हृषीकेश सुलभ - कहानी: स्वप्न जैसे पाँव | Hindi Kahani: Hrishikesh Sulabh - Swapn Jaise Paanv

सुबह हुई। उसे चाय की तलब लगी। पर उसके पास समय नहीं था। 
उसने सोचा, इतने असुरक्षित जीवन में किसी इच्छा का क्या महत्त्व, चाहे वह चाय पीने जैसी अदना सी इच्छा ही क्यों न हो!

स्वप्न जैसे पाँव

हृषीकेश सुलभ

≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡≡

    यह एक हरा-भरा क़स्बाई शहर था, जिसे कोशी नदी की उपधाराओं ने चारों तरफ़ से घेर रखा था। एक तो, जिसका नाम सौरा था, शहर को दो भागों में बाँटती हुई ठीक बीचोंबीच बहती थी। महल्ले दूर-दूर बसे थे। बीच-बीच में धान के हरे-भरे खेत थे और बेतरतीब उगे जंगली पेड़ों और झाड़ियों का सघन विस्तार था। सड़कों के किनारे भी पेड़ थे - कदम्ब और सेमल के ऊँचे-ऊँचे छायादार पेड़। कदम्ब जब फ़ूलते, गोल-गोल लट्टुओं जैसे फ़ूलों से सजी-सँवरी हरियाली की छटा और खिल उठती। फि़र कदम्ब ललछौंहा पीलापन लिये पककर तैयार होते और पेड़ों के नीचे की ध्रती फ़लों से पट जाती। सेमल वसंत में फ़ूलते। पत्रहीन नग्न वृक्ष देखते-देखते दहकते हुए लाल-लाल अंगारों से ढँक जाते। सेमल के फ़ल पेड़ों पर टँगे-टँगे पकते और फ़ूटते। कोमल रूई के पंख लगाए सेमल के बीजों से आकाश भर जाता। हवा के झोंके उन्हें इध्र-उध्र उड़ाते फि़रते। लगता, सूरज के ताप से घबराकर बादल के नन्हें-नन्हें फ़ूल ध्रती के क़रीब आना चाह रहे हों। ये उड़ते हुए बेरोक-टोक खिड़कियों-दरवाज़ों से घरों में घुस आते। राह चलते ज़ुल्फ़ों में उलझ जाना इस शहर में सेमल बीजों की ख़ास अदा थी।

    इस क़स्बाई शहर में वर्षा भी ख़ूब होती थी। शुरू होती, तो सात-सात दिनों तक झड़ी लगी रहती। कोशी की उपधाराएँ ऊनकर शहर को चारों तरफ़ से घेर लेतीं। पुलों के ऊपर से पानी बहने लगता। सौरा ऊनती, तो अक्सर हफ़्ता-दस दिनों के लिए शहर के दोनों हिस्सों को अलग-थलग कर देती। पर लोग बहुत फ़िक्र नहीं करते। इन दिनों को धीरज के साथ काट लेते। लगभग हर साल ऐसा होता। लोगों को आदत पड़ चुकी थी।

    यह शहर उसे किसी पहाड़ी शहर की तरह लगता। हालाँकि, पहाड़ थे ही नहीं।......पर जाने क्यों उसे हमेशा यह महसूस होता कि इस शहर में पहाड़ हैं ज़रूर,......भले ही कहीं छिपे हों और एक दिन अचानक निकल आएँ। अपनी इस बकवास कल्पना पर वह मन ही मन हँसता। उसे ऐसी कल्पनाओं के भरोसे जीने की आदत थी। वह अक्सर ऐसी ऊटपटांग बातें सोचा करता। वह चलते-फि़रते अपने लिए ऐसे दृश्य और ऐसी बातें गढ़ लेता और उनमें डूबता-उतराता रहता। कई बार तो जिन हालातों की दूर-दूर तक सम्भावनाएँ नहीं होतीं, वह उन्हें मन ही मन रचकर अपने लिए जीवित खड़ा कर लेता। वह सोचता, यह एक बुरी आदत है, पर वह इसे अपनी ताक़त भी मानता। उसे लगता, वह अपनी इसी आदत के बल पर जी रहा है। बात दुःख की होती, तो बे-मतलब उदास फि़रा करता और प्रसन्नता की होती तो जश्न मनाता। अगर वह किसी रहस्यमय स्थिति में जा फँसता, तो कई-कई दिनों तक उलझा रहता। उसके दिन-रात रहस्य के सिरे तलाशने में गुज़रते। पर उसके साथ एक अजीब बात यह भी थी कि उसकी कई ऊट-पटांग कल्पनाएँ भी सच साबित हो जातीं। बात लगे तो तीर और न लगे तो तुक्का जैसी ही थी, पर थी सच। 

    एक दिन, बस यूँ ही बे-मतलब घूमते हुए वह शहर के बाहरी इलाक़े की ओर चला गया। यह इलाक़ा वर्षा के दिनों में इस शहर का जलग्रहण क्षेत्र था। पानी पहले इसी तरफ़ आता। यहाँ पक्के मकान नहीं थे। सौरा जब पानी उलीचती, इन महल्लों के लोग अपनी झोपड़ियों के टाट उठाकर सड़क किनारे ऊँची जगहों पर अपना डेरा डालते। बरसात के बाद ज़िला प्रशासन के साहब, कारकुन और सिपाही अपनी गाड़ियाँ दौड़ाते और डंडे भाँजते हुए आते और इन्हें झोपड़ियों सहित फि़र निचले इलाक़े में ठेल देते। थोड़ी अफ़रा-तफ़री मचती ज़रूर, पर दो-चार दिनों में फिर जैसे-तैसे जीवन शुरु हो जाता।

    शाम का समय था। जाड़े के दिनों का मरियल-सा सूरज डूब रहा था। वह मुख्य सड़क छोड़कर नीचे बस्ती में उतरा और घूमने लगा। मर्द बहुत कम थे। शहर से मज़दूरी ख़त्म कर लौटने ही वाले थे। औरतें कम ज़रूर थीं, पर थीं। बच्चे थे। आपस में गुत्थमगुत्था करते,......एक-दूसरे के पीछे भागते-दौड़ते। घीरे-धीरे घिरते अँधेरे से बे-परवाह मस्ती के आलम में डूबे हुए बच्चों की रोर से पूरा महल्ला मृदंग की तरह बज रहा था। झोपड़ियाँ बहुत सुन्दर थीं। कोशी के लोग सुन्दर झोपड़ियाँ बनाने, आनन-फ़ानन में उनको सिर पर लादकर भागने और लगातार इध्र-उध्र बसते-उजड़ते रहने में माहिर थे। हर झोपड़ी के सामने बाँस की फ़ट्ठियों से घिरा आँगन था। आँगन में केला के गाछ थे। कदम्ब भी थे, इध्र-उध्र।

    उसने एक आँगन में कदम्ब के नीचे खड़ी एक औरत को मुँह उपर उठाकर मनुहार करते हुए देखा। वह ठिठका। फि़र उसने कदम्ब की ओर देखा। कदम्ब की डाल पर सात-आठ साल का एक लड़का बेफिक्री से बैठा था। इस बीच औरत की नज़र उस पर पड़ी। वह आँगन से बाहर निकली। पूछा - ‘‘क्या बाबू ? किसको खोज रहे हो ?’’

