नामवर सिंह — मेरा जन्म एक छोटे किसान परिवार में हुआ (जीवन क्या जिया : 1 )


जब मैं बनारस में था तब भी मैंने नहीं जाना कि राशन की दुकान कौन सी है, सब्जी कहां मिलती है, कैसे घर का खर्च चलता है। सारा का सारा काम काशी करते थे जो हमारे साथ रहते थे।
Prof Namvar Singh with daughter Samiksha (Photo: Bharat Tiwari)

Jeevan kya Jiya - 1

Namvar Singh

जीवन क्या जिया! 

(आत्मकथा नामवर सिंह बक़लम ख़ुद का अंश)


कहने को तो मैं भी प्रेमचंद की तरह कह सकता हूं कि मेरा जीवन सरल सपाट है। उसमें न ऊंचे पहाड़ हैं न घाटियां हैं। वह समतल मैदान है। लेकिन औरों की तरह मैं भी जानता हूं कि प्रेमचंद का जीवन सरल सपाट नहीं था। अपने जीवन के बारे में भी मैं नहीं कह सकता कि यह सरल सपाट है। भले ही इसमें बड़े ऊंचे पहाड़ न हों, बड़ी गहरी घाटियां न हों। मैंने जिन्दगी में बहुत जोखिम न उठाये हों।

ब्रेख्त के एक नाटक गैलीलियो का एक वाक्य अकसर याद आता रहा है कि बाधाओं को देखते हुए दो बिन्दुओं के बीच की सबसे छोटी रेखा टेढ़ी ही होगी। मेरे जीवन की रेखा भी कहीं कहीं टेढ़ी हो गयी है। जहां टेढ़ी हुई है, उसका जिक्र करूंगा।

...मैं अपने गांव के बारे में कहना चाहता हूं, जहां मैं पैदा हुआ। 

उस पूरे जवार में उससे छोटा कोई दूसरा गांव नहीं है। मेरी बिरादरी यानि कि राजपूत पूरब दिशा में थे और कुछ लोग दक्षिण दिशा में बावली के किनारे। उस गांव के जो मूल निवासी थे, दक्षिण दिशा में रहते थे। उत्तर दिशा में हमीं लोगों के बीच के लोग थे। बाकी जो पश्चिमी इलाका था, मध्य भाग से लेकर पश्चिम तक वह आमतौर पर पिछड़ी जातियों का था। पूरा गांव चमारों की तीन बस्तियों से घिरा हुआ था। उस जमाने में वह ऊसर गांव था और उसमें दो ही चीजें पैदा हुई दिखायी पड़ती थींः एक ओर नागफनी के जंगल थे, दूसरी ओर बांसों के जंगल थे। बांस देखने में बड़ा सरल होता है लेकिन उसमें खोंचे लगाने वाली चीजें भी होती हैं। यह और बात है कि उसी से बांसुरी भी बनती है। अब नागफनी को लीजिए। उसमें कांटें होते हैं लेकिन उसमें फूल भी बड़े अच्छे खिलते हैं। सुंदर दिखते हैं लेकिन उनमें गंध नहीं होती है। हां फल भी उगते हैं जिन्हें तोड़ने पर उनमें से लाल रंग निकलता है। मैं यह कह रहा हूं कि मेरी जिन्दगी भी एक हद तक ऊसर है और एक हद तक उसमें उगने वाली नागफनी है जिसमें कांटे होते हैं और सीधे तड़ंगे बांस होते हैं। यदि प्रकृति कहीं न कहीं परिवेश को प्रभावित करती है तो शायद मेरे व्यक्तित्व को मेरे जीवन को उसने प्रभावित किया हो। वैसे यह अनुमान ही है। आज का लगाया हुआ अंदाजा है। उन दिनों तो ऐसा सोचता भी नहीं था।



