हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएं | भाषा, समय, संवेदनाओं की हिंदी कविताएँ | शब्दांकन

हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएं | भाषा, समय, संवेदनाओं की कविताएँ | शब्दांकन
हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएं | समय, भाषा और लोकतंत्र की हिंदी कविताएँ
हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएं
समय, भाषा, लोकतंत्र, पहचान और मानवीय संवेदनाओं पर केन्द्रित समकालीन हिंदी कविताएँ।

हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएं

समकालीन भारतीय बौद्धिक जगत में हिलाल अहमद एक प्रतिष्ठित राजनीतिक चिंतक, शोधकर्ता और लेखक के रूप में जाने जाते हैं। राजनीतिक इस्लाम, भारतीय लोकतंत्र और दक्षिण एशिया में प्रतीकों की राजनीति पर उनके गंभीर अध्ययन ने उन्हें विशिष्ट पहचान दी है। किंतु उनके व्यक्तित्व का एक और संवेदनशील पक्ष है - कवि 'आतिफ'

हिलाल की कविताओं की पंक्तियाँ इंजेक्शन की सुई की माफिक होती हैं - चुभकर अपने होने का अहसास पाठक के भीतर छोड़ जाती हैं। उनकी कविताओं में लोकतंत्र, जनता, भाषा, समय, स्मृति, पहचान, आध्यात्मिकता और मनुष्य की नैतिक बेचैनियां हैं। प्रस्तुत हैं हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएँ। ~ भरत तिवारी (सं०)


परिचय

हिलाल अहमद, सी.एस.डी.एस., दिल्ली में प्रोफेसर हैं। वे राजनीतिक इस्लाम, भारतीय लोकतंत्र तथा दक्षिण एशिया में प्रतीकों की राजनीति पर पिछले तीन दशकों से शोध कर रहे हैं। वे लोकनीति कार्यक्रम के सह-समन्वयक (Co-convener) हैं।

उनकी प्रकाशित पुस्तकों में मुस्लिम पॉलिटिकल डिस्कोर्स इन पोस्टकोलोनियल इंडिया: मॉन्यूमेंट्स, मेमोरी, कॉन्टेस्टेशन1, ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ द प्रेज़ेंट: मुस्लिम्स इन न्यू इंडिया2, अल्लाह नाम की सियासत3, सियासी मुस्लिम्स: ए स्टोरी ऑफ़ पॉलिटिकल इस्लाम इन इंडिया4, डेमोक्रेटिक अकोमोडेशन्स: माइनॉरिटीज़ इन कंटेंपररी इंडिया5 (पीटर आर. डिसूज़ा एवं संजीर आलम के साथ), कम्पैनियन टू इंडियन डेमोक्रेसी: रेजिलिएंस, फ्रैजिलिटी, एम्बिवेलेंस6 (पीटर आर. डिसूज़ा एवं संजीर आलम के साथ), रीथिंकिंग मुस्लिम पर्सनल लॉ: इश्यूज, डिबेट्स एंड रिफॉर्म्स7 तथा सुदीप्त कविराज8 शामिल हैं।

हिलाल अहमद 'आतिफ' नाम से कविताएँ और नज़्में लिखते हैं। इन दिनों वे अपने पहले कविता-संग्रह ‘ये आतिफ कौन है?’ पर कार्य कर रहे हैं।


1. भाषा, एक दुविधा

हिंदी मेरी दत्तक मां है। उसने मुझे गोद लिया, पाला, पोसा। उसने मेरा दर्द लिया मैंने उसका दर्द जिया। इस अपनत्व में पर अपनापन न था मैं हिंदी का जन्मया पुत्र न था। उर्दू मेरी नफ़ीस1 ख़ाला है। बाअख़्लाक़2, मुहज़्ज़ब3, रखरखाव वाली अशराफ़4। मैं उसके घर जाता था एक मेहमान-सा। वो अदबी5 बातें करती थी, मैं चुप-सा हो जाता था। मैं उर्दू का अरज़ाल गूंगा था। अंग्रेज़ी मेरी क्रूर अध्यापिका है। बेहद चालाक, चतुर, मतलबी। उसके यहाँ भाव-शून्यता थी, विचार, ज्ञान व्यवसाय था। उसका चरित्र व्यावसायिक था। मैं उसका प्रिय न था, कोई न था। मैं अंग्रेज़ी का दमित छात्र था।

