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कहानी - युद्ध और बुद्ध : मधु कांकरिया | The best story written on the human side of Kashmir-Terrorism

मई 5, 2015

एक-एक रोआँ कहानी 'युद्ध और बुद्ध' पढ़ते समय खड़ा रहा... और ख़त्म होने तक बरौनियाँ तर।  मधु कांकरिया ने कश्मीर-आतंकवाद के मानवीय हिस्से पर सबसे बेहतरीन कहानी लिख दी है!

भरत तिवारी
(५/५/२०१५, नयी दिल्ली) 

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युद्ध और बुद्ध

: मधु कांकरिया

    वे आंखें कभी नहीं भूलेंगी।

    न वह दिन।

    न वह तारीख। खाली होते ही दोने में धरे दीपक की तरह यादों की नदी मुझे बहा ले जाती है वहां जहां उम्र के इस टीले पर खड़े हो पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि मेरा असली ‘मैं’, मेरा असली चेहरा पीछे कहीं दूर बहुत दूर छिप गया है कि मैं अपने से दूर बहुत दूर जा चुका हूं- “मैं ढूंढ़ रहा हूं कब से, वह चेहरा जो मेरा था।
 
    
    यह सारा अफसाना उसी खोए चेहरे का है क्योंकि मेरे साथ दिक्कत यह थी कि मैं मेजर विशाल राणावत सिर्फ एक समर्पित और कर्त्तव्यनिष्ठ फौजी ही नहीं था, फौजी के अलावा भी कुछ और था।

    यह सारी कहानी उस कुछ और की है। सोचकर अजीब लगता है कि मैं मेजर विशाल राणावत कोई व्यक्ति नहीं मात्र कुछ तारीखों का गुच्छा भर हूं।

    पहली तारीख मुझे याद नहीं है, बस इतना भर याद है कि उन दिनों मीठा-मीठा मुस्कराता रहता था और सोचता रहता था कि मैं कब फौजी बनूंगा। क्योंकि उन दिनों जादू और रोमांस से भरा फौजी शब्द मुझे ईश्वर की सबसे बड़ी नियामत लगता था। अठारह वर्ष की उम्र। अबोध अनजान दुनिया और आर्मी का जादू। मेरे दूर के रिश्ते की बहन के पति फौज में कर्नल थे। जब-जब वे मुझे मिलते, मैं लहर-लहर हिल उठता उनके एक-एक ठहाके पर। बचपन की उम्र में भी वे इतने भड़क और कुरकुरे थे जितना कि शायद मैं अपने बचपन में भी नहीं था। और मेरे पिता लाहौल बिलाकूवत! पैंतालीस वर्षीय मेरे पिता उनके सामने इतने थुलथुल, बीमार और सिलवटों से भरे दिखते थे कि मैं विरक्ति से भर उठता था और सोचता था कि मैं कब फौजी बनूंगा? पिता के माथे पर हर वक्त सिलवटें खिंची रहतीं, उनका चेहरा हमेशा झुंझलाया रहता और उनकी बनिया खोपड़ी में हमेशा नफे-नुकसान का हिसाब-किताब चलता रहता। वित्त सत्य ही उनका जीवन सत्य था और वे उसी को समर्पित थे। उनकी जैसी स्टिल लाइफ मुझमें वितृष्णा जगाती। उनके और उनके माथे पर स्थायी रूप से खिंची रहने वाली सिलवटों के बीच वही रिश्ता था जो फौजी और उनकी बंदूक के बीच होता है। उन दिनों मेरे जेहन, दिल-दिमाग, स्वप्न और चेतना सब पर फौजी छाया रहता और मैं सोचता कि मैं क्या करूं कि फौजी बन जाऊं। बहुत जतन से पाली अपनी फौजी बनने की इच्छा को मैं हर दिन सींचता कि वह कुम्हला न जाए और अकसर अपने उन फौजी जीजू की नकल करता, उनके जैसे ही ठहाका मारकर हंसता। उनके जैसे ही कड़क चाल चलता। चलते वक्त यह विशेष खयाल रखता कि मेरे जूतों से भी वैसी ही आत्मविश्वास से भरी ठकठक निकले जो फौजी जीजू के जूतों से निकलती थी। मैं खूब दूध पीता, फल खाता कि मेरा सीना चौड़ा हो जाए। मैं खूब तंदुरुस्त दिखूं और फिजिकल फिटनेस टेस्ट में मात न खा जाऊं।