    वह कुछ नहीं बोल सका। क्या बोलता! औरत समझ गई कि पेड़ पर बैठे बेटे की लीला ही उसके रुकने का कारण है। वह अपने-आप बोलने लगी - ‘‘क्या करें बाबू! ......मानता ही नहीं। बहुत हठी है।......बात-बात में गाछ पर चढ़कर बैठ जाता है।’’

    वह हँसते हुए आगे बढ़ा। उसके पैरों में जाने कहाँ से ऐसी स्फ़ूर्ति आकर पैठ गई कि वह लगभग पंछियों की तरह फ़ुदकते हुए चलने लगा। कृष्ण की बाललीला के रूपक को अपनी आँखों साकार देखने का आह्लाद उस पर छा गया था। 
    
[*]

    वह सारी रात सो नहीं सका। पहले तो आह्लाद से भरा रहा। फि़र यह आह्लाद धीरे-धीरे पीड़ा में बदल गया। वह औरत बहुत सुन्दर थी। उसका बेटा उससे भी ज़्यादा सुन्दर था। आँगन का कदम्ब वृक्ष भी युवा था। अपनी छतनार डालों से आँगन को लगभग ढँकते हुए खड़ा था। उसका तना अभी बहुत मोटा नहीं हुआ था। उसने युवा कदम्ब की उम्र का अंदाज़ा लगाया। औरत के बेटे की उम्र के आस-पास कदम्ब की उम्र ठहरी। आठ या दस साल। 

    रात जैसे-जैसे गहराती गई उसका दुःख गहराता गया। उसे यह सवाल परेशान कर रहा था कि इतनी सुन्दर औरत, ऐसा नटखट बालक, और ऐसा युवा बलिष्ट कदम्ब वृक्ष, क्या ये सब बचे रह सकेंगे ? हो सकता है कि एक रात......! ......और फि़र वही ऊटपटांग कल्पनाएँ करनेवाली उसकी बुरी लत जाग उठी।......पूरे महल्ले में रात का सन्नाटा पसरा।......कुहासे में डूब गईं झोपड़पड़ियाँ।......धूल उड़ाती टाटा सूमो जीप सड़क पर आकर लगी। हथियारों से लैस कुछ लोग उतरे। सड़क छोड़ झोंपड़पट्टी की ओर बढ़े। उस आँगन के सामने आकर खड़े हुए और फि़र शुरु हुआ तांडव।......वे भीतर घुसे। उन्होंने सबसे पहले उस औरत की बाँहों में बँध्कर सो रहे उसके पति को खींचा और घसीटते हुए आँगन में ले आए। नींद से अचानक जागकर चीख़ती हुई औरत पति के पीछे-पीछे दौड़ी। एक ने औरत को पकड़ लिया। चीख़-पुकार से बच्चे की नींद टूट गई। वह उठा और रोते हुए बाहर निकला। उन्होंने उसे पकड़ना चाहा, पर वह जाकर अपनी माँ से लिपट गया।......पहले उन्होंने बीच आँगन में खड़ा करके उसके पति की छाती पर गोली दाग़ दी। इसके बाद दूसरे ने बच्चे को औरत से खींचकर अलग किया और पिस्तौल से बच्चे का माथा उड़ा दिया। फि़र उन्होंने आपस में कुछ बातें की और उनमें से एक दौड़ते हुए सड़क किनारे खड़ी जीप तक गया और एक बड़ी सी टँगिया लिये वापस लौटा। फि़र उन्होंने कदम्ब को काटा। बाढ़ के दिनों में नदी की धारा के काटने पर जैसे ध्रती गिरती है नदी के पेट में, वैसे ही कदम्ब गिरा आँगन में। गिरते हुए कदम्ब की हरहराती हुई ध्वनि उस महल्ले के हर आँगन तक पहुँची। फि़र उन्होंने जलती सिगरेट का टुकड़ा झोंपड़ी पर फ़ेंक दिया और उस औरत को घसीटते हुए लेकर चले गए।......और उनके जाने के बाद झोंपड़पट्टी में कुहराम मच गया।

    हल्के फ़ेर-बदल के साथ लगभग यही दृश्य उसकी आँखों के सामने बार-बार उभरता और मिटता रहा। फ़ेर-बदल यानी, आँगन, कदम्ब वृक्ष, वह औरत और उसके बेटे का चेहरा तो वही रहता, जो उसने देखा था, पर पति और हमलावरों का चेहरा हर बार बदल जाता, जिन्हें उसने नहीं देखा था। कई बार तो उस औरत के पति की जगह वह अपने आप को देखता। अपनी ही आँखों अपने को गोली से भूना जाते हुए देखकर उसकी रीढ़ काँप उठती। वह सारी रात बदहाल रहा। जागती आँखों के इस दुःस्वप्न ने उसे तोड़कर रख दिया।

[*]

    सुबह हुई। उसे चाय की तलब लगी। पर उसके पास समय नहीं था। उसने सोचा, इतने असुरक्षित जीवन में किसी इच्छा का क्या महत्त्व, चाहे वह चाय पीने जैसी अदना सी इच्छा ही क्यों न हो! ......वह बदहवास निकला। लगभग भागते हुए उस महल्ले में पहुँचा। 

    वहाँ भी सुबह हो चुकी थी। बेहद प्यारी और सुन्दर सी सुबह। ऐसी सुबह, जिसके बारे में वह कविताओं-कहानियों में पढ़ता रहा था। विसमिल्लाह ख़ाँ की शहनाई पर राग भैरवी या कुमार गंध्र्व के कंठ से अहीर भैरव सुनते हुए जैसी सुबह के बारे में वह सोचा करता था, वैसी ही सुबह थी। झोंपड़पट्टी के हर आँगन में कोयले की अँगीठियों का धुआँ उठ रहा था। पेड़ों पर पंछियों की चहक थी। बच्चे खेलने में जुटे थे। अपने-अपने पति और बेटों को काम पर भेजने या ख़ुद काम पर जाने की जल्दबाज़ी में उलझी औरतों की गतिशीलता का संगीत गूँज रहा था। वह उस झोंपड़ी के आँगन के सामने खड़ा था। आँगन में अँगीठी सुलग रही थी। वह औरत गोबर से आँगन लीपती हुई दिखी। उसका बेटा दातुन करते अपने पिता के गले में बाँहें डाले पीठ पर सवार झूल रहा था। 

     सबसे पहले बच्चे की नज़र उस पर पड़ी। बच्चे ने पिता के कान में फ़ुसफ़ुसाकर उसके खड़े होने की सूचना दी और उसकी ओर देखकर हँस उठा। फि़र पिता की पीठ का झूला छोड़ आगे बढ़ा। आदमी उठकर खड़ा हुआ और उसकी ओर अपरिचय के भाव से देखा। अब तक आँगन लीपती औरत की नज़र उस पर पड़ चुकी थी। वह उठी। चकित भाव से, कुछ-कुछ भयभीत-सी आगे बढ़ी और पूछा - ‘‘किसको खोज रहे हो बाबू ?’’

