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कहानी: सन्नाटे की गंध - रूपा सिंह

जन॰ 31, 2015

बेड़ियाँ तोड़े बिना आगे जा पाना असंभव है ... हिंदी साहित्य की यही रुढ़ीवादी बेड़ियां पाठक को अन्य भाषाओँ के साहित्य की तरफ मुड़ने को 'मजबूर' करती रहती हैं... किन्तु बीच-बीच में इन बंधनों को तोड़ कर आगे आने वाले लोगों ने उम्मीद बरक़रार रखी है... ''कृष्णा सोबती'' जी हमेशा ही ऐसे क़दमों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रही हैं यहीं ''दीपा मेहता'' बहुत याद आती हैं, उनकी फिल्मों फायर, अर्थ, वाटर के चलते दर्शक उन पहलुओं से रूबरू हो सका जो बेड़ियों में जकड़े थे, परदे के पीछे थे - उन्हें परदे पर लायीं दीपा मेहता ............ 

रूपा ! दिल खुश है .... कि एक प्रिय दोस्त की पहली ही कहानी में मुझे  ऐसे साहित्य की तमाम संभावनाएं नज़र आ रही हैं जिसे हम हिंदी साहित्यिक लेखन में कम पाते रहे हैं......... तुम्हारी कहानी 'सन्नाटे की गंध' में वो महक है जिसकी पाठक को बहुत कमी महसूस होती रही है... इसे खूब फैलाना ! रुकना नहीं दोस्त !

भरत 


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कहानी

सन्नाटे की गंध 

रूपा सिंह 


रात है। नीली रात। सन्नाटा धीरे-धीरे फैल रहा है। पर्दे हिल रहे हैं, खामोश सरसराहट में। बाहर लॉन की तमाम कलियां मानो चटक कर फूल बनने की तैयारी में हैं। मदमाती गंध है, एक सिहरन है, एक चुभन भी है। आंखें अधखुली-सी हैं, मन हिचकोलों में। बीच के पल को पकड़ने की कोशिश करती हूं, हाथ नहीं आता कुछ...। कोई चीख-पुकार नहीं। हो- हल्ला नहीं। लड़ाई-झगड़ों की आवाज नहीं...। क्या हो गया है घर को? सर्वत्र चुप्पी... शांति... सन्नाटा...।

आंखों में तरेर डाल जब घूरती हूं, दोनों मुस्कराती हैं। अजीब तरीके से एक दूसरे को देखते हुए। मैं छिटका दी जाती हूं, अजनबी हो जाती हूं। क्या यह व्यंग्य भाव है, कुछ छुपा लेने का भाव। समझदारी की कौंध या किसी गहन भेद को लांघ जाने की अदम्य धमक...?

कुछ तो है इस मुस्कुराहट में। आंखों में भी कुछ है। इतनी सधी हुई निगाहें? जो एक साथ उठती हैं, आपस में मिलती हैं... डंक मारती हुई कालिया नाग-सी फिर पिटारे में छिप जाती हैं। आपस में इतना प्रेम उमड़ रहा कि इन दिनों झगड़े कम हो गए हैं। उस दिन भी देखा था अपने अलग बाथरूम के बीच में टॉवेल-स्टैंड पर रुके दोनों, पहले की तरह कॉरीडोर में धक्के नहीं खाए, चिल्लाए नहीं। धक्का तो था एक रगड़ से, लेकिन चिल्लाहट नहीं, वही मुस्कुराहट। मुस्कुराहट?

ओह याद आया... कैसे भी यह मुस्कुराहट... हूबहू वैसी ही थी। धत्त, मैं भी कहां परेशान हो रही हूं। जब नई-नई शादी होकर आई थी, देवरानियों-जेठानियों के बीच पारस यूं ही नहीं मुस्कुराता था छिप-छिपाकर मुझे देखकर...? बाप से मेल खाने लगी हैं उसकी बच्चियों की मुस्कुराहट। आखिर बड़ी हो रही हैं। बड़की 14 छूने को है, भले देखने में 15-16 की लगे। छोटी भी 12 पूरे कर रही है। बाप जैसी ही हैं दोनों, लंबी-चौड़ी कद-काठी, सुंदर और सेहतमंद बच्चियां।