    मैं मेजर विशाल राणावत उस दौर की पटकथा लिख रहा हूं जिन दिनों मुझे राष्ट्रीय राइफल्स 24 में भारत के सबसे संवेदनशील इलाके गुंड गांव में अल्फा कंपनी का कंपनी कमांडर बनाकर भेज दिया गया था। 2002 का वह समय जब दिल्ली में लाल किले से शांति के प्रतीक कबूतरों को उड़ाया जा रहा था और कश्मीर में गोले बरस रहे थे। हालांकि हिंसा, खूनखराबा और बमबारी का ग्राफ शीर्ष पर पहुंचकर अब अवरोही मोड़ लेने लगा था। इस अवरोही मोड़ तक पहुंचने के लिए कितना दिमाग आर्मी ने खपाया था, कितना इनसानी खून बहा था और कितना क्षरण इनसानियत का हुआ था, इसका हिसाब तो शायद कोई चित्रगुप्त भी न रख सके। बहरहाल हमारा मिशन था, इस अवरोही मोड़ को बरकरार रखते हुए कश्मीर के हालात का सामान्यीकरण और इस सामान्यीकरण का मतलब था बहुत सुंदर और मानवीय का सफाया।

    ‘मिलिट्री’ और ‘मिलिटेंट’ ये दो शब्द ऐसे थे जो उन दिनों धूप और हवा की तरह कश्मीर की फिजा में रच-बस गए थे। हर नुक्कड़ पर फौजी। हर फौजी की आंख में एक सपना और हर सपने में मिलिटेंट का सफाया।

    मैंने भी सपनों के कुछ गुच्छों के साथ कश्मीर की खूबसूरत वादियों में कदम रखा था। वे सपने थे - राष्ट्र की एकता, अखंडता और गरिमा की रक्षा पर कश्मीर की सरजमीं से विदा होते-होते मेरी आंखें रोती थीं, मेरे पास कोई सपने नहीं थे। इसलिए नहीं कि मैंने ऐसा चाहा था कि अपने सारे सपने लुटाकर यहां से रुखसत करूं। वरन् इसलिए कि निकलते वक्त मेरी आंखें इनसानियत के धुएं से भरी हुई थीं। क्योंकि जब पीड़ित इनसानियत मेरे सामने घुटने टेककर मुझसे मदद की गुहार लगा रही थी, मुझे उसे रौंदते हुए आगे बढ़ जाना पड़ा था। क्योंकि यहां मेरी आत्मा, इनसानियत, विश्वचेतना, मानवप्रेम, हमदर्दी, सहानुभूति, करुणा, प्रेम जैसी मानवीय अनुभूतियां जिस एक जंजीर के लहूलुहान थीं उसका नाम था - ऑर्डर - हमें ऐसा करने का ऑर्डर नहीं और यह ‘नहीं’ मेरे और मेरे इनसान के बीच, मेरे और मेरी मुक्तात्मा के बीच, मेरे और मेरी अंतरात्मा के बीच हर लम्हा टकराता और जब-तब मुझे इस पीड़ा भरे अहसास से भर देता कि मुझसे ज्यादा मुक्तात्मा इन खूबसूरत वादियों में भैंस, सूअर और बकरियां थीं जो अपनी मर्जी के मुताबिक हिलडुल सकती थीं। कहीं भी निकल सकती थीं।

