मंगलवार, जुलाई 01, 2014

मृदुला गर्ग : मिलजुल मन (उपन्यास अंश -3) Mridula Garg's "Miljul Man" Sahitya Akademi Award Winner 2013



मृदुला गर्ग
                 मिलजुल मन - अध्याय तीन (साहित्य अकादमी 2013 'हिन्दी' पुरस्कृत उपन्यास)

हम कहेंगे क़िस्सा, आप मानेंगे सच्चाई।

मैं पश्चिम के किसी मुल्क में रह रही होती और दूध से जले होने का तजरबा न हुआ होता तो बेबाक कहती, कनकलता और पारबती के बीच, क़िस्सा, लुकी छिपी समलैंगिकता का था। जब हर औरत, अपने हमसफ़र मर्द से औरतनुमा ग़मख्वारी की तवव़को रखती है; पर मिल जाए तो उसे ज़नाना बतला कर, मुँह बिचका लेती है तो ज़ाहिर है, मर्द में औरत या औरत में मर्द ढूँढती है। तभी स्कूल-कॉलेज में हर कमसिन लड़की, किसी हमजोली या टीचर पर फ़िदा हुई रहती है। उम्र और दुनियादारी का जज़्बा बढने के साथ, शादी-ब्याह,मर्दों से रचाया जाता है तो इसलिए कि यही रिवायत, समाज को क़बूल है। वरना कौन जानता है, क्या ग़ुल खिलते। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी एक चीज़ है और जज़्बाती, दूसरी। इसलिए बर्ताव में हिन्दी हुए रहने पर भी, मन से हर ज़ेहनी बन्दी बाग़ी रहती है। आप मानें तो ठीक, न मानें तो ठीक। अपना काम है, ठहरे पानी में पत्थर फेंकना। उठती लहर आप गिनें, न गिनें, आपकी मर्ज़ी।
Mridula Garg sahitya akademi award winners 2013

गुलमोहर और मोगरा के पिताजी, श्री बैजनाथ जैन, वाक़ई शब्दों के जादूगर थे। मोगरा ने बतलाया था न? जितना बतलाया, उतना नहीं भी बतलाया। अपनी या अपनों की कहने में यही दिक्कत है। इसीलिए मैंने तय किया है कि बीच-बीच में, बक़लम लेखक, मोगरा की मदद करती चलूंगी। उससे दो फ़ायदे होंगे। एक तरफ़, मोगरा की ज़ुबानी, पोशीदा बातों का ज़िक्र आप तक पहुँचता रहेगा। दूसरी तरफ़, जब-जहाँ, वह असलियत को राज़ बनाएगी, मैं उसे अफ़शां कर दूँगी। यक़ीन मानिए, वह जानबूझकर नहीं छिपाएगी। अपनी समझ में सच कहेगी। गड़बड़, सच कहने के क़िस्से में ही होगी। सच कहने पर आते हैं तो होशोहवास दुरुस्त रखने के चक्कर में, हम, इस क़दर बदहवास हो जाते हैं कि किसी-न-किसी से बेइन्साफ़ी कर बैठते हैं। अपनी कहेगी तो खुद को ज़रूरत से ज़्यादा नाकारा बना कर पेश करेगी या ज़रूरत से ज़्यादा आला। हर हाल बेइंसाफ़ी हो कर रहेगी।
क़िस्सए बैजनाथ, उनकी दुख़तर पर न छोड़, थोड़ा-बहुत मुझे भी कह लेने दें।

       क्या कहा, मैं ज़्यादा सच कहूँगी। तौबा किजिए, अपना पेशा सच कहने ही नहीं देता। वही ज़ुबान की कलाबाज़ी, जो कूटनीतिज्ञ ही नहीं, अदीबों की भी कमज़ोरी और ताक़त है। आज के मुहावरे में कहें तो मसला उस ख़ुदाई हँसी का है, जिसके चलते, उपन्यास हुआ करते हैं। हम कहेंगे क़िस्सा, आप मानेंगे सच्चाई। वे कहेंगे आँखों देखा सच, आप मानेंगे, गप्प। हम, बन्दापरवर, समचेता किस्म के इंसान हैं, इसलिए सुनिए क़िस्सए गुलमोहर व साथी, कभी मोगरा की तो कभी लेखक की ज़ुबानी। 

       बैजनाथ जैन ने ज़बान की लताफ़त ऐसी पाई थी कि मर्द-औरत को यकसां क़ाबू कर लें। कूटनीतिज्ञ रहे होते तो चोटी पर होते। कूटनीतिज्ञ आधा काम ज़बान के लचीलेपन से ही साधता हैं, देश का हो या निजी। उनके साथ दिक़्क़त थी तो यह कि, ऊपर से पुख्ता नज़र आते पर भीतर-भीतर, दुविधा में हिचकोले खा रहे होते। दुविधा में रहना, आप जानो, ज़ेहनी आदमी की पहली पहचान है। आप पूछेंगे, कूटनीतिज्ञ होने की तमाम ख़ूबियाँ रहते हुए, चोटी के न सही, छोटे-मोटे नितिज्ञ क्यों नहीं बने तो जवाब है, वही दुविधा। ब्रितानी राज के दौरान, जब आई.सी.एस का इम्तिहान दे कर नौकरशाह बन सकते थे (इम्तिहान देते तो पास होते ही, इसमें शक़ोशुबह नहीं था) तब, आज़ादी की लड़ाई में कूद गए। आई.सी.एस का इम्तिहान देने से मुकर गए। आज़ादी मिली तो कुर्बानियों के एवज़ में, विधायक, लोकसभा मेम्बर, वज़ीर वग़ैरह बन, रफ़्ता-रफ़्ता, राजदूत या राज्यपाल का ओहदा पाने का चलन हुआ। कहें, टेढ़ी उंगली घी निकालने का ज़माना आया। तब उनकी ऐसी कोई ज़बर कुर्बानी नहीं मिली, जिसकी बिना पर, सरकार में शामिल किया जा सकता। दो टूक कहें तो बेचारे, क़िस्मत के मारे, कभी जेल नहीं गए थे। बेचारों को उनकी पुरानी ज़ेहनियत उन्हें ले डूबी। अपनी नामुराद जिरहकारी और ग़ैरजानिब सोच की वजह से, कुछ बरसों बाद, गान्धीवादी अहिन्सा से दिलबस्त न रहे थे। पर अफ़सोस, पूरी तरह हिन्सात्मक आन्दोलन के भी न हुए थे। ढंग से शहीद हुए होते तो कम-अज़-कम उनके मज़ार पर हर बरस मेला ही लग जाता। ज़िन्दा रहते भी एक फ़ायदा झटक लेते। यक़ीनन उस हाल, शादी का झंझट उनके साथ न होता। दुनिया की अलामात से बचाए रखने की ख़ातिर, खूबसूरत, नाज़ुकमिज़ाज, नाज़नीन से, तरह-तरह के शायराना झूठ न बोलने पड़ते।