बच्चियां बड़ी हो रही हैं। बड़ी हो रही हैं तभी बदल रही हैं शायद। कुछ दिनों से देख रही हूं, डांटती हूं तो शिकायत नहीं करतीं। कुछ बोलने से पहले ही बरज दी जाती हूं... ओह रहने दो। हम देख लेंगे। आप जाओ... हम सब कुछ अच्छे से संभाल लेंगे। ज्यादा काम नहीं है... हो जाएगा घर साफ करना, बर्तन रखना, कपड़े तहाना- आप जाओ न, आओगे तो सब किया-धरा मिलेगा।

यह तो सच में कमाल है जी। रब्बा मुझे सद्बुद्धि दो। सब कहते थे, परेशान न होना टीन-एज आएगी इनकी तो ऐसे ही करेंगे। लेकिन इतनी चिल्ल-पों? मैं तो पिछले दो वर्षों से आए इस टीनएजी बदलाव से परेशान थी। पता नहीं कब यह एज आगे खिसकेगी और ये स्थिर होंगी? मेरा तो बैंड बज जाएगा तब तक...। कहीं बाहर जाने का नाम ले लूं बस... हल्ला शुरू। कभी कहीं साहित्यिक गोष्ठी है, मंडी हाउस में नाटक है, कविता-पाठ है, कभी पुस्तक-विमोचन भी है। एकाध बार साथ ले गए तो वापस आकर लताड़ खाई, हम बोर हो गए वहां बुरी तरह। घर पर ही पढ़ लेते तब तक...? और मेरे जाने की बात निकलती नहीं कि... क्यों जाती हो रोज-रोज? हमें अकेले अच्छा नहीं लगता है, बोर हो जाते हैं। हाय रे इनकी बोरियत? अब तो जिस दिन जाना होता है, दिन में खाने की मनपसंद एकस्ट्रा चीजें मंगवाकर फ्रिज भर देती हूं कि जाने के समय हल्ला न मचाएं। क्या करूं? मेरे लिए जरूरी है जाना। यह सब मेरी मानसिक खुराक है। साहित्यिक चर्चा होती है, लोग मिलते हैं, कुछ पढ़ने-गुनने का सिलसिला बनता है। मुझे पसंद है। मंडी हाउस में नाटक देखने के लिए तो मेरी आत्मा बेचैन रहती है। बाप भी दूर है इनका जो रहता साथ तो मैं जाती कभी अकेली? नहीं वह रहता तो सब साथ जाते या फिर कोई न जाता। सब हमेशा चिपट के रहते साथ-साथ। दूर तेजपुर की विश्वविद्यालय की नौकरी... छुट्टियों में आ पाता पारस और तब उस समय... हम सब मॉल जाते... खाना खाते... मूवी देखते...। छन्न-छन्न मेरी हंसी की झनकार पूरे घर में फैली रहती। मां-बाप को खुश देख दोनों बेटियां ठुनकती रहतीं...। प्यार से गीली हो बेवजह कभी मां को आवाजें देतीं, कभी बाप को। शिकायतें लगतीं। एक दूसरे का फैसला करवातीं। अभी कुछ दिन पहले ही इतना शोर हुआ करता था, ‘मां, देखो! मेरा कलर-पेंसिल ले लिया।’

‘इसने मेरा पेंसिल बॉक्स क्यों छुपाया...’

‘इसने मेरी किताबें फाड़ दीं... मर जा तू...’

‘तू क्यों नहीं मरती... लड्डू बांटूँगी मर जा... मर जा...’

दोनों की चीखें ओफ... मर... मर तो मैं जाती। बड़ी तो बाप रे, दादागीरी ऐसी कि एक दिन देखते-देखते छोटी का हाथ बुरी तरह मरोड़ दिया। डर से थरथराने लगी। कभी जो मैं न रहूं... एक दूसरे को अपाहिज ही न कर डाले ये तो...। थप्पड़ मारा दोनों को। चिल्लाकर रोई फिर मुझे रोते देख... सन्नाटा पसर गया घर में...।

