अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika



अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika

अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika


बोलियां

नागरी प्रचारणी सभाभवन के
पीछे की गलियों में
खेसारी के दाल की कचरियां बेचतीं
हिन्दी की बोलियां
   मातृसुलभ रोब में एक दिन बोलीं
   राजभाषा हिन्दी से
”कहो भला, कैसी हो?
जीती रहो, दूधो नहाओ और पूतो फलो!
मिलती रहो कभी कभार
नाता बनाये रहो
   मेरी यह गोद है तुम्हारा घर!
   मेरा घर?
   मेरे हैं कई कई घर, कई सहचर
मैं कहीं अंटती नहीं,
सांसें हैं मेरी असवारी,
जाती हूं भीतरी शिराओं तक तुम्हारी!
और लौट आती हूं वापस
अपनी खुदी तक!
   जो देखता है, मुझे देखता है
   जो सुनता है, सुनता है मुझको!
मैं स्वाद हूं, मैं ही जिह्वा
मैं गंध, मैं ही हूं पृथ्वी
फूलों फलों औषधियों का मत्त विलास!
जो जानता है, मुझे जानता है
वाणी मैं, ब्रह्मांड है कोख में मेरे!
सातों समुंदर मेरा आंचल
सन सन सन बहती हुई सब दिशाएं मैं
इस सृष्टि का पहला आंसू
उदीप्त मुस्कान पहली
हरीतिमा घास की मैं ही, आकाश की नीलिमा
हिमाच्छन्न हो मेरा मन तो मैं
साधू निरंकुश सी सकदम
   रस रंग गंध और ध्वनियां
   इस सृष्टि से बहिष्कृत करूं
   और मना कर दूं फूलों को
   ‘खबरदार, यदि खिले!’
सारा यह रूप तुम्हारा, तुम्हारी यह चेतना
मेरा उपहार है तुम्हें, बच्ची!
   मेरा उपहार है तुम्हें!“



हवामहल

  कैलेण्डर में मैंने देखा था हवामहल
  सौ खिड़कियों वाला, उत्तुंग सा, जोगिया
  लघिमा वाशिमा महिमा वगैरह वगैरह
  आठ सिद्धियां साधे योगी सात आसमानों में उड़ने को बिल्कुल तैयार!
  जितने भी सुंदर कैलेण्डर होते थे,
  बिस्तर के नीचे तहा कर रख देती मां,
  जब घर में आतीं किताबें नयी
  जिल्द चढ़ायी जाती उनकी ही !
जिल्द चढ़ाने के उस अभियान में शामिल होते हम
  नये योद्धाओं के जोशोखरोश से
  गोंद की शीशी, स्केल और कैंची
  गदा की तरह धारे
  पापा को घेर बैठते !
खासे मजाकिया थे पापा।
स्केचपेन से उन किताबों पर नाम हमारा लिखते
और कैलेण्डर की तस्वीरों के बारे में कुछ कुछ लगातार कहते
रवि वर्मा की प्रतीक्षारत रूपगर्विताएं,
दुनिया के सुंदर वन उपवन
या फिर उत्तुंग वे इमारतें हवामहल सी
कैलेण्डर के दिल पर राज था इन्हीं का तब।
  हवामहल के बारे में
  बोलते बोलते पापा बोल पड़े
”देखो भाई, होना तो होना हवामहल !
सब खिड़कियां खोल कर रखना जीवन भर
जो आये, बह जाये !
एक कान से सुन कर ज्यों दूसरे कान से बाहर
कर देते हो मशविरे तुम सब
वैसे ही इस खिड़की आये, उस खिड़की निकल जाये,
द्वेष राग, दुख सुख कुछ जबदे नहीं भीतर !’’
  तबसे अब तक कितने कैलेण्डर बदल गये,
  पर जिल्द की तरह मेरे वजूद पर
  चढ़ा हुआ है अब तक
  पापा का हवामहल !
कभी कभी लेकिन कुछ दरवाजे
लगते हैं जरा ढनमनाने
कब्जे ढीले पड़ गये होंगे
मुंदने लगे हैं कपाट कई
कुछ है जो पार नहीं बह पाता
  और बुड़बुड़ाता रह जाता है
  जैसे कि हुक्के के पानी में बंद हवा!
हवामहल के बाहर से देखती हूं जब हवामहल
दिखता है हवामहल एक बड़ा हुक्का अब
चांद आसमां का
किसी चौधरी सा जिसे गुड़गुड़ाता हुआ
रोज चौपाल सजा लेता है संझा तक!
  सांझ हुई मेरी भी,
  कयामत के दिन आ गये अब तो,
  सोचती हूं ये ही घबरा कर कभी कभी
  पापा पूछेंगे कि कैसा है हवामहल,
  क्या दूंगी उनको मैं उत्तर!