इन दिनों की बहुत सी चीजें अब नहीं रहीं। 

उन दिनों ताड़ के बहुत सारे पेड़ थे, अब नहीं रहे। पूरे गांव के बीच में सामाजिक सांस्कृतिक जीवन का केन्द्र था विशाल बरगद का वृक्ष। उसकी बरोहें जमीन तक लटकी हुई थीं। वह वृक्ष नहीं है। गांव में पश्चिम की तरफ एक डीह बाबा थे, हर गांव का एक डीह होता है, उसकी मूर्ति नहीं होती है। पूरब की तरफ काली माई थीं। मेरे गांव की आबादी में आज खास बात यह मालूम होती है कि ब्राह्मण कोई नहीं था, और नाई धोबी पड़ोस के गांव से आते थे। हमारे गांव के पास गौरव की कोई चीज नहीं थी। छोटा सा ऊसर गांव। खपरैल और फूस के मकान। रहने वाले बहुत साधारण लोग। यह बात सन् 1926-27 की है। आज तो हमारे गांव में नहर है जिसमें साल भर पानी रहता है। पक्की सड़क बन गयी है, जिस पर मोटर चल सकती है और जो आसपास के कस्बों से गांव को जोड़ती है। आज प्राइमरी स्कूल भी है और बिजली भी है। अब तो अस्पताल भी बन रहा है। काम शुरू हो गया है। इस अस्पताल के लिए जमीन की जरूरत थी। मेरे कहने पर मेरे दोनों भइयों ने हमने पहले अपनी जमीन दी। फिर दूसरों से कहा, मेरे कहने पर उन्होंने बड़ी खुशी खुशी अपनी जमीन दी। यह इस इलाके का पहला अस्पताल होगा।

इस गांव में मेरा जन्म एक छोटे किसान परिवार में हुआ। 

कहने के लिए लोग जमींदार थे पर जो जमीन थी वह किसी काश्तकार के ही बराबर थी। मेरे बाबा, पितामह जिन्हें मैंने देखा नहीं सुना था। रामनाथ सिंह था उनका नाम। नितांत वीतराग आदमी। हमारी पाही की खेती करजौड़ा में होती थी, थोड़ी दूर पर। वहीं पर एक तालाब के किनारे वह दिन भर पड़े रहते थे। नहा धोकर पूजा पाठ करते। भैंस चराते थे। बड़े सरल। कम उम्र में उनका निधन हो गया। उनके तीन पुत्रों में मेरे पिता मझले थे ठाकुर नागर सिंह। पिताजी नहीं हैं। लगभग चौदह वर्ष उनको गुजरे हो गये। भवभूति के शब्दों में कहूं तो ‘जीवत्सु तातपादेषु ते हि नो दिवसा गतः’। उनके जीवित रहते हुए जो दिन बीते समय बीते वे अब चले गये। पिताजी न होते तो मैं आज जो कुछ हूं न होता। हमारे गांव में अकेले पढ़े लिखे मिडिल क्लास पास वही थे। वह प्राइमरी स्कूल के अध्यापक हो गये थे। वह मुझे भी प्राइमरी स्कूल का अध्यापक बनाना चाहते थे। उनकी इससे बड़ी महत्वाकांक्षा हो ही नहीं सकती थी। उनकी इच्छा के अनुरूप मैंने भी पढ़ाई के दौरान ही तय कर लिया था कि मैं शिक्षक बनूंगा। दरअसल शिक्षक बनने के अलावा मेरे पास अन्य कोई रास्ता भी नहीं था। इंजीनियर बन नहीं सकता था, डाक्टर बन नहीं सकता था। क्योंकि इनकी पढ़ाई के लिए यथोचित पैसे नहीं थे हमारे पास, साधन भी नहीं थे। धीरे धीरे लगा कि मेरी रुचियां और मेरी सीमाएं भी शायद वैसी नहीं हैं।

पिताजी चुप्पा, एकांतप्रिय और शाम को थोड़ा पूजा पाठ करने वाले थे। 

सुना है कि उन पर अपने पिता की कोई छाया पड़ी होगी कि मेरे जन्म से पहले वे साधु होने के लिए विन्ध्याचल की पहाड़ियों की तरफ निकल गये थे। मां ने बताया था कि वहां जंगल में पिता को कोई साधु मिला था। उसने कहा कि तुम कहां भटक रहे हो! तुमको तो कई पुत्र लिखे हुए हैं। तुम गृहस्थ होने के लिए बने हो। पिताजी लौट कर आ गये लेकिन आजीवन वह शाम को पूजा मनन करते थे और हनुमान चालीसा वगैरह का पाठ करते थे। वह अद्भुत अनुशासनप्रिय और घोर मर्यादावादी आदमी थे। जैसाकि गांव में तमाम तरह की बातें होती हैं जमीदारों के बारे में। हम लोग सुनते रहते थे। उन लोगों के बीच पिताजी की छवि एक चरित्रवान व्यक्ति की थी। इस चरित्र का बड़ा गहरा असर मेरे ऊपर पड़ा। पिताजी ईमानदार और स्वाभिमानी भी थे। इसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा। हमारे गांव के पास के ही ठाकुर अपरबल सिंह डिस्ट्रिक बोर्ड के चेयरमैन हो गये थे। वे जमींदार पार्टी के थे और कांग्रेस के विरोधी भी। वकील थे। बड़े प्रतापी आदमी। जबकि पिताजी की आस्था कांग्रेस में थी। 36-37 की बात होगी, अपरबल सिंह का हुक्म हुआ कि पिताजी कांग्रेस के खिलाफ वोट दें और गांव वालों से दिलवाएं। पिताजी ने ऐसा करने से मना कर दिया था। परिणाम यह हुआ कि उनका ट्रांसफर गांव से बहुत दूर जिले के दूसरे छोर पर कर दिया गया। कष्ट उठाया उन्होंने लेकिन झुके नहीं।

