
नारद और राजा अश्वपति बैठे बातचीत कर रहे हैं।
नारद: राजन! अब तो पुत्री सावित्री विवाह योग्य हो गई होगी। आपने उसके लिए कोई उपयुक्त वर नहीं खोजा?
अश्वपति: मुनिवर! आप तो जानते ही हैं कि सावित्री कोई साधारण कन्या तो है नहीं। उसके तेज से विचलित होकर कोई भी युवक उससे विवाह करने को राजी नहीं होता। इसीलिए मैंने उसे देशाटन के लिए भेजा है कि वह अपना वर स्वयं चुने...
नारद: यह तो आप ठीक कह रहे हैं। अद्वितीय गुणों व लक्षणों से सम्पन्न है राजकुमारी। आपने सही निर्णय लिया। वह अपने मन लायक वर चुनने के सर्वथा योग्य है।
तभी सावित्री आती है और नारद मुनि को देखकर एक पल रुक जाती है।
अश्वपति: आ गईं बेटी तुम... आओ मुनिवर को प्रणाम कर आशीर्वाद लो।
सावित्री दोनों को विधिवत् प्रणाम करती है।
नारद: राजकुमारी! आप जिस कार्य के लिए गईं थीं, उसमें कोई सफलता मिली?
सावित्री कुछ सकुचा जाती है। पिता की ओर देखती है। उनका इशारा मिलने पर वह विनम्र किंतु दृढ़ स्वर में कहती है।
सावित्री: जी ऋषिवर! वन में मैंने शाल्वनरेश धूम्रत्सेन के पुत्र सत्यवान को देखा। किसी रोगवश शाल्वनरेश वर्षों पहले अपनी दृष्टि खो बैठे। वे प्रज्ञाचक्षु हैं और रानी शेव्या तथा पुत्र सत्यवान के संग वे तब वन में आए थे जब सत्यवान अभी बाल्यावस्था में ही थे। वे वन में निवास करने को इसीलिए बाध्य हैं, क्योंकि उनके राज्य को पड़ोसी राजा ने हड़प लिया है। सत्यवान मातृ-पितृसेवी हैं और अपने चक्षुहीन पिता को छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते। यद्यपि वे अत्यंत वीर कहे जाते हैं और अश्वों से उनका विशेष प्रेम है। वे मिट्टी के बहुत अच्छे अश्व बनाते हैं और कागज़ पर भी उनके चित्र उकेरा करते हैं।
नारद: राजन! इसीलिए सत्यवान का एक नाम चित्राश्व है।
सावित्री: जी!
नारद जी सोच में पड़ जाते हैं। वे राजा को एक ओर ले जाते हैं। राजा भी चिंतित होते हैं।
नारद: यूँ तो सत्यवान, नाम के अनुरूप ही सच्चाई के मार्ग पर चलने वाला अत्यंत वीर युवक है। वह पृथ्वी की तरह धैर्यवान है। वह बहुत सुंदर व होनहार भी है। किंतु...
नारद जी रुक जाते हैं। सावित्री कुछ दूर खड़ी उन दोनों की बातें सुन रही है। राजा नारद की चुप्पी से परेशान हो जाते हैं।
राजा: मुनिवर! आप रुक क्यों गए... बताइए न!
नारद: क्या बतलाऊँ। राजकुमारी से कह दें कि वे सत्यवान को भूल जाएँ और किसी अन्य युवक को ढूँढें।
राजा: मुनिवर... ऐसा क्या है सत्यवान में कि आप?
नारद: सत्यवान में कोई अवगुण नहीं है छोड़ इस दोष के कि इस पृथ्वी पर रहने का उसका समय केवल एक वर्ष और बचा है!