       ख़ैर, जो बन सकते थे पर नहीं बने; उसका क़िस्सा बदला नहीं जा सकता।

     फ़िलहाल, हाज़िरजवाब और ज़ेहनी बैजनाथ जैन, उस मुकाम पर थे, जब ग़लत लाला के ग़ैरवक़्ती इन्तक़ाल ने उन्हें, अपने पढ़े अर्थशास्त्र की जीती-जागती मिसाल बना दिया था। जिगरी दोस्तों की याराना महफ़िलों में, बहुत बार गहरी साँस भर, कहते पाए गए थे कि, सोचो, अगर छोटे के बजाय बड़े लाला स्वर्ग सिधारे होते तो, हालात कितने मुख़तलिफ़ होते। दोस्त सोचते और क़िस्मत की पूँजीवादी मार पर हाय-हाय करते।

       जी हाँ, छोटे लाला के इन्तक़ाल के बाद, जो पटकनी बड़े लाला ने उन्हें दी, उससे कुछ अर्से के लिए उनकी ज़िन्दगी, पूँजीवादी निज़ाम-सी हो रही। क्या 1930 में युरोप में ज़बर मंदी आई थी, जो उनके घर आई। ग़नीमत थी कि यह वह ज़माना था, जब दरम्याने वर्ग की निचली सीढ़ी पर खड़े लोग भी, दो-चार ख़िदमतगार रखने की ताब रखते थे। वजह उनकी ऊँची औक़ात नहीं, बेचारे ख़िदमतगारों की कंगाली थी, जो तनखा न मिलने पर भी, दो जून रोटी की ख़ातिर, मालिक के दिन जल्दी फिरने की आस में, वफ़ादार हुए पड़े रहते थे। लगता है, अपने वक़्त का अर्थशास्त्र, उन्होंने, केन्स को बेपढ़े रट लिया था। गुफ़्तारों के बाज़ार में मंदी, बंदापरवर, कब तलक? ऐसा न होता तो आप क़यास लगा सकते हैं कि बैजनाथ के परिवार का क्या हश्र हुआ होता। मुलाज़िमों के बिना, घर भूतों का नहीं तो परियों का डेरा ज़रूर हो रहता।

       आपको शायद यक़ीन न हो, शुरु-शुरु में मुझे भी नहीं हुआ था, कि गुलमोहर और मोगरा की माँ साहिबा, कनकलता को इल्म न था कि, लाला के इन्तक़ाल ने उनकी माली हालत पर क्या क़हर ढाया था। अनजान थीं या जान कर अनजान बनी थीं, कहा नहीं जा सकता। मज़े की बात यह थी कि मौक़े की नज़ाक़त से वाक़िफ़, दोनों मुलाज़िम, जो मिया बीवी थे, बिला तनखा गुज़र-बसर करते हुए भी, मालकिन को असलियत की जानकारी देने के ख़िलाफ़ थे। रसोईया रामदेब इस क़दर लज़ीज़ खाना बनाता था कि तंगहाली में भी, खिचड़ी को दाल पुलाव कह कर खाने की नौबत नहीं आई। उसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि, सब्ज़ी के छिलकों से भी बढ़िया भाजी बना सकता था। कहने को जी चाह रहा है कि यह हुनर, उसने 1943 के बंगाल के अकाल के दिनों, हासिल किया था। पर अफ़सोस, बिन अकाल भी, बंगाल की अदबी सरज़मीं पर भूखो मरने की नौबत आई रहती थी। वक़्तन फ़क़्तन, हम सच बोलने पर भी मजबूर होते रहेंगे। कह लीजिए, बैजनाथ की दुविधा मारी शख्सियत का असर है। किरदार गढ़ेंगे तो असर होगा ही। कहना पड़ेगा कि उसने वह हुनर, बचपन में, अकाल से काफ़ी पहले, अपनी माँ से सीख लिया था। तंगहाली के दिनों में, उसका हुनर बैजनाथ के ख़ूब काम आया। सपनों की दुनिया में जीने वाली कनकलता, यह न जान पाई कि उनके यहाँ, एक दिन भाजी, ताज़ा सब्ज़ी की बनती थी तो दूसरे दिन, उसके छिलके की। इतनी मायावी बाला को कौन क़िस्सए तंगदस्ती से वाक़िफ़ करवाता? करवा भी देता तो सपनों में विचरती नाज़नीन कर क्या लेतीं? उनकी पगार तो मुहैया करवा नहीं सकती थीं। हौलेदिल के दौरे डाल, काम ज़रूर बढ़वा सकती थीं। इसी डर से परिवार का कोई जन उन्हें अनजान से जानकार बनाने में दिलचस्पी नहीं रखता था। 

