मध्यकालीन स्त्रियाँ: वो हँसी बहुत कुछ कहती थी — अनामिका


मध्यकालीन स्त्रियाँ: वो हँसी बहुत कुछ कहती थी  —  अनामिका

जिसे महायानी बौद्ध ‘म्यूचुअल पॅाजे़शन ऑफ टेन वर्लड्स’ कहते हैं, मध्यकालीन स्त्री की हँसी पर भी वह अवधारणा पूरी तरह लागू है

—  अनामिका

मध्यकालीन स्त्रियाँ: वो हँसी बहुत कुछ कहती थी

-  अनामिका
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चूँकि मध्यकाल को हम ईश्वर-केन्द्रित समाज मानते हैं, स्त्रियों के व्यंग्य-विनोद से उसका कोई सहज ताल-मेल बैठता नहीं दीखता - पश्चिम में तो बिल्कुल भी नहीं, क्योंकि बाइबिल के अनुसार हव्वा को पछतावे के आँसू रोने से फुर्सत नहीं होनी चाहिए और माँ मेरी को भी करुणास्नात मुस्कान से अधिक की इजाजत नहीं ! हमारे यहाँ पौराणिक काल की कुछ देवियाँ - दुर्गा, काली और सप्तमात्रिकाएँ अट्टहास करती हैं और कुछ मध्यकालीन पाठ उसकी विभीषिका दर्ज भी करते हैं, पर वह बुद्धि-वैभव से जनमा हास्यबोध न होकर, एक ऐसी घनघोर हँसी है जो रणक्षेत्रकीलित होने के कारण पुरुषोचित अधिक जान पड़ती है। इसलिए हम उसकी चर्चा न करते हुए उन पाठों पर आएँगे जहाँ पचास विभीषिकाओं से जूझती हुई कुछ बुद्धिमान स्त्रियाँ बेधक हँसी हँसती हैं - अपनी उत्कट जिजीविषा का प्रमाण देती हुई जिसका सम्बन्ध उत्तर-आधुनिक समय में फ्रांसीसी भाषा वैज्ञानिकों ने ‘जोसुआ’, push and joy of language 1 आदि से जोड़ा।

मध्यकालीन स्त्री-संतों की दास्तान थोड़ी अलग है, विशेषकर यूरोप में जिसके मध्यकाल का विस्तार हमारे मध्यकाल से थोड़ा ज्यादा है। ग्रीस और रोम के प्राचीन वैभव और पुनर्जागरणकालीन चतुर्दिक अभ्युदय के बीच काले नद की तरह बहता यूरोपीय मध्यकाल कई नए परिवर्तनों का वाहक भी था। महारानी एलिज़ाबेथ का समय पुनर्जागरणकाल कहलाता है किंतु उसके पहले की अवस्था भी घोर सुषुप्तावस्था न थी। बहुत सारी नई संस्थाएँ जग-बन रही थीं जो किसी-न-किसी रूप में अब तक हमारे बीच जीवित हैं - विश्वविद्यालय, कानून-संहिताएँ, रूमानी प्रेम, आधुनिक यूरोपीय भाषाएँ, राजनीतिक सीमाएँ, राष्ट्र-राज्य, राष्ट्रपिता, व्यापारी, शहर, बैंक, चेक, गोली-बारूद, कम्पास, बुक-कीपिंग और चश्मे - सब मध्ययुग का ही दाय हैं।

कविता के बारे में हम सभी जानते हैं कि प्रेम, सौन्दर्य, प्रकृति की महीनियों के अलावा धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक बर्ताव की महीनियों का भी ऐसा चुस्त ग्राफांकन वह करती चलती है जैसा कोई दस्तावेज नहीं कर पाता —  अनामिका