    औरत के प्रश्न ने उसे चौंका दिया। वह झटके से मुड़ा और तेज़ क़दमों से चलने लगा। अपनी मूर्खता पर अपने को कोसते हुए वह वापस लौट रहा था। औरत की आँखें संदेह और आश्चर्य के साथ दूर तक उसकी पीठ पर चिपकी रहीं। वह झोंपड़पट्टी से बाहर निकल गया था। 

  लौटते हुए, रास्ते में एक जगह वह चाय पीने के लिए रुका। अब उसे चाय की तलब बुरी तरह सता रही थी। चाय की दुकान पर चाय पीते हुए उसने अख़बार के पन्ने पलटे। इस क़स्बाई शहर से निकलने वाले एकमात्र अख़बार के पहले पन्ने पर ख़बर छपी थी - ‘‘मरंगा बस्ती में हत्या और आगज़नी; ज़िले के नये एस.पी. को अपराधियों का सलाम’’

   मरंगा बस्ती शहर के दूसरे छोर पर थी। उस बस्ती में पिछली रात अपराधियों ने लूटपाट की थी। मरंगा बस्ती में मध्यवित्त परिवारों के लोग रहते थे। इन्होंने पिछले दिनों सम्पन्न चुनाव में जिस उम्मीदवार का साथ नहीं दिया, वह अपने आपराधिक रिकार्ड के बल पर जीत गया था। यह उसकी जीत का जश्न था। बस्ती के मुँह पर एक छोटी सी झोंपड़पट्टी भी थी। जीत का जश्न मनाकर लौटते अपराधियों को जब झोंपड़पट्टी के लोगों ने ललकारा, वे अंधाधुंध् गोलियाँ चलाते हुए निकले और जाते-जाते झोंपड़ियों में आग लगा गए। 

    चाय ख़त्म करने के बाद वह मरंगा पहुँचा। पुलिस की गाड़ियाँ लगी थीं। एस.पी. स्वयं मौक़ा-ए-वारदात पर हाज़िर होकर तफ़्तीश में जुटा था। रोते-बिलखते लोगों के हुजूम में बदल चुकी थी झोंपड़पट्टी। जली हुई झोंपड़ियों की राख की ढेर में अपने पिछले दिनों की स्मृतियाँ ढूंढ रहे थे बच्चे। औरतें जले-अध्जले कपड़े और टूटे-फ़ूटे बरतन-बासन टटोल रही थीं। पुरुष इध्र-उध्र गोल बाँध्कर चुप खड़े थे। किसी दूसरे ग्रह से उतरे प्राणियों की तरह पुलिस के जवान जाँच-पड़ताल में लगे थे। वह मरंगा बस्ती से वापस लौटा और सारा दिन इध्र-उध्र बेमतलब भटकता रहा। 

[*]


    उसकी बेरोज़गारी के दिन थे। पिता रिटायरमेंट के कगार पर थे। पिछले दिनों अपेन्डिक्स फ़ट जाने के कारण मरते-मरते बचे थे। किरानी के सूखे वेतन के सहारे जीवन की कठिन राह पर चलते हुए वह पहले ही थक चुके थे। उनके साथ कई दूसरे किरानियों ने इसी नौकरी के बल पर मकान खड़ा कर लिया था। कुछ तो मकान के अलावा व्यवसाय खड़ा करने में भी सफ़ल हो गये थे और अब नौकरी उनके लिए बस एक शग़ल था। उसके पिता की ऐसी स्थिति के लिए लोग उनके स्वभाव को दोष देते। पूरा दफ़्तर उन्हें कायर और मूर्ख समझता। ऐसा नहीं कि उन्हें सेन्सेटिव विभाग या रसदार टेबल नहीं मिला। जब कभी अवसर आया, वह ज़िलाधिकारी के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए कि इस टेबल के योग्य नहीं हैं वह,.....कि उनकी नौकरी चली जाएगी। उन्होंने कुल तीन बार पदोन्नति को छोड़ा और इन्हीं कारणों से उपहास का केन्द्र बने रहे। 

    अनंत कष्टों के बावजूद पिता ने उसे शिक्षा के लिए प्रदेश की राजधानी भेजा। वह अपनी शिक्षा, बेरोज़गारी और पिता की ईमानदारी, जिसे लोग कायरता कहते थे, के बीच जब कभी तालमेल मिलाने की कोशिश करता, रहस्यमय स्थितियों में फ़ँस जाता। पिता उसे हमेशा बहेलिया के लासा लगे यंत्र में फ़ँसे-छटपटाते पंछी की तरह लगते।......दिन भर भटकते हुए उसे प्रदेश की राजधानी के स्कूल जीवन से लेकर एम-ए- तक के दिन याद आते रहे। पिता के भेजे मनीऑर्डर और उनके लिखे असंख्य पत्रें की याद आती रही। कथाओं - उपन्यासों के कई पात्र याद आते रहे, जिन्होंने उसकी दुनिया ही बदल दी थी। कविताओं की वे पंक्तियाँ उसके दिमाग़ में गूँजती रहीं, जिन्हें वह अपने हॉस्टल के कमरे में लिखकर टाँगा करता था। माँ के निध्न के बाद उसकी जवान होती छोटी बहन ने घर सँभाल लिया था। वह असमय बुज़ुर्ग बनकर माँ की तरह उस पर ममता लुटाने लगी थी। बहन की ममता भरी आँखें भी दिन भर उसका पीछा करती रहीं। 

    रात हुई। पिछली रात की तरह ही वह सारी रात छटपट करता रहा। वही आँगन, वही कदम्ब वृक्ष, वही औरत, उसका पति और बेटा......और वही उसकी रीढ़ को कँपकपाता भयावह दृश्य। सब उसकी कल्पना में सारी रात उतरते रहे......आवाजाही करते रहे। उस औरत का घर-आँगन और मरंगा बस्ती आपस में घुल-मिलकर गड्मगड्ड होते रहे।
    
[*]

    दूसरे दिन की सुबह वह निकला। चाय की दुकान तक गया। पिछले दिन की सुबह की तरह उसने अख़बार के पन्ने को पलटना शुरु किया। ख़बर थी - ‘‘युवा एस.पी. का जवाब: मरंगा कांड के चार अपराधी मारे गए।’’