       जानती हूं, बात इतनी सीधी-सपाट नहीं थी। सिर्फ़ काम बढ़ जाने के डर से, वे भले लोग उन्हें ख़ुशफ़हमी में नहीं रखे थे। कुछ असर, उनकी शख्सियत का था, कुछ धरती पकड़ लोगों की रोमानियत की चाहत का। काश हम थोड़ा सा रोमानी हो पाते, जपते दुनियादार लोग, कभी-कभी ज़्यादा ही ग़ैरदुनियादार हो उठते हैं। कनकलता, खूबसूरत और नाज़ुक तो थी ही, ऐसा बेबस, लबेदम, अब साँस रुका कि अब, रुख़ अपनाए रखती थी कि सामने वाला, उसे हर परेशानी से महफ़ूज़ रखने पर आमादा हो जाता था। बेचारे रामदेब और पारबती उसी तिलिस्म के मारे हुए थे। पर दोनों का रवैया थोड़ा मुख़तलिफ़ था। पारबती पूरी तरह कनकलता पर मोहित थी। वह मर्द नहीं थी, इस एक रुख़ को छोड़, हर मायने में उसकी उलट थी, इसलिए मोह लाज़िमी था। दोनों में से किसी का मर्द न होना, मोह को बढ़ावा देता था। जानते आप भी हैं, मैं भी, दिक़्क़त अनकही को कहने की है कि हर औरत के अन्दर, एक समलैंगिक, अंग्रेज़ी में जिसे कहते हैं, लेस्बियन, छिपी रहती है। औरतों की किसी मजलिस में चले जाइए। बातचीत का एक मसला, अपने-अपने मर्द की बेनाज़ुकख्याली का होगा; काश वह मुझे वैसे समझ पाता जैसे तुम समझती हो, काश तुम मर्द हुई होतीं। काश ...आगे कहना मना है। पर कौन इतना कमज़ेहन है जो न समझे, काश क्या? मैं पश्चिम के किसी मुल्क में रह रही होती और दूध से जले होने का तजरबा न हुआ होता तो बेबाक कहती, कनकलता और पारबती के बीच, क़िस्सा, लुकी छिपी समलैंगिकता का था। जब हर औरत, अपने हमसफ़र मर्द से औरतनुमा ग़मख्वारी की तवव़को रखती है; पर मिल जाए तो उसे ज़नाना बतला कर, मुँह बिचका लेती है तो ज़ाहिर है, मर्द में औरत या औरत में मर्द ढूँढती है। तभी स्कूल-कॉलेज में हर कमसिन लड़की, किसी हमजोली या टीचर पर फ़िदा हुई रहती है। उम्र और दुनियादारी का जज़्बा बढने के साथ, शादी-ब्याह,मर्दों से रचाया जाता है तो इसलिए कि यही रिवायत, समाज को क़बूल है। वरना कौन जानता है, क्या ग़ुल खिलते। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी एक चीज़ है और जज़्बाती, दूसरी। इसलिए बर्ताव में हिन्दी हुए रहने पर भी, मन से हर ज़ेहनी बन्दी बाग़ी रहती है। आप मानें तो ठीक, न मानें तो ठीक। अपना काम है, ठहरे पानी में पत्थर फेंकना। उठती लहर आप गिनें, न गिनें, आपकी मर्ज़ी।

       दूध से कैसे जली थी, वह भी बतलाऊँ? कहानी, मेरी नहीं, गुलमोहर, मोगरा एण्ड को की कही जा रही है। मेरा दख़ल क्यों? क्या कहा? छाछ फूंक-फूंक कर पी रही हूँ। तौबा! सुनिए। ज़माना गुज़रा एक पाक़-साफ़ उपन्यास लिखा था, चित्तकोबरा नाम से। दो निहायत पाक़दिल बन्दों का, मिया-बीवी के अलावा, दूसरों से प्यार था। इसी पर अपने ज़हीन आलोचकों ने इतना दिल जलाया कि क्या बयान करें। पता नहीं वैसा हसीन प्यार न कर पाने की तक़लीफ़ और हसद थी या कुछ और। हो सकता है, एक तक़लीफ़ यह रही हो कि पता चलने पर, शौहर ने न मारपीट की, न भौंका-गांजा, न बेगम को दरबदर किया। ऐसे ग़मख्वार मर्द को, हिन्दी हुए मुम्बईया किस्म के मर्द, भला क्योंकर सही मानते? तुर्रा यह कि बीबीजान ने तनिक जो गुनहगार महसूस किया। नासपीटी को सिलाई मशीन के सहारे बच्चे पालने पड़ते तो पता चलता। मर्दानगी साबित करने की छूट मैंने नहीं दी, इसलिए इंसाफ़ पसन्द हिन्दीवरों ने मुझे ग़लती की सज़ा दी। दूध में तिश्नगी भले न हो, औटा कर तत्ता-तत्ता, सिर पर उलट दोगे तो दूध से बन्दा जलेगा ही। वही मेरे साथ हुआ।

       आपने पूछा तो मैंने बतलाया। वरना मैं सिर्फ़ यह कह रही थी कि दूध से जली न होती तो साफ़ कहती, ऐसी औरत कभी रही नहीं, जिसने मर्द को औरत न देखना चाहा हो। जलने के बाद कह देती हूँ, मर्द में औरत न देखनी चाही हो। शब्दजाल है पर यूं क़िस्सा अर्धनारीश्वर पर जा टिकता है, जो सदियों से क़बूला जाता रहा है। छोड़िए मेरा अफ़साना, वापस कनकलता पर आएं।