The Wife of Bath

चौथी शताब्दी से चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी तक फैला यूरोपीय मध्यकाल पुनर्जागरण के पहले का निद्रालस समाज नहीं था, इसका एक प्रमाण यह भी है कि थियोक्रेटस, सेंट जेरॉम, ओविड आदि द्वारा मध्यकाल के पहले रची गई कृतियों का भी सजग बंकिम उपयोग उपदेशों, आचार-संहिताओं, कहावतों, पाठ्यपुस्तकों, औषधिविज्ञान के ग्रंथों, संतकथाओं अैर रोमांसों में भी धड़ल्ले से हुआ मध्ययुग में - विशेषकर वहाँ जहाँ स्त्री-प्रसंग आता है, पर ‘हर फिक्र को धुएँ में उड़ाती’ हँसमुख, स्त्री चौदहवीं शती तक के अँगरेजी साहित्य में बस एक ही जगह दिखाई देती है - चासर के ‘वाइफ ऑफ बाथ’ में !2  42 वर्षीया यह बुद्धिमान और हँसमुख स्त्री एक सफल कपड़ा व्यापारी है, पहली शादी उसकी 12 वर्ष की उम्र में करा दी जाती है - पैंतालीस वर्ष के प्रौढ़ व्यक्ति से। विधवाओं को उन दिनों पति की सम्पत्ति में कोई हिस्सा मिलने का सवाल ही नहीं था, पर साम-दाम-दण्ड-भेद से वह अपने तीन-तीन हिंसक पतियों से सारी सम्पत्ति अपने नाम करा लेती हैं और फिर सारा संचित धन वार देती है अपने ताजातरीन 22 वर्षीय विद्यार्थी-पति पर! जब वह बच्चा पति उसपर रोब-गालिब करने लगता है और मार-कुटाई भी शुरू कर देता है तो बुद्धि-वैभव से दिया हुआ धन वापस लेकर उसको उसकी औकात याद दिला देने से भी नहीं चूकती। स्त्री-सम्बन्धी सारी रूढ़ियाँ तोड़ती हुई यह स्त्री कहीं से सुन्दर भी नहीं, उसके सामने के दो दाँत टूटे हुए हैं, पर कैण्टरबरी सराय की उस गप्प-गोष्ठी में जिस अकुण्ठ भाव से हँसती हुई वह अपनी रामकहानी सुनाती है, वह अपने-आप में चॅासर की महानता की एक ज्वलंत मिसाल है। चॅासर का युग जिजीविषा और यौन-भावना पम्प-अप करने वाले लैवेटरी टेल्स (अश्लील गाथाओं) का युग था। 100 वर्ष तक फ्रांस से, छूत की बीमारियों से, ब्लैक डेथ से जूझने वाला इंग्लैण्ड बहुत हद तक पुरुषविहीन हो चुका था ! ‘डीपॅापुलेशन’ या जनसंख्या ह्रास से जूझने वाले इस समाज में लिबाइडो जगाने वाले ‘लैवेटरी टेल्स’ एक तरह से युगधर्म का ही अनुपालन कर रहे थे। ऐसे में चॅासर ने यह हर फिक्र को धुएँ में उड़ाती औरत खड़ी की !

मध्यकाल की कुछ प्रमुख भाषाओं हिंदवी, अवधी और ब्रजभाषा की प्रमुख कृतियों के साक्ष्य से कुछ बातें सामने रखने के पहले दो-एक बातें भारतीय मध्यकाल की पृष्ठभूमि में इतिहासकारों के समझाए जो समझी हूँ, उनका सारांश प्रस्तुत करना चाहूँगी। इस्लाम शासकों को इफ्तिदार हुसैन सिद्दीकी ‘कल्चर इम्प्रिंटर्स’3 कहते हैं और यह बात स्वयंसिद्ध है: इस्लामी इमारतों, खानपान, ओढ़ना-बिछौना, तहजीब, अदब - सबके प्रभाव में जनजीवन और जनमन कितना समृद्ध हुआ, इसका खनकदार वर्णन ‘पद्मावत’ में मिलता है। अलबरूनी और अमीर खुसरो - जैसे लोगों की विरासत हमारी बौद्धिक और मानसिक जलवायु में ही नहीं, हमारी ज़बानों में भी सुहावनी तब्दीली ले आई।

कविता के बारे में हम सभी जानते हैं कि प्रेम, सौन्दर्य, प्रकृति की महीनियों के अलावा धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक बर्ताव की महीनियों का भी ऐसा चुस्त ग्राफांकन वह करती चलती है जैसा कोई दस्तावेज नहीं कर पाता। काल और स्थान की अवधारणा, बाज़ार, नगर, राज्यारोहण, युद्धारोहण, कसीदे, रंगमहल, सेना - इन सबके महीन परिवर्तन मध्ययुग की कुछ महान रचनाएँ दर्ज करती ही हैं, और उससे भी अधिक कुशलता से इशारे करती हैं स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों की राजनीति पर: कैसे, स्त्री के उन्मुक्त हास्य के संदर्भ में हम यही समझने की चेष्टा करेंगे !

घुमन्तू टेलीफोनों के इस इंटरनेटशासित, सततसंवादी युग में विरह एक ‘डेटेड’ (कालकवलित) अवधारणा तो है ही। टी.वी. स्क्रीन से लेकर चौराहों तक पर (हजार परेशानियों के बीच) मजबूती से हंस रही नई स्त्री के मन में एक खास तरह का कुतूहल जगता है मध्यकालीन नायिकाओं को ‘निसिदिन बरसत नैन हमारे’ की विरहाकुलता में कैद देखकर। वे सोचती हैं कि युद्ध में या रोजगार की तलाश में दूर देश गये (या जा बसे) पतियों/प्रेमियों की स्त्रियाँ दिन भर बैठकर रोने की फुर्सत कैसे पा सकती थीं भला। ठीक है, अनजान संकटों में घिरे प्रिय की चिंता होती होगी, पर बाकी जो इतने सारे काम छूटे रहते होंगे, लगातार रोते-कलपते रहने से वे काम निबटाने की ऊर्जा कहां से आती होगी। बाल-वृंद के पालन-पोषण से लेकर घर के बुजुर्गों की देखभाल, खेत-पथार, घर-गृहस्थी, अड़ोस-पड़ोस की सामाजिकताओं के चुस्त-संयोजन तक में जो बौद्धिक और आत्मिक ऊर्जाएँ व्यय होती हैं, उसके लिए तो दिमाग और भाषा चुस्त सजग होनी ही चाहिए; गोशाला, बाजार, रनिवास, हरम, कोप-भवन आदि कठिन जगहों में भी सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए उनकी बुद्धि का सजग, भाषा का पेंचदार और हंसमुख होना जरूरी है।