राजा हतप्रभ हो जमीन पर ही बैठ जाते हैं। सावित्री कुछ पल अवाक् मुनि को देखती है। फिर निश्चय करके स्पष्ट शब्दों में कहती है।
सावित्री: पिताजी! मैंने निश्चय करके यह निर्णय किया है कि मैं सत्यवान से ही विवाह करूँगी। उन्हें देखते ही मेरे हृदय ने कहा कि यही पुरुष मेरा प्रेम पाने योग्य है। इसीलिए मैंने मन ही मन उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया। अब मैं किसी और का वरण नहीं कर सकती। आप कहेंगे तो मैं कुमारी रह लूँगी... किंतु वरूँगी तो केवल सत्यवान को।
नारद: परंतु राजकुमारी जानते-बूझते हुए वैधव्य का दुःख...
सावित्री: मुनिवर! माता-पिता ने मुझे इतनी शिक्षा-दीक्षा दी है। तप, योग व संयम का पाठ पढ़ाया है। सेवाभावी बनाया है। क्या मेरी ये योग्यताएँ सत्यवान के रोगों को हर न लेंगी! आप लोग मुझे आशीर्वाद दें कि मैं दृढ़ भाव से उस व्यक्ति को प्रेम कर सकूँ, सेवा कर सकूँ, जिसे मैंने अपने हृदय में उच्च स्थान दिया है।
नारद व राजा (समवेत स्वर में): तथास्तु! तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो।
नारद: तुममें अपार धैर्य व साहस हो, यही आशीर्वाद देता हूँ।
सावित्री झुककर बड़ों का आशीर्वाद लेती है।
राजा: मैं तुम्हारी माता से अभी बात करता हूँ। हम कल ही वन को रवाना होंगे और विधिवत् तुम्हारा विवाह सत्यवान से करेंगे। मुनिवर आप भी हमारे साथ चलें।
सावित्री का हर्षित व सलज्ज चेहरा...
दृश्य 3 : वर्तमान और अतीत के बीच
सभी लोग गोल घेरा बनाकर बैठे हैं। कुसुम के साथ स्वाति भी है।
स्वाति: कितनी क्लैरिटी है सावित्री में। उसे पता है कि वह सत्यवान से प्रेम करती है और उसके लिए सब उपाय करने को तैयार है।
रागी: लेकिन आंटी यह एक कहानी है। सच्चाई थोड़े ही! अभी तो उनकी शादी भी नहीं हुई। अगर शादी हुई होती तो बात कुछ और होती... तब तो इंडियन वुमेन के लिए यह डेड एंड होता। शी हैड टू सफ़र ऑल द पेन...
स्वाति: शायद...
कुसुम: ऐसा क्यों कहती हो रागी। हसबैंड-वाइफ़, माँ-बच्चे, भाई-बहन में एक इमोशनल रिलेशन भी होता है... वही सब कुछ करवा ले जाता है! माँ तो अपने बीमार बच्चे को छाती से लगा कर रखती है, पर क्या बच्चा अपनी बीमार माँ की चिंता करना छोड़ देता है? फ़ीलिंग्स आर इम्पॉर्टेंट।
स्वाति: इमोशन्स बहुत महत्त्वपूर्ण रोल प्ले करते हैं। परंतु कई बार बीमार भी अपने आस-पास के लोगों को, अपनी देखभाल करने वालों को परेशान कर देते हैं। लगता है कि वे ठीक होना ही नहीं चाहते। ऐसे में लाइफ़ मुश्किल हो जाती है...
कुसुम बहुत ध्यान से स्वाति को देखती है। वह नौजवानों से कहती है कि वे लोग अब घर जाएँ।
कुसुम: अच्छा अब कल मिलेंगे... आज देर हो रही है, जाइए आप लोग।
सभी के जाने के बाद।
कुसुम: स्वाति, आप कुछ उलझी लग रही हैं। अब आपके हस्बैंड कैसे हैं?
स्वाति: मैं सच में परेशान हूँ। बीमारी का इलाज ठीक चल रहा है, किंतु उन्हें किसी पर भरोसा ही नहीं। डॉक्टरों पर भी नहीं।
कुसुम: आपको है? क्या आपको नहीं लगता कि रोज़-रोज़ टेस्ट फालतू में करवाए जा रहे हैं?