पारियां बंधी हुई हैं, अपने-अपने कामों की। मैं क्या-क्या करूं? हम तीन ही तो हैं। तीन भी पूरे नहीं... ढाई गंजियां दा परिवार...। 38 वर्षीया मां, चढ़ती वयस की दो बेटियां। सप्ताह में दो बार भी कपड़े धोने की मशीन लगाओ तो काफी है और क्या काम? छोटे-छोटे काम बचते हैं। जैसे स्कूल-ड्रेस रात में निकाल रखना, जूते पॉलिश, अक्वागार्ड से पानी की बोतलें भरना, धुले बर्तन रैक पर सजा देना, बिस्तर बनाना और रात को फुल्के सेंक लेना। सारे काम बंटे हुए हैं। सब्जियां बनाना, कपड़े प्रेस करना, पौधों की देखभाल जैसे काम मेरे जिम्मे हैं। ध्यान से हिसाब लगाया तो अपनी पारियां मनमर्जी से शिफ्ट कर रखी हैं इन्होंने। हल्के-फुलके काम बड़ी के जिम्मे हैं। चिल्ल-पों मचाने में बड़ी जितनी दादागीरी, रौब गांठती, छोटी उतनी ही समझौतापरस्त मैं चीखती तो कहती कि छोड़ो न मां, लाओ मैं कर देती हूं। मरने दो उसे, मत कहो उसे कुछ, वह कमीनी है पूरी...।

अरे... रे ओय क्या बक रही है? बड़ी बहन को ऐसे बोलते हैं? टोकती-टोकती रह जाती। मेरी आत्मा भी उतनी ही दुःखी। अभी सारे काम हम कर लें, खाना लगा दें- धप्प से आकर बैठेगी, गप्प से खाएंगी, चिल्लाएगी अलग, कि अरे पानी की बोतल कहां है... पानी क्यों नहीं दिया?

दोनों की किच-किच शुरू न हो, मैं दौड़ती पानी के लिए। झूठे बर्तन मैं ही फेंकती वॉश बेसिन में और झाड़न से टेबल की जूठन पोंछती देख... देख, मां कर रही है...। बेशर्म... शर्म नहीं है तेरे को, छुटकी हमदर्दी से चिल्लाती...। हां नहीं है, क्यों कर रही है वो, मैंने कहा है? मेरी जब मर्जी होगी, मैं कर लूंगी।

ओय, मर्जी की मालकिन...? तंग आ गई मरजानियों तुम दोनों चुप रहो। पता नहीं कौन-सी हरारतें भरी हैं खून में, जब देखो लड़ती रहती हो।

आज रविवार था। देर तक सोना था दोनों को। मेरे लिए भी अच्छा ही है यह। न टिफिन बनाने का झंझट, न सुबह-सुबह चिल्ल-पों झेलने की मशक्कत। छह बजे के बदले मैं भी आठ बजे उठी। बाई साढ़े आठ बजे आकर साढ़े नौ चली जाती है। उठाऊं इनको अब? रहने दो? घर शांत तो है कम से कम। मैंने फटाफट दो सब्जियां बना लीं। आटा गूंथ लिया। मटर वाले नमकीन चावल बना लिए फिर नहाने घुस गई। नहाकर निकली फिर उठाया इन्हें। उठो, भई 11 बज गए। नहाओ... धोओ। मुझे भी भूख लगी है। साथ खाते हैं, उठो भी। महारानियां उठीं, गीजर ऑन था ही। सर्दी जाने-जाने को है, गई नहीं अभी। नहाया दोनों ने। हमेशा की तरह बड़की ने आवाज लगाई कि मां हीटर चला रहे हैं। मेरे बेड पर उषा लेक्सस का कन्वर्टर चलाकर... दोनों बहनें अपने पैर गर्माती हैं। अरे, पहले दूध पी लो, फिर किताबें वहीं ले जाकर पढ़ते भी रहो। मेरे कहने-कहने तक गटर-गटर दूध पी लिया, किताबें उठाईं, भागीं कमरे की तरफ...। अरे, ये क्या? कोई शोर नहीं आज? दूध में मलाई नहीं दिखी? फिर से छानने की जिद पैदा नहीं हुई? कौन किसके कप में पी के चलता बना...। हद है। शुक्र है। शुक्र है मालिक, तेरा शुक्र है। एक आवाज नहीं... कोई शोर नहीं...।

दो-तीन बार आवाजें दीं। भाई खाना खाने आओ, भूख लगी है। सन्नाटा और केवल सन्नाटा। अचानक एक जानी-पहचानी गंध ने मुझे अपने लपेटे में लेना शुरू किया। रेंग गया कुछ पूरे शरीर पर अर्से बाद... पहचानी-सी गंध?