पढ़ाया-लिखाया पुरुषों को गया, तो लेखक भी वही हुए 

पढ़ाया-लिखाया पुरुषों को गया, तो लेखक भी वही हुए पर मध्ययुग के कुछ महान लेखकों: विद्यापति, जायसी, सूरदास और बिहारी अपने साहित्य में लोकजीवन का जो अंतरंग वर्णन करते हैं - उसमें कांतासम्मित उपदेश के बहाने या ‘भ्रमरगीत’ आदि में उत्कीर्ण बौद्धिक वादविवाद के सहारे स्त्रियों के आपसी बहनापे, हंसमुख बौद्धिकता और बचाव वृत्ति (सर्वाइवल तकनीक) के कुछ उदाहरण उनकी प्रमुख कृतियों में मिल ही जाते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि स्त्रियां (दूतिकाएं हों या नायिकाएं) बुद्धिमती, प्रज्ञावान, परोपकारी हंसमुख जीव होती हैं, सिर्फ एक सुंदर शरीर,  ‘एक लदा हुआ गर्भ’ या रोंदू-सा भीरू जन्तु नहीं।

हास्य की भी चार मुख्य जातियाँ-प्रजातियाँ पाई गई हैं - क्रुद्ध या क्रूर हँसी, जैसे रावण का अट्टहास; फीकी या उदास हँसी, जैसे नागमती की हँसी (अन्यासक्त पति की शर्मिन्दा  हँसी के प्रत्युत्तर में) नटखट हँसी जैसे प्रीतिकलह प्रसंग में बिहारी की नायिकाओं की या उद्धव महाराज से बतकुच्चन करते हुए ‘भ्रमरगीत’ की गोपिकाओं की, और चौथी प्रजाति, जो स्त्रियों के संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण है, वह ठहरी मनमोदक लूटती हुई एक स्वप्नलीन हँसी जहाँ नायिकाएँ मन-ही-मन मनचीते पुरुष से अपना दुख-सुख कह लेती हैं और मीठी चुहल भी कर लेती हैं। इसमें पारंगत दीखती हैं भक्त कवयित्रियाँ, घनानंद की नायिकाएँ और उससे भी पहले विद्यापति की।

इसके पहले कि मध्यकालीन क्लासिकों से इन हँसियों के उदाहरण ढूँढ़कर आपको हँसाने का कुछ इंतजाम करूँ, मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूँगी कि जिसे महायानी बौद्ध ‘म्यूचुअल पॅाजे़शन ऑफ टेन वर्लड्स’ कहते हैं, मध्यकालीन स्त्री की हँसी पर भी वह अवधारणा पूरी तरह लागू है। क्रोध, तृष्णा, पशुता, जीवप्रेम, करुणा, बोधिसत्त्व भाव, बुद्ध भाव आदि के दस अंतर्भुक्त मण्डलों के आपसी घाल-मेल से हमारे चित्त की नारकीय और स्वर्गिक अनुभूतियों का सीधा सम्बन्ध बौद्ध जैसे जोड़ते हैं, मैं जोड़ना चाहूँगी मध्यकालीन स्त्री की हँसी से जो किसी एक श्रेणी या जाति में पूरी तरह फिट न होकर, तरह-तरह के विसंवादी भावों के घालमेल से बनी है। जिन चार लोकों या जातियों की चर्चा मैंने ऊपर की, उनमें पहली कोटि की हँसी यानी अट्टहास स्त्री-प्रसंग में विरले ही मिलता है, बाकी जो तीन लो कोटियाँ हैं - उदासी, व्यंग्य-विनोद और तृप्ति - इनका पारस्परिक घाल-मेल मध्यकालीन नायिकाओं की हँसी में आषाढ़ के बादलों के प्रथम नाद-सा सुनाई देता है।

अलग-अलग पाठों से मध्यकालीन नायिकाओं की सतरंगी हँसी के जो उदाहरण मैंने चुने हैं, पहले उनका एक कोलाज सामने रखती हूँ। ये उदाहरण मैंने कालक्रम से सजाए हैं ताकि काल के निस्सीम जल में इनके उत्तरोत्तर प्रवाह का छंद आँक सकूँ और यह भी समझ सकूँ कि निराला ने आगे चलकर जिस हँसी का इतना मारक ब्योरा अपनी कविता में दिया, उनसे इनकी दूरी या नजदीकी कितनी है -

