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तानाशाह व अन्य कवितायेँ — मंगलेश डबराल | Manglesh Dabral 4 poems

मई 16, 2016
manglesh dabral


मंगलेश डबराल - कवितायेँ


आसान शिकार



मनुष्य की मेरी देह ताकत के लिए एक आसान शिकार है
ताकत के सामने वह इतनी दुर्बल है और लाचार है
कि कभी भी कुचली जा सकती है
ताकत के सामने कमजोर और भयभीत हैं मेरे बाल और नाखून
जो शरीर के दरवाजे पर ही दिखाई दे जाते हैं
मेरी त्वचा भी इस कदर पतली है कि उसे पीटना बहुत आसान है
उसके ठीक नीचे ही बहता है ऱक़्त
और सबसे अधिक नाजुक और ज़द में आया हुआ है मेरा हृदय
जो इतना आहिस्ता धड़कता है
कि उसकी आवाज भी शरीर से बाहर नहीं सुनाई देती

मिट्टी हवा पानी ज़रा सी आग
थोड़े से आकाश से बनी है मेरी देह
उसे मिट्टी हवा पानी आग और आकाश में मिलाना है आसान
एक पुराने भुरभुरे काग़ज़ की तरह है मेरी आत्मा
जो हल्के दबाव से ही फट सकती है
पूरी तरह भंगुर है मेरा वजूद
उसे मिटाने के लिए किसी हरबे-हथियार की जरूरत नहीं होगी
किसी ताकतवर की एक फूंक ही मुझे उड़ाने के लिए काफ़ी होगी
मैं उड़ जाऊं गा सूखे हुए पत्ते या नुचे हुए पंख की तरह

मनुष्य की मेरी देह हमेशा उपलब्ध है
वह सड़क पार करती है दूर तक पैदल चलती है
सांस लेती है प्रेम करती है
थक कर बैठती है और फिर उठ खड़ी होती है
दुनिया के संभावित ताक़तवरों अत्याचारियों आततायियो को
उसे कहीं खोजने की ज़रूरत नहीं होती
मनुष्य की मेरी देह खड़ी रहती है उनके ठीक सामने
निष्कवच बिना किसी हथियार के।

तानाशाह


तानाशाह को अपने किसी पूर्वज के जीवन का अध्ययन नहीं करना पड़ता। वह उनकी
पुरानी तस्वीरों को जेब में नहीं रखता या उनके दिल का एक्स-रे नहीं देखता। यह स्वतःस्फूर्त
तरीके से होता है कि हवा में बंदूक की तरह उठा हुआ उसका हाथ या बंधी हुई
मुट्ठी के साथ पिस्तौल की नोक की तरह उठी हुई अंगुली किसी पुराने तानाशाह की
याद दिला जाती है या एक काली गुफा जैसा खुला हुआ उसका मुंह इतिहास
में किसी ऐसे ही खुले हुए मुंह की नकल बन जाता है। वह अपनी आंखों में
काफी कोमलता और मासूमियत लाने की कोशिश करता है लेकिन क्रूरता
कोमलता से ज्यादा ताकतवर होती है इसलिए वह एक झिल्ली को भेदती हुई बाहर आती है
और इतिहास की सबसे ठंढी क्रूर आंखों में तब्दील हो जाती है। तानाशाह मुस्कुराता है
भाषण देता है और भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि वह एक मनुष्य है
लेकिन इस कोशिश में उसकी मुद्राएं और भंगिमाएं उन दानवों-दैत्यों-राक्षसों की
मुद्राओं का रूप लेती रहती हैं जिनका जिक्र प्राचीन ग्रंथों-गाथाओं-धारणाओं-
विश्वासों में मिलता है। वह सुंदर दिखने की कोशिश करता है आकर्षक कपड़े पहनता है
बार-बार बदलता है लेकिन इस पर उसका कोई वश नहीं कि यह सब
एक तानाशाह का मेकअप बन कर रह जाता है।

इतिहास में तानाशाह कई बार मर चुका है लेकिन इससे उस  पर कोई फर्क नहीं पड़ता
क्योंकि उसे लगता है उससे पहले कोई नहीं हुआ है।