स्वाति: लगता है, पर हम कर भी क्या सकते हैं। डॉक्टर से कुछ कह तो सकते नहीं। वे जो कहते हैं, हम करते जाते हैं। ये इतने चिड़चिड़े हो गए हैं कि कभी-कभी तो मुझे उनसे डर लगने लगता है। इसीलिए यहाँ आ जाती हूँ। थोड़ा दिमाग हल्का हो जाता है।
कुसुम: उन्हें बुरा नहीं लगता?
स्वाति: लगता तो है। बोलते हैं तुम मुझसे भाग रही हो... मेरा तो सारा दिन उन्हीं को देखते बीतता है। रात को नींद भी नहीं आती। पर वे खुश ही नहीं होते... सावित्री ने यह सब कैसे किया होगा?
कुसुम: इट वॉज़ प्योर लव फ़्रॉम सावित्रीज़ साइड! उसने शुरू से ही सत्यवान को महसूस करवाया होगा कि वे उसके लिए बहुत इम्पॉर्टेंट हैं। खूब प्यार जताया होगा... यह जानते हुए भी कि एक साल के मेहमान हैं, उनके लिए सजती-सँवरती होगी... हँसती-खिलखिलाती होगी... और उसने सत्यवान का दिल ऐसे जीता होगा कि जो वह कहती होगी, सत्यवान को वही सही लगता होगा...
स्वाति: शायद आप ठीक कह रही हैं... ऐसा नहीं कि मैं इनसे प्यार नहीं करती। बल्कि इतना करती हूँ कि मैं हमेशा डरी रहती हूँ कि इन्हें कुछ हो न जाए। खाना-पीना, सजना-सँवरना सब जैसे भूल ही गई हूँ... दरअसल सावित्री शुरू से ही तैयार थी इस हादसे के लिए। मैंने इन्हें इतना हँसते-खेलते... फ़ुल ऑफ़ एनर्जी देखा है कि अब उन्हें दिनों-दिन छीजते नहीं देख पाती... आधे भी नहीं रह गए... अच्छा चलती हूँ अब... देर होगी तो और दुःखी होंगे...
दृश्य 4 : सत्यवान की मृत्यु का दिन
विवाहिता सावित्री एक पोथी लिए बैठी कुछ पढ़ रही है और उँगलियों पर गणना कर रही है। वह सूर्य की ओर देखती है और सबसे आँखें बचाकर साड़ी के पल्लू से दाईं आँख पोंछती है। फिर पोथी को सिर से छुआकर पास रखे लोटे से सूर्य को अर्घ्य देकर परिक्रमा करती है और जमीन पर माथा रखकर प्रणाम करती है। वह बुदबुदाती है।
सावित्री: मुनिवर नारद ने जो काल बताया था, उसके अनुसार तो आज ही का दिन है... आज मैं इन्हें एक पल को अकेला न छोड़ूँगी... और तब तक कुछ न ग्रहण करूँगी, जब तक इनके प्राण न लौटा लाऊँ... देव मुझे शक्ति देना...
वह पुनः सूर्य की ओर देखते हुए उन्हें प्रणाम करती है। तभी अंदर से कुदाल और थाल में कुछ फल लेकर सत्यवान आते हैं। सुंदर... पर कुछ थके से।
सत्यवान: सावित्री! प्रिये! तुम गत तीन दिनों से व्रत-उपवास पर हो। देख रहा हूँ कि तुमने अभी-अभी पाठ समाप्त कर सूर्य देवता को अर्घ्य दिया है। लो... इन फलों को खाकर तुम अपना व्रत खोलो...
सावित्री: प्रिय! मुझे तनिक भी भूख नहीं लग रही और तीन दिनों के उपवास ने मुझे और ताज़ा कर दिया है। आप कुदाल लिए सुबह-सुबह कहाँ जा रहे हैं?