‘वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी
देती थी सबको दाँव, बंधु !
बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु,
पूछेगा सारा गाँव बंधु !’4

सारे गाँव के पूछने की चिंता हँसी में उड़ाते हुए हम जिन स्मित-प्रसंगों के तटपर अपने नाव बाँधने का यत्न कर रहे हैं, उनमें पहला तट ठहरेगा विद्यापति का, फिर जायसी और सूरदास का, अंत में घनानंद का ! विद्यापति की नायिका तो पिता से भी मजाक कर लेती है ! निर्धन हैं पिता, विवाह-लायक पैसे नहीं, और बेटी है कि बड़ी हुई चली जाती है, अब हो तो क्या हो ! विवाह की औपचारिकता तो निभानी ही है ! पहले सोचते हैं कि पड़ोसी की तरह पीपल के पेड़ से ही बेटी ब्याह दें ! उसके बाद डेढ़ बरस का एक सुयोग्य वर मिल जाता है और हो जाता है विवाह संपन्न, ... कुछ दिन अपने बालक-पति से चुरिया-नुकिया खेलती है, फिर हँसकर कहती है कि चलें, माघ का मेला देखने चलें -

‘पिया मोर बालक, हम तरुनी,
पिया लेली गोदक, चलली बजार !’5

आगे के पद में वह बालक पति को ही ‘भ्रमरगीत’ का भँवरा बनाकर कहती है कि नाना से कहूँगी कि तुम्हारा पेट भरने को एक गैया भी भेज दें, पेट भरेगा, तभी तो जल्दी-जल्दी बड़े होंगे - मुझसे बातें करने - लायक !

इससे मार्मिक हँसी का उदाहरण साहित्य में दुर्लभ है। यह एक तरह ‘ड्रैमेटिक मोनोलोग’ है ! ब्राउनिंग ने बहुतेरे ऐसे एकालाप लिखे हैं। इन नाटकीय एकालापों की केन्द्रीय विशेषता यह होती है कि यहाँ कहने को दो लोग होते हैं पर दूसरा कुछ भी नहीं बोलता ! डेढ़ बरस का पति बोले भी तो क्या ! इसी के समानांतर एक भोजपुरी लोकगीत की कुछ पंक्तियाँ रखी जा सकती हैं जिसमें पति बच्चा है, इस बात का फायदा उठाते हुए ससुर ही नई दुल्हन को अरहर के खेत से गुजार कर ले जाते हैं ! ‘गीतगोविन्दं’ में तो कृष्ण की प्रणय केलि से राधा के घुँघरू बजते हैं, यहाँ कंसनुमा ससुर के आरोपित प्रणय की मार से अरहर की पकी हुई बालियाँ घुँघरू-सी बज जाती हैं: ‘रहरिया में बाजे घुँघरू’ और इस घुँघरू की हँसी में भिंची रुलाई की गंध बसी है।

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जायसी से जो हँसी मैंने चुनी है, वह नागमती की है, उस नागमती की जो साँवली-सलोनी विरहिनी है। पूरे बारह मौसमों की मार उसने पलंग के पाटे पर एक करवट लेटकर काटी। सबसे मुश्किल से काटी बरसात क्योंकि व्यावहारिक कारणों से भी बरसात बहुत दूभर होती है ! आवागमन ठप्प पड़ गया है, न पथिक आते हैं, न पंछी, कहीं से संदेश नहीं आता, सब अपने घरों में सिमटे पड़े हैं, बूढ़ी सास का प्रसंग तो आता है, पर वे भी घर के किसी कोने में औंधी लेटी होंगी, दोनों साथ नहीं लेटीं, छप्पर टपक रहा है; जिनके पति साथ हैं, वे साथ मिलकर छप्पर छवा रहे हैं, नागमती अपने में डूबी है -

हिय हिंडोल जस डोलै मोरी। बिरह झुलावै देइ झँकोरी !
(हृदय ऐसा हिंडोला है जिसको झकोरने वाला कोई और नहीं, सिर्फ विरह है)

बाट असूझ अथाह गँभीरा ! जिए बाउर भा भवै भँमीरा।6
(पानी लगने के कारण मार्ग असूझ, अथाह और गम्भीर हो गये हैं, जी उनमे बावली भँमीरी होकर चक्कर लगा रहा है !)

अंत में पति संदेश पाकर आया भी तो दूसरी पत्नी के साथ ! मान में वह मुख फेर लेती है तो रत्नसेन उसे मनाता हुआ एक लजाई हँसी हँसता है, नागमती भी आँसुओं से रुँधी हुई फीकी हँसी हँसती है -

काह हँससि तूँ मोसौं कियेउ जो और सौ नेहु।
तोहि मुख चमकै बीजुरी मोहि मुख बरसै मेहु।।7

उलाहना, तंज, मान ... और इन सबके बीच बिजली-सी चमकती हुई विनोद-वृत्ति, जीवंत विट् का ऐसा उदाहरण है यह जो मेटाफिजिकल कवि जॉन डन के टक्कर का जान पड़ता है - प्रेम तुम्हें और किसी से है, देखकर मुझे हँस रहे हो, मेरे चेहरे पर मेघ बरसते हैं, क्या इसके ही प्रत्युत्तर में तुम्हारी यह हँसी बिजली-सी दमक रही है ? अन्यार्थ यह कि विषम ही सही, पर बादल बिजली की जोड़ी टूटने वाली नहीं !

