'एक उदाहरण काफ़ी होगा' नामवर विफलताएँ - 3 — अशोक वाजपेयी


'एक उदाहरण काफ़ी होगा'  नामवर विफलताएँ - 3 — अशोक वाजपेयी

नामवर विफलताएँ - 3 

— अशोक वाजपेयी 

नामवर जी ने कोई नई पत्रिका नहीं निकाली

साहित्य के संस्थागत रूप की एक अभिव्यक्ति संपादन में भी होती है। नामवर जी ने कोई नई पत्रिका नहीं निकाली : वे कभी कहीं संस्थापक-सम्पादक नहीं हुए। लेकिन उन्होंने पहले से प्रकाशित हो रही दो पत्रिकाओं “जनयुग” और “आलोचना” का संपादन किया है। “जनयुग” भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र था और नामवर जी ने उसमें साहित्य आदि पर सामग्री शामिल की। पर उसे आज कोई याद नहीं करता। “आलोचना” को शुरू में नामवर जी ने नया रूप दिया। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने उसे निरा अकादैमिक मंच और समकालीन साहित्य को लेकर लगभग अप्रासंगिक बना दिया था जिनसे नामवर जी ने उसे उबारा।


पर धीरे धीरे लगभग पिछले दो दशकों में उनके सम्पादन में भी वह अप्रासंगिकता के कगार पर पहुँच गई है। उसमें कई सह-सम्पादक जुड़े और बिछुड़े लेकिन नामवर जी प्रधान सम्पादक बने हुए हैं। इधर उसमें कुछ रोचक परिवर्तन आए हैं लेकिन नामवर जी का सम्पादन लगातार क्षीण, दिग्विहीन, और नाममात्र का होता गया है। वे एक दैनिक अख़बार “राष्ट्रीय सहारा” के भी सलाहकार-सम्पादक कुछ वर्ष रहे पर उसमें भी कोई सुधार या प्रासंगिकता लाने में वे सफल नहीं हो सके : उसी समय प्रभाष जोशी और बाद में ओम थानवी के सम्पादन में “जनसत्ता” अख़बार की बौद्धिक और सांस्कृतिक जगत में जो प्रतिष्ठा बनी वह नामवर जी के सम्पादन के बावजूद “राष्ट्रीय सहारा” को कभी नहीं मिल सकी।

इस विश्लेषण में अगर हम फिर आलोचना-कर्म की ओर लौटें तो यह नोट करना ज़रूरी है कि समकालीन साहित्य-दृश्य में अपनी उपस्थिति और सक्रियता के बावजूद नामवर जी ने अपने ही प्रिय लेखकों जैसे मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, निर्मल वर्मा, रघुवीर सहाय आदि पर ऐसा कुछ नहीं लिखा है जो इन लेखकों को समझने-बूझने के लिए पढ़ना अनिवार्य लगे। इनमें से किसी पर ‘नामवर-समझ’ की कोई तह कभी नहीं जम सकी। ऐसी कोई साहित्यिक-कृति भी याद करना मुश्किल है जिसे समझकर पढ़ने-समझने में नामवर जी की कोई विषद व्याख्या अनिवार्य लगती हो।



एक उदाहरण काफ़ी होगा

इस मुक़ाम पर उनके अज्ञेय के साथ आलोचनात्मक व्यवहार की कुछ व्याख्या ज़रूरी है। यह सभी जानते हैं कि लगभग पचास वर्ष नामवर सिंह अज्ञेय के विरुद्ध डटकर मोर्चा सम्हाले रहे हैं। उन्हें अभिजात, समाज-विरोधी, पश्चगामी आदि बताने में भी वे अग्रणी रहे हैं। यह दिलचस्प है कि यह अज्ञेय-विध्वंस उन्होंने कभी बाक़ायदा उन पर विस्तार से कुछ लिखकर नहीं किया। वे अज्ञेय के विरुद्ध अधिकतर बोलते, कटूक्तियाँ आदि करते रहे हैं। अज्ञेय की उपस्थिति में, अपने अवसरवादी चरित्र के अनुरूप, उनकी ज़रूरत से अधिक प्रशंसा करते थे लेकिन पीठ पीछे और अपने प्रगतिशील मंचों पर उन पर जमकर कटाक्ष और प्रहार। एक उदाहरण काफ़ी होगा।

भारत भवन ने “समवाय” नाम से 1986 में पहली आलोचना-वार्षिकी आयोजित की थी जिसमें अज्ञेय और नामवर सिंह दोनों शामिल हुए। उसमें नामवर जी ने कहा : “हिन्दी की आज की आलोचना को देखते हुए कभी कभी लगता है कि लेखक ऐसे लिख रहा है जैसे इसकी भाषा में रामचन्द्र शुक्ल कभी हुए ही नहीं या ऐसे लिख रहा है जैसे इसकी भाषा में हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, अज्ञेय, मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा ने आलोचना लिखी ही नहीं है।

