कहानी - घूरना - आँचल | #Hindi Story by Aanchal

घूरना 

- आँचल 


ऋचा आज बहुत जल्दी में थी... घर से निकलने में ही उसे देर हो गयी थी और ऊपर से सुबह-सुबह मेट्रो की भीड़ लेडीज कोच तक पहुँचने में २ मिनट की और देर हो जाती...इसलिए सीढियों से चढ़ते ही वो जनरल कोच में प्रवेश कर गयी..सामने वाली सीट के सामने खड़ी हो गयी..सामने वाली सीट पर सारे मर्द ही थे...जिनमे से ऋचा के ठीक सामने वाले व्यक्ति ४०-५० वर्ष के रहे होंगे..मेट्रो चली, रोज़ की तरह ऋचा ने अपने बैग से हेडसेट निकाला और गाने सुनने लगी. कुछ देर बाद उसे एहसास हुआ की सामने बैठे व्यक्ति उसे घूर रहे है.. पहले तो उनकी नज़रें ऋचा की जीन्स की ज़िप के पास ही अटकी रही... फिर उपर से नीचे उसे ऐसे देख रहे थे मानो स्कैन कर रहे हो.. ऋचा ने इधर उधर देखा लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी की वो अपनी जगह से हिल तक नहीं पायी.. बहुत अजीब स्थिति थी उसके लिए.. शायद आसपास बैठे लोगो को आभास हो रहा था की लड़की uncomfortable है लेकिन किसी ने उठकर उसे सीट देने की ज़हमत नहीं की.. ऋचा की मजबूरी थी वही खड़े रहना.. अपने गंतव्य स्टेशन पे पहुँचने के बाद ही उसकी जान में जान आई.

      थोड़ी देर तक ऋचा कुछ समझ ही नहीं पायी..हालांकि ऐसी स्थितियां पहले भी हुई थी, लेकिन तब लेडीज कोच नहीं था.. लेडीज कोच की सुविधा होने के बाद से ऋचा ने हमेशा उसी में सफ़र किया. जब तक की साथ में कोई मेल ना हो..

      हालांकि ऋचा इस शहर में प्रवासी ही थी..लेकिन काफी साल हो गए थे उसे यहाँ रहते हुए. . और ऐसा भी नहीं की उसने इस तरह का वाकया पहली बार देखा-सुना हो, हाँ लेकिन उसके साथ ऐसा कुछ पहली बार ही हुआ था इसलिए उसे ज्यादा बुरा लग रहा था. ख़ैर,  स्टेशन पर ऋचा की दोस्त अनीता उसका इंतज़ार कर रही थी..ऋचा अपनी सोच में गुम चलते-चलते अनीता के पास पहुंची और उसे गले लगा लिया ..पिछले कुछ देर में जो कुछ घटा था, ऋचा ने सब कुछ कह डाला. अनीता ने पहले तो उसे नार्मल किया, फिर हमेशा की तरह अपने बेबाक अंदाज़ और तेज़ आवाज़ में कहा, "यार, ये सब तो रोज़ का ही है..इन लोगो की सोच को और इनकी हरकतों को कोई नहीं बदल सकता..तू टेंशन छोड़ अब.."

       ऋचा ने बीच में टोका, " लेकिन यार, अभी अभी दिसम्बर में जो कुछ भी हुआ उसके बाद इस तरह की हरकतो को लेकर इतनी चर्चाएँ हुई है, लेकिन कहीं कुछ भी बदलता हुआ नहीं दिख रहा..पीपल जस्ट कांट चेंज देयर mentality.."

       अनीता अब अपने पूरे तेवर में थी, झुंझलाते हुए बोली, "अब रहने भी दे यार! ये भी तो सोंच कि जब हम सारे दोस्त एक साथ होते है और जनरल कोच में सफ़र करते है तब इन्ही में से कुछ बंदे कितनी विनम्रता से हमें सीट देते है..अभी लास्ट वीकेंड की ही बात ले ले..तुझे ही एक लड़के ने सीट दी थी न. अब क्या करें, कुछ लोग अच्छे है तो कुछ बुरे भी. आज मेरी एक बात समझ ले, 'घूरना' एक राष्ट्रीय आदत है और अगर मैं ये कहूं कि अब ये एक 'बीमारी' बन चुकी है तो भी गलत नहीं होगा. तू ही बता लेडीज कोच आ जाने से कौन सा फायदा हुआ है..उल्टा ऐसे मर्द इकठ्ठे इतनी लडकियों को ताड़ते है. जहां लेडीज कोच ख़त्म होती है वहाँ देखी है कभी भेडियो की तरह उनकी नज़रें..हाँ इन्ही में से कुछ अच्छे पुरुष ऐसे लोगो समझाते भी नज़र आते है कि भैया उधर क्या देखे जा रहे हो! मैंने सुना है यार ऋचा, एक बार एक अंकल ऐसे कुछ लडको को डांट रहे थे.. और अब तो stalking/voyaging को लेकर इतने सारे क़ानून भी बन गए है. धीरे-धीरे सब बदलेगा..”

        ऋचा अब थोड़ी नार्मल थी..अब दोनों धीरे-धीरे स्टेशन से नीचे उतरने लगी ...अनीता अब कुछ हल्की बातचीत कर रही थी.. लेकिन ऋचा के मन में एक ही सवाल घूम रहा था कि "आखिर कब बदलेगी हर एक इंसान की मनोवृति…..”


आँचल
स्नातक दिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क: avidaanchal@gmail.com
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

होली: सतरंगी उत्सव — ओशो | Happy Holi with #Osho
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है — स्नोवा बार्नो की अद्भुत प्रेम कहानी
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
अट नहीं रही है — सूर्यकांत त्रिपाठी निराला Happy Holi
पंकज सुबीर की सुधा ओम ढींगरा से बेबाक बातचीत
अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
Book Review: मानस का हंस की आलोचना — विशाख राठी
शिवानी की कहानी — नथ | 'पिछली सदी से जारी स्त्री स्वाधीनता की खामोश लड़ाई' - मृणाल पाण्डे