...जब पारस चिमनपुरा के जंगलों में पोस्टेड थे। दोनों खेल रही थीं। किलकारियां आ रही थीं आंगन से रसोई तक। और फिर एक सन्नाटा...। सन्नाटे की गंध से भयभीत हो दौड़कर खिड़की से झांका, ओह! दोनों बच्चियों से कुछ दूर एक काला नाग फन हिलाए झूम रहा है। नौकर की आंखें पथराई पड़ी भौचक्कीं...। छह और चार साल की दोनों बच्चियां अजीब से भय और सन्नाटे से ग्रसित। वहां सांपों का निकलना औचक न था, लेकिन उस सन्नाटे की गंध में कुछ था जो मां होने के नाते झट तक आ पहुंचा था और उनकी जान बच गई थी। उसी गंध ने मानो आज फिर फन काढ़ा, दौड़कर पहुंची कमरे तक। धचके से धक्का दिया। दरवाजा खुला। दोनों के हाथ तेजी से नीचे आए। एक हड़बड़ाहट...। एक ने पास पड़ा मोबाइल थामा, तो दूसरी ने फटाफट किताब। मुझे न दिखते हुए भी दिखा था कि बड़की का हाथ छुटकी की पीठ पर था। कुर्ती के नीचे। रेंग गया कुछ, मेरी समूची देह पर। ‘क्या हो रहा है?

‘कुछ नहीं।’
‘क्या करा रही थीं?’
‘कुछ नहीं।’
‘बताओ, सच, सच...।’
‘कुछ नहीं, ऐसे ही...।’
‘ऐसे ही? ऐसे ही क्या?’
‘गुदगुदी...।’
हमेशा चिंघाड़ती बड़की चुप थी... घनघोर चुप।
‘हो क्या रहा था यह?’

‘अरे कुछ नहीं, मोबाइल से गेम खेल रहे थे, आपको देखकर छोड़ दिया।’ छुटकी ने जवाब दिया। (धड़ाक से फोन लेकर मैंने देखा था...।)

ओह... ओक्के... तिलमिलाती गंध को पूरी तरह खींचकर नथुनों में कहीं जमा लिया। अत्यधिक मुलामियत से बोली, ‘चल मेरे साथ, खाना लगवा दे।’ बाहर आते ही ज्यों सटाया उसे, अपने से बुरी तरह चिपक गई मुझसे। धड़कनें उसकी धाड़-धाड़। किचन में जाने को मुड़ीं कि कनखियों से देखा दरवाजा आहिस्ता से खोलता एक वजूद, डायनिंग टेबल पर आ बैठा है। चार आंखें मिलीं आपस में, रुकीं, नीचे झुकीं, कोई थिरकन नहीं, बर्फ की ठोस सिल्लियां।

खाने के बर्तन झूठे छितरे रहे। मैं बीते समय में पहुंच गई अपने गांव के लंबे-चौड़े घर के आंगन में। जब गर्मी की रातों में जमीन पर गद्दे बिछाकर पंक्ति में हम सोते सब एक साथ। मां और नानी की कड़ी पाबंदियों से लैस। मादाओं का घर था वह। चारों तरफ एक ही गंध, एक ही तरह के वस्त्र, मासिक पडावों के कष्ट। नानी की दबंगई और मां की अच्छी नौकरी ने हम तीनों रूपवती, गुणवती बहनों को जीवन की सुविधाएं दीं तो पुरुषों को लेकर असहजता भी। भले ही उनकी दी हुई दबंगई ने जमाने को ठेंगे पर रखने का कौशल दिया, लेकिन अभी भी दबी-झुकी नजरें परिवार और विवाह जैसी संस्थाओं से विद्रोह करने का अतिरिक्त साहस पैदा नहीं कर पाईं। तीनों बहनों में मैं बिचली। रीमा और रेणू में खूब पटती। मैं पढ़ाकू, अलग-थलग। दिखने में भी कमजोर। थोड़ी सांवली, पतली, लंबी छड़ी-सी तेल भर-भर के सिर में थोपे दो कसी चोटियां, फैशन-वैशन से दूर अपने में रमने वाली। तीनों बहनों में मात्र दो वर्षों का अंतर। वे दोनों गदबदी, गोरी, पढ़ने की कम, गप्पों की अधिक शौकीन। रोमांच से मेरे रोए खड़े हो जाते जब देखती-निकलते ही अगले मोड़ पर किताबों के बीच छुपाकर लाई बिंदी माथे पर सज जाती और लौटते वक्त वापस पन्नों पर चिपका दी जाती। मैं चाहकर भी मां से नहीं बता पाती। सही है कि जवान होती लड़कियां जाने क्या-क्या अपने सीने में दबाए-छुपाए बड़ी होती हैं। साझा करने बैठो तो पुरानी से पुरानी औरत के लिए भी कहां कुछ नया होता है। सब एक जैसी ही पीड़ा से बिलबिलाती रहती हैं।

