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मेरे मन में अनेक विचार उठ-गिर रहे हैं - भारत भारद्वाज

दिस॰ 24, 2014
वर्तमान साहित्य  दिसंबर, 2014

मेरे मन में अनेक विचार उठ-गिर रहे हैं - भारत भारद्वाज


              ‘जा चुके थे जो बहुत दूर, 
                       करीब आए हैं’ 
                      —कैफ़ी आजमी 
क्यूबा ने चे को जिस तरह सम्मान दिया, हमने अपने देश में न गांधी को दिया और न ही भगत सिंह और नेता जी सुभाष बोस को। हमें इस पर शर्मिंदा होना चाहिए - भारत भारद्वाज 
भारत भारद्वाज
अभी जब प्रस्तुत अंक का संपादकीय लिखने के लिए (16 नवंबर 2014) अपने को मानसिक रूप से तैयार कर रहा हूँ, मेरे मन में अनेक विचार उठ-गिर रहे हैं। आज की राजनीति, इतिहास, विधि-व्यवस्था, चुनाव आयोग, भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू की 125वीं जयंती पर उठे विवाद या फिर सांप्रदायिकता या साहित्य। विचारों के ऊहापोह से घिरा अभी अंधेरे में भटक ही रहा था कि अचानक लगा कि आज की राजनीति पर मुझे लिखना चाहिए। मुझे जर्मनी के प्रसिद्ध कवि वर्तोल्त ब्रेख्त की विश्व प्रसिद्ध कविता याद आई: ‘महाशय, संसद ने जनता का विश्वास खो दिया है/तो ऐसा करें/ कि संसद को रहने दें और जनता को भंग कर दें।’
ब्रेख्त ने यह कविता सोवियत संघ के प्रभुत्ववाली जर्मनी में हुई क्रांति के जनतांत्रिक आंदोलन का पक्ष लेते हुए लिखी थी। लेकिन मुझे लगा कि आजादी के बाद भारत के जनतांत्रिक आंदोलन पर लिखने लगूंगा तो सीमित पृष्ठों के संपादकीय में इसकी समाई न होगी। फिर सोचा पं. नेहरू की 125वीं जयंती पर लिखूं। सातवें दशक में प्रसिद्ध पत्रकार दुर्गादास की अंग्रेजी पुस्तक ‘इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू’ वी.एस. नायपाल की दो पुस्तकें—‘एन एशिया ऑफ डार्कनेस’ और ‘वुंडेइ सिविलाइजेशन’ के साथ मैं 1962 में भारत पर हुए चीनी आक्रमण पर अंग्रेजी में प्रकाशित लगभग एक दर्जन पढ़ी पुस्तकों को आधार बनाऊं। पं. नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ और प्रेमचंद द्वारा हिंदी में अनूदित पुस्तक ‘पुत्री के नाम पिता के पत्र’ भी उन पर लिखने के लिए पर्याप्त होंगी। ये विचार मेरे मन में अभी उमड़-घुमड़ ही रहे थे कि आज के अखबार पर मेरी नजर पड़ी और मैंने सोचा अब अखबार पढ़ने के बाद ही संपादकीय लिखने का निर्णय करूंगा। 