    सहसा उसका रक्त-संचार तीव्र हुआ। खिन्नता, जो उसकी नसों में पैठ गई थी, समाप्त हुई। उसे लगा, अभी बहुत कुछ शेष है। अगर शेष नहीं होता तो व्यवस्था की यह सक्रियता और उसका प्रतिफ़ल सामने नहीं आता। पिता के अबोले दबाव पर दी गई सिविल सर्विसेज की परीक्षा में अपनी असफ़लता का दर्द उसे मिटता हुआ लगा। फ़ाँस की तरह एक टीस उसके सीने में अटक गई थी और अक्सर चुभती रहती थी कि अच्छी तैयारी के बावजूद अपनी अनिच्छा के कारण वह पिता की इच्छा पूरी नहीं कर सका। यह टीस उसे पिघलकर बहती हुई लगी। उसे लगा, असफ़लता की पीड़ा से वह मुक्त हो गया। वह नहीं तो क्या हुआ! कोई तो है ऐसा ईमानदार और कर्मठ, जो उसके पिता के सपनों को पूरा करने में लगा है।

    उसकी इच्छा हुई कि वह चाय का ग्लास फ़ेंककर दौड़े और एस.पी. की कोठी में घुस जाए। युवा एस.पी. को गले लगाकर बधाई दे। चाय की दुकान पर इस ख़बर से गहमागहमी थी। लोग राहत की साँस ले रहे थे। युवा एस.पी. की इस सफ़लता से भयमुक्त होकर जीने की उम्मीद बँधी थी। रामबाग की तरफ़ से आने वाले एक ग्राहक ने सूचना दी कि अपराधियों की लाशें रामबाग की झोंपड़पट्टी के सामने सड़क पर पड़ी हैं और पुलिस पहरा दे रही है। 

    रामबाग ! एक झटके से वह उठा। तेज़ चाल से, लगभग दौड़ते हुए वह रामबाग की ओर चल पड़ा। आज की सुबह ऊष्म और चमकदार लग रही थी। ऊर्जा से भरी हुई सुबह। नई आशा के साथ जीवनारम्भ के लिए सबसे उपयोगी सुबह। उसने सोचा, ज़रूर रामबाग बस्ती को लूटने गए होंगे अपराधी और वहाँ भी झोंपड़पट्टी के लोगों ने उन्हें ललकारा होगा। अपराधी भाग नहीं सके होंगे। सबने मिलकर घेर लिया होगा और तब तक पुलिस गश्तीदल पहुँचा होगा और अपराधी मारे गए होंगे। 

    रामबाग वाली सड़क पर भीड़ जुटी थी। सड़क किनारे लाशों को पुलिस की देखरेख में अस्पताल की पोस्टमार्टम गाड़ी में लादा जा रहा था। बड़ी बेदर्दी से घसीटते हुए लाशों को गाड़ी के पिछले दरवाज़े तक लाया गया और उठाकर गाड़ी के अन्दर फ़ेंक दिया गया। मुख्य सडक के नीचे, बस्ती की ओर जाती सड़क पर झोंपड़पट्टी के लोग हुजूम बनाकर भयभीत खड़े थे। इसके पहले कि वह कुछ जान सके, गाड़ी लाशों को लेकर चली गई। पीछे-पीछे पुलिस की जीप भी सरपट भागी। 

    उसने देखा, वह औरत कुछ और औरतों के साथ छाती पीट-पीट कर रो रही थी। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और केश बिखरे हुए। वह बच्चा भी दिखा, रोती-बिलखती अपनी माँ से चिमटकर रोता हुआ। 

    वह सकते में था। काटो, तो ख़ून नहीं। अवाक् ! उसकी रगें सिकुड़ने लगी थीं। उसे लगा, पृथ्वी अपने अक्ष से हट गई है और करवट ले रही है। उसके कानों में बन्दूकों-पिस्तौलों से छूटती गोलियों की आवाज़ भरने लगी।......फि़र वही दृश्य, वही भयावह दृश्य उसकी आँखों के सामने उभरने लगा। वह दोनों हाथों से अपना सिर पकड़े हुए बीच सड़क पर ध्म्म से बैठ गया। कुछ लोग दौड़े। उसे पकड़कर उठाया और बीच सड़क से हटाकर किनारे ले गए। किसी ने कहा - ‘‘पानी लाओ। लगता है, चक्कर आ गया। लाश देखना, और वो भी एक साथ चार-चार लाशें, सबके वश की बात नहीं।’’ 

    उसने अपने को सँभालने की कोशिश की और उठकर खड़ा हो गया। वह सड़क से नीचे उतरा। झोंपड़पट्टी के लोगों की भीड़ के बीच गया। दहाड़ें मारकर रोती उस औरत ने उसे देखा और पकड़कर झूल गई। वह दोनों हाथों से उसे नोचने लगी। औरत उसे झकझोर रही थी और वह दोनों पाँवों को ध्रती में वृक्ष की जड़ों की तरह धाँसाकर अविचल बने रहने की कोशिश कर रहा था। विलाप करती हुई वह औरत बीच-बीच में गालियाँ दे रही थी। उसे कोस रही थी। वह कह रही थी कि उसने ही उसके पति को मरवा दिया......कि वह कई दिनों से उसके पीछे पड़ा था और बार-बार उसके घर के सामने खड़ा रहता था। लोगों ने औरत को जबरन खींचकर उससे अलग किया। लोग समझ रहे थे कि औरत दुःख और उन्माद में प्रलाप कर रही है। पता चला कि आधी रात के आस-पास पुलिसवाले पहुँचे और चार घरों से चार लोगों को बन्दूक की नोक पर निकालकर ले गए। फि़र उन्हें सड़क पर दौड़ाकर गोली मार दी। 

[*]

    वह फि़र सड़क पर था। शहर के मध्य भाग की ओर अपनी टाँगें घसीटते हुए चला जा रहा था। अख़बार की ख़बर पर फ्रुल्लित शहर के भीतर रामबाग से आनेवाली ख़बर पैठने लगी थी। धीरे-धीरे चारों ओर सच पसर गया। 

    ‘‘सालों ने चार बेकसूरों को मार डाला।......हर हाल में मरता ग़रीब ही है।....चारों मज़दूर थे।......नए एस.पी. ने अपराधियों की ध्र-पकड़ के लिए अपने मातहतों को आदेश दिया होगा। अब हिस्सा लेने के बाद किस मुँह से पकड़ने जाते ! चार ग़रीबों को एनकाउन्टर के नाम पर मार गिराया।......एस.पी. ख़ुश,.....नेता ख़ुश,....अख़बार ख़ुश,.....जनता ख़ुश।.....बोलो सियावर राचन्द्र की जय !’’ - यह शहर के मध्य स्थित व्यस्ततम नवरतन चौक की चर्चा थी, जिसे उसने रुककर सुना। सोचा, शायद एस.पी. को सच नहीं मालूम और उसे बताना चाहिए। .....और वह एस.पी. के दफ़्तर पहुँचा।