सत्यवान: कल संध्या को ही देखा था कि यज्ञ-होम आदि के लिए सूखी लकड़ियाँ नहीं हैं। भंडार में फल भी लगभग समाप्त हैं। अभी सुबह की ठंडी हवा में ये सब काम करना ठीक रहेगा। बाद में तो सूर्यदेवता भी अग्नि ही बरसाते हैं।
सत्यवान सूर्य की ओर देखकर मुस्काते हैं।
सावित्री: मैं भी आपके संग चलूँगी...
मुस्कुराती हुई, आँखें झपका कर झुका लेती है। उसकी मुद्रा बहुत मनभावन है। वह शीघ्रता से नेपथ्य की ओर जाती है।
सावित्री (कुछ तेज स्वर में): माता! मैं स्वामी के संग वन में जा रही हूँ। हम दोनों लकड़ियाँ और फल-फूल लेने जा रहे हैं... वन की शोभा भी देखेंगे। लौटने में कुछ विलंब होगा...
सत्यवान: यह तो तुमने खूब अच्छी बात कही। मेरे मन की बात! हम लोग पहली बार संग-संग वन घूमेंगे... देखो मुझे रोकना-टोकना मत... जब मैं तुम्हारे श्यामल बालों में फूल टाँकूँ... तुम्हें रंग-बिरंगे फूलों का हार पहनाऊँ तो...
सावित्री मुस्कुराकर सत्यवान की बाईं बाँह पकड़ लेती है और अपना सिर उनके कंधे से टिका देती है। दोनों बाहर चले जाते हैं।
दृश्य 5 : यमराज और सावित्री
एक ओर डलिया में कुछ फल व फूल रखे हुए हैं। सावित्री गले में माला पहने और बालों में फूल सजाए एक ओर बैठी है और सत्यवान पेड़ की डाल काट रहे हैं। अचानक उनके माथे व शरीर से पसीना बहने लगता है। बेहद थके वे बाँह से पसीना पोंछते हुए सावित्री के निकट आते हैं।
सत्यवान: बहुत थकावट हो रही है। कुछ देर लेटकर विश्राम करूँगा... इतना शक्तिहीन...
सावित्री उन्हें थोड़ा पानी पिलाकर उनका सिर अपनी गोद में रखकर माथा सहलाती है। तभी एक सुपुरुष सामने आकर खड़े हो जाते हैं और सत्यवान की छाती छूकर गोया उनके प्राण खींचते हैं। एक हिचकी के साथ सत्यवान का सिर एक ओर लुढ़क जाता है। वे पीछे मुड़कर जाने को होते हैं कि सावित्री तुरंत खड़ी होकर उनके चरण छूकर प्रणाम करती है।
सावित्री: देव! मनुष्यों की तरह आपकी छाया धरती पर नहीं पड़ रही। आप कोई साधारण पुरुष नहीं लग रहे... कृपया बतलाइए कि आप कौन हैं और आपने मेरे पति को किस तरह छुआ कि वे प्राणहीन-से हो गए हैं?
यमराज: देवि! मैं यमराज हूँ। आज तुम्हारे पति की मृत्यु सुनिश्चित थी, मैं उनके प्राण लेने आया हूँ।
सावित्री: यमराज! देव! आपने यह कष्ट क्योंकर किया। यह कार्य तो आपके दूत भी कर सकते थे?
यमराज: सत्यवान कोई साधारण पुरुष न थे। सत्य के प्रति उनकी प्रीति एवं धर्म के प्रति उनकी निष्ठा अद्भुत थी। उसके साथ ही उनकी दयालुता व करुणा उन्हें विशिष्ट बनाती है। फिर आप उनकी अर्धांगिनी! साक्षात् प्राणवायु! इन्हें अपने साथ ले जाने के लिए मुझे आना ही था!