 मैं हिंदी-अंग्रेजी के अखबार पढ़ने लगा। विभिन्न अखबारों में प्रकाशित लेखकीय वक्तव्य, स्तंभ और खबर पर तीन महत्वपूर्ण सामग्री मिली। 1964 में फ्रांस के प्रख्यात लेखक और चिंतक ज्यां-पॉल सार्त्र को साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा स्वीडीश एकेडेमी ने की थी। अब तक यह प्रचारित किया गया था कि सार्त्र ने विश्व के सबसे बड़े पुरस्कार को ‘आलू का बोरा’ कह कर लेने से इनकार कर दिया था। लेकिन सच्चाई कुछ और है। दैनिक हिंदुस्तान में ‘लेखक की आजादी’ शीर्षक से इस पुरस्कार को उनके द्वारा इनकार किए जाने के बारे में दिए गए वक्तव्य से सही वस्तुस्थिति का पता चलता है। सार्त्र ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट लिखा है— ‘पुरस्कार लेने से इनकार करने का संबंध न तो स्वीडीश एकेडेमी से है और न स्वयं नोबेल पुरस्कार से। इसमें मैंने व्यक्तिगत व वस्तुपरक दो तरह के कारणों का जिक्र किया है। व्यक्तिगत कारण ये हैं—मेरा इनकार किसी आवेग का प्रदर्शन नहीं है। मैंने हमेशा आधिकारिक सम्मान से इनकार किया है। युद्ध के बाद 1945 में जब ‘लीजन ऑफ ऑनर’ का प्रस्ताव रखा गया, तो सरकार से सहानुभूति रखते हुए भी मैंने इनकार कर दिया था। इसी तरह अपने कई मित्रों की सलाह के बावजूद मैंने कभी कॉलेज डी फ्रांस में जाने का प्रयास नहीं किया।’ आगे फिर लिखते हैं—‘मेरा यह रुख लेखकीय कर्म की मेरी अवधारणा से संबंद्ध है। एक लेखक अगर अपने राजनैतिक, सामाजिक या साहित्यिक विचार बनाता है, तो उसे सिर्फ अपने संसाधनों पर निर्भर होना चाहिए यानी लिखे शब्दों पर। वह जो भी सम्मान ग्रहण करता है, उनसे उसके पाठक को दबाव का अनुभव होता है, जो मुझे वांछनीय नहीं लगता। जैसे अगर मैं ज्यॉ-पॉल सार्य के रूप में हस्ताक्षर करता हूँ, तो यह नोबेल पुरस्कार विजेता ज्यां-पॉल सार्त्र के हस्ताक्षर से नितांत भिन्न होगा।’ पुरस्कार इनकार करने का वस्तुनिष्ठ कारण बताते आगे वे कहते हैं— ‘सांस्कृतिक मोर्चे पर आज जो एक मात्र संघर्ष संभव है, वह दो संस्कृतियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संघर्ष है—पूर्व और पश्चिम का संघर्ष। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि वे एक-दूसरे को गले लगा लें—मैं जानता हूँ कि इन दो संस्कृतियों का आपसी विरोध मतवैभिन्न का रूप ले लेगा—लेकिन यह विशेष लोगों और संस्कृतियों के बीच होना चाहिए। इसमें संस्थाओं का दखल न हो।’ अपने वक्तव्य के अंत में सार्त्र ने लिखा—‘यही वे कारण हैं, जिन्होंने इस पुरस्कार का मिलना व इसे लेने से इनकार करना दोनों को ही मेरे लिए पीड़ादायक बना दिया। मैं स्वीडन की जनता के साथ भाईचारा व्यक्त करते हुए यह स्पष्टीकरण समाप्त करता हूँ। (अनुवाद सुमिता) कहना ही होगा कि सार्त्र के वक्तव्य से कई बातें साफ हुर्इं, खासकर लेखकीय प्रतिबद्धता। सार्त्र विश्व के उन कुछ लेखकों में हैं जो अपने शब्दों पर सबसे ज्यादा भरोसा करते थे। यह अकारण नहीं है कि उनकी आत्मकथा का शीर्षक है ‘The words’ (शब्द)। 

 आज हिंदी में दिए जा रहे पुरस्कारों की संख्या गिनना मुश्किल है। अनुमानत: इसकी संरचना आज प्रकाशित अनिश्चियकालीन लघु पत्रिकाओं से टकराती है। दो बड़े पुरस्कार के नाम हैं—भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और इफको श्रीलाल शुक्ल स्मृति पुरस्कार। 5-5 लाख के पुरस्कार उ.प्र. हिंदी संस्थान और आगरा हिंदी संस्थान से दिए जाते हैं। लखटकिया पुरस्कारों की संख्या पचास से ऊपर है और 50, 25,11 व 5 हजार रुपए की राशि के लिए दिए जाने वाले पुरस्कार सौ से ऊपर है। नीचे के पुरस्कार राशि की संख्या 200-250 होंगी। आज हिंदी के लेखक पुरस्कार प्राप्त करने का जुगाड़ बिठाते हैं। रजिस्ट्रेशन फीस देकर अंबिका प्रसाद ‘दिव्य’, डॉ. शोभनाथ यादव पुरस्कार लेते हैं। आज भी साहित्य अकादमी पुरस्कार की गरिमा है। लेकिन सरस्वती सम्मान और व्यास सम्मान की प्रतिष्ठा नहीं है। मेरे जानते आज तक हिंदी में संभवतः: एक मात्र लेखक—आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा हैं, जिन्होंने पहले व्यास सम्मान की राशि संस्थान को साक्षरता अभियान के लिए दिया। और बाद में भी कई अन्य पुरस्कारों की राशि। 