पड़ोस की सभी लड़कियों से उनकी दोस्ती। छत पर, दरवाजे पर जब देखो, हंसी-ठट्ठा, गप्पे मारना... और मैं? उतनी ही रट्टा मारने की शौकीन, पढ़ने में खूब मन लगता। एक और काम बड़े शौक से करती, झाडू लगाने का। छत साफ, घर के सामने दूर तक गली साफ, फूल और गमले भी पसंद। मैं पानी देती, वे मुझसे बातें करते। नई कलियां मेरी आंखों की सेंक से बड़ी होतीं। फिर भी न जाने कैसे उन्हें क्या होता, सारा दिन मेरे सामने इठलातीं किसी एक रात न जाने कैसे चटक के सुबह फूल बनी मचलती मिलतीं। रातों को जागकर भी देखने का प्रयास किया, लेकिन अबूझ पहेली। बीच का समय पकड़ से बाहर ही रहता।

दीवारों पर छत की मुंडेरों पर छूटते चूने की गंध भी मुझे बेहद प्रिय होती। जीभ से छुआती... छन्न से जीभ सूख जाती। गला शुष्क हो जाता। एक महक-सी जाती अंदर तक, प्यास मरोड़े डालती अंदर नाभि तक। पता नहीं, इस उम्र की यह कैसी तृष्णा थी जो अच्छी लगती थी।

रीमा और रेणू दोनों जब देखो खी-खी करतीं, मुस्कियातीं। गर्मी में आंगन में सोते वक्त मां मुझे बीच में डाल देती। उनकी मुस्कुराहटें, तंग कर देने वाली होतीं। परेशानी की हालत में याद करते हुए मुझे लगा, अरे यही तो, एकदम यही मुस्कुराहटें उतरी हैं बच्चियों पर। दोनों निश्चित ही अपनी मौसियों पर गई हैं, वैसी ही छुपी-छुपी मुस्कुराहट! आहें, जी अब मां समझी। लेकिन यह क्या समझी मैं? कुछ रेंग गया सारे शरीर पर। यादों की गंध फनफना उठी।

मुझे नींद देर से आती थी। दोनों तरफ गर्म सांसों की निश्चिंत नींद। खुमारियों की सरगोशियां न जाने किस बेचैनी से भर देती थीं मुझे? ठंडे चांद पर टिकी नजरें जैसे गर्म आंच तलाशतीं। गली के विक्की, राजू याद आते। सीमा, मेरी इकलौती सहेली, जो उनकी दूर की बहन भी थी बताती कि उन दोनों में एक बार झगड़ा भी हुआ था- रेशमा मेरी, रेशमा मेरी... ऐसा बोलकर...।

ऐ...? मैं...? मुझे कौन पसंद करेगा, क्यूं करेगा। करेगा भी तो ये दोनों लप्पड़बाज इतनी सुंदर हैं, ठुनकती रहती हैं, मुझ तक किसे पहुंचने देंगी? लेकिन अच्छा लगता। कोई भले यकीन न करे, लेकिन सदियों यह बात रात के बियाबान पहर में लोरियों के खुशगवार लम्हों की तरह एकदम मेरे कलेजे को चीरकर प्रकट होती। मैं उत्साह, आशा, सपनों से भरी मीठी नींद सो जाती।

आज तो नींद आ ही नहीं रही। सीमा ने बताया, विक्की देहरादून जा रहा है, मामा के पास वहीं रहकर पढ़ाई करेगा। मन धक्क से रह गया।

राजू है। यहीं है। वह अच्छा भी ज्यादा है। लेकिन दोनों थे, तो दोनों की वह लड़ाई? असली दमदार बात तो वही थी, लड़ाई वाली- एक अनार दो बीमार वाली। ओह, जो रुक जाता विक्की तो मैं कह देती उससे रुकोगे तो तुम्हारी हो जांऊगी पर जाओ मत। दूर-दूर तक कोई मोबाइल न था। खामख्याली में करवटें बदलती मैं, बेचैन-सी, पूरा बदन जैसे तना हुआ खाली कटोरा था...। पानी पी लूं शायद तृप्ति लगे कि उठती-उठती थम गई मैं। रेणू का हाथ नींद मे ही चप से मेरे सीने पर पड़ा। झिड़क दूं हाथ? अरे, उठ जाएगी बंदरिया। दम साध लिया। पता न चल जाए कि अब तक जाग रही हूं... छिः न जाने क्या सोच रही हूं, चुप पड़ी रहने में ही भलाई। गुलगुथना हाथ प्यास के ऐसे स्त्रोत पर था जहां से अमृत की खान निकलती है। हटा दूं हाथ? नहीं...।