       मैं भी, औरतजात, पारबती पर अटक ली । रामदेब की तो कहूं। वह वाक़ई बेदर्द किस्म का मर्द था। जिसकी बेदर्दी का रोना हर औरत रोती है; जिसे बेदर्द से हमदर्द बनाने की खातिर, तरह-तरह की मुसीबतें उठाती है। एक के बजाय कइयों का हमदर्द बन जाने पर, लाख टसुए बहाती है। उसके लिए बैजनाथ के यहां टिके रहने की वजह, सिर्फ़ कनकलता का दिलफ़रेब रुख़ नहीं था। बैजनाथ से वफ़ादारी भी नहीं थी। मोगरा ने बतलाया था, उनसे ख़फ़ा हो, एक बार, बड़े लाला की रसोई सम्भालने जा चुका था। बहुत बेआबरू हो कर लौटा था। अगर बैजनाथ की बर्बादी के पीछे किसी और का हाथ रहा होता तो शायद वहाँ न टिकता। पर बड़े लाला से उसकी ख़ास रंजिश थी। ऊपर से तंगहाली के दौर में, बिला मंहगे साज़ोसामान, बढ़िया खाना बना कर खिलाने में, वह ज़बरदस्त क़ामयाबी महसूस करता था, जैसे कोई क़िला फ़तह कर लिया हो। क़िला वही औरतजात का। बेसाज़ोसामान बढ़िया खाना बनाने में,ग़रीब परिवार की सब औरतें माहिर होती हैं। पर मर्द खाना तब बनाते हैं,जब बाक़ायदा खानसामा हों, यानी कोई रईस मालिक, सामान जुटा कर दे। बिन जाने रामदेब जानता था कि अब जाकर, वह ढंग से गृहस्थन हुआ था। इस मामले में अपने यहाँ मिर्च बड़े काम की चीज़ है। उसके भरोसे बेस्वाद से बेस्वाद सब्ज़ी, ज़ायकेदार बना कर पेश की जा सकती है; तुर्रा यह कि ज़्यादा खाई न जाए। बचत ही बचत है। क़िस्मत ने क्या पुरअसर मज़ाक किया था। जिस लाला की वजह से बैजनाथ बेसाज़ोसामान हुए, उन्हीं की बदौलत, रामदेब की ज़ायकेदार खिदमत मिली।

       कनकलता से राज़दारी का एक मोर्चा, रामदेब और पारबती ने सम्भाल रखा था तो दूसरा, खुद बैजनाथ ने। दुनियादारी का सलीक़ा अपना कर, तंगहाल न होने का पुख्ता सबूत, दरवाज़े पर रख छोड़ा था। यानी छोटे लाला की दी हडसन गाड़ी, बड़ों के हाथों पड़ने से बचा ली थी। जमा पूँजी लगा उसे खरीद, सफ़ेद हाथी की मानिन्द, दर पर खड़ा कर रखा था। पेट्रोल बचाने की खातिर, कह रखा था, इंजिन में कुछ खराबी है, जिसे ठीक होने में वक़्त लगेगा, क्योंकि पुर्जा अमरीका से आना है।

       क़िस्मत से जल्दी ही वह वक़्त आ गया, जब पुर्जा भेजने के बजाय, खुद अमरीका उनके दर पर आ पहुँचा। बात साफ़ करने के लिए इतना कहना काफ़ी है कि मैं, आज़ादी के पाँचेक बरस बाद की बात कर रही हूँ। 1952-53 का ज़माना रहा होगा। हमारे नायाब मुल्क में अकेले बैजनाथ जैन, दुविधा में नहीं रहते थे। यह वो वक़्त था, जब पूरा मुल्क़, दुविधा में रहने का इस क़दर आदी हो चुका था कि उसे क़ौमी जज़्बा बनाने पर आमादा था।

       उन दिनों पूरी दुनिया, दो खेमों में बँटी हुई थी। साम्यवादी खेमा और धुर पूँजीवादी खेमा। सर्द जंग के हालात में इस या उस खेमे में दाख़िला ज़रूरी था। तभी फ़ेबियन सोशलिज़्म का पाठ बख़ूबी घोटे, नये आज़ाद हुए मुल्क के हमारे पहले वज़ीरेआज़म ने, मौलिक भारतीय फ़लसफ़े की राह अपनायी। न इधर के, न उधर के। सियासी ज़ुबान में उसे एक तरफ़, ग़ैरमुतास्सिर हिकमत कहा गया तो दूसरी तरफ़, मिला जुला आर्थिक क़ायदा। असल मतलब दो हुए। एक तरफ़, सरकार ने इस्पात कारखाने से ले कर डबल रोटी बनाने तक का, हर मुमकिन कारोबार अपने कब्ज़े में कर लिया। दूसरी तरफ़, अमरीका से होड़ लेती, बड़ी-बड़ी बहुआयामी पन-बिजली योजनाओं पर काम शुरु कर दिया। अमरीका और सोवियत संघ, दोनों खेमों के सरदारों और उनके चेले-चाटें देशों की मदद से, बड़े-बड़े बाँध बनाए जाने लगे। पूँजीवाद और समाजवाद से अलग-थलग दुविधा से उपजी ज़बान में, उन्हें, नये युग के मंदिर, तीर्थ और धाम घोषित कर दिया गया। 

       वाह भई वाह, बैजनाथ बाबू ने सोचा, पाखण्ड, हमारा क़ौमी जज़्बा हमेशा से रहा है। पर इतनी धूमधाम से दुविधा को मूल्य बना कर, पहले क़ायम नहीं किया गया था। तब भी नहीं जब, पूरा मुल्क, हिंसा-अहिंसा के उसूलों के बीच त्रिशन्कु-सा झूल रहा था।

       अपनी कुदरती तबीयत की खासियत को क़ौमी वक़अत की तरह कायम होते देख, लाज़िमी था कि बैजनाथ,उसे भरपूर भुनाने में लगते। सो लगे और अपने दिमाग़ और ज़ुबान के नायाब तालमेल से, जल्दी ही हडसन के साथ, फ़ोर्ड और स्टूडीबेकर गाड़ियाँ पा लीं। साथ ही वतनपरस्त भी कहला लिये। सीधी सी बात है। मंदिर में काम करने वाला पुजारी हुआ, तीर्थ-धाम निबटवाने वाला हुआ पण्डा, तो वह आदमी क्या हुआ जो नया तीर्थ बनवा कर दे? साक्षात भगवान न? चलो न सही, मर्यादा पुरुषोत्तम तो हुआ ही। पुरुष उत्तम हो तो देशभक्त कैसे न होगा? 