इसके पहले सिंहलद्वीप के शयनकक्ष में रत्नसेन से पद्मावती प्रीति-कलह प्रसंग में जो निरंतर वाद-विवाद करती है, उसमें भी स्त्री बुद्धिमत्ता के कई प्रसंग आते हैं - सच्चे और झूठे प्रेम के कई उदाहरण देती हुई वह चौके-चूल्हे, रंगरेज, पनवाड़ी - सबके घर से उदाहरण लाती है - ”प्रेमी में कितने ही गुण क्यों न हों, जबतक वह चूने के भाँति चूरा-चूरा नहीं कर लेता अपना अहंकार, उसके प्रेम में रंग उसी प्रकार नहीं आता जिस प्रकार सुपारी-कत्थे से भरे पान में चूने के बिना रंग लाना असम्भव है:

पान सुपारी खेरे दुहुँ मेरे करै चक चून !
तब लगिरंग न राचै जब लबि होइ न चून।।8

बहुत देर तक दोनों ज्ञान-विज्ञान बाँटते हैं - मगर भारी-भरकम पंडिताऊ सुर में नहीं, हँसी-मजाक के सरस प्रसंग में ... पहले मन-मस्तिष्क आपस में दोस्ती करते हैं, तब शरीर की बारी आती है। कहीं कोई जल्दी नहीं मचती, और परम-प्रेम के क्षण में भी चौका-चूल्हा, दीन-दुनिया नहीं छूटती, ऐसा सर्वसमावेशी प्रेम इनका है, भावों की शुद्धता की रुमानी धारणा से बिल्कुल अछूता।

जायसी इतने महान कवि हैं कि उनकी शान के खिलाफ बोलने की इच्छा नहीं होती, इसलिए सारा दोष मध्यकाल पर ही डालती हुई कहती हूँ

आधुनिक पाठक का रस-भंग होता है, उसको हँसी आती है उस प्रसंग पर जहाँ पद्मावती और नागमती - जैसी श्रेष्ठ स्त्रियों को दो पहलवानों की तरह जायसी ने आपस में भिड़ा दिया है ! दोनों अपनी श्रेष्ठता का उद्घोष करती हुई बड़े-बड़े बोल बोलती हैं, साधारण सौतों की तरह आपसी मारपीट पर उतारू हो जाती हैं और तब आता है रत्नसेन श्रेष्ठतर बनकर उन्हें अलगाने ! जायसी इतने महान कवि हैं कि उनकी शान के खिलाफ बोलने की इच्छा नहीं होती, इसलिए सारा दोष मध्यकाल पर ही डालती हुई कहती हूँ कि यह मध्यकालीन दृष्टि की ही सीमा है कि वह स्त्रियों के आपसी टकराव के क्षण का शब्दांकन हास्यास्पद स्वर में ठीक वैसे ही करता है जैसे लोटन कबूतरों को लड़ाकर नवाब ताली बजाते थे। मैं क्या कहने की कोशिश कर रही हूँ, साफ हो जाएगा जब इस पूरे प्रसंग को हल्के से लिंग-विपर्यय के साथ पढ़ें - कल्पना करें कि पद्मावती विवाहिता स्त्री है और रत्नसेन अविवाहित कुमार ! लाख कष्ट सह कर, पचपन आध्यात्मिक उठा-पटक के बाद पद्मावती रत्नसेन को ब्याह लाती है, जहाँ उसका सामना उसके पहले पति से होता है, दोनों में भिड़ंत भी होती है; अब प्रश्न यह है कि उस भिड़ंत में क्या पद्मावती की स्थिति ऐसी होगी कि वह दोनों को समझा-बुझाकर, पुचकार कर अलग कर दे और दोनों का मन रखने को दो तरह की बातें कहे।

यह प्रसंग राधाकृष्ण का लिंगविपर्यय करके भी उठाया जा सकता है: राधा अकेली वंशीधर से लेकर मुरलीधर, गीतावाचक, रासरचौया आदि मुद्राओं में और दुनिया-भर के गोप उनसे ऐसे ही अनुरक्त जैसे परमात्मा से आत्मा ! जायसी ने यह क्रांतिकारी काम किया कि परमात्मा के बाने में पद्मावती आई, एक पद्मिनी स्त्री, पर एकनिष्ठता और सतीत्व का आग्रह फिर भी उसी के लिए, सिर्फ उसके लिए।