मोबाइल


वे गले में सोने की मोटी जंजीर पहनते हैं
कमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
वे एक आधे अंधेरे और आधे उजले रेस्तरां में घुसते हैं
और खाने और पीने का ऑर्डर देते हैं
वे आपस में जाम टकराते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं

उनके मोबाइलों का रंग काला है या आबनूसी
चांदी जैसा या रहस्यमय नीला
उनके आकार पतले छरहरे या सुडौल आकर्षक
वे अपने मोबाइलों को अपनी प्रेमिकाओं की तरह देखते हैं
और उन पर बात करते हैं
वे एक दूसरे के मोबाइल हाथ में लेकर खेलते हैं
और उनकी विशेषताओं का वर्णन करते हैं
वे एक अंधेरे-उजले रेस्तरां में घुसते हैं
और ज़्यादा खाने और ज़्यादा पीने का ऑर्डर देते हैं
वे धरती का एक टुकड़ा ख़रीदने का ऑर्डर देते हैं
वे जंगल पहाड़ नदी पेड़
और उनमें दबे खनिज को ख़रीदने का ऑर्डर देते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं

वे पता करते रहते हैं
कहां कितना खा और पी सकते हैं
कहां कितनी संपत्ति बना सकते हैं
वे पता करते रहते हैं
धरती कहां पर सस्ती है खाना-पीना कहां पर महंगा है
वे फिर से एक अंधेरे-उजले रेस्तरां में बैठते हैं
वे सस्ती धरती और महंगे खाने-पीने का ऑर्डर देते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
वे फिर से जंजीरें ठीक करते हैं बेल्ट कसते हैं
वे अपने मोबाइलों को अपने हथियारों की तरह उठाते हैं
और कुछ जीतने के लिए चल देते हैं।

मुलाक़ात

(रंगकर्मी और चित्रकार मित्र विजय सोनी के निधन पर)


अब ऐसी ही जगहों में मुलाक़ात होती है
जहां कोई जा रहा होता है ज़्यादातर असमय

वहां चारों ओर आग जलाई जा रही होती है
या एक गड्ढा खोदा जा रहा होता है

लोग हड़बड़ाते हुए आते हैं कहते हैं
उम्मीद नहीं थी कि समय पर पहुंच पायेंगे
रास्ते में बहुत भीड़ है
हर कोई  कुछ खाने या कुछ ख़रीदने में जुटा है

कुछ तब आते हैं जब आग बुझ गयी होती है
गड्ढा भर दिया गया होता है

कभी-कभी मृतक के पास पहुंचने में कई दिन लग जाते हैं
कभी महीने या साल
कभी आख़िरी सलाम भी मन में ही कहना पड़ता है

यह ऐसा ही समय है
हर ख़बर बाज़ार से गुज़र कर आती है
और बाज़ार हमेशा हादसों को छिपाने की कोशिश करता है

जीते जी लोगों का होना भी पता चलता
वे पता नहीं किस दुनिया में रहने जाते हैं
या फिर हम ही जा चुके होते हैं कहीं और

अब संवेदनाएं भी पहले जैसी कहां रहीं
आंखें जितना देखती हैं दिल उससे भी कम महसूस करता है
अभाव कितना ही बड़ा हो दब जाता है किसी और चीज़ से

और दुख के जो आधे-अधूरे वाक्य बोले जाते हैं
उनका संबंध हमारे भीतर के हादसे से है
जो बाहर नहीं आता और दिखाई नहीं देता।


मंगलेश डबराल 

टिप्पणियां

  1. बहुत सुंदर रचनाऐं। साझा करने के लिये आभार !

    जवाब देंहटाएं
  2. सुंदर प्रस्तुति...
    आप ने लिखा...
    मैंने भी पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पड़ें...
    इस लिये आप की ये रचना...
    19/05/2013 को http://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com
    पर लिंक गयी है...
    आप भी इस हलचल में अवश्य शामिल होना...

    जवाब देंहटाएं

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