यमराज दक्षिण दिशा में आगे बढ़ते हैं। सावित्री उनके पीछे-पीछे।
यमराज: देवि! अब आप लौट जाएँ और पति की पार्थिव देह की अंत्येष्टि करें। जहाँ तक आपको पति के संग और उनके पीछे आना था, वहाँ तक आप आ गईं। अब लौट जाएँ। यहीं तक आप दोनों का साथ था।
सावित्री: देव! पति-पत्नी का धर्म साथ-साथ रहना है अतः मैं धर्म का पालन करते हुए उनके साथ ही रहूँगी। आप मुझे जाने को न कहें, वैवस्वत! क्योंकि आप और मैं एक साथ सात कदम चल चुके हैं। और जैसा कि शास्त्रों में कहा गया है कि सात कदम साथ चलने से दो जन मित्र हो जाते हैं। अतः अब हम मित्र हैं। अब मैं जो पूछूँगी, मित्रता के नाते उसका उत्तर आप देंगे। अभी आपने स्वयं कहा कि मेरे पति धर्म का पालन करने वाले, करुणा से भरे हुए साधु पुरुष थे।
यमराज: हाँ देवि वे साधु पुरुष थे, जिन्हें आपने तन-मन से प्रेम किया। उनकी भरसक सेवा की। किंतु अब वे नहीं हैं...
सावित्री: आप ऐसा न कहें... उनके बिना तो मुझे भी मृत ही जानें। आप जानते हैं कि मेरे मन में वे निरंतर विद्यमान हैं। देखें उनका पहनाया हार अब तक मुरझाया नहीं है। इन फूलों की सुगंध व रस से आकर्षित हो मधुमक्खियाँ यहाँ दिखाई पड़ रही हैं...
यमराज: देवि आप विचित्र हैं। मेरी छाया मात्र से ब्रह्मांड के समस्त जीव डर जाते हैं और आप फूलों के रस-गंध की बात करते हुए मेरे संग-संग चल रही हैं। मैं आपके साहस, ज्ञान व तर्क से बहुत प्रसन्न हुआ हूँ अतः सत्यवान के जीवन के अलावा आप जो भी वर माँगना चाहें, माँग लें।
सावित्री: मेरे श्वसुर दृष्टिहीन हैं। उनका राज्य भी दूसरों ने हथिया लिया है। वे दृष्टिसंपन्न हो जाएँ और पुनः राजगद्दी प्राप्त करें। ये वर दें।
यमराज: तथास्तु! ऐसा ही होगा। आप बहुत परोपकारी हैं। अच्छा अब आप लौट जाएँ। इस कठिन राह में आप थक गई होंगी।
सावित्री: सत्पुरुषों की एक बार की संगति ही बहुत हितकारी होती है। उनसे मित्रता हो जाना तो परम हित की बात है। मैं आप जैसे सत्पुरुष का सत्संग करने को उत्सुक हूँ देव! फिर मेरे पति भी तो आपके संग ही हैं। मैं उन्हें छोड़कर कैसे जा सकती हूँ।
यमराज: देवि! आपने यह बात सबके हित में कही है। सत्संग ज्ञान का प्रधान माध्यम है। इससे मन को जो सुख मिलता है, उसकी तुलना असंभव है। प्रसन्न होकर मैं आपको एक और वर देता हूँ। सत्यवान के जीवन को छोड़कर आप जो चाहें माँग लें।
सावित्री: धर्मराज! आपकी जय हो। मेरे पिता महाराज अश्वपति पुत्रहीन हैं; उन्हें सौ औरस बलशाली पुत्रों की प्राप्ति हो, जिससे उनका कुल हमेशा-हमेशा चल सके।
यमराज: आप धन्य हैं देवि! आपकी यह कामना भी पूर्ण होगी। आपके पिता को आपकी माता मालवी की कोख से सौ पुत्रों को जन्म देने का सुयोग होगा। किंतु अब आप लौट जाएँ। सत्यवान की मृतदेह का संस्कार जरूरी है। विलंब उचित नहीं।
सावित्री: मैं तो अपने पति के समीप ही हूँ। आप मेरी बात गौर से सुनें। यह सच है न कि मनुष्य को अपने ऊपर उतना विश्वास नहीं होता, जितना संतों की कही वाणी पर होता है।
यमराज: कल्याणि! सच कह रही हैं आप।
सावित्री: संतों में सौहार्द होता है, इसीलिए सब उनकी बातों में अपना हित देखते हैं और उन पर विश्वास करते हैं।
यमराज: मैं बहुत प्रसन्न हुआ। आप ही ऐसी शुभ बात कह सकती हैं। सत्यवान के जीवन के अलावा कोई भी वर आप माँगें। मैं आपको एक और वर देता हूँ।
सावित्री: पति और पिता के कुलों का शुभ करने के बाद मैं आपसे यह वर माँगती हूँ कि मेरे सास-ससुर पोते का मुँह देखें।
यमराज: तथास्तु! अरे आपने तो मित्र को छका दिया सावित्री!
