सोमवार, जनवरी 14, 2013

दामिनी के विरुद्ध - लेख - डॉ. कविता वाचक्नवी


     इन दिनों नेट पर, पत्र-पत्रिकाओं में लोग भावविह्वलता में दिल्ली में नृशंसता की शिकार हुई दामिनी के नाम पर कविताएँ लिख रहे हैं, गीत, छन्द, मुक्तक लिख रहे हैं ...... और इस भावुकता में उसे 'बलिदानी', कह कर उसका महिमा-मंडन कर रहे हैं, उसके त्याग और बलिदान का गुणानुवाद कर रहे हैं । (जबकि वह नृशंसता की 'शिकार' थी)। 

    यह भक्तिभाव के भक्तिगीतों जैसा महिमामंडन इतना हास्यास्पद व अनैतिक है कि मुझे डर है कि कुछ दिन में दामिनी के नाम पर पूजापाठ न शुरू हो जाएँ; क्योंकि भारतीय समाज ऐसा ही करता रहा है। और ऐसा कर के जहाँ वह एक ओर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेगा; दूसरी और यह ठीक वैसी ही मानसिकता व दबाव बनाएगा जैसा सती आदि प्रसंगो में। 

    "अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली स्त्री ही महान होती है' की सामाजिक मानसिकता के चलते हमारे घरों में लड़कियों को अपने सारे सुख-चैन को तिलांजलि देकर सब कुछ बलिदान कर महान बनने व तभी सम्मान अर्जित करने योग्य हो पाने की घुट्टी पिलाई जाती है....... । जो स्त्री अपने सुख, स्वास्थ्य, सम्मान, निर्णय, इच्छा, आवश्यकता, शौक या अपनी किसी भी तरह की परवाह न कर परिवार व दूसरों के लिए घुट-घुट कर मर जाए, त्याग पर त्याग करती रहे या अपने बारे में कदापि न सोचे, उसे ही सदाचारी, महान, सुसंस्कृत, सन्नारी माना जाता है। इस चक्कर में लड़कियाँ और महिलाएँ अपने जीवन को गला-गला कर भी दूसरों की नजर में थोड़े से सम्मान व इज्जत के लिए तरसती अपना आप खोती रहती हैं। 

    हम लोग या तो स्त्री को पूजा के आसन पर देवी बना कर प्रतिष्ठित करते हैं या फिर जो देवी के सिंहासन पर न बिठाई जाती हों, उन सब को पायदान या जूती समझ कर जीवन भर प्रताड़ित करते या स्वयं अपने आप में ही उन्हें अपराधबोध से भरते रहते हैं।  इन दो पदों के बीच 'मानवी' होने का विकल्प उसके लिए हमारी सामाजिकता में उपलब्ध ही नहीं है, है तो स्वीकार्य ही नहीं है।

    इस अस्वीकार्यता के पीछे त्याग का महिमामंडन करने की हमारी मानसिकता का ही हाथ है। त्याग के महिमामंडन की इस प्रवृत्ति ने स्त्रियों का बड़ा अनिष्ट किया है और स्त्री की सामाजिक स्थिति के घोर अमानवीय होने का यह एक बड़ा व महत्वपूर्ण कारक है। लड़कियाँ/स्त्रियाँ दूसरों की नजर में सम्मान पाने के लिए जीवन-भर समझौते करती व त्याग करती चली जाती हैं। 

    स्त्री के मानवी होने की स्वीकार्यता के लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम सबसे पहले त्याग का महिमामंडन बंद करें और न्यूनतम उनके मनुष्य होने के अधिकारों को पाने का अधिकार उनके लिए सुरक्षित करें। अन्यथा कर्तव्यों और त्याग बलिदान का सारा दायित्व स्त्री के सिर और अधिकार, निर्णय व मालिकाना रौब सारा लड़कों के नाम करते घरों में भेदभाव करते रहेंगे। इसी भेदभाव के चलते ही समाज में ऐसी नृशंस घटनाएँ अनवरत होती रहेंगी क्योंकि स्त्रियाँ किसी न किसी की जागीर बनी रह कर उनके अधिकार क्षेत्र में आएँगी कि वे चाहे जैसे उन्हें जोतें या चाहे जैसे उन्हें इस्तेमाल करें। वे तो केवल धरती की तरह चुपचाप सब कुछ सहती हुईं सर्वस्व देने को सदा प्रस्तुत रहेंगी। और फिर समाज उनके इस बलिदान ( छीन कर लिए गए ) के बदले उन्हें श्रद्धा के सिंहासन पर बिठाकर देवी की तरह पूजने लगेगा । .......और महिमामंडन के बहाने अपने अपराधों, अन्यायों को उसकी दिव्यता की अनिवार्य शर्त व कसौटी बनाए रखेगा। 