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यह प्रसंग यहीं छोड़कर मैं मान-मनुहार और उदासी-भरी उस हँसी के पास आती हूँ जिसमें व्यंग्य-विनोद और ज्ञानविदग्ध बुद्धिमत्ता के कई नटखट झकोरे लेकर स्त्री-भाषा अपने मूल स्वरूप में प्रकट होती है यानी कि पूरी बेबाकी में ! उद्धव से वाद-विवाद करती हुई ब्रजबालाएँ ऐसा तेज दिखाती हैं जैसा वाद-विवाद की ट्रॉफी जीतने वाली नई स्त्रियाँ भी क्या दिखाएँगी - दो प्रसंग सामने हैं; पहले में तो वे अपना मजाक खुद ही उड़ाती हैं कि बकरी के मुँह में कुम्हेड़ा कैसे समाए भला, हम ठहरीं बेचारी बकरियाँ, तुम्हारा निर्गुण प्रेम बेडौल कुम्हड़ा !

”राजपंथ तैं टारि बतावत, ऊजर कुचल कुपैड़ो।
सूरदास सो समाइ कहाँ लौं, छेरी बदन कुम्हैड़ो !“9

जो स्वयं पर नहीं हँस सकता, उसे किसी और पर हँसने का नैतिक अधिकार भी नहीं। दुख में डूबी हैं बेचारी, फिर भी अतिथि-सत्कार तो करना है, सो वे भँवरे को बीच में रखकर ही कुछ उपालंभ देती हैं, यह नहीं कहतीं कि तुम हास्यास्पद बातें कह रहे हो, कहती हैं कि तुम अटपटी बातें कह रहे हो हमपर तरस खाकर कि हम इसी बहाने हँस दें, ‘मुक्ति’ का माल जो माथे पर रखकर बेचने निकले हो तो इसका खरीदार ही कहाँ है - ”धरे सीस घर-घर डोलत हौ“, थक जाओगे, भैया, विश्राम करो, जल मथकर मक्खन निकालने की कोशिश बेकार है; और ठीक से देखो तो हम ही योगिनियाँ ही हैं - दर्शन की खातिर खुली आँखें ही भिक्षापात्र हैं हमारा, हरिचन्दन ही हमारा भस्म, गाय हाँकने वाली बेंत ही हमारी सोटी - इसी से हम दुख के कुत्ते भगाती हैं - ‘करतल बेंत डर दंड डरत ना, सुनत स्वान दुख धावत।’

यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि गोपिकाएँ लगातार ‘हम’ की भाषा बोलती हैं, ‘मैं’ की भाषा नहीं ! उनकी एक सामूहिक पहचान है, कोई वैयक्तिक पहचान नहीं। वे प्रतिनिधित्व की भाषा नहीं बोलतीं। और सबके चित्त की दशा ही नहीं, सोच की दिशा भी एक है। वे अपनी पीड़ा से उबरना भी नहीं चाहतीं - ‘हजरते दाग़ जहाँ बैठ गये, बैठ गये!’ नहीं बदलनी हमें अपनी दिशा, नहीं बदलना अपना मार्ग, यह अहंकार नहीं है ! अहंकार चूरा-चूरा हो गया होगा तभी तो प्रेम ही यह दशा आई होगी कि जित देखौं तित लाल ! अहंकार नहीं है, यह दृढ़ता है, दृढ़ता जो गहरी आश्वस्ति और समर्पण से निकली है, तकलीफ की इन्तेहां है, फिर भी हँसना नहीं भूलतीं ! आपसी ईर्ष्या-द्वेष से वे बची हुई हैं, पर शहरी बाला कुब्जा का अन्यीकरण करती हुई वे यह भी सिद्ध कर देती हैं कि सम्बन्धों की राजनीति से पूरी तरह वे अछूती भी नहीं। सामूहिक इयत्ता का प्रेशर-ग्रुप के रूप में इस्तेमाल नहीं करतीं, चेला मूड़ने में या अपनी बात मनवाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं, पर तर्क पद्धति और विश्लेषण के सारे औजार इनके इतने ही दुरुस्त हैं जितने किसी आधुनिक स्त्री के हो सकते हैं। यह बात अलग है कि आधुनिक सांसदों, वकीलों, बौद्धिकों की तरह अपना पक्ष सामने रखते और दूसरे का पक्ष काटते वे किसी कटुता का शिकार नहीं होतीं, मनहर हँसी हँसकर अपना तर्क सामने रखने की यह कला आधुनिक स्त्री-रचनाकारों ने भी अपनाई मगर बहुत बाद में!