सावित्री मुस्कुराती है। यमराज सावित्री की प्रत्युत्पन्नमति से हैरान भी हैं और प्रसन्न भी।
यमराज: आप जीत ही गईं। मैं सत्यवान के प्राण लौटाता हूँ। ले जाइए अपने प्रियतम को पुनः संसार-सागर में। मैं यह भी वर देता हूँ कि आपके सास-ससुर एक नहीं अनेक पोते-पोतियों का मुख देखेंगे।
ऐसा कह यमराज ने प्रसन्न होकर सत्यवान के प्राण को बंधन-मुक्त किया।
यमराज: कुलनंदिनी! आप निःसंदेह ऐसी तेजयुक्त किरण हैं, जो अज्ञान के समस्त अंधकार को चीरकर ब्रह्मांड को प्रकाशित करती है। आपने न केवल अपने कुल को, बल्कि संपूर्ण जगत को अपने साहस व बुद्धिचातुर्य से भर दिया है। वेद आपकी कीर्ति गाएँगे। आपको संबोधित ऋचाएँ रची जाएँगी।
बैकग्राउंड में गायत्री मंत्र।
यमराज: युगों-युगों तक दंपति सावित्री के प्रेम व सेवाभाव तथा सत्यवान के सौभाग्य की कहानियाँ कहेंगे। यह भी जान लें सावित्री! आपके कुल को भविष्य सत्यवान के नाम से नहीं बल्कि आप ही के नाम से जानेगा... और सहस्रों वर्षों तक आपके कुल की संततियाँ “सावित्र” कहलाएँगी। साध्वी! आपका पति नीरोग व सफल मनोरथ होगा। और लंबे समय तक राज्य का सुख भोगेगा।
सावित्री विनीत भाव से यमराज को प्रणाम करती है और भरे गले से कहती है।
सावित्री: सात कदम साथ चल मित्र हुए थे हम हे वैवस्वत! आपने मित्रता का सम्मान किया। मित्र के नाते मैं भी आपसे कहना चाहती हूँ कि हे धर्मराज! भविष्य जब भी मुझे याद करेगा, तब-तब आपको भी गहरी कृतज्ञता से नमन करेगा। आप सच्चे अर्थों में प्रेम, ज्ञान, विवेक और करुणा के साधक हैं। आपने एक स्त्री का प्रेममार्ग दीप्त करके, भविष्य की पीढ़ियों के लिए नूतन राह दिखाई है। वे आत्मविश्वासयुक्त होंगी और सब कठिनाइयों से लड़ जाएँगी।
धर्मराज कुछ संकोच में।
यमराज: देवि! अब आप जाएँ... वहाँ देखें! ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेममार्गी सत्यवान लंबी नींद से जागकर आपको ही खोज रहे हैं।
सावित्री यमराज को विधिवत् प्रणाम करके उस जगह पहुँचती है, जहाँ सत्यवान है।
सत्यवान: प्रिये! मुझे सोता छोड़ कहाँ चली गई थीं तुम?
सावित्री: मेरे सत्यवान! दक्षिण दिशा में आग लग गई थी। मैं उसी का शमन करने चली गई थी।
सत्यवान: आग! कहाँ...