कीमोथेरेपी के बाद

”कभी कभी अपने वजूद से
बाहर टहलने निकल जाओ,
जाओ, वहां जाओ,
दूर वहां कोने में खड़े रहो
यों ही कुछ देर,
फिर गौर से जांचो खुद को
कि कैसे हो!“
कहते थे उस्ताद फत्तन खां, डांस मास्साहब अक्सर ही,
लखनऊ घराने का ठाठ है यही
वहां कथक कहता है कथा
मगर बंधता नहीं किसी किस्से में,
  रहता है गत पार
  आगत विगत पार!
मैं खास डांसर नहीं निकली,
गुरुमंत्र आत्मसाक्ष्य का मुझसे कितना सधा,
मुझको नहीं पता,
लेकिन हां, लम्बी वेणी में बंधने वाले
मेरे ये बाल
कीमोथेरेपी के बाद से
  इस बात का मर्म समझने लगे हैं !
फुहियों से धीरे धीरे झड़ कर,
  इधर उधर उड़ कर,
  कमरे के हर कोने से
  पीछे मुड़मुड़ कर
  मुझे जांचते दीखते हैं ये !
  अभी छोह थोड़ा सा बाकी है,
  धीरे धीरे तटस्थ हो लेंगे !
उस्ताद फत्तन खां जहां कहीं भी होंगे
  क्या सोचते होंगे देख कर
  झड़े हुए बालों का विस्तृत संजाल
  सुबुक और थोड़ा बेहाल
  कांप रहा है धीरे धीरे
  कमरे की हर शय पर
  हवा में उड़ायी गयी
  एक अधूरी चिट्ठी जैसी अनंत, अकथ
  स्वरलहरियां रचता
  कपड़ों पर, कंधों पर, तकिये पर, तौलिए पर,
    क्या जाने कितने
    विरामचिह्न...
  कभी हाइफन, कभी कोष्ठक की शक्ल में
  मुड़ता तुड़ता
  एक केश एकदम अकेला
  खुले हुए ओठों पर लो, आ गिरा
  चुप की उंगली की तरह!
सांसों से भी झीने
इन केशों का
वारा न्यारा करने आती है
खिड़की से ठंडी हवा!
तोशक के नीचे सिहरती हैं
  स्मृतियां
  एक्सरे प्लेटों से सटी हुईं!
दो अकेले लोग
मुस्करा कर देखते हैं
एक दूसरे को!
  एक पीला फूल
  प्रज्ञादीपित सा
  खिला हुआ सिरहाने
  खोल रहा जीवन के मायने
आगे न पीछे
जीवन तो बस इस पल के
नन्हे वर्तुल में समाया है
जैसे कि आंखों में एक बूंद
  अब गिरी, तब गिरी जैसी !



आधारकार्ड

वह एक खाली सड़क थी
किसी अजाने देश की!
वह देश सुमालिया भी हो सकता था, ईरान भी,
तिब्बत, क्यूबा या गाजापट्टी!
होने न होने के बीच एक जंगल था,
जंगल में रात ढल रही थी!
खरहे तीतर और बटेर नींद में चौकस
और ताल की मछलियां कछमछ!
सीने में मुंह गाड़े एक गिलहरी सो रही थी!
सपनों की सातवीं परत पर सन्नाटा था,
सन्नाटे में लेकिन एक बूंद अटकी थी!
पता नहीं, किस हिरणी की आंख से यह झड़ी होगी,
परिरम्भण की कोई आखिरी घड़ी होगी!
घास की आंख झिलमिलाती थी
उस लड़के की आंख में
लॉरी की छत पर जो चादर लपेटे खड़ा था!
उड़ रहे थे केश कंधों पर
बर्फीली हवा के खिलाफ!
स्वाभिमान में सर उठाये हुए जो खड़ा था,
उस लड़के का गम कुछ भी हो सकता था
प्रोमिथियस, सिद्धार्थ गौतम, या चेगोवेरा!
तोड़ी गयी थीं उसकी हड्डियां
तोड़ी गई हड्डियों पर लिपटी हुई पट्टी
धीरे धीरे खुल रही थी!
दर्द का समंदर हहाता हुआ बढ़ रहा था नसों में!
दूरस्थ नक्षत्र से फोन आया, मोबाइल बजा,
पट्टी का एक सिरा दांत में दबा कर वह बोला
”हलो, हलो, चिन्ता की बात नहीं, मां,
मैं तो अच्छा हूं।“
कुछ देर घनघोर चुप्पी सी छायी रही,
फिर गवाही में खड़ी हो गयी कायनात,
”हलो हलो दुनिया के लोगो, यह अच्छा है!“
सुनसान जंगल का हृदय भेद कर
शून्य से शून्य की तरफ जाती हुई सड़क
सोचने लगी
”अच्छे ही लोग भला क्योंकर
रहते हैं हरदम खटाई में पड़े!
क्या दर्द आधारकार्ड है अच्छाई का
जैसे कि क्रांति का सांसत,
और शोर का चुप्पी
चकचक उजाले का आधारकार्ड यह अंधेरा?
क्यों इतने चितकबरे होते हैं दुनिया के सारे आधार?
क्या चितपट का खेल ही है यह सारा संसार?“



थर्मामीटर

अमराई के चौकीदार की तरह
एकदम से पकड़ लेता बुखार हमें
और बंद कर देता कालकोठरी में!
जिसकी गवाही पर गिरफ्तार होते हम
फूटी आंखों नहीं सुहाता हमें वो थर्मामीटर!
सन् नब्बे में फूटा
दुनिया का सबसे बड़ा थर्मामीटर,
पारे के तारों सी छिटक गयी
जब सोवियत संघ की सब इकाइयां
तब जाकर ये जाना हमने होता है दुनिया में काफी कुछ तर्क और प्रमाण के परे!
आज जब धरती का माथा गरम है,
जलस्रोतों की पट्टी पूरी नहीं पड़ती,
निष्पत्र पेड़ हो गये हैं
थर्मामीटर
याद आ रही है वो छोटी सी लड़की
ओ. हेनरी की कहानी
‘द लास्ट लीफ’ की!
  प्लास्टिक की एक पत्ती
  डोल रही है हवा में
  अंतिम सांसें गिन रही
  आस को
  देती दिलासा
  झूठी सच्ची!


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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