उसके थोड़े दिनों बाद फरवरी-मार्च 1987 में विवेचना के प्रगतिशील मंच पर नामवर जी ने कहा : गद्य का पतन जिनके कारण हुआ है वे इतने गंभीर आदमी हैं। अज्ञेय चिड़ियाघर के किसी चिम्पांजी के समान गम्भीर व मनहूस दिखाई देते हैं। अज्ञेय, निर्मल वर्मा, रमेशचन्द्र शाह जिन्हें सही गद्य तो लिखना आता नहीं पर भारी चिंतन की बात करते हैं। ... इस पर “पूर्वग्रह” पत्रिका ने सप्रमाण आपत्ति की लेकिन नामवर जी ने कोई उत्तर या स्पष्टीकरण नहीं दिया।

फिर 2011 में जब अज्ञेय जन्मशती मनाई गई तो नामवर जी ने अज्ञेय की कविताओं का एक संचयन तैयार किया और उसकी भूमिका में लिखा : “देश-काल की दृष्टि से अज्ञेय की कविताओं की दुनिया अन्य हिन्दी कवियों से कहीं अधिक व्यापक है। ... वह आधी दुनिया के साथ-साथ लगभग आधी शताब्दी तक फैली हुई है। ध्यान से देखें तो अज्ञेय हिन्दी में प्रकृति के शीर्षस्थ चित्रकार हैं। क्या मजाल कि उनकी कविता में भूल से भी कोई फ़ालतू शब्द आ जाए। सच तो यह है कि अज्ञेय ने अपनी अप्रतिहत सृजन-यात्रा में प्रयोग से आगे बढ़कर अपना एक नया भरा-पूरा काव्य-संसार रचा जो सभी वादों से ऊपर है और टिकाऊ भी...“... इसी भूमिका के समापन पर अज्ञेय ‘चिम्पांजी’ के बजाए ‘अमृतपुत्र’ हो गए हैं ! यह नोट करने की बात है कि इस मत-परिवर्तन में नामवर जी ने इसका उल्लेख तक नहीं किया है कि उन्होंने अपने पहले के, लगभग एक अधसदी में फैले, रुख़ में यह क्रान्तिकारी परिवर्तन क्यों और कैसे करना ज़रूरी समझा है ? यह एक और तरह की बौद्धिक अनैतिकता है। या कि शायद उनकी बद्धमूल अवसरवादिता का एक और नमूना !

नामवर जी युवाओं की प्रशंसा करने में, इस समय, अग्रणी वरिष्ठ हो गए हैं

युवा लेखकों के प्रोत्साहक होना एक बात है, उनकी अकारण और अक्सर निराधार प्रशंसा करना बिल्कुल दूसरी। नामवर जी युवाओं की प्रशंसा करने में, इस समय, अग्रणी वरिष्ठ हो गए हैं। इसका एक कारण तो शायद अपने प्रभाव का क्षेत्र संरक्षित करना है और दूसरा अवसरवादिता के एक नए युवा अवसर का थोड़ा निर्लज्ज लाभ उठाना।

जेएनयु पर चुप्पी 

नामवर जी का लम्बा बौद्धिक जीवन अनेक अवसरों पर कुछ शक्तियों का विरोध करते बीता है। हाल में, उनके लंबे शरण्य ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ पर जब उन्हीं शक्तियों ने हमला किया, जिनका नामवर जी विरोध करते रहे हैं, तो उस पर नामवर जी ने कुछ नहीं कहा, चुप्पी साध ली। ‘नेहरू विश्वविद्यालय’ मार्क्सवादियों का गढ़ रहा है और उस पर जो प्रहार हुआ वह सत्तारूढ़-शक्तियों का सोचा-समझा आक्रमण है। ऐसे समय पर सार्वजनिक हस्तक्षेप से अपसरण नामवर जी के स्वभाव में तो नहीं है पर शायद यह भी एक क़िस्म का अवसरवाद है। यह समझना कठिन है कि यह उनके लिए चुप्पी का अवसर क्यों-कैसे है ?

विफलता की यह आलोचक-गाथा शिक्षाप्रद है। अपनी आलोचना में, जिसमें उनके बोले गए पर कभी न लिखे गए सैकड़ों वक्तव्य शामिल हैं, नामवर जी ने अपने विरोधियों के मतों का अथक सरलीकरण और कुपाठ किया है : अगर यह निबन्ध भी कुछ ऐसा ही ‘कुपाठ’ है तो वे आपत्ति नहीं कर सकते क्योंकि उनकी विफलता में हममें से अनेक आलोचकों की भी विफलता के सूत्र हैं।

बहुवचन से साभार
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