    युवा एस.पी. व्यस्त था। दफ़्तर शुरु हो चुका था। चार अपराधियों को एनकाउन्टर में मार गिराने और मरंगा कांड जैसे संवेदनशील मामले का उद्भेदन कर लेने जैसी बड़ी सफ़लता पर वह अपने मातहतों के साथ बैठक कर रहा था। उसे एस.पी. के गार्ड ने बैठक की सूचना दी और वापस जाने को कहा। अर्दली ने बाद में आकर मिलने को कहा। वह एस.पी. से तत्काल मिलने की ज़िद पर अड़ा हुआ था। उसकी ज़िद से तमतमाया हुआ गार्ड अब उसे ध्कियाने ही वाला था कि पेशाबघर के लिए हाजतमंद कोतवाल बाहर निकला। वह हड़बड़ी में था, पर सभाकक्ष के सामने गार्ड और अर्दली से बहस की आवाज़ ने उसे रोक लिया। गार्ड ने बताया कि यह आदमी साहब से मिलना चाहता है और कहता है कि इसके पास रामबाग एनकाउंटर के बारे में गोपनीय सूचना है। कोतवाल पहले चौंका। फि़र वहशी भेड़िये की तरह फ़ाड़ खाने वाली पुलिसिया नज़रों से उसे घूरने लगा। कोतवाल की नज़रों का उस पर कोई असर नहीं हुआ। वह अविचल खड़ा था। कोतवाल थोड़ा विचलित हुआ, पर तत्काल सँभल गया। एक सिपाही को इशारे से बुलाकर कुछ फ़ुसफ़ुसाया और पेशाबघर में घुस गया।

    कोतवाल के पेशाबघर से निकलने से पहले उसे एस.पी. कार्यालय के परिसर से बाहर किया जा चुका था। उसके माथे पर गूमड़ निकल आया था। होठ का निचला हिस्सा कट गया था और ख़ून रिस रहा था। बोरे में कसे फ़ालतू सामान की तरह जीप के पिछले हिस्से में लदा नीमबेहोश वह कोतवाली पहुँचा। बैठक की समाप्ति के बाद कोतवाल आया। उसकी ज़ुल्फ़ों को बायीं मुठ्ठी में भरते हुए दाएँ हाथ से ताबड़तोड़ आठ-दस झापड़ रसीद किए और तब शुरु हुई पूछताछ। कोतवाल को जब सच मालूम हुआ, तो हँसा। ख़ूब हँसा। कोतवाल के साथ सिपाही भी हँसे। कोतवाल ने उसका पता पूछा। उसके पिता तक ख़बर पहुँचाने के लिए मुंशी को निर्देश दिया। 

    पिता तक ख़बर पहुँची। वह भागे-भागे कोतवाली पहुँचे। कोतवाल ने मामला संगीन बताया। बोला - ‘‘आप तो सरकारी आदमी हैं। समझदार हैं। अब आपसे क्या लुकाना-छिपाना ! ......आपका बेटा क्रिमनल सब का लीडर हो गया है। .......पटना से उग्रवाद पढ़कर लौटा है। उग्रवादी सब का थिंकटैंक है आपका बेटा। ......थिंकटैंक बूझते हैं ?......नहीं बूझते ?......तब क्या कद्दू बूझते हैं ?......बूझना होगा सब। नया मरज़ है। बिना बूझे काम नहीं चलेगा। आप लोग पुलिस के कपार पर अपना बलाय थोपकर सो जाते हैं।......आपके बेटे का माथा ख़राब हो गया है। जितना थिंकटैंक होता है, सबका माथा ख़राब हो जाता है।......जाइए......पाँच हज़ार लेकर आइए। बहुत कड़ियल एस.पी. है। समझे ?’’ 

    ‘‘जी !’’ उसके पिता हाथ जोड़कर खड़े थे। 

    ‘‘और पाँच-पाँच सौ का नोट नहीं, सौ-सौ का नोट चाहिए। आजकल पाँच सौ का जाली नोट ख़ूब चल रहा है। पूरे बाज़ार में पाँच सौ के जाली नोटों की भरमार है। आई-एस-आई- का नोट फ़ैला हुआ है। एक नोट जाली निकला कि आई-एस-आई- का मामला भी इस पर सटा।’’

    उसके पिता घर गए। बेटी को दहेज़ देने के लिए सहेजकर रखी हुई पत्नी की एकमात्र निशानी सोने के हार को पाँच हज़ार पाँच सौ रुपए में बेचकर कोतवाली पहुँचे। पाँच हज़ार के बदले उसे सौंपते हुए कोतवाल ने उसके पिता को सलाह दी - ‘‘बड़ा बाबू, घर के भीतर रखिएगा।......एकदम ताला मारकर। इसका माथा ख़राब हो गया है। जब तक ठीक नहीं हो, बाहर नहीं निकले। बाहर निकलेगा और अंटसंट बकेगा, तो फि़र भीतर करना पड़ेगा। ......पुलिस का कान हमेशा खड़ा रहता है।......अगर इस बार अफ़वाह फ़ैलाया, तो समझिए कि रिटायरमेंट से पहले ही आपका पी-एफ़- चाट जायेगा।’’

    उसे साथ लेकर पिता घर पहुँचे। उन्होंने दफ़्तर से एक सप्ताह की छुट्टी ली। जीवन में पहली बार वह इस तरह से संकटग्रस्त हुए थे। पत्नी की मृत्यु ने उन्हें दुःख ज़रूर दिया, पर ऐसा दुःख नहीं। पूरा जीवन वह भयभीत ही जीते रहे थे, पर ऐसा भय कभी नहीं हुआ था। जवान बेटे की दुर्दशा से उन्हें गहरा आघात पहुँचा था। पुलिस ने उसे बेरहमी से पीटा था। 

    पिता और बहन ने उसकी दिन-रात सेवा की। धीरे-धीरे वह स्वस्थ होने लगा। इस बीच पड़ोसी और पिता के दफ़्तर के लोग उसका हालचाल पूछने पहुँचे। ख़बर फ़ैली थी कि वह मानसिक संतुलन खोकर एस.पी. ऑफि़स में घुस गया था। उसने बोलना बहुत कम कर दिया था। पन्द्रह दिनों के बाद वह चलने-फि़रने के क़ाबिल हुआ। घर में ही रहता। कभी कोई कविता-पुस्तक उठाता, एक-दो पन्ने पलटता और रख देता। पढ़ने की इच्छा ही नहीं होती। उसके मन के भीतर एक आँधी लगातार चलती रहती, जिसके ओर-छोर का उसे कोई पता नहीं था। उसने इस घटना के बाद से अब तक अख़बार नहीं देखा था। घर में अख़बार आता भी नहीं था। 

    कुछ दिन और गुज़रे। लगभग एक माह। इस बीच बहन छाया की तरह उसके साथ लगी रही। एक दिन बहन बोली - ‘‘उसे बाहर निकलना चाहिए। थोड़ा घूमना-फि़रना और लोगों से बोलना-बतियाना चाहिए। इस तरह गुमसुम बैठे रहने से......’’ बहन की बात पर वह मुस्कराया। उसने बहुत प्यार से बहन को देखा। बहन के क़रीब गया और उसके सिर पर हाथ फ़ेरा। उसकी ओर पनीली आँखों से निहारता रहा और फि़र फ़फ़ककर रो पड़ा। बहन ने उसे तत्काल सँभालने की कोशिश नहीं की। उसे जी भर रोने दिया। थोड़ी देर बाद वह पानी लेकर पहुँची। उसका मुँह हाथ धुलवाया। चाय बनाकर ले आई । ख़ुद भी चाय लेकर उसके पास बैठी। बोली - ‘‘तुम कल से सुबह-सुबह टहलने जाया करो। सुबह की हवा से मन को ताज़गी मिलती है। मैं तुम्हें रोज़ सुबह जगा दिया करूँगी।’’
    