 प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ‘द हिंदू’ में, बिहार के समस्तीपुर जिले में 1932 में जन्मे और 1933 ई. से लंदन निवासी बिल किर्कमैन अप्रैल 24, 1994 से लगातार अपना स्तंभ ‘कैंब्रिजलेटर’ लिखते रहे, जिसे मैं पढ़ता रहा हूँ। किर्कमैन न केवल विश्व के सम्मानित और प्रतिष्ठित पत्रकार हैं, बल्कि एमेरिटस फैलो ऑफ वूल्फसन कॉलेज भी रहे हैं। वे ‘दि टाइम्स’ के रिपोर्टर ही नहीं रहे, कैंब्रिज और आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से भी वे जुड़े थे। आज के अखबार में उन्होंने अपने ‘कैंब्रिज लेटर’ की आखिरी किस्त लिखी है—‘ the last word’ यह स्ंतभ न केवल कारुणिक है, बल्कि मार्मिक भी कम नहीं है। वे लगातार ‘द हिंदू’ में 20 वर्षों तक यह स्तंभ लिखते रहे। यही नहीं, बहुत अच्छा स्तंभ लिखा। पहले ‘हिंदू’ द्वारा स्तंभ लिखने के प्रस्ताव से चौंके। और फिर लिखने लगे। बाद में अपनी अस्वस्थता के कारण लाचारी प्रकट की लेकिन फिर से संपादकीय लिखने के असाधारण मित्रतापूर्ण आग्रह से अभिभूत हुए। अपने स्तंभ के अंत में उन्होंने लिखा है—‘दि हिंदू से मेरा बड़ा विशेषाधिकार था। यह मेरे लिए बड़े पश्चाताप का विषय है कि अब मेरा ‘कैंब्रिज लेटर’ नहीं छपेगा। लेकिन मेरा दुख है कि यह दो कारणों से बाधित हुआ। पहला 20 वर्षों तक निरंतर स्तंभ लिखने का मुझे अपूर्व सुख मिला। दूसरा कारण, इस स्तंभ को बंद करने के बारे में मुझे यह कहना है कि इसे बंद करने का यह सही समय है, अनिश्चित काल तक इसे चालू रखने का कोई मतलब नहीं है—बिल किर्कमैन के ये शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। न केवल हिंदी में लंबे समय तक निकलने वाली निरर्थक पत्रिकाओं के लिए, बल्कि मेरे जैसे साधारण स्तंभ लेखक के लिए भी। 

 आज के अखबार में एक छोटी-सी सनसनीखेज महत्वपूर्ण खबर कई समाचार पत्रों में छपी। लेकिन आज के दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ में तस्वीर के साथ छपी— ‘चे ग्वारा के शव की तस्वीरें स्पेन में फिर से दिखीं।’ इस खबर से मैं बेचैन हुआ। 2007 में साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से भारतीय लेखक शिष्ट मंडल के प्रतिनिधि के रूप में मैंने क्यूबा की यात्रा की थी क्यूबा की राजधानी ला हवाना के पाल्को होटल में हम रुके थे। हम चे ग्वारा के घर पर गए थे और क्यूबा के पूरे साहित्य-संस्कृति और राजनीतिक परिदृश्य को देखा था। हम क्यूबा के बाहरी परिसर—फिंका बिजिया स्थित—अमेरिकी लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे के निवास पर भी गए थे, जिसे क्यूबा सरकार ने स्मारक के रूप में सुसज्जित किया है। हमने हेमिंग्वे संग्रहालय में उनकी पुस्तकों को देखा। प्रवेश द्वार पर उनकी तस्वीर थी। मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि हेमिंग्वे के घर में किचन को छोड़कर कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहां किताबें नहीं थीं। वे खड़े होकर टाइपराइटर पर लिखते थे। उनकी रुचि क्यूबा के फिशिंग टूर्नामेंट में थी और एक बार उन्होंने क्यूबा के राष्ट्रपति फिडेल कास्ट्रो को हराया था। हेमिंग्वे छह महीने क्यूबा में रहते थे और छह महीने अमेरिका में। उनके उपन्यास ‘दि ओल्ड मैन एंड दि सी’ का मुख्य पात्र सेंटियागो क्यूबा का था। यह असली चरित्र था। क्यूबा की यात्रा में मुझे यह सूचना मिली कि कुछ वर्षों पूर्व सेंटियागो की मृत्यु हुई। क्यूबा में चे ग्वारा हर जगह हैं, ऑफिस की दिवारों पर, गली, चौराहे पर ही नहीं, वहां की जनता के मन में। फिडेल कास्ट्रो कहीं नहीं हैं। क्यूबा ने चे को जिस तरह सम्मान दिया, हमने अपने देश में न गांधी को दिया और न ही भगत सिंह और नेता जी सुभाष बोस को। हमें इस पर शर्मिंदा होना चाहिए। 

 यह बड़े दुख की बात है कि भारत में हमने बड़े नेताओं के घर को स्मारक बनाया लेकिन किसी लेखक के घर को नहीं। लमही में प्रेमचंद स्मारक की दुर्दशा हमारे सामने है। प्रेमचंद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, निराला और मुक्तिबोध के लिए हमने क्या किया? जब भारत की राजधानी दिल्ली में ऐरे-गैरे नेताओं के स्मारक ही नहीं, सड़क-पथ के नाम भी हैं। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। 

 सचमुच संपादकीय लिखना मुझे नहीं आता एक बात और पत्रिका का यह अंक अनुवाद पर केंद्रित है। नए वर्ष से पत्रिका का सामान्य अंक निकलेगा जिसमें कहानी, कविता, समीक्षा, लेख, बहस, साक्षात्कार के साथ गोलमेज स्तंभ भी होगा, जिसमें हम ज्वलंत समस्याओं पर बातचीत करेंगे। इति नमस्कारन्ते। 

भारत भारद्वाज 
संपर्क : 09313034049
ईमेल: vartmansahitya.patrika@gmail.com

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