मां मेरी मां लम्बी, छरहरी थी। 

पिताजी जितने चुप्पा थे, मां उतनी ही मुखर थी। लोकगीतों को गाने की शौकीन। गांव में हर तरफ उसकी पूछ रहती थी। वही थी जो गा गाकर और गाते हुए रो रोकर बहुत सी कहानियां सुनाती थी। गांव की बहुत सी कहावतें तो उसी के मुंह से मालूम हुई हैं। वह पिताजी से पहले चली गयी। मैं अभागा हूं कि मां की मृत्यु हुई तो जोधपुर में था। काशी ने तार भेजा तो तार दिल्ली होते हुए जोधपुर गया। पिताजी की मृत्यु हुई तो मैं दिल्ली में था उनका मुंह भी नहीं देख सका। इस मामले में काशी भाग्यशाली है। अंतिम दिनों में मां की सेवा की और पिता की भी सेवा की। मैंने तो कोई जिम्मेदारी निभायी नहीं उन दोनों के प्रति लेकिन उन्होंने अपने आशीष का हाथ बराबर मेरे सिर पर रखा।

जब मैं जे.एन.यू. में था, एक बार पिताजी आये थे 

और बड़ी मुश्किल से तीन हफ्ते रहे। तीर्थयात्रा पर निकले थे वह। चारों धाम किया था उन्होंने। वह मुझसे कभी कुछ कहते नहीं थे। मैं उनके सामने सिर उठा कर बोलता भी नहीं था। हम भाइयों में काशी सबसे छोटे थे तो उन्हीं से ज्यादा बात करते थे। जे.एन.यू. आने पर रहते हुए उन्होंने केवल एक बात की। मेरा वजन थोड़ा बढ़ गया था पेट थोड़ा निकल आया था, तो पिताजी ने कहा, ”इस उमर में पेट निकलना ठीक नहीं है।“ यह भी उन्होंने जैसे हवा को सुना कर कहा था।


मेरी कोई बहन नहीं थी। 

सुना था कि बचपन में एक थी, मर गयी। हमारे जो दो चाचा थे, उनके भी कोई बेटी नहीं थी। यानि कि बहनविहीन हमारा पारिवारिक जीवन था। बहन के प्यार का सुख हम लोगों ने जाना नहीं। मुझे बहन के प्यार का अनुभव सरोज से मिला। सरोज मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र और मेरे लिए भी पितातुल्य कामता प्रसाद विद्यार्थी की बेटी थी। मैं सरोज को ही अपनी बहन मानता था। अभी वह इलाहाबाद में है। उसकी शादी जौनपुर के बाबू श्रीकृष्ण दास से हुई थी, जिन्होंने कथाकार मार्कण्डेय को अपने घर में जगह दी थी। मैं इलाहाबाद जाता था तो सरोज के घर पर ही ठहरता था। मुझको राखी बांधती थी। रहे भाई, तो अभी भी हमारा संयुक्त परिवार है। अपने को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे अनमोल दो भाई मिले। गांव में ही नहीं, आसपास के पूरे क्षेत्र में मिसाल दी जाती है हमारी। मुझे खुशी है कि मेरे दोनों भाई आज भी मेरे साथ हैं। मैं कहना चाहता हूं कि भाइयों का प्यार मैंने जाना। मेरे भाई अगर न होते, तो मेरे जैसा आदमी जो बनारस छोड़ कर जगह जगह घूमता रहा; दिल्ली आया, जोधपुर गया, सागर गया, फिर दिल्ली आया, परिवार कभी साथ नहीं रहा, कैसे कुछ कर पाता। जब मैं बनारस में था तब भी मैंने नहीं जाना कि राशन की दुकान कौन सी है, सब्जी कहां मिलती है, कैसे घर का खर्च चलता है। सारा का सारा काम काशी करते थे जो हमारे साथ रहते थे। हाई स्कूल करके गांव से आये थे काशी और सारी जिम्मेदारी ले ली थी। कभी कभी मुझे बहुत अफसोस होता है कि यदि काशी पर यह बोझ न होता तो वह और जाने क्या बन गये होते। लेकिन मैं तो लाचार था। मैं निश्चिन्त हो गया था काशी पर सब कुछ छोड़ करके। मां साथ रहती थी, मेरी पत्नी थी घर में। मेरा बेटा आ गया था, पिताजी भी आया करते थे गांव से, मझले भाई भी आते थे। उनका भी परिवार था। इन तमाम चीजों को बरसों तक काशी ने संभाला। इसीलिए काशी के लिए एक स्नेह तो अनुभव करता हूं लेकिन एक ऋण भी है जो बराबर महसूस करता रहा हूं। इसे कभी नहीं भूल सकता, हालांकि कभी कहा नहीं, कभी लिखा नहीं। 