[*]

    दूसरे दिन की सुबह वह घूमने निकला। जाड़ा लगभग विदा हो चुका था। सुबह की हवा में हल्की खुनक थी। नथुनों से होती हुई यह हवा जब भीतर उतरती, सचमुच ताज़गी का अहसास होता। उसे अच्छा लग रहा था। यह सुबह की हवा मन को उत्फ़ुल्ल कर रही थी। उसने सोचा, सच कह रही थी बहन। इन दिनों बहन ही उसके जीवन के केन्द्र में थी। वह बहन के इतना क़रीब कभी नहीं रहा। उसने पहली बार बहन की निकटता और बहन के स्नेह को अपने भीतर इस तरह फ़ैलते हुए पाया। बचपन में, जब बहन छोटी थी और वह उससे कुछ बड़ा, पिता ने उसे इस शहर से दूर पढ़ने के लिए भेज दिया था। बहन छूट गई। बहन ही नहीं, माँ और पिता भी छूट गए। इन दिनों बहन फि़र उसके साथ थी। उसके भीतर।

    वसंत आरम्भ हो चुका था। वनस्पति जगत में वसंत का उल्लास फ़ूटने लगा था। वह चारों तरफ़ निहारता चला जा रहा था। यह उसका शहर था। उसका जन्म-स्थान। पर वह पहली बार इसके सुबह के सौन्दर्य पर मोहित हो रहा था। वह गिरजा चौक की ओर जाती सड़क पर था। 

    गिरजा चौक से पूरब की ओर जाने वाली सड़क अक्सर निर्जन रहा करती थी। सिर्फ़ सुबह यहाँ थोड़ी आवाजाही रहती। सैर के लिए निकले तरह-तरह के लोग यहाँ दिखते। मसलन, कुछ दिन और जी लेने की लालसा में हाफ़ँते हुए बूढ़े, स्वस्थ और सुन्दर बने रहने की होड़ में लगे अधेड़ और अपने यौवन की चकाचौंध् से दूसरों को ललचाते युवा। दिन भर मनहूस की तरह सोई रहने वाली यह सड़क सुबह-सुबह चहकने लगती। इसी सड़क पर ऊँची मीनारोंवाला गिरजाघर था। गिरजाघर का विशाल परिसर कई एकड़ में फ़ैला था। सड़क किनारे ऊँची दीवार का घेरा था। दीवार और सड़क के बीच कदम्ब और सेमल के पेड़ों की घनी क़तारें थीं। गिरजाघर का परिसर भी विशाल वृक्षों से पटा हुआ था। ये अँग्रज़ों के ज़माने के वृक्ष थे। मोटे तने वाले ऊँचे-ऊँचे वृक्ष। इनकी प्रजातियों के वृक्ष शहर में और कहीं नहीं थे। ये अँग्रज़ों के अपने कुल-गोत्र के वृक्ष थे, जिन्हें सात समंदर पार से मँगवाकर उन्होंने रोपा और अपने स्मृति-चिह्न के रूप में छोड़कर लौट गए।

    चलते-चलते गिरजाघर का फ़ाटक आया। परिसर के भीतर सि्त्रयाँ घूमती हुई दिखीं। क्रिकेट खेलते हुए कुछ बच्चे भी दिखे। सुबह की सैर पर निकली एक औरत तेज़ क़दमों से चलती हुई फ़ाटक से बाहर निकली और उसके आगे-आगे चलने लगी। एक नज़र में उसे औरत का चेहरा काफ़ी आकर्षक लगा था। उसकी इच्छा हो रही थी कि वह अपनी चाल थोड़ी और तेज़ कर दे और उस औरत को पार करते हुए और आगे निकल जाए। आगे निकलने के बाद पीछे मुड़कर एक बार उसका चेहरा ग़ौर से देख ले। पर वह ऐसा नहीं कर सका। उस औरत की तेज़ चाल और पीछे से दिखती उसकी देह के भँवरजाल में वह उलझता जा रहा था। उस औरत की देह के कटाव बेहद आकर्षक थे। चाल तेज़ होती हुई भी लयात्मक थी। वह सलवार-समीज़ और दुपट्टे में थी। उसका काला दुपट्टा तेज़ गति से झूलती उसकी बाहों के झटके से लहरा रहा था। उसने चलते हुए एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने दोनों हाथ पीछे कर चलते हुए ही बालों का क्लिप खोला, बाल सहेजकर फि़र क्लिप लगा लिया। एक दक्ष जिमनास्ट की तरह तनी हुई रस्सी पर आगे-आगे वह औरत और उस औरत के पीछे-पीछे सर्कस के जोकर की तरह जैसे-तैसे वह चलता जा रहा था कि अचानक परिदृश्य बदल गया। वह औरत दाहिनी ओर एक गली में मुड़ गई। 

    वह अपने को ठगा-सा महसूस करने लगा। उसने अपने-आप से पूछा कि आख़िर क्यों होता है उसके साथ ऐसा कि उसकी आँखों के सामने का परिदृश्य अचानक बदल जाता है ? उसे उम्मीद थी कि यह औरत उसके आगे-आगे कुछ और दूर तक चलेगी और वह उसकी गति, लय और ऊर्जा के साथ जुड़कर तेज़-तेज़ चलने लगेगा, पर......। ऐसा ही हुआ था पिछले दिनों भी जब अचानक बिन्नी परिदृश्य से ओझल हो गई थी। वह हत्प्रभ रह गया था। कुछ जाने, पूछे या कहे इसके पहले ही बिन्नी अपना निर्णय सुनाकर चली गई। वे सिविल सर्विसेज की परीक्षा की तैयारी के दिन थे। वह अपने पिता और बिन्नी का ही सपना पूरा करने में जुटा था। कविताओं की दुनिया से बाहर निकल बिन्नी के कहने पर ही......। पर रहस्यमय कथाओं की नायिका की तरह वह अदृश्य हो गई। ग्रीन कार्ड होल्डर सॉफ़्टवेयर इंजीनियर के साथ विदेश चली गई बिन्नी। आनन-फ़ानन में मँगनी, विवाह और विदा। यह सब कुछ अगर होना ही था, तो होता, पर अचानक क्यों हुआ ?

