कवितायेँ: नीलम मलकानिया | Poems: Neelam Malkania (hindi kavita sangrah) - #Shabdankan
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कवितायेँ: नीलम मलकानिया | Poems: Neelam Malkania (hindi kavita sangrah)

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कवितायेँ

नीलम मलकानिया

रेडियो के विदेश प्रसारण प्रभाग में कार्यरत जापान में रह रहीं नीलम मलकानिया रेडियो जापान की हिन्दी सेवा में कार्यरत हैं।
पंजाब में जन्मीं नीलम दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और हिन्दी साहित्य व रंगमंच में स्नातकोत्तर हैं तथा कॉलेज के समय से पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतन्त्र लेखन करती रही हैं। दिल्ली व मुंबई में कई नाटकों के मंचन में मंच पर और मंच-परे सक्रिय भूमिका निभाने वाली नीलम इग्नू से रेडियो लेखन में डिप्लोमाधारी भी हैं। ऑल इण्डिया रेडियो के नाट्य एकांश में रांगेय राघव, सत्यजीत रे, रवीन्द्र नाथ ठाकुर की रचनाओं का रेडियो नाट्य रूपान्तरण पेश कर चुकीं नीलम एक 'बी हाई ग्रेड' की कलाकार हैं। हिन्दी, उर्दू और पंजाबी सहित पाँच भाषाओं में कई धारावाहिकों की डबिंग करने वाली हंसमुख स्वभाव की नीलम लगभग चार सालों तक FM प्रेज़ेन्टर रही हैं साथ ही कई टेलिविज़न धारावाहिकों में अभिनय तथा धारावाहिकों का लेखन भी करती रही हैं। कई मंचों पर स्वरचित कविताओं का पाठ कर वाहवाही बटोरने वाली नीलम के साथ हमारी शुभकामनाएँ।
ईमेल: meriawaazsuno16@gmail.com
फोन : +81-80-8474-1413
नीलम मलकानिया

पूरक

उदास शाम,
शांत नदी,
सूनी आँखें,
अलसाया ऊँघता सागर,
लम्हों की मुट्ठी में क़ैद इक दुआ,
यानी तुम।
रंगीन शाम,
उफ़नती नदी,
चकाचौंध आँखें,
उमढ़ता सागर,
हाथ से फिसलती रेत,
यानी मैं।
आओ हो जाँए एक,
और रचें,
मुस्काती मदमाती शाम,
झूमती थिरकती नदी,
स्वप्निल हँसती आँखें,
लहराता गुनगुनाता सागर,
अंकुरित होता प्रेम,
यानी हम।





खेल

सृष्टि का वो छोर थामे तुम,
सृष्टि का ये छोर थामे मैं ।
खेलते खेल जन्मों-जन्मों से,
युग-युग से बँधे और बाँधते।
बना हर लोक, नए खेल का पाला न्यारा,
ग्रह,उपग्रह,उल्कापिंडों के खगोलीय खेल में।
अखंडित खेल शाश्वत मेरा तुम्हारा प्यारा ।।
रचते-धरते रूप नए,कर्म-भोग का करते हिसाब,
अनंत यात्रा में संग सदा, रहे मिलन की आस ।
पल भर छोड़ ये नश्वर तन,
चलो ना फिर प्रकाश-कण बन।
बार-बार, हर बार इस निरंतर धारा में,
जी लें हम अपना सुख,भरे अंजुरी प्रेम की।
ब्रह्माण्ड की इस अक्षय आभा में,
शून्य से शुरु होगी फिर यात्रा नई।




आँकड़े
(परमाणु बम हमला)

सुदूर द्वीप पर उगती होगी,
कच्ची सी धूप कुछ पहले ही,
लाल-पीले इचो पर लिख,
कुछ इबारतें इतिहास की,
मानवता झूमती होगी बेसबब,
लरजते चैरी के शालीन फूलों सी।
बहती शिनानो को बाँध फुजि के खूँटे से,
गढ़ा होगा वर्तमान नया।
मशरूमी बादलों पर चढ़ता होगा इंडैक्स।
आँकड़े जीतते हैं देश।
जीते हैं लोग, मरते हैं लोग,
साँसे लेते रहते हैं आँकड़े।