सावित्री: अब सब ठीक है। आग बुझ गई है। जीवन फिर से हरा हो रहा है। ... आपको अब कैसा लग रहा है... सोकर थकान उतरी तो होगी।
सत्यवान: हाँ सावित्री अब मैं बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूँ। पर सोने के कुछ पलों बाद मुझे ऐसा लगा कि कोई मेरा कलेजा चीरकर ले जा रहा है। तब मुझे इतनी पीड़ा हुई कि मैं अचेत-सा हो गया।
सावित्री सत्यवान को देख-सुन रही है।
सावित्री: अब तो स्वस्थ हैं न?
सत्यवान: अब तो मैं बहुत हल्का और ऊर्जा से भरा हुआ महसूस कर रहा हूँ। लगता है ऐसे दौड़ूँ कि उड़ता-सा दिखूँ...
हँसते हैं और सावित्री को गले लगा लेते हैं।
सत्यवान: सावित्री तुम्हारे गले में पड़ी माला तो एकदम ताज़ी है और मुझे लग रहा था कि मैं बहुत देर तक सोता रहा...
सावित्री: आपने प्यार से गूँथा था न... और फूल भी तो अधखिले चुने थे...
सत्यवान: किंतु सूर्यदेव पश्चिम दिशा में उतर गए हैं और संध्याकालीन तारागण आकाश पर चमक रहे हैं... समझ नहीं आ रहा कुछ... तुम बताओ न आग कैसे लगी?
सावित्री: बता दूँगी पर अभी नहीं... अभी देर हो रही है, चलिए घर चलें। वहाँ सब लोग हमारी राह देखते होंगे।
तभी सत्यवान देखते हैं कि उनके पिता दृष्टिसंपन्न होकर वन के ऋषियों एवं माता के संग उनकी ओर आ रहे हैं। सब बहुत खुश हैं। उत्सव का सा माहौल है। सब लोग प्रसन्न भाव से मिलते हैं। दूर खड़े धर्मराज यमराज सावित्री को स्नेहभाव से देख रहे हैं। सावित्री सिर हिलाकर उनसे मौन विदा लेती है। चंद्रोदय हो रहा है।
ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
दृश्य 6 : नाटक के बाद
नाटक के बाद सब लोग इकट्ठा हैं।
नीलोफ़र: रागी तुझे याद है बीबीए में हमारी क्लास में धीरेन्द्र सावित्र हुआ करता था?
रागी: अरे हाँ... फिर तो वो सावित्री द ग्रेट के ही खानदान का हुआ...
कुसुम: अरे यह तो तुम लोगों ने बहुत इम्पॉर्टेंट बात बताई... यानी कि अभी तक सावित्री का कुल मौजूद है!
नीलोफ़र: मै’म उसे पता नहीं था, वरना एयर लेता!
रागी: स्टूपिड कहीं का... मेरा इतना इलस्ट्रियस पास्ट होता!
पंकज: तो मैं अपने सारे टॉप्स पर यह लिखवा लेती...
सब हँसते हैं।
कुसुम: चुप रहो पंकज... हाँ रागी जरा पता लगाओ वो कहाँ है... मिलना तो चाहिए... शायद कुछ और भी पता चले।
रागी: यस्स मै’म... नीलू तू भी पता करियो...
तभी निखिल बात बदल देता है।
निखिल: मुझे तो बहुत अच्छा लगा सत्यवान बनकर! सावित्री तुम्हें कैसा लगा?
वह को-एक्टर को चिढ़ाता है।
पंकज: बताऊँ कैसा लगा? हम पुरुषों को स्त्रियों की लगातार सेवा की इतनी आदत हो गई है कि ये लोग चाहती ही नहीं कि कोई सावित्री फिर से पैदा हो? मैं गलत कह रहा हूँ क्या?
रागी: यह तो सच कह रहे हो ड्यूड! तुम लोगों ने सत्यवान से काम करना तो सीखा नहीं, सेवा करवाना सीख लिया। सो लेसन फ़ॉर यू—घर का काम मिल बाँटकर करते हैं और बीबियों को प्यार तो करते ही हैं, उसकी भी सेवा करते हैं, वरना हम तुम्हें छोड़छाड़कर भाग जाएँगी...