1 नफीस (Nafis): उत्तम, श्रेष्ठ, कीमती या बहुत बारीक और साफ-सुथरा। जब यह किसी व्यक्ति के लिए उपयोग होता है, तो इसका मतलब है कि वह बहुत परिष्कृत (refined) और सुरुचिपूर्ण पसंद रखने वाला इंसान है।
2 बाअख़लाक़ (Ba-akhlaq): अच्छे आचरण या अच्छे अख़लाक़ (manners) वाला व्यक्ति। ऐसा इंसान जो हर किसी से बहुत तमीज़, इज्ज़त और नेक व्यवहार के साथ पेश आता है।
3 मुहज़्ज़ब (Muhazzab): सभ्य, सुसंस्कृत (civilized) या संस्कारी। यह शब्द उस व्यक्ति के लिए आता है जिसे समाज में उठने-बैठने और बात करने का सही सलीका मालूम हो।
4 शरीफ़ लोग, सज्जन, उच्च कुल के लोग
5 अदबी (Adbi): इसका संबंध 'अदब' से है। इसके दो मायने होते हैं। पहला—साहित्यिक (literary), यानी जो साहित्य या किताबों से जुड़ा हो। दूसरा—बेहद अदब, सम्मान और मर्यादा रखने वाला व्यक्ति।


2. एक अनुचित कविता

जनता, भीड़ होती है, जनता, समुच्चय होती है, जनता, संख्या होती है, हमें, विवेकी जनता चाहिए। जनता, खंडित होती है, जनता, बहुजन बनती है, जनता, अल्प जन बनती है, हमें जनहित जनता चाहिए। जनता, क्षणिक होती है जनता, नश्वर होती है, जनता, बिखरी होती है, हमें शाश्वत जनता चाहिए। जनता का लोक नहीं, जनता का तंत्र नहीं, जनता का मत नहीं, हमें, लोकतांत्रिक जनता चाहिए।


3. सूर्य का प्रतिबिंब

सूर्य का प्रतिबिंब प्रतीक है, विश्वास भी है प्रतिध्वनि है, आवाज़ भी है मापक है, अपवाद भी है आभास है, यथार्थ भी है। सूर्य का प्रतिबिंब मिटने, बनने का पल है काल चक्र से मुक्त स्वायत्त, स्वतंत्र, उन्मुक्त छाया।


4. वक़्त का क्या करें?

वक़्त का क्या करें? वक़्त को सुनना चाहिए। वो आहट नहीं, दस्तक नहीं, वो आता नहीं, वो जाता नहीं, वक़्त, एक गूंज है, खामोश-सी आवाज़ है। वक़्त का क्या करें? वक़्त को पढ़ना चाहिए। वो कलिमा नहीं, किताब नहीं, वो लफ़्ज़ नहीं, अल्फ़ाज़ नहीं, वक़्त, एक नक्श है, लिखावट दर लिखावट है। वक़्त का क्या करें? वक़्त को लिखना चाहिए। वो नज़्म नहीं, ग़ज़ल नहीं, वो कहानी नहीं, दास्ताँ नहीं, वक़्त, एक तहरीर है, शीशे की इबारत है।


5. क्यों?