    इसलिए दिल्ली में नृशंसता की शिकार हुई बच्ची की मृत्यु तथा अत्याचार की सहनशीलता के महिमामण्डन को बंद कर उसके साथ हुए अनाचार के विरुद्ध कदम उठाने में अपना वैचारिक व क्रियात्मक योगदान करें तो बेहतर होगा। अन्यथा जो ऐसा नहीं कर उसका महिमामण्डन कर रहे हैं वे स्त्री के विरुद्ध होने वाले अपराधों व नृशंसता में बराबर के भागीदार हैं। 

    महिलाओं व लड़कियों को जब तक समाज व परिवार में ऊँचा स्थान, मान-सम्मान व विशेष महत्व नहीं दिया जाता, जब तक वाणी, व्यवहार, मानसिकता और दृष्टि से भी उनके प्रति अवमानना, तिरस्कार आदि की भावना लेशमात्र भी शेष है, तब तक यह हवा स्त्रियों के आँसुओं से यों ही तर होती रहेगी.... आने वाली पीढ़ियों की स्त्री भी कभी अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाएगी भले ही कितने भी आधुनिक साधन जुटा लें या नए-नए दंड और बढ़िया से बढ़िया अदालतें खड़ी कर लें। 
    स्त्री को मान देने की अपेक्षा हमारे समाज में उसके गुणों (वे भी उसके शोषण के लिए आरोपित किए हुए) को महत्त्व देने की रूढ़ि चली आती रही है,
  • 'पत्नी पथ-प्रदर्शक' लिखे गए, उसके त्याग को सामाजिक उत्सव व आयोजन बनाया गया 
  • सती की पूजा होती रही और उसके नाम पर देवालय स्थापित हुए
  • परदे में रहने को उसकी सच्चरित्रता से जोड़ा गया
  • बचा-खुचा खा लेने को उसके सन्नारी होने का पर्याय माना गया
  • उसके सर्वस्व लुटा कर बलिदान हो जाने को मातृत्व का पर्याय माना गया
  • उसके केशमोचन करा रूखा-सूखा खा बिना बिछौने सो जाने को सके वैधव्य की तपस्या के साथ जोड़ा गया
  • पतियों के व्यभिचार की अनदेखी को उसके बडप्पन व घर को बचाए रखने के औदार्य का नाम दिया गया 
  • ससुराल से अर्थी पर विदा होते समय ही निकलने को उसके सुखी विवाहिता होने
  • माता-पिता की लाज निभाने के प्रण को जान देकर भी निभा लेने के साहस से जोड़ा गया
  • पिट-पिट कर नीले हो जाने से लेकर गंभीर घायल तक हो जाने पर भी गिर पड़ने का बहाना कर चुपचाप अगली सुबह समाज को 'सब कुछ बढ़िया है' का भ्रम देने को पति की मान-मर्यादा का सम्मान करने का नाम दिया गया
  • घरों के भीतर ही भीतर चलने वाले पापाचारों को छिपा-झेल कर दांत में जीभ दबाए जीवनभर निभा ले जाने को सतवंती नार का लक्षण कहा गया
  • बेमेल विवाह से लेकर सौदा हो जाने तक को परिवार की लाज बचाने के लिए दिया गया बलिदान कहा गया
 ...... हजार चीजें हैं जहाँ लड़कियों को अपमान सहना, बेड़ियों में बंद रहना, अपने सामान्य से सामान्य अधिकार को परिवार और समाज के लिए तिलांजलि देते चले जाना, 