    वह काफ़ी दूर निकल आया था। सामने जनता चौक था। एक भीड़ भरा चौराहा। यहाँ मज़दूरों की भीड़ थी। हर सुबह आस-पास की बस्तियों के मज़दूर यहाँ एकत्र होते और जीवित मनुष्यों की हाट सजती। फ़ावड़ा, कुदाल, गैंती, दराँती और टोकरियाँ लिये भीड़ में चिल्ल-पों मचती। आपस में बीड़ी-तम्बाकू का लेन-देन चलता। घर-परिवार की बातें होतीं। झगड़े-मनमुटाव चलते, तूतू-मैंमैं और मान-मनौवल होता। काम मिलने की आशा में नई योजनाएँ बनतीं और नहीं मिलने की आशंका में आँखों में आँसू भरते। मज़दूरों की तलाश में किसी मालिक के आते ही मधुमक्खियों की तरह सब टूट पड़ते। लोग आते, मोल-भाव करते और ज़रूरत के हिसाब से मज़दूरों को ले जाते। 

    वह मुड़ने ही वाला था कि अचानक, हाँ, अचानक उसकी नज़र सामने गई। ......टोकरी लिये वह औरत खड़ी थी। उसका बच्चा भी साथ था। उसने रुककर औरत को देखा। औरत के चेहरे पर प्रलय के चिह्न साफ़ दिख रहे थे। उसकी माँग सूनी और केश उलझे हुए थे। चेहरा कठोर हो गया था। वह थोड़ा क़रीब जाना चाहता था। वह आगे बढ़ा कि उस औरत से उसकी आँखें मिल गईं। वह ठिठक गया। औरत की बड़ी-बड़ी आँखों में सूनापन पसरा हुआ था - निर्जन दोपहरी का सूनापन। उसे देखते ही औरत की मुखमुद्रा बदलने लगी। औरत चौकन्नी हो गई। सबसे पहले उसने अपने बेटे को आकुल होकर ढूँढा। टोकरी फ़ेंककर वह पास खड़े बेटे पर झपटी और उसे गोद में ले लिया। माँ के भीतर अचानक उमड़े इस लाड़-प्यार से बच्चा अचकचा उठा। फि़र बच्चे की नज़र उस पर पड़ी। बच्चा मुस्कराया। वह भी मुस्कराना चाहता था, पर उस औरत की हालत देखकर वह परेशान हो उठा,....कुछ-कुछ भयभीत भी। औरत की आँखों में कातरता और क्रोध् के मिले-जुले भाव थे। वह रुकना चाहता था। चाहता था उस औरत का कुशल-क्षेम पूछना। वह उससे बातें करना चाहता था। वह उसे बताना चाहता था कि उसके पति की हत्या में उसका हाथ नहीं, जैसा कि वह सोचती है।......और वह स्वयं उस हत्या के कारण दुखी और परेशान है अब तक,.....कि वह उसके दुःख में शामिल है। पर वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सका। 

    वह मुड़ा और उसी रास्ते से घर की ओर लौटने लगा। उसे लग रहा था, .....वह औरत उसके पीछे-पीछे आ रही है। कई बार उसने पीछे मुड़कर देखा भी। उसकी कैफ़ीयत अजीब हो चली थी। उसे कभी लगता, वह औरत, वहीं जनता चौक पर खड़ी उसे वापस लौटते हुए निरंतर देख रही है और उसकी आँखों से निकलती हुई लेसर किरणें उसकी पीठ में छेद कर रही हैं।

    वह घर लौट रहा था। वह चाह रहा था जल्दी से जल्दी घर पहुँचना। घर पहुँचकर अपनी बहन के पास होना। लौटते हुए वही राह थी, जिस पर चलकर वह सुबह की सैर में जनता चौक तक पहुँचा था। वही वृक्ष थे।.....वही हरियाली थी।......आते हुए वसंत की हल्की खुनक भरी वही हवा थी।.....वही गिरजाघर था। सब कुछ वही था, पर उसके लिए फि़र परिदृश्य अचानक बदल चुका था। जाते हुए काले दुपट्टेवाली अजनबी औरत के पाँवों की लय के सहारे वह काफ़ी दूर तक चला था, पर लौटते हुए उसके पाँवों के नीचे था जनता चौक पर खड़ी औरत की आँखों से पिघलकर बहता हुआ गर्म लावा।
   
[*]

    वह वापस घर पहुँचा। 

    वह उद्विग्न था। एक आदिम दुःख और भय ने उसे हिलाकर रख दिया था। उसे प्यास लग आई थी। 

    बहन चहकती हुई आई। उसे उम्मीद थी कि उसका भाई सुबह की सैर से तरोताज़ा होकर लौटेगा और वह चमत्कृत हो जाएगी। पर वह भौंचक रह गई। उसके चेहरे पर फ़ैली बेचैनी ने बहन को कई तरह की आशंकाओं से भर दिया। बहन ने पूछा - ‘‘क्या हुआ ?’’

    ‘‘पानी.....प्यास लगी है।’’ वह किसी तरह बोल सका। बहन पानी से भरा ग्लास लिये वापस लौटी। उसे एक साँस में ग्लास ख़ाली करते हुए देखती रही। पूछा - ‘‘और ?’’

    उसने सिर हिलाकर ना कहा और अपने कमरे में घुस गया। बहन कुछ समझ नहीं पा रही थी कि आख़िर हुआ क्या ? वह परेशान हो उठी। उसकी आँखें भर आईं। उसने दुपट्टे से अपनी आँखों को पोंछा और रसोई में जाकर चाय बनाने का उपक्रम करने लगी। पिता पूजा पर बैठे थे। वह नहीं चाहती थी कि पिता को कुछ पता चले। वह सुबह-सुबह घूमने गया है, यह जानकर आज पिता बेहद प्रसन्न थे। उन्हें लगने लगा था कि वह अब पिछले हालातों से उबरकर बाहर आ रहा है और धीरे-धीरे सब कुछ पटरी पर आ जाएगा। उसके सैर पर जाने के बाद आज पिता ने माँ को भी याद किया था। वे माँ का ज़िक्र बहुत कम करते थे, पर आज उन्होंने बेटी से कहा - ‘‘तूने अपनी माँ की तरह उसे सँभाल लिया।’’

    बहन चाय के साथ उसके कमरे में पहुँची। वह कुर्सी पर निढाल बैठा था। पीछे की तरफ़ पीठ टिकाए। दोनों बाहें झूल रही थीं, अलगनी पर टँगी कमीज़ की बाहों की तरह। बहन के पैरों की आहट पाकर उसने अपने को सहज करने की कोशिश की। बहन ने चाय का प्याला दिया और वहीं, बिल्कुल उसके पास फर्श पर बैठ गई। वह चुपचाप चाय पीता रहा। चाय ख़त्मकर उसने प्याला बहन को पकड़ा दिया। बहन ने प्याला नीचे ही रख दिया और उसके घुटनों पर सिर टिकाकर सुबकने लगी। बहन के बालों में अँगुलियाँ फि़राते हुए वह चुपचाप बैठा रहा। उसके कानों में बहन के सुबकने की ध्वनि उतर रही थी और उसकी आत्मा के भीतर उमड़-घुमड़ रही थी। ......थोड़ी देर तक यह सिलसिला चलता रहा और फि़र अपने-आप रुका। बहन ने सिर उठाया। उसने झुककर बहन के चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया। ख़ूब ग़ौर से उसे निहारता रहा। फि़र एक हाथ से ठुड्डी पकड़, दूसरे हाथ को सिर पर फ़ेरा। बहन के होठों पर एक फ़ीकी मुस्कान उभरी। वह उठी और चाय का ख़ाली प्याला लेकर अवसाद से भरे कमरे में राह बनाती हुई बाहर निकल गई। 