नीलोफ़र: यस्स! डोंट ऐवर टेक अस फ़ॉर ग्रांटेड!
कुसुम और स्वाति बहुत उत्सुकता और प्रेम से उनकी बातें सुन रही हैं।
कुसुम: ये लड़कियाँ आज के पुरुषों का मिजाज ठीक करेंगी। बराबरी से प्यार... बराबरी से जिम्मेदारियाँ। सत्यवान-सावित्री की पौराणिक कथा भी तो यही कहती है।
कुसुम (युवाओं से): अब तुम लोग जाकर कॉस्ट्यूम तो चेंज करो। घर नहीं जाना क्या?
नीलोफ़र: थैंक्यू मै’म! बहुत स्ट्रॉन्ग कैरेक्टर है सावित्री का।
रागी: प्ले भी बहुत अच्छा लिखा आपने। इट ब्रिंग्स आउट द एसेंस... पैट्रियार्की ने हजारों साल से जो धूल डाल दी है न इस कैरेक्टर पर, आपका प्ले उसे बिल्कुल साफ़ कर देता है।
पंकज: मै’म मूल महाभारत पर आपकी एडेप्टेशन इस कैरेक्टर को और स्ट्रॉन्ग बना देती है।
निखिल: गाइज़! यह हरदम इम्प्रेस करने के चक्कर में पड़ा रहता है... यार हम सब जानते हैं कि तुम किताबी कीड़े हो... क्या कहते हैं इंग्लिश में?
नीलोफ़र: बुक वर्म!
पंकज: याद रखना मैं यमराज हूँ! सबके सब बच के रहना... बदमाश सत्यवानों को ज़िंदा न छोड़ूँगा...
सब हँसते हुए चले जाते हैं।
दृश्य 7 : स्वाति और कुसुम
स्वाति और कुसुम बात कर रहे हैं।
कुसुम: अब आप बताइए कैसा लगा नाटक!
स्वाति: एक स्वस्थ नज़रिया तो मिला ही। मुझे लगा कि मैं बिना किसी अपेक्षा या असंतोष के अपने पति की देखभाल करूँ। उनकी तकलीफ़, उनके डर को समझने की कोशिश करूँ... वैसे मैंने पिछले दिनों रिहर्सल देखते हुए भी ऐसा करने का प्रयास किया... मुझे लगता है कि वे भी पॉज़िटिव हो रहे हैं। बात-बात पर अब नहीं लड़ते हैं, बल्कि मुझसे कभी देर होने लगे, तो दवाई माँग लेते हैं, या खुद ले लेते हैं... कमरे से बाहर भी निकलने लगे हैं...
कुसुम: यही तो है... मुझे तो यह कैरेक्टर बड़ी चैलेंजिंग लगती है। आखिर हो भी क्यों न। कितनी तपस्या और प्रयासों के बाद पैदा हुई थी। फिर माता-पिता ने उसे हर तरह की शिक्षा दी। उसके व्यक्तित्व को निखारा। उस जमाने में अपना वर खुद ढूँढने को कहा और यह जानते हुए भी कि सत्यवान की आयु ज्यादा नहीं है, उन्होंने उसे रोका-टोका नहीं, बल्कि उसके प्रेम का मान रखा। कितना आत्मविश्वास बढ़ता है, जब माता-पिता अपने बच्चों की, खास तौर से बेटियों के मन की बात को समझते हैं और उनका साथ देते हैं।
स्वाति: थैंक्यू कुसुम जी! इस शानदार कैरेक्टर से मिलवाने के लिए...
कुसुम: उस कैरेक्टर की सबसे बड़ी बात है प्रेम... वो भी ऐसा प्रेम जो मृत्यु को पछाड़ दे... ऐक्टिव प्रेम की गाथा है, सावित्री की कथा।
कुसुम (दर्शकों से):
प्रिय दर्शकों, आपको कैसा लगा यह नाटक... खासतौर से सावित्री का कैरेक्टर... बताएँ... सुझाव भी दें ताकि यह और शानदार प्ले बन सके!
दृश्य समाप्त होता है।
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