मध्यकालीन स्त्रियाँ काफी सांसत में रहती थीं। कहने की जरूरत नहीं कि एक युद्धकातर, विस्थापनमूलक समाज में जहाँ पुरुष भी थका-हारा, कुंठाओं में डूबा, अस्त-व्यस्त और पस्त था, स्त्रियों के कांतासम्मित उपदेशों का खाक असर होता होगा उसपर ! जैसे आज के बेरोजगार युवक ऐडहॉक नौकरियाँ करते हुए ऐडहॉक रिश्ते ही बना पाते हैं - हरी घास पर क्षण-भर - मनसबदारी आदि से परेशान काश्तकार और राज्याश्रय में भी निश्चिंत न रह पाने वाले कवि-कलाकार (और सिपाही) स्त्रियों को खुंदक और खुजली मिटाने वाली कठपुतली के सिवा भला क्या समझते होंगे ! ऊपर से रोजगार की तलाश में दर-दर भटकने की मजबूरियाँ - ‘परदेसी पिया’ वाली श्रेणी और दुरूह हो गई थी, वियोग अकेला करता था, पर संयोग ही कौन-सा सुख देता था भला, इसीलिए शायद बहनापे की भावना सुदृढ़ हुई, जिसका ‘मोनोलिथ’ के रूप में विकास ‘सूरसागर’ दिखाता है।

मध्यकालीन कवयित्रियाँ और रीतिकालीन नायिकाओं में भी पद्मिनी-हस्तिनी-चित्रिणी-गणिका आदि से लेकर कुट्टिनी, दूतिनी आदि नायिकाएँ भी हजार दुखों के बीच खुलकर हँसती हैं, यह उनकी ताकत है ! मीरा जैसी पुरमजाक स्त्री भी आपको शायद ही मिले जो पुरुषों को पर्दा कर लेने का निर्देश दे डालती हैं - ‘अपने मुख ते पर्दा करले, मैं अबला बौरानी !’10 घनानन्द की नायिका कृष्ण का हिसाब-किताब दुरुस्त कर देने से बाज नहीं आती - ‘तुम कौन धों पाटी पढ़ै हो लला/मन लेहुँ पै देहुँ छटाँक नहीं !’11

कहने की गरज यह कि सम्बलन और सर्वाइवल की एक आजमाई हुई तकनीक के रूप में हँसी का प्रयोग मध्यकालीन साहित्य में भरपूर हुआ, पर एक सिद्धांत के रूप में उसका कीलन अब जाकर हो पाया है - ‘द लाफ ऑफ मेड्यूसा’ आदि में ! इसी अर्थ में साहित्यिक अग्रकथन सामाजिक सैद्धांतिकी के ‘बड़े भाई साहब’ हैं शायद।

पार्थ चैटजी, तापती गुहा धकुर्त्ता और बोधिसत्त्व कर द्वारा सम्पादित सद्यःप्रकाशित 'New Cutural Histories of India : Materiality and Practices' में फ्रांसिस्का ओरसिनी का जो लेख है, 'For a Multilingual Literary History: North India in the Long Fifteenth Century' - उसकी मूल स्थापनाओं के आलोक में यदि हम मध्यकालीन स्त्रियों की हँसी एक विशृंखल पाठ की तरह विरचित करें तो ऐसा जान पड़ेगा कि मैथिली, ब्रज और अवधी - इन तीन महानदों के तट पर समन्वित रूप से उभर रही जो नहीं भाषिक संस्कृति थी, उसमें किसी-किसी पाठ को (तरह-तरह की श्रोता-मण्डलियों और हस्तलिपि - नकल की कई आवृत्तियों से गुजरते हुए) कई तरह के प्रभाव, आलोड़न, दोहराव और किंचित विकृतियाँ आत्मसात करने होते थे। सर्वग्राह्यता एक मिथक है और प्रशासन, व्यापार और सेना - जैसे गैर-साहित्यिक प्रक्षेत्रों का हस्तक्षेप इसकी रहस्यमयता और दुर्बोधता और बढ़ा भी देता है। इसी से उस ‘अपोरिया’, उस अभेद्य ग्रंथि की सृष्टि होती है, मध्यकालीन नायिकाओं की हँसी से लेकर मोनालिसा की मुस्कान तक जो कई-कई पाठों का मुहताज बनी रहे। मौखिक पारायण और अभिमंचन द्वारा भी अर्थ-संकोच और अर्थ-विस्तार की कई परतें हर पाठ पर चस्पां होती है ! वितरण-प्रसारण के अलग-अलग भौतिक संदर्भों से आलोड़ित-चूर्णित मध्ययुगीन पाठ उन हजार परिवर्तनों का साक्षी भी होता है जिसे ओरियाना  ßslippageÞ  और  ßrefigurationÞ के हजार घूर्णनों से जोड़ती हैं। पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के जैन, हिंदू, मुस्लिम संभ्रांतों के बीच उनके तरह-तरह के पंथों-सम्प्रदायों के बीच इन मध्यकालीन नायिकाओं की व्यंजक हँसी कैसे-कैसे पढ़ी गई होगी, इसका ब्योरा देना कठिन है, मगर आज के दिन बँधी हुई पुस्तकों के रूप में ये जैसे हमारे सामने आई हैं, उसे हम उसकी मैटेरिएलिटी में ऐसे पढ़ सकते हैं ! समाज द्वारा बहिष्कृत-प्रताड़ित चार मध्यकालीन कवियों ने स्त्री की हँसी को बचाव-वृत्ति रेखांकित करने वाले एक औजार के रूप में उभारा, और ध्यातव्य यह है कि चारों-के-चारों स्वयं वंचना और अधूरेपन की पीड़ा भोगकर ऊँचे उठे, तभी उनकी हमदर्दी का कद इतना बढ़ा - जायसी के एक आँख नहीं थी, सूरदास की दोनों आँखें न थीं, विद्यापति विस्थापन की पीड़ा झेलने वाले अज्ञातवासी हो गये थे उन दिनों, और घनानंद को भयावह राजकोप झेलना पड़ा था ! खग जाने खग की ही पीड़ा - यह बात चरितार्थ हुई थी, और तभी उन्होंने विवर्ण हँसी का मर्म पहचाना था।