  • गऊ की तरह खूँटे से बंधे रहकर दुहे जाने को तत्पर रहना, 
  • धरती की तरह सब कुछ सह सबको क्षमा करते चले जाना, 
  • अपनी देह को लज्जा की वस्तु समझ उसके लिए शर्मिन्दा होते रह उसे लुकाए-छिपाए रहना और लज्जा का प्रतिमान होना,  
  • कभी भी छोड़ दी जाने को शापित रहना, 
  • घरों, मोहल्लों व बाजारों में किसी के भी द्वारा छेड़छाड़ पर आपत्ति न कर स्वयं पर ही शर्मिन्दा हो रोना-घुटना और सरेआम तमाशा बनना, 
    पुरुषों के 'बिल्ट-इन' गुणों (?) व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तत्पर रह सब कुछ झेल ले जाना, पंगु से पंगु, क्रूर से क्रूर, महाचरित्रहीन से ले नपुंसक और नालायक से नालायक पति के दुर्दिनों में उसके साथ खड़े होने का 'साहस' दिखा सहनशीलता की देवी बनना घुट्टी में पिला कर सिखा-पढ़ा दिया गया है। जो स्त्री/ लड़की ऐसा नहीं करती उसे कुलटा, डायन, चरित्रहीन और न जाने क्या-क्या कह कर, क्या-क्या कर कर तिरस्कृत व प्रताड़ित किया जाता है। अपने लिए सोचना व करना उसके लिए जीवन-भर निषिद्ध है। इस निषिद्ध का पालन करने की पल पल पर परीक्षाएँ और सबूत उसे देते रहने पड़ते हैं। इतने सब को निभा ले जाने वाली ही वास्तव में थोड़ा-सा सम्मान और अधिकार पा सकती है। 
लडकियाँ/ महिलाएँ इस सम्मान को पाने के लिए जीवनभर जुटी रहती हैं, परस्पर दौड़ मची रहती है उनमें, कि मालिक लोग किसे तमगा देते हैं, कैसे तमगा प्राप्त किया जाए। उसे दबाने कुचलने वाले ही उसे पुरस्कार देने वाली ज्यूरी बनते हैं, क्योंकि उनके पास विधिवत् मारने-पीटने, लज्जित-प्रताड़ित करने, सताने-धमकाने, छल-कपट कर इस्तेमाल करने का आधिकारिक लाईसेंस होता है। स्त्रियाँ इन लाईसेंस धारकों से प्रमाणपत्र लेने के लिए कतार में लगी रहती हैं, जुटी रहती हैं, कभी कभी हाथापाई तक करती हैं, अपनी बेगुनाहियों के सबूत जुटाती देती रहती हैं और इस सारे में मची भागदौड़ के बीच नरपिशाच अपनी कीमत लेते रहते हैं, अपनी शक्ति और अधिकार का प्रदर्शन व प्रयोग कर महिलाओं की महिमा जाँचते (?) रहते हैं। उनके हिंसक से हिंसक और बीभत्स  से बीभत्स शक्ति प्रयोग को झेल ले जाने वाली लड़कियों / स्त्रियों को वे बड़े बड़े तमगों से सुशोभित करते हैं। 

    ऐसा ही तमगा दामिनी को बलिदानी घोषित कर, उसके जीवनदान (?) को उसके त्याग, महानता और महिमामंडन के रूप में दिया जा रहा है। लोग गलदश्रु भावविह्वलता और भक्तिभाव से उस पर तुरता रचनाएँ लिख कर धरती पर लोटपोट हो रहे हैं। ताकि लाईसेंस जारी करने का काम निर्विरोध चलता रहे और लाईसेंस देने वाले संस्थान की मान्यता बनी रहे। स्त्रियों में इस लाईसेंस को लेने की होड़ मची रहे और संसार में मानवता को बचाए रखने का जिम्मा लेकर पैदा हुई महिलाएँ अपनी महानता को याद कर उस महानता के लिए पूर्ववत् कटिबद्ध रहें, प्रतिबद्ध रहें और हाँ .... बद्ध भी रहें। 

(डॉ.) कविता वाचक्नवी    GoogleFacebookTwitterBlogger


नोट: इस लेख का सम्पादित अंश १३ जनवरी २०१३ के जनसत्ता में प्रकाशित हुआ है 


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