       जब कोई इंसान अपने दिमाग़ और दूसरों के दिल के भरोसे, बड़ा काम कर गुज़रने की ठान लेता है तो विधाता नामी विदूषक, एकाध मज़ेदार इत्तिफ़ाक़ जुटा कर तमाशा देखता है कि, चेला कुछ कर पाएगा या नहीं। यही बैजनाथ के साथ हुआ। बेरोज़गारी के दिनों में, वे, अपना पुराना पर सलीके से सिला, नफ़ीस सूट पहन, शिकार की टोह में, पंचसितारा होटल के लाऊंज में बैठे रहते। सूट एक नहीं कई थे, एक से एक उम्दा। उनकी नफ़ासत के क्या कहने। आखिर वे छोटे लाला की उमरावजानी महफ़िलों के लिए बनवाए गए थे। दिल्ली के बेहतरीन दर्जियों से; जिन्हें दर्जी कहना उनके फ़न की तौहीन थी, इसलिए बराबर मास्टरजी कहा जाता रहा। अपनी तरफ़ से बैजनाथ ने, सोने पर इतना सुहागा किया था कि कोई पूछता तो कह देते, लंदन की बॉन्ड स्ट्रीट पर सिलवाए थे। यूँ वे कभी लंदन गए न थे। पर क़द-बुत गुलमोहर से भी दो क़दम आगे था। अंग्रेज़ी की जानकारी ही नहीं, तलफ़्फ़ुस भी आला था। आखिर वे आई.सी.एस बनते-बनते रह गए थे। आज़ादी की जंग भी लड़ चुके थे, भले जेल न गए हों। अपने वक़्त के अहिंसक नेताओं की तरह, सख्त अंग्रेज़ीदां थे।

       यह वह ज़माना था जब कोई सजा-संवरा मर्द, बिला खाने-पीने का ऑर्डर दिये, क़िताब हाथ में ले, पंचसितारा होटल के लाउंज में सिगरेट फूंकता, घंटों बैठा रह सकता था। क्या मजाल कि बैरा आ कर चाय-कॉफ़ी को पूछे। आज-सा बाज़ारू वक़्त नहीं था कि होटल के चप्पे-चप्पे पर दाम ठुके हों। आजकल की क्या कहें; सिगरेट तक पीने पर मनाही हो गई। पता नहीं, ज़बानदराज़ खुफ़िया किस्म के लोग मामला कैसे फ़िट करते हैं। तभी न, हर जगह एक अदद बाज़ारू औरत और मंहगे कमरे की ज़रूरत पड़ने लगी। भ्रष्टाचार बढ़ेगा नहीं तो क्या होगा? ऊपर से क़िताब पढ़ने का रिवाज जाता रहा। हाथ में न सिगरेट हो, न क़िताब तो फ़ुर्सत को मसरूफ़ियत का जामा कैसे पहनाया जाए? खासी मुश्किल हो जाती है। सौदेबाज़ी में, सिगरेट पीने वाला, न पीने वाले पर भारी पड़ता है। क़श खींचने में,राख़ झाड़ने में, राख़दानी में सिगरेट मसल कर बुझाने में जो वक़्त हासिल होता है, दूसरे को इंतज़ार में बिताना पड़ता है, लिहाज़ा घाटे में रहता है। आदमी कितना भी फ़ालतू हो, क़िताब के पन्ने पलटता, पन्ने पर निशां रख आज़िज़ी से उसे बन्द करता, ऊँचे रुतबे और दिमाग़ का दिखलाई देता है। क़िस्मत से बैजनाथ उस पुराने दिलदार वक़्त में रौनक अफ़रोज़ रहे, वरना इस कहानी का मज़मून कुछ और होता।

       एक दिन,आदत के मुताबिक,अशोका होटल के लाउंज में बैठे, निहायत बेसब्री से किताब के पन्ने से, नज़रें उठा बार-बार दरवाज़े की तरफ़ यूँ ताक रहे थे मानों अहम मुलाक़ाती का इंतज़ार हो। बीच-बीच में घड़ी देखना न भूलते थे। उठने को हो, दुबारा बैठना क़वायद का हिस्सा था। असर यह पड़ता कि उस शHस को ज़्यादा देर इन्तज़ार क़बूल नहीं।  

       तभी देखा, सामने की मेज़ पर बैठा अधेड़ अंग्रेज़, माचिस की तीली से सिगरेट जलाने में, ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लगा रहा है, दाएं हाथ में, पाँच के बजाय दो उंगलियां हैं, शायद इसलिए। वे आराम से उठे, उसके पास पहुँचे और अपने लाइटर से उसकी सिगरेट जला, बिला एक लफ़्ज़ बोले, अपनी जगह वापस आ गए। क़िताब खोली,पन्ना बरामद किया,बुकमार्क रखा,क़िताब बन्द की, घड़ी देखी,सिर झटका कि और इंतज़ार गवारा नहीं और ख़रामा-ख़रामा, दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगे। अंग्रेज़ की मेज़ के सामने से गुज़रे तो उसकी तरफ़ आँख उठा कर देखा तक नहीं। वही लपक कर आया, गर्मजोशी से शुक्रिया कहा। जी, थैंक्स नहीं, बाक़ायदा, साफ़ तल्लफ़ुज़ में शुक्रिया।  

