नामवर सिंह जन्मशती विशेष | शब्दांकन पर प्रकाशित संस्मरण, व्याख्यान, संवाद और लेख



नामवर सिंह जन्मशती : आलोचना की उस परंपरा को नमन जिसने हिंदी साहित्य को नई दृष्टि दी

28 जुलाई 2026 हिंदी के अप्रतिम आलोचक, चिंतक, अध्यापक और साहित्यिक विमर्श के शिखर पुरुष प्रो. नामवर सिंह की 100वीं जयंती (जन्मशती) है। यह केवल एक साहित्यकार को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उस वैचारिक परंपरा को नमन करने का भी समय है जिसने हिंदी साहित्य में संवाद, असहमति, तर्क और आलोचनात्मक विवेक को नई ऊँचाइयाँ दीं।

नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को केवल रचनाओं के मूल्यांकन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे समाज, इतिहास, संस्कृति और विचार की व्यापक बहसों से जोड़ा। उनके व्याख्यान, लेख और संवाद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे साहित्य को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि उसके साथ प्रश्न करना, विचार करना और नए अर्थों में समझना सिखाते हैं।

शब्दांकन के लिए यह गर्व का विषय है कि पिछले वर्षों में हमने नामवर सिंह के आत्मकथात्मक संस्मरणों की श्रृंखला, उनके व्याख्यान, संवाद और उन पर लिखे गए महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित किए हैं। उनकी जन्मशती के अवसर पर हम उन सभी रचनाओं को एक साथ पुनः पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

"आलोचना का काम निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि साहित्य के साथ एक जीवंत संवाद कायम रखना है।"

— प्रो. नामवर सिंह


📚 नामवर सिंह जन्मशती पर शब्दांकन का विशेष पाठ

जीवन क्या जिया : आत्मकथात्मक संस्मरण

  1. मेरा जन्म एक छोटे किसान परिवार में हुआ (जीवन क्या जिया : 1)
  2. मेरी शादी हो रही थी और मैं रो रहा था (जीवन क्या जिया : 2)
  3. मेरे आत्मविश्वास का आधार है यह कोफ्त (जीवन क्या जिया : 3)
  4. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नहीं दी थी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में नौकरी (जीवन क्या जिया : 4अ)
  5. विरोध उसी का होता है जिसमें तेज होता है (जीवन क्या जिया : 4ब)

संवाद

व्याख्यान

नामवर सिंह पर


नामवर सिंह : विचारों की विरासत

नामवर सिंह का साहित्यिक अवदान केवल उनकी पुस्तकों या आलोचनात्मक लेखन तक सीमित नहीं है। उन्होंने अनेक पीढ़ियों के लेखकों, कवियों, शोधार्थियों और पाठकों को प्रभावित किया। वे हिंदी के उन विरले विद्वानों में थे जिनके व्याख्यान भी उतने ही चर्चित रहे जितनी उनकी पुस्तकें। उनके व्यक्तित्व में विद्वत्ता, सहजता, विनोदप्रियता और वैचारिक निर्भीकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

आज, उनकी जन्मशती के अवसर पर, जब हिंदी साहित्य नए प्रश्नों और नई चुनौतियों के बीच खड़ा है, नामवर सिंह का लेखन और चिंतन हमें पुनः पढ़ने, सोचने और संवाद करने की प्रेरणा देता है।

शब्दांकन अपने पाठकों से आग्रह करता है कि इस अवसर पर इन लेखों, संस्मरणों, संवादों और व्याख्यानों को पढ़ें, साझा करें और नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ। यही प्रो. नामवर सिंह की जन्मशती पर हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


प्रो. नामवर सिंह
28 जुलाई 1926 – 19 फ़रवरी 2019

जन्मशती वर्ष पर शब्दांकन की विनम्र श्रद्धांजलि।


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