    दिन जैसे-तैसे गुज़रा। बहन के लाख इसरार के बावजूद उसने खाना नहीं खाया। बहन मटर की हरी फ़लियाँ टेबल पर रख गई थी। वह कभी-कभार दाने निकालकर मुँह में डाल लेता। सारा दिन वह कमरे में बंद रहा।

    शाम हुई। पिता लौटे। उसे कमरे में बंद पाकर और बेटी के चेहरे पर फ़ैली निराशा को देख वह सब कुछ समझ गए। सुबह पूजा से उठने के बाद ही बेटी का चेहरा देख उन्हें आशंका हुई थी, पर उन्होंने अपने मन को झुठला दिया था। अपने को दिलासा दिया था कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

    रात हुई। बहन भूखी न रह जाए, सिर्फ़ इस अपराध्-बोध् के कारण उसने जैसे-तैसे खाना निगला और कमरे में बंद हो गया। रात धीरे-धीरे ऊपर सरक रही थी। कुछ देर तक रसोई से खटपट की आवाज़ आती रही। पिता को खाना खिलाने और ख़ुद रोटी के दो-चार निवाले निगलने के बाद बरतन-बासन समेटकर बहन अपने कमरे में चली गई। पिता बिस्तर पर पड़े-पड़े सोच रहे थे, .....कभी उसके बारे में, तो कभी बेटी के बारे में। आज बेटी को लेकर वह ज़्यादा चिन्तित थे। उन्होंने सोचा, अब जल्दी से जल्दी बेटी का विवाह कर उसे विदा करेंगे। वह करवटें बदलते और बीच-बीच में कराह उठते। पिता के कराहने की आवाज़ें उसके कानों तक पहुँचती रहीं। कुछ देर बाद सब कुछ शांत हो गया। पूरा घर नींद में था। घर ही नहीं, पूरा महल्ला, पूरा शहर, सब विश्रांति की चादर ओढ़ सो गए। 
    
[*]

    वह सोना नहीं चाहता था। उसे नींद से घबराहट हो रही थी। उसे लगता, सोने का अर्थ सिर्फ़ आँखें मूँदना नहीं होता। सोना, पूरी दुनिया से कट जाना, दूर हो जाना होता है। अगर वह सो गया तो यह हलचल छूट जाएगी। हर क्षण बदलते परिदृश्य पर वह नज़र नहीं रख सकेगा। वह कैसे बता पाएगा उस औरत को सच और कैसे कर पाएगा माँ-बेटे के जीवन की रक्षा ? दूर देश से बिन्नी की वापसी पर वह कैसे उसे देख सकेगा ? अपनी बहन से भी अब वह दूर नहीं जाना चाहता था। वह अपने पिता को रिटायरमेंट के बाद की ज़िम्मेदारियों से मुक्त करना चाहता था। उसने अपने कमरे में भर चुके अँधेरे को अपनी आँखों से भेदते हुए कमरे की खिड़कियों-दरवाज़ों को टटोला। कमरे में रखी चीज़ों को आँखों से छूने की कोशिश की। वह अपनी आँखों के सहारे कमरे से बाहर निकलना चाहता था।

    अजीब रात थी यह, जिसमें वह सोना नहीं चाहता था, पर जागना भी उसके लिए कम दुष्कर नहीं था। जागती आँखों के स्वप्न दलदल की तरह उसे अपने भीतर खींचते जा रहे थे। अकथ पीड़ा के साथ वह धाँसता जा रहा था इन स्वप्नों में। असह्य यातना से भरी इस रात का वह अकेला रचयिता था,.....तमाशबीन था,.....भोक्ता था। उसकी आँखों में दृश्य ऐसे भरते, मानो किसी अनजाने ग्रह के रहस्यमय जीवन की गतिविध्याँ हों- फ़ुसफ़ुसाती हुई भयभीत करती ध्वनियों में घुली-मिली। वह औरत,.....और उसकी बहन,......और उसकी माँ,.....और बिन्नी.....सबका चेहरा इन दृश्यों से छन-छनकर बाहर आता। कभी-कभी ये तमाम चेहरे एक-दूसरे में मिल जाते। कभी सौरा की तेज़ धारा में चिन्दी-चिन्दी होकर बहती बहन दिखती, तो कभी कोशी-तट पर फ़ैले बालू के ढूह में गले तक धाँसी माँ दिखती। उसे कभी इस शहर के अदृश्य पहाड़ों के शिखर पर खड़ी बिन्नी दिखती और कभी दिखती वह औरत,.....धुँआती धरती के गर्भ से बाहर निकलती और अग्नि की लपटों पर सवार होकर आकाश में चक्कर काटती हुई। 

    हमेशा की तरह अचानक परिदृश्य बदला। एक चक्रवात ने उसके कमरे में, उसकी देह में, उसकी आत्मा में प्रवेश किया। वह एक पत्ते की मानिन्द उड़ा। कमरे की एक-एक चीज़ उड़ रही थी।......उन कविताओं के शब्द और अर्थ, जिन्हें उसने वर्षों से अपने भीतर सहेजकर रखा था। बचपन की स्मृतियाँ, जो उसके साथ जवान हुई थीं। बिन्नी की यादें, जिन्हें उसने गठरी बाँधकर मन की खूँटी पर टाँग रखा था। बहन और पिता का निर्विकल्प स्नेह, जो उसकी शक्ति था। चक्रवात ने खिड़कियों-दरवाज़ों को खोल दिया था। शहर की तमाम गर्द, वृक्षों के सूखे पत्ते, कोशी की उपधाराओं का जल - उसके कमरे में सबकी आवाजाही मची थी। कमरे की दीवारें उड़ गईं।

    वह अपने कमरे से बाहर था। उसके पाँव आँगन में भी नहीं टिक सके। वह घर से बाहर था। भयावह-गहन अँधेरे में उड़ता चला जा रहा था वह। उसके आगे-आगे राह दिखाती चल रही थीं उस औरत के बच्चे की छवियाँ। कदम्ब की डाल पर बेफिक्री से बैठा बच्चा,......अपने पिता के गले में बाँहें डाले पीठ पर सवार झूलता हुआ बच्चा।......अब स्वप्न सिर्फ़ उसकी जागती आँखों में ही नहीं, रामबाग की झोपड़पट्टी की ओर चलते हुए उसके पाँवों में भी थे।

शीर्षक ‘स्वप्न जैसे पाँव’ शमशेर बहादुर सिंह की एक कविता-पंक्ति, आभार सहित।                 


हृषीकेष सुलभ                                                 
Share on Google +
    Faceboook Comment
    Blogger Comment

3 comments :

  1. बाँधती हुई कहानी हर लाईन को दूसरी लाईन से ।

    ReplyDelete

osr5366