       "अमूमन आप लाइटर से सिगरेट जलाते हैं।" बैजनाथ ने सवाल नहीं पूछा, बात कही।   

       "पता नहीं कहाँ खो गया।"

       "आपके लिए," उन्होने उसी ग़ैरमुतास्सिर अंदाज़ से लाइटर आगे बढ़ा दिया।  

       उसने हाथ आगे बढ़ाया, लाइटर लेने को नहीं, हाथ मिलाने के लिए। कहा,"मेरा नाम आर्मस्ट्राँग है।" और ओंठ टेढ़े कर, हँस दिया। बैजनाथ भी मुस्कराए, कहा,"ग्रेंड आइरनी।"

       "आपका मुलाक़ाती आया नहीं, मेरे साथ एक कॉफ़ी हो जाए।"

       बैजनाथ ने घड़ी देखी, कहा,"मुझे वक़्त की नापाबन्दी बर्दाश्त नहीं।"

       "मुझे भी। बैठें।"

       "ज़रूर, उनका वक़्त आपका हुआ।"

       "मैंने अपनी उंगलियाँ लड़ाई में गँवाईं,"उसने कहा,’पहले आर्म, स्ट्रांग ही था।"

       "अब भी होगा। उंगलियाँ, बाँह नहीं होतीं; पंजा भी नहीं। पंजा लड़ाएंगे?"

       "क्या!"

       "हाँ, दूसरा साबुत है न।"

       "ठीक है।" 

       पंजा लड़ाया गया, दोनों ने बायां हाथ इस्तेमाल किया। ज़ाहिर है, बैजनाथ ने आर्मस्ट्राँग को जीतने दिया।

       अगला जुमला जो उसने कहा, वह था, "मेरे साथ काम करना चाहेंगे? मैं रिहान्ड बाँध पर प्रोजेक्ट तैयार करवा रहा हूँ।"

       "आपकी कम्पनी…"

       "अमरीकन है। मुझे लिएज़ाँ के लिए रखा है।" 

       "ज़ाहिर है।"

       "किस तरह?"

       "एक,मैं पहले से जानता था,यह बाँध अमरीका के हिस्से आएगा। दूसरे,हिन्दुस्तान में लिएज़ाँ कहना, सॉरी, करना, अमरीकनों के बस का नहीं है। तीसरे, आपकी ज़ुबान से लगता है, आप हिन्दुस्तान की रग-रग से वाक़िफ़ हैं।"

       "हाँ, मेरी उर्दू-हिन्दी ठीक-ठाक है।"

       "अंग्रेज़ी भी।" 

       आर्मस्ट्रांग ने चौंक कर उनकी तरफ़ देखा, फिर मज़े से हँस दिया, कहा, "आपकी भी।"

       "इनायत आप लोगों की, सीखनी पड़ी।"

       "मैंने ईस्ट इन्डिया कम्पनी के लिए कभी काम नहीं किया।"

       "समझता हूँ।"

       "आदमी काफ़ी समझदार हैं आप।"

       "काम का भी। इश्क़ ने निकम्मा कर दिया ग़ालिब वरना हम भी आदमी थे काम के।"

       "हम भी सुनें दास्ताने इश्क।"

       बैजनाथ ने घड़ी देखी, कहा,"सॉरी, फिर कभी।"

       "मेरे सवाल का जवाब?"

       "सोच कर बतलाऊंगा, परसों ठीक रहेगा?"

       "हाँ, शाम छह बजे?"

       गर्मजोशी से हाथ मिला कर बैजनाथ विदा हुए। कच्ची गोटियाँ नहीं खेले थे, जानते थे, शाम छह बजे मिलने का मतलब क्या होता है। 

       यह भी कि उन्हें जवाब क्या देना है। पर हाँ को ना से शुरु करके, हाँ-ना के रास्ते गुज़ारते,रफ़्ता-रफ़्ता, मुँहज़बानी हाँ तक पहुँचाने का नाम ही कूटनीतिज्ञता है। सामने वाले को लगे, बन्दा मान गया तो काम बन जाएगा वरना हमेशा आधा-अधूरा रहेगा, पूरा कभी न होगा। उसे किसी हाल यह नहीं पता चलना चाहिए कि बन्दा माना बैठा है, सिर्फ़ मनवाये जाने का मज़ा लेना चाहता है। जानती हूँ, इस कला में औरतें, कुदरती तौर पर माहिर मानी जाती हैं। हज़ूर, मैं अदना लेखिका ही नहीं कह रही, दुनिया कहती आई है। अपनी तरफ़ से मैं यह कहना चाहती हूँ कि ज़्यादातर औरतें, अरसे तक बेवक़ूफ़ बनी रहीं, जो ऐसी जन्मजात ज़हानत, मर्दों को पटाने या परिवार को बाँटने में बरबाद करती रहीं। मंथरा हो या कैकई, सब कुटनी बनीं, कूटनीतिज्ञ नहीं। हद से हद कूटनितिज्ञों का मोहरा बन गईं या भाई लोगों की मॉल। क्या कहते हैं फ़्रांसीसी, फ़ैम फ़ैताल। दो-चार औरतें क़तार से बाहर ज़रूर रहीं। जैसे रज़िया सुल्तान, इंगलिस्तान की एलिज़ाबैथ प्रथम, इज्ऱाइल की गोल्डा मेयर और अपनी इंदिरा गान्धी। पर ज़्यादातर औरतें, मर्दों से पंजा भिड़ाने में वक़्त बरबाद करती रहीं। ठीक समझे, बन्धु, बैजनाथ में ज़नाना माद्दा कफ़ी था, आर्मस्ट्राँग में नहीं के बराबर। कहते हैं न, भारत बुनियादी तौर पर औरत है, देश मातृ भूमि है, पितृधरा नहीं। दुनिया उसने भी देखी थी पर जंग के मैदान में। मर्दों में सबसे भोला, शायद फ़ौजी ज़िन्दगी जिया मर्द होता है। ऐसे में बैजनाथ का काम बनना ही था।

       दो दिन बाद, शाम छह बजे मिले तो सूरज ढलने को था। शुरुआती सरदी के दिन थे, छब्बीस अक्तूबर, तारीख़ों का शौक़ रखते हों तो। 

       "सनडाउन," आर्मस्ट्राँग ने बैठते ही कहा,"क्या पिएंगे?"