    नहीं, यह हमारे साथ धोखा नहीं था। हमीं नहीं समझ पाए थे कि क्या होता है फौजी होने का मतलब। हमीं नहीं समझ पाए थे अपनी उस शपथ को जो हमने पासिंग आउट परेड में टोपियां उछालने के बाद फौजी जीवन में पूरी औपचारिकता के साथ प्रवेश करते वक्त ली थी। कितनी बहुआयामी, व्यापक, दमघोंटू और बहुअर्थी शर्त थी वह। मैंने शपथ ली थी जिसके भाव इस प्रकार के थे कि “मेंरा पूरा जीवन भारत के राष्ट्रपति के नाम समर्पित रहेगा। मुझे जहां भेजा जाएगा मैं जाऊंगा, जो कहा जाएगा करूंगा।”

    “कि भारत और उसके संविधान के प्रति पूरी निष्ठा से काम करूंगा।”

    “कि मैं अपना हित सबसे अंत में सोचूंगा।”

    और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनना भी तो अपने हित की परिधि में ही आता है। इसलिए यहां अंतरात्मा की आवाज, आंतरिक सौंदर्य-संवेदना का उजास और मानवीय मूल्य जैसी समस्त उच्च अनुभूतियों को देश-निकाला मिल जाता था। यदि किसी ओने-कोने में वे अटकी मिल भी जातीं तो बड़ी अवास्तविक लगतीं।

    यहां स्वाभाविक लगता था सिर्फ आदेश/ऑर्डर। जैसे कुछ आदिम जनजाति यह मानती हैं कि आत्मा शरीर से बाहर रखी जा सकती है इसलिए उनके वीर जब युद्धभूमि पर जाते तो अपनी आत्मा को अपने घर में सुरक्षित रखकर जाते।

    यहां गुंड में आकर मैंने समझा क्या है इसका अर्थ। क्योंकि यहां आत्मा को साथ लेकर चलना असंभव था जो आत्मा से जितना दूर वह उतना ही कुशल अफसर।

    श्रीनगर से 40 किलोमीटर दूर , सोनमर्ग के रास्ते किसी आदिम गावं सा पसरा गडुं गावं । अशिक्षा, गरीबी, बेकारी और मजहबी कट्टरता के कोहरे से घिरा ऐसा गांव जहां की वृद्धाएं तो वृद्धाएं, नए जमाने की रमणियां तक बात-बात में अल्लाह को घसीट लातीं। बच्चा हो, जवान हो, बूढ़ा हो, औरत हो, मर्द हो, अल्लाह से सबकी हॉट लाइन जुड़ी हुई थी। यहां भोजन की पैदावार कम और बच्चों की पैदावार ज्यादा थी। हर घर में ढेर सारे बच्चे।

    यों गांव खूबसूरत था, पर यहां की हवाएं, पहाड़ियां, खूबसूरत वादियां, चश्मे, गुनगुनाती धूप, दूधिया तिलिस्मी बादल कुछ भी लोगों को सुकून नहीं दे पाते थे क्योंकि लोगों के मिजाजों में खूबसूरती नहीं थी। वे वर्तमान में कम मिथक, अधकचरे इतिहास और कुरान में ज्यादा जीते थे। जाहिर है ऐसी माटी में आतंकवाद के जीवाणु खूब फलते-फूलते। दिन में यह गांव किसी आदिम गांव सा ऊंघता-उबासी लेता लेकिन अंधेरा घिरते ही गांव की सरहद पर बेचैन आत्माएं भटकने लगतीं। आतंकवाद केंचुए की तरह रेंगने लगता। कभी इस पार से उस पार तो कभी उस पार से इस पार। कभी घर से बाहर तो कभी बाहर से भीतर।