ब्रह्माण्ड

मैं नाराज़ हूँ ईश्वर से,
बहुत सीमित उसने मुझे दिया।
मेरे सारे अस्तित्व को,
मात्र पाँच तत्वों में बाँध दिया?
केवल भूमितत्व के होने से ही,
मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ ।
भूमि का अदृश्य अंश नहीं,
मैं चाहती हूँ समस्त भू ।
नहीं सन्तुष्ट जल तत्व से,
कुछ अधिक पाने की है आस।
पानी की बस बूँदे नहीं ,
जल देव हैं मेरी प्यास।
खोखली आस के ही बल पर,
नहीं सीचूँगी आशाओं का चमन।
चँद नील कुसुम नहीं ,
मुझे चाहिए सारा नीलगगन।
देखना ही नहीं चाहुँगी ,
मात्र पवन के झलकोरों को।
बाँधना चाहती हूँ आँचल से ,
समस्त पवन के हलकोरों को।
अस्तित्व मेरा नहीं निर्भर करता तेज तत्व पर।
बिंदिया बनाने को माथे की ,
मुझे चाहिए प्रत्यक्ष दिवाकर।
अब भी आकाँक्षा अंश शेष हैं मेरे,
कुछ अधूरे-अधूरे से परिवेश हैं मेरे।
मैं फूलों की कोमलत चाहती हूँ,
शशि की शीतलता चाहती हूँ ।
नदियों की भाँति बहना चाहती हूँ,
पक्षियों की भाँति उड़ना चाहती हूँ।
बूँदों की तरह गिरना चाहती हूँ,
लहरों की तरह उठना चाहती हूँ।
कलियों सी महकना चाहती हूँ,
फूलों सी खिलना चाहती हूँ ।
हरी दूब पर ओस सी चमकना चाहती हूँ,
बाद बारिश के खिली धूप सी दमकना चाहती हूँ।
मूक नयनों से गाना चाहती हूँ।
प्यार बन सबमें बस जाना चाहती हूँ ।
चंद शब्दों में कहूँ... मैं ब्रह्माण्ड हो जाना चाहती हूँ
मैं ब्रह्माण्ड हो जाना चाहती हूँ।



रूप बदलती औरत

कहती है दुनिया, रूप बदलती है औरत,
टिकता नहीं मन का घड़ा,'त्रिया चरित्र'।
हाँ रूप बदलती है औरत,
फिर बदल देती है सबकुछ।
मछली पकड़ने के काँटे सी,
पड़ी रहती उपेक्षित ख़ामोशी में।
खो अस्तित्व अपना बस इतंज़ार में,
सफलता करके नाम परिवार के।
बन जाती है औरत इक चक्की,
अनायास सख़्त पथरीली राहों से,
हटाती चुभन सख़्त मुसीबतों की।
बिछाती रहती बारीक आटा दुआओं का।
माँ-बीवी होने के दो पाटो में बँटी,
तैयार करती रहती क़िस्मत अपनों की।
वो मथानी भी तो औरत ही है ना,
घूमती रहती जो अनवरत खट्टी मलाई में,
कड़ी मेहनत से निकाल लाती है,
उजला मक्खन अधिकारों का।
समाज की हर बुराई को छितरा,
मीठास कर देती है अपनों के हवाले।
नीम बन जाती है कभी औरत।
कड़वी-कड़वी और कड़वी,
ना फूल सुंदर ना फल मीठा,
फिर भी जड़ से फुनगी तक,
आती रहती है काम..दातुन,निम्बोली और पत्ती बन।...
उफ़्फ कितने रूप बदलती है औरत...
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