       "पी कुछ भी लूंगा पर पीने के मेरे कुछ उसूल हैं। मुफ़्त की पीता नहीं, अपने पैसों से दूसरों को पिलाता नहीं।"

       "ग्रेट। अमरीकन आपकी साफ़गोई पसन्द करेंगे।"

       बैजनाथ ने अपने लिए देसी रम मँगवाई, कहा,"मैं इन्डियन ही पीता हूँ।"   

       "उसूल नम्बर दो,"आर्मस्ट्राँग यानी जिम ने अपने लिए स्कॉच व्हिस्की मँगवा कर कहा। वक़्त आ गया है कि मैं आपको उसका जन्म का नाम बतला दूँ।

       "और भी हैं। रफ़्ता-रफ़्ता पता चल जाएंगे।"

       "दस्तूरे आशिक़ी की तरह। चियर्स!"

       जिम का गिलास जल्दी खत्म हो गया। फिर भरा गया, फिर खत्म हुआ। फिर-फिर सिलसिला चला, आख़िर वह फ़ौजी था।

       "आप, तुम, बैज, यार ख़त्म करो,"उसने लटपटाती ज़बान से कहा। 

       बैजनाथ समझ गए, मौज़ूं वक़्त आ गया।

       "उसूल नम्बर तीन,"उन्होंने कहा,"मैं एक ही ड्रिंक लेता हूँ।"

       "कंजूस! हिन्दुस्तानी साले सब कंजूस होते हैं।"

       "अंग्रेज़ों से ज़्यादा नहीं। पर आपको मैं अपनी बीवी का भाई तजवीज़ करने को क़तई तैयार नहीं हूँ।"

       जिम ने पल भर उज़बक़ की तरह देखा फिर ठठा कर हँस दिया,बोला,"हमें कंजूस-मक्खीचूस की ही ज़रूरत है, जो हिन्दुस्तान की हरामी सरकार से हमें,कम-से-कम खर्चे पर कॉन्ट्राक्ट दिलवा सके।"

       "तभी आपने एक हरामी अमरीकन कम्पनी को चुना।"

       "क्यों माबदौलत आपको कम हरामी लगे?"

       "नहीं, ज़्यादा। आख़िर आप हरामियों के दलाल हैं।"

       "कहीं आप मेरी बेइज़्ज़ती तो नहीं कर रहे?"

       "बिल्कुल नहीं, तारीफ़ कर रहा हूँ। जात से मैं बनिया हूँ। जानता हूँ, दलाली से ज़्यादा हुनरमन्द और मुश्किल पेशा, दूसरा नहीं है। कहने को मुल्क की, दुनिया की तवारीख़, ब्राहमणों-क्षत्रियों ने बनाई है। पर हम-आप जानते है कि असल किरदार, बनियों ने निभाया। आप फ़ौजी हैं तो क्षत्रिय हुए। पर हिन्दुस्तान पर हुक़ूमत बनियों ने की। उनकी हुक़ूमत बरक़रार रखने में, इस देश के बनियों ने अहम भागीदारी की। चोर-चोर मौसेरे भाई। वी आर वन फ़ैमिली।"

       जिम बेसाख्ता हँस दिया,यह समझे बिना कि ख़ुद पर हँस रहा है या बैजनाथ के जुमले पर। कटी उंगलियों वाले हाथ से बैजनाथ का हाथ थाम लिया, बोला,"मैं आपको बैज बुला सकता हूँ?"

       "ज़रूर पर दुकेले में। औरों के सामने मिस्टर जैन कहें तो मुनासिब होगा।"

       "मतलब, मेरे साथ काम करेंगे?"

       "कल सुबह मिलें, दस बजे, तब बतलाऊँगा।"

       सुबह जिम हैंगओवर की सिरदर्दी नज़ाक़त में मुब्तिला था और बैजनाथ, तरोताज़ा। तनख़ा, गाड़ी, चपरासी, टाइपिस्ट वगैरह, की शर्तें मनवाने के बाद, वे उसकी कम्पनी के लिए, बतौर सलाहकार, काम करने के लिए तैयार हो गए। उसूल नम्बर चार,"मैं किसी कम्पनी में नौकरी नहीं करता।"

       इस तरह हमारे मुल्क के पहले और आख़िरी दूरंदेशी वज़ीरेआज़म की दुविधा नीति,बीसवीं सदी के नये तीर्थ बने बाँधों की मार्फ़त,बैजनाथ की ज़िन्दगी में बरक़त लाई। वही जिसे केन्ज़ ने बूम कहा था। उर्दू में मतलब उल्लू है तो वाजिब है। बूम वह वक़्त होता है, जब सावन के अन्धे को हरा ही हरा दीखता है और वही मरीचिका, मंदी लाती है। पुरानी औपनिवेशिक कौम का बाशिन्दा बिचौलिया बना, वह भी बातुक था।

       नया बिचौलिया बनिया नहीं,फ़ौजी था; यह एक आज़ाद देश के लिए फ़ख़्र की बात मानी जा सकती थी।