    ऐसे ही गांव का मैं एरिया कमांडर था जहां बीसवीं सदी ने अभी प्रवेश नहीं किया था। पिछले कई सालों की तुलना में उस साल स्थिति काफी नियंत्रण में थी क्योंकि अब खुले खुलेआम ‘हिंदुस्तानी कुत्ते वापस जाओ’ या ‘कश्मीर की मंडी रावलपिंडी’ जैसे उत्तेजक नारे सामूहिक रूप से तो नहीं लगते थे, पर दबा-दबा आक्रोश और ढका-ढूमा ज्वालामुखी गुंड, कंगन, पुंछ, राजौरी, सोपोर और अनंतनाग जैसे अति संवेदनशील इलाकों में चप्पे-चप्पे पर था। मेरे अधीन कार्यरत लांस नायक, प्रताप सिंह एक बार रो पड़ा था, “सर जी, कभी मेरी बंदूक चल जाएगी तो मुझे दोष मत देना, आज चुपचाप ड्यूटी पर खड़ा था, जाने कहां से तीन मुसल्ले प्रकट हो दूर से ही मुझे देख जमीन पर घृणा से थूकने लगे। उनकी आंखों से घृणा की चिंगारियां फूट रही थीं। यदि कानून का डर नहीं होता तो मुझे वे फाड़ ही डालते।”

    मेरे जेहन में कौंध गया कैप्टन अजय वर्मा का शव जो एक ऑपरेशन के दौरान जिंदा उनके हाथ लग गया था। और जिसे उन्होंने इस कदर सलाद की तरह चिंदी-चिंदी काट डाला था कि घृणा से आप सुलग उठें।

    बहरहाल, ऐसे ही माहौल और ऐसी ही स्थितियों में मेरा काम था अपने इलाके से मिलिटेंसी का सफाया करना। लोगों के बीच भारतीय फौज और भारत सरकार के प्रति सद्भावना फैलाना। कश्मीरियों का मन जीतना। जाहिर है हिंदू और हिंदुस्तान विरोधी वातावरण में ऐसे काम अपनी हिंदू पहचान बरकरार रखकर नहीं किए जा सकते थे। इसलिए मुझे आर्मी ने एक मुस्लिम नाम दिया - हकीम अली कबीर। मैंने उर्दू जुबान सीखी, मुस्लिम अदब-कायदे जाने और अपनी पुरानी पहचान, संस्कार और अस्तित्व को मिटाते हुए नया अवतार लिया - मियां का अवतार। अब मैं गुंड गांव के चप्पे-चप्पे, बच्चे-बच्चे, पत्ते-पत्ते से पानी की मछली की तरह घुलने-मिलने लगा। धीरे-धीरे मैं उस इलाके का इनसाइक्लोपीडिया बन गया - किस घर के तार आतंकवाद से जुड़ हुए हैं, या पूर्व में कभी जुड़े हुए थे। किस घर में कितने युवा लड़के हैं, किनके साथ उनका उठना-बैठना है, किस घर से आतंकवादी निकल चुके हैं, किस घर का लड़का एनकाउंटर में मारा जा चुका है। गांव के असरदार लोग कौन हैं? कौन बाहर से आया? कौन बाहर गया? गर्ज यह कि अब हम फौजी अफसर से स्थानीय पुलिस में रिड्यूस हो चुके थे। गांव में यदि बच्चा भी जन्म लेता तो उसकी गूंज हमारे हेडक्वार्टर तक पहुंच जाती।

    जैसे मिलिटेंट हमारी गोली का शिकार हो सकता था वैसे ही हम भी कभी भी कहीं भी मिलिटेंट की गोली का शिकार हो सकते थे। इसलिए मिलिटेंट चौबीसों घंटे हमारे दिमाग, हमारे स्वप्न, हमारी कल्पना यहां तक कि हमारी नींद में भी मेघालय के तिलिस्मी बादल की तरह हम पर छाए रहते। लगता जैसे उनके होने से ही हमारे अस्तित्व का कोई अर्थ था। उनके होने से ही हम अपनी जिंदगी को शिद्दत से महसूस करते थे क्योंकि कई बार मैं उनके हाथों मरते-मरते बच चुका था। और जिंदगी की कीमत और शान का अर्थ समझ चुका था।