कितने दिन का 'कल' होगा, कितने दिन में 'कल' होगा। कल बेकल की नीरव कलरव में सब होगा बस 'आज' न होगा। क्योंकि! 'समय नियंत्रण', शक्ति प्रबंधन है, मानव, निरपेक्ष मूक संसाधन है, विकास, उद्यम के लोकभ्रम में, जो छुप रहा, पूंजीवाद ही होगा। लेकिन.... समय गति निश्चित है, उसकी चाल सुनिश्चित है, समय समय के सम सम्यक में, जो होगा, साम्य संवाद होगा!


6. हिलाल और आतिफ

उस वीरान मस्जिद का काबा, हर सिम्त तवाफ करता है, अस्र में शम्स-ए-आतिफ1, मग़रिब में हिलाल2 बनता है।

1 शम्स-ए-आतिफ — दयालु सूर्य।
2 हिलाल — दूज का चाँद।


7. लेकिन

उस मक़ाम पर पहुँचना लाज़िम तो था, लेकिन ज़मीन लम्बी थी, आसमान छोटा था। उस दायरे की हद ज़ईफ़1 सी थी मगर ज़मीन बोसीदा थी, आसमान धुंधला था। उस मसले का हल मुमकिन था यूँ तो, ज़मीन टेढ़ी थी, आसमान सीधा था। उस वक़्त को क्या नाम दोगे 'आतिफ' ज़मीन कल में थी, आसमान कल पर था।

1 ज़ईफ़ — कमज़ोर, वृद्ध।


8. दुआ

या ख़ुदा यही दुआ है मेरी, तदबीर मेरी तक़दीर हो। मैं लिखूँ इबारत दुनियावी, रहबर तेरी तहरीर हो। हर मासूम का दर्द कह डालूँ, एक कसक बुलंद तकरीर हो। हक़ ओ बातिल का फ़ैसला न टले, तर्ज़-ए-क़यामत एक तकरीब हो। मेरी दुआ से "मैं" मिट जाऊँ, क्योंकर न ऐसी एक तरकीब हो। दुनिया के मज़लूम एक हों, या रब, ऐसी भी तो एक तरतीब हो।


9. मेरी अभिलाषा

सृष्टि की गाथा रचूँ निज धाम से जनधाम तक। गीत एक ऐसा बनूँ निज गान से जनगान तक। अमा के भीतर जा उर बनूँ निज निशा से निशांत तक।


10. मेरा एकाकीपन

मेरा एकाकीपन मेरा एकाकीपन खंडहर नुमा है... भयावह भी, आनंदित भी, शांत भी उद्विग्न भी। उलझे उलझते विचार, टूटे बिखरे पत्थर से। साक्ष्य भी, साक्षी भी, बोसीदा भी, पेचीदा भी। अस्तित्व विहीन आत्म, बे दर-ओ -दीवार द्वार सा। आवारा भी, अकेला भी, वीरान भी, व्याकुल भी। मेरा एकाकीपन कुछ भी तो नहीं ...एक क्षुधित पाषाण है।


इन्हें भी पढ़ें


संदर्भित पुस्तकें

1 Muslim Political Discourse in Postcolonial India: Monuments, Memory, Contestation (Routledge, 2014/2026) — Amazon पर देखें

2 A Brief History of the Present: Muslims in New India (Penguin, 2024) : Amazon पर देखें

3 अल्लाह नाम की सियासत (सेतु प्रकाशन, 2023) : Amazon पर देखें

4 Siyasi Muslims: A Story of Political Islam in India (Penguin Random House, 2019) : Amazon पर देखें

5 Democratic Accommodations: Minorities in Contemporary India (with Peter R. deSouza & Sanjeer Alam, Bloomsbury, 2019) : Amazon पर देखें

6 Companion to Indian Democracy: Resilience, Fragility, Ambivalence (with Peter R. deSouza & Sanjeer Alam, Routledge, 2021) : Amazon पर देखें

7 Rethinking Muslim Personal Law: Issues, Debates and Reforms (Routledge, 2022) : Amazon पर देखें

8 सुदीप्त कविराज (सेतु प्रकाशन, 2023) : Amazon पर देखें

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