       कामनवैल्थ का मज़ाहिया ख़याल, और किसी के काम आया हो चाहे नहीं, बैजनाथ के ज़रूर आया। उसे लेकर अपने यहाँ क्या कम दुविधा रही। पुराने हुक्मरान को दोस्त मानें कि दुश्मन? जीत दुविधा की हुई यानी फ़ैसला यह लिया गया कि कोई फ़ैसला न लिया जाए। उनकी मलिका हमारी रहनुमा बनी रही, हम पहले की तरह अंग्रेज़दाँ और अंग्रेज़ीदाँ बने रहे।  फ़र्क़ सिर्फ़ इतना हुआ कि अंग्रेज़ी में अमरीकी जुड़ गई।

       भले अमरीका कामनवैल्थ का सदस्य न था पर ब्रितानिया सरकार का महाजन होने के नाते,भाई छोड़ चाचा था। सुना नहीं, अंकल सैंम! दुनिया-भर का चाचा, यानी पहरेदार। जिसका पैसा उसकी भैंस। जिसकी वैल्थ उसकी ताक़त। बाकी बन्दे कामन फ़ोक, आम जन! उसका चचापन हमारे मुल्क के वज़ीरेआज़म को इतना रास आया कि वे ख़ुद को, मुल्क का चाचा कहलवाने लगे। तमाम दुनिया के बड़े नहीं तो छोटे चाचू बनने के सपने देखने लगे। बाक़ी मुल्कों ने क्या ख़ूब भरमाया उन्हें।याद कीजिए, पचास के दशक में शायद कोई दिन ऐसा गया, जब हमारी सरज़मीं पर किसी नामी मुल्क़ का सरताज, हवाई जहाज़ से उतरा न।

       अमरीकी कम्पनी के सलाहाकार, जी हाँ वही दलाल, बनते ही बैजनाथ, आला शहरियो की फ़ैहरिस्त में आ गए। उस नाते, अनेको बार, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के कन्धे से कन्धा मिला कर, अमरीका,रूस,ब्रितेन ही नहीं, युगोस्लाविया, बुल्गारिया,इरान,कुवैत,साऊदी अरेबिया और जने किस-किस मुल्क के सरताजों की अगवानी में, दिल्ली हवाई अड्डे पर, क़तार में खड़े पाए गए।

       नये बने लोकतंत्रों को, नये तंत्र में लोक की बराबरी के नाम पर भरमा कर, मीठी नींद सुलाने की ख़ातिर, दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के फ़ौरन बाद, चचा सैम ने,अपनी चचाजानी सरपरस्ती का झण्डा फहराया। तमाम छोटे-मोटे गणतंत्र,उसे अपनी आज़ादी का पहरेदार और रहनुमा मान बैठे। रक़बे और आबादी की बिना पर, हिन्दुस्तान, किसी हिसाब से छोटा नहीं माना जा सकता था। पर जिस मुल्क और क़ौम को बुतपरस्ती से आगे बढ़, व्यक्ति पूजा की आदत पड़ चुकी हो, उसकी सारी आबादी सिमट कर एक हो जाए तो मुनासिब माना जाएगा। जिस मुल्क को एक का अकेला दिमाग़ चलाए, वह हुआ, एक का देश। और एक की गिनती, बच्चा भी जानता है, छोटी से छोटी है। 


       सबसे मीठी नींद सोई हमारी अंग्रेज़दाँ सरकार। इस हद तक कि पहले अपने आज़ाद मुल्क का गवर्नर जनरल और फ़ौज का सिपहसलार, अंग्रेज़ को बनाए रखा। फिर तर्क को आगे बढ़ाते हुए, कश्मीर में आगे बढ़ती फ़ौज को रुकने का हुक्म दे, चचा सैम से ज़्यादा चचा बने, अपने वज़ीरेआज़म ने मामला, यू.एन.ओ में दर्ज करवा दिया। शायर जोश मलीहाबादी ने उस वक़्त क्या ख़ूब कहा था, यू.एन.ओ, जिसमें यू.एस.ए का यू है बाक़ी सब नो-ही-नो। यह दीगर है कि बाद में वे पाकिस्तान रुख़सत हो गए। शायद सीधे वार करने में यक़ीन न रखते हों। या मसला वही भैंस का हो, जो वैल्थ दे, वह आक़ा।  

       मीठी नींद कोई नहीं सोया तो दुविधाचेता बैजनाथ। जब-जब अपना सफ़ेद शार्क स्किन का बन्द गले का कोट और काली पैन्ट पहन, हवाईअड्डे पर, किसी सदर से हाथ मिलाया, अपने आला शहरी होने पर और दुनिया का सिरमौर बतलाने वाले अपने नेतां पर, यक्सां शर्म आई। उनका रक्तचाप, अपने पिता के रक्तचाप की मशहूर उँचाइयाँ छू चला। शायद दिमाग़ जिसे उसूलन ग़लत मानता था,अपनी और कुनबे की खुशहाली बनाये रखने की ख़ातिर, उसे करते जाने से बड़ा तनाव, कोई नहीं हो सकता। शक्कर की बीमारी, छोटे लाला के इन्तक़ाल से पहले हो गई थी, आला शहरियत के पचास-साठ के दशक में, रक्तचाप ने भी पकड़ लिया।

       लो जी, हो गई ऐसी-तैसी एक गिलास शराब तमामशुद के बाँकपन की। चालीस साल में शक्कर की बीमारी हो जाए तो भला एक से ज़्यादा पी कर, जान पर अजाब कोई लाये क्यों?फिर भी ज़ब्त, इज़्ज़त की माँग करता है। भतेरे जिगर गँवाने पर चेतते हैं। ख़ैर पचास-साठ के दशक का विश्व नेताई सपना टूटने के बाद, बैजनाथ का दुविधा से सिंचा सब्ज़बाग़ टूटना ही था। टूटा।

       जिस सत्तर के दशक की आधी रात को मुल्क में, नई धरती पकड़ नेता की दुनियाबी समझ के चलते इमैरजैन्सी लगी, उसी के बीच, बैजनाथ दुविधा-मुक्त हुए।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

गूगलानुसार शब्दांकन

loading...