पर उससे भी महत्त्वपूर्ण बात शायद यह है कि संस्कृत-फारसी में लिखी हुई रचनाएँ ये नहीं थी, तरह-तरह के मठों, सूफी सिलसिलों और खानखाओं द्वारा इनकी प्रतिलिपियाँ तैयार हुई थीं, सारे पाठ पैलिम्सेस्ट का क्लासिकल उदाहरण थे, पर कहीं स्त्रियों की हँसी सम्पादित नहीं हुई ! किसी महफिल या सभा ने इसपर अपनी आपत्ति दर्ज नहीं की, तो क्या जीवन की कठिनतम बिडम्बनाओं के बीच चमकने वाली - मध्यकालीन नायिकाओं की यह हँसी उनके आसुओं से आवृत्त उस मध्यकालीन जीवन की हँसी थी जिसकी अभ्यर्थना में ओरियाना कहती हैं: "Specially for a richly fluid century like the fifteenth century in north India, literary texts are often the only way we have to write social history, to write individual and groups, their self - representation and worldview with the picture, which is otherwise a hopelessly empty and schematic one of court and people, rulers and dynastic, Muslims and Hindus, of course men, and hardly any women  at all.”12

 'स्त्री विमर्श का लोकपक्ष'
महिलाओं के अधिकार पर संघर्षशील लेखिका, कवयित्री अनामिका ने स्त्री-विमर्श पर हिन्दी भाषा में पहली शोधपूर्ण पुस्तक 'स्त्री-विमर्श का लोकपक्ष' प्रस्तुत की है । पुस्तक हर वर्ग, नस्ल, आयु या जाति की स्त्री के सामाजिक, व्यक्तिगत व राजनीतिक त्रिकोण पर प्रकाश डालती है । पुस्तक स्त्री-विमर्श पर वर्तमान काल में उपलब्ध साहित्य से इसलिए अलग है क्योंकि न तो यह पूर्ण रूप से पाश्चात्य परम्परा के बौद्धिक विमर्शों पर केन्द्रित है और न ही समाज में स्त्री की दुर्दशा का ब्योरा भर देती है । बल्कि यह इन दोनों तरह के स्त्री-वैमर्शिक साहित्य को जोड़ती है, यानी इसमें स्त्री-विमर्श की वर्तमान परिस्थितियों पर बोद्धिक रूप से तर्कपूर्ण चर्चा है ।

संदर्भ
1. सिक्सू, द लॉफ ऑफ द मेड्यूसा, माक्र्स ऐंड कूविरो, (सं.) न्यू फ्रेंच फेमिनिज्म, पैरिस।
2. चॅासर, कैंटरवरी टेल्स, द वाइफ ऑफ बाथ, बेंटले पे्रस, यू.के.।
3. इफ्तिदार हुसैन, मेडीवल इंण्डिया, एसेज इन इण्टेलेक्चुअल थाॅट ऐंड कल्चर, वॉल्यूम वन, मनोहर, दिल्ली।
4. निराला, रचनावली, नंदकिशोर नवल (सं.), राजकमल, दिल्ली।
5. विद्यापति, विद्यापति पदावली के आकर - स्रोत, प्रमोद कुमार सिंह, बिहार ग्रंथ कुटीर, पटना।
6. जायसी, पदमावत, डॉ. माता प्रसाद गुप्त (सम्पादित) साहित्य भवन, वाराणसी, पृ. 337
7. वही, पृ. 401
8. वही, पृ. 307
9. सूरदास, सूरसागर, डॉ. देवेन्द्र आर्य, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, पद 759
10. मीराँबाई, परशुराम चतुर्वेदी, साहित्य भण्डार, इलाहाबाद।
11. घनानन्द, मध्यकालीन कविता, श्यानन्दन किशोर, बिहार ग्रंथ कुटीर, पटना।
12. फ्रांसिस्का ओरसिनी, फॉर अ मल्टीलिंगुअल लिटररी हिस्ट्री: नार्थ इण्डिया इन द लॉन्ग फिफ्टीन्थ सेन्चुरी’ न्यू कल्चरल हिस्ट्रीज ऑफ इडिया, O.U.P, पृ. 55 (प्रकाशित ‘हंस’ मार्च, 2016)

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