    एक बार कड़कती ठंड और घनघोर बारिश में मैं नारायण नाग से गुजर रहा था। मैं सिविल ड्रेस में था। अपने किसी मित्र से मिलकर आ रहा था। रास्ते में मैंने ठंड से थरथराती एक युवती को देखा। काले बुर्के के अंदर। मैंने गाड़ी धीमी की और सोचने लगा कि मैं कैसे उसकी मदद कर सकता हूं। मुझसे आंखें मिलते ही उस युवती ने मुझसे लिफ्ट मांगी। खुशी-खुशी उसे अंदर कर लिया। बंद गाड़ी में भी कांप रही थी वह। मैंने हीटर चालू कर दिया। करीब पांच किलोमीटर बाद जैसे ही ढलान शुरू हुई, युवती उतर गई। मैं बस आधा किलोमीटर और आगे बढ़ा हूंगा कि सीआरपीएफ के जवानों ने मुझे घेर लिया। बाद में जब मैंने अपना आइडेंटिटी कार्ड दिखाया तो वे सकते में आ गए। उन्होंने कहा, महानसीब आप बच गए, जिस महिला को आपने पनाह दी वह एक खतरनाक मिलिटेंट थी।

    इस घटना ने मेरी दृष्टि और मेरे नजरिए दोनों को एकदम बदल डाला। मैं दुनिया को ही शक की निगाह से देखने लगा। मानवीय संबंधों से ज्यादा मैं अपनी निजी सुरक्षा की चिंता करने लगा। यूं भी हमें अपने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा चौबीसों घंटे सतर्क, एलर्ट एवं चौकन्ना रहने की हिदायत दी जाती थी। चौकन्ना रहते-रहते मैं इतना चौकन्ना रहने लगा कि एक बार श्रीनगर से 50 कि.मी. दूर बूशन कैंप में आया मेरा छोटा भाई गेस्ट हाउस में मेरे साथ सोया था। रात उसे ओडोमॉस क्रीम की आवश्यकता पड़ी। उसने नींद में ही मुझे कुहनी मारी। मेरा हाथ सीधे मेरी ए-के- 47 पर पड़ा। भाई हैरान। विस्फारित नेत्रों से ताकते हुए उसने मुझसे कहा, “रिलैक्स। क्या नींद में भी तुम्हें मिलिटेंट ही दिखते हैं।” मैं हंस दिया क्योंकि जिस चीते की सी फुर्ती के साथ मेरा हाथ ए-के- 47 पर गया था कि वह सहम गया था। अब मैं उसे क्या बताता कि चारों तरफ से अति सुरक्षित इस बेस कैंप तक में भी फिदाईन हमला हो चुका था और तब से हमारे बेस कैंप में भी शाम ढलते ही ब्लैक आउट हो जाता है और यह ब्लैक आउट में रात में भी यह भूलने नहीं देता है कि हम मिलिटेंट के निशाने पर हैं।

    दिन बीतते रहे। जिंदगी का दबाव बढ़ता रहा। कैंसरग्रस्त रोगी के से दिन। हर पल की चौकसी। हर पल की मलहम पट्टी। हर पल मौत की आहट। यह शहीद...वह ढेर। यहां विस्फोट, वहां मुठभेड़। यहां ऑपरेशन, यहां घेराबंदी-हर पल की खबर। मैं ललक रहा था उस जिंदगी के लिए जो कहीं और थी। मेरे आने के बाद प्रकृति ने भी रंग बदल लिए थे। हरियाली का भी रंग बुझ गया था। मौसम बदल चुका सा था, पर हमारे जीवन का ताप और मौसम वही का वही था। हिंसा और मिलिटेंसी सदा सुहागिन की तरह बदले मौसम में भी झेलम नदी सी इठला रही थी कि तभी हमें गुंड में एक ऐसे परिवार की खबर लगी जिसका सबसे बड़ा बेटा जमील साल भर पूर्व ही ताजा-टटका मिलिटेंट बना था। मेरा तत्काल लक्ष्य था उस मिलिटेंट का सफाया, इससे पूर्व कि वह कोई वारदात करे। सारे विवरण मेरे पास आ चुके थे, परिवार का इतिहास, भूगोल, जमील की तस्वीर...सब कुछ। दो छोटे भाई जमील के, एक युवा होती छोटी बहन। बेहद गरीब बीपीएल (गरीबी की सीमा रेखा के नीचे का) परिवार। मां रुक्साना। बहन रूबीना। एक छोटे भाई-हमीद। दूसरे का नाम हसन। जीविका के लिए दो बूढ़े घोड़े थे जो नारायण नाग में सैलानियों की सवारी के लिए सीजन में निकलते और परिवार को भुखमरी से बचाते। घर के आगे थोड़ी सी जमीन थी। जहां कुछ मुर्गे कुड़कुड़ाते रहते।