यहां यह जिक्र करते मुझे खुशी होती है कि 

मैंने तो शिक्षक बनने का निश्चय किया ही था, काशी भी शिक्षक ही बने। और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जहां मैं लेक्चरर था और जहां से मैं निकाला गया था, उसी विश्वविद्यालय में मेरा छोटा भाई प्रोफेसर अध्यक्ष होकर बैठा। इस तरह पिताजी की परम्परा काशी में भी रही। बेटा इंजीनियर हुआ। पिताजी के पुण्य प्रताप से और काशी की सहायता से उसकी उसी दिशा में पढ़ाई हुई। मैंने सोचा था कि मेरी संतान में कोई तो ऐसा हो जो मेरे और काशी के लिखे हुए को पढ़ने और समझने वाला हो। संतोष है कि बेटी समीक्षा हिन्दी की अध्यापक बनी और दिल्ली के एक कालेज में लैक्चरार है। उसका लालन पालन काशी के परिवार में हुआ। इंटरमीडिएट तक वह वहीं पढ़ती रही। उसका नाम भी काशी ने ही रखा। लोग समझते हैं कि आलोचक की लड़की समीक्षा है तो मैंने यह नाम रखा होगा। यह नाम तो काशीनाथ सिंह कहानीकार ने रखा। वह भी पापा उन्हें ही कहती है। बचपन से उसने काशी को ही जाना। दरअसल मैं पारिवारिक आदमी बन ही नहीं सका। मेरे जीवन के चौदह वर्ष छात्रावासों में बीते। छात्रावासों में रहते एक उम्र ऐसी आती है जब परिवार की आवश्यकता पड़ती है। परिवार का सुख उस दृष्टि से मैंने नहीं जाना। उसके बाद भी कमोबेश यह बात लागू होती है। इसी कारण मेरे जीवन में कई कमियां आयी हैं। इस उम्र में पहुंचने पर अब मेरा बेटा, मेरी बहू दोनों अपने बच्चों के साथ कुछ वर्षों से मेरे साथ रह रहे हैं तो एक नया अनुभव हो रहा है। छोटेपन में अपने बेटे से जुड़ना चाहिए था, नहीं जुड़ा। अब बड़े होने के बाद जब कि उसके बेटे जवान हो चुके हैं और बेटी हाई स्कूल में पढ़ रही है, बेटा कालेज में और वह स्वयं पचास साल के आसपास है तो आज भी उसके साथ वह लगाव, वह सहजता नहीं बनी जो पिता पुत्र में होनी चाहिए। मैं आज भी काशी के परिवार के साथ अपने आपको अधिक सहज पाता हूं। मेरे बेटे बहू में कमी नहीं है, कमी मेरी है। मैं उनको कैसे समझाऊं कि इस उम्र में जब आदमी बूढ़ा पका हो गया हो उसका बदलना मुश्किल है। कोई पत्थर को घिस कर कैसे पानी बनाये। देख कर मुझे प्रसन्नता होती है कि जीवन में जो सुख मुझे नहीं मिला वह मेरे बेटे को मिला रहा है। एक हद तक वह सुख मेरे भाइयों को मिला। मेरी बेटी ने अपनी इच्छा से विवाह किया। बहुत अच्छी तरह है। सुखी है। समीक्षा की छोटी बच्ची है। उसको देख कर लगता है कि हमारी ही जिन्दगी का एक हिस्सा है जो वह जी रही हैं। कई बीमारियों बीच जो मैं बच गया तो शायद इसी सुखी जीवन को देख कर।

००००००००००००००००
Share on Google +
    Faceboook Comment
    Blogger Comment

1 comments :

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति आशापूर्णा देवी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

    ReplyDelete

osr5366