वह पल जाने कैसा था? पैर के नखने से लेकर सिर की चोटी तक अद्भुत सनसनी। उसने करवट ली। पूछा, ‘सोई नहीं अब तक।’ हाथ बिना हटाए, आंखें बंद किए ही पूछा था। ‘उहूं... सोती हूं।’ मैंने करवट बदल ली। हाथ पीठ सहलाने लगे, बढ़ने लगे जहां-जहां बंधन थे, अजीब सुरसुरी मची थी। सदियों की खुजली जमी थी मानो। बंद खुलने लगे। हाथ रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे। कांटेदार झाड़ियों में ऊंचे-ऊंचे टीले, धमकता कोई चढ़ जाए- सीधे कैलाश पर्वत... छेड़ दे तांडव...। अनिवर्चनीय सुख, वर्जित जगहों का सुख, स्पर्श-सुख, बंदिशों से पार जाने का सुख। सारा बदन मानो नन्हीं हथेलियों में दबकर पिस जाने को आतुर। बगैर किसी प्रायोजित संवाद के, इशारेबाजी के हमने इन पलों को जिया और एक सीमा के बाद मैंने कांख को लांघते हाथों को दबाकर बरज दिया, आगे और नहीं...। हम बच्चों को आगे का रास्ता मालूम न था, लेकिन मां और नानी की हिदायतें बखूबी याद थीं, ‘बीमारी हो जाती है। अपना शरीर मत छूने देना किसी को। खासकर नीचे और ऊपर की जगहें, कोई ऐसी हरकत करे, तो तुरंत बताना हमें।’

डरे हुए दोनों, रुक जाते, वहीं मर जाते, ऐसे ही जी जाते। हम दोनों अब पक्की सहेलियां थीं। एक-दूसरे के काम फटाफट निपटाती थीं। शिकायत का मौका नहीं देतीं, मुस्कुराती थीं, वहीं बड़की छिटका दी गई थी, अजनबी-सी।

एक कली जब फूल की उम्र में छलांग लगाती है तो कुछ सन्नाटे होते हैं, मुस्कुराहटें होती हैं, चटखना होता है तो बिखरने से बचना भी होता है। कत्थई गुलाबों की अपनी गंध होती है जो फौव्वारों-सी फूट पड़ती है। खाद और पानी का संतुलन उन्हें समय से पहले कुम्हलाने से बरजता है।

...

रात, दोनों बेटियों को साथ लेकर सोने गई। खूब प्यार किया उन्हें। बड़की से पूछा, ‘कहानी सुनेगी?’ सारे दिन से जमी बर्फ की गेंद पहली बार झुलसी, ‘हां।’ सुनाई मैंने, यही कहानी, मेरी अपनी कहानी। क्या हुआ था मेरे शरीर को, कैसी फुरफरी थी? कितना अनिवर्चनीय सुख, लेकिन उसके बाद क्या? कली फूल बनकर बिखरती नहीं है, अपनी सुगंध से अपनी अस्मिता का ऐलान करती है।

नन्हीं-नन्हीं फुरेरियों से थरथराते ताजे उगे दो शरीर मेरे दोनों ओर लिपट गए, ‘हां मां, ठीक कहती हो...।’ उठी, बत्ती जलाई। दोनों बच्चियां उठ बैठीं। मिचमिचाई आंखों से अपने को रोशनी में एडजस्ट किया। नजरें मिलीं। संकल्प की एक विद्युतीय लहर मुझ तक प्रवाहित हुई। मैं अब उनके बीच की कड़ी थी। हम तीनों एक दूसरे को धुली-धुली, नहाई रोशनी में निरख रहे थे। गोपनीय न था कुछ। मैंने बत्ती बुझा दी। रात परिपक्व हो चली थी। फूल मुस्कुरा रहे थे। सन्नाटा सुगंध से भरा था।
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साभार पाखी

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