    इंडक्शन (कश्मीर-नियुक्ति के समय दी जाने वाली महीने भर की महत्त्वपूर्ण ट्रेनिंग) कोर्स के दौरान हमें ट्रेनिंग दी जाती थी कि आतंकवादी के ठौर-ठिकाने का पता लगाने के लिए जरूरी है परिवार की ‘वीक लिंक’ का पता लगाना। ‘वीक लिंक’ यानी मिलिटेंट के परिवार या बृहत्तर परिवार में से किसी ऐसे कमजोर रिश्तेदार को अपनी ओर मिलाकर उससे मिलिटेंट का भेद लेना जिसे किसी भी प्रकार के लालच से खरीदा जा सके, या जो आर्थिक या कानूनी रूप से कर्जे वगैरह से या मामला-मुकदमा से परेशान हो। जमील के मामले में हमें ऐसी कोई भी वीक लिंक हाथ नहीं लग पा रही थी जिसके जरिए हम जमील तक पहुंच सकें। गांव में छोडे़ गए हमारे मुखबिर ने हमें यह पक्की खबर दी कि जमील के मिलिटेंट बनने के बाद उसके घर में थोड़ी समृद्धि की चमक आने लगी है, उसके घर की टूटी छत फिर से बनने लगी है। मुखबिर का अनुमान था कि शायद जानलेवा गरीबी से निजात पाने के लिए ही जमील ने यह रास्ता पकड़ा है।

    हम जब-तब उस गांव में गश्त लगाते। उजड़ा और वीरान गांव जिसके अधिकतर युवा या तो मारे जा चुके थे या ए-के- 47 उठाए गांव के बाहर थे। बची रह गई थीं बेवाएं या वृद्ध, वृद्धाएं।

    मैं कड़कती आवाज में जमील के अब्बू से कश्मीरी में पूछता-“नसे कछी छुई नेदू” (बता तेरा बेटा कहां है?)। वह थर-थर कांपता। सारा घर कांपता। हिचकी लेते, हकलाते हुए वह कहता, “मैं छुप पता” (मुझे नहीं पता)।

    मैं बंदूक पर हाथ रख सीधे उसकी आंखों में आंखें डाल उसे घूरने लगा तो वह जाने क्या-क्या कहता, जिसे मैं समझ नहीं पाता। अनुवादक मुझे कहे तो हिंदी में अनुवाद कर बताता-कसम ले लो, छह महीने से नन्हे मियां की शक्ल भी यदि देखी हो।


Madhu Kankaria
जन्म   23rd March, 1957
शिक्षा :M.A. (Eco),Diploma (Computer Science)

उपन्यास 
• खुले गगन के लाल सितारे
• सलाम आखरी
• पत्ता खोर
• सेज पर संस्कृत  
• सूखते चिनार
कहानी संग्रह
• बीतते हुए
• और अंत में ईसु
• चिड़िया ऐसे मरती है
• भरी दोपहरी के अँधेरे (प्रतिनिधि कहानिया)
• दस प्रतिनिधि कहानियां
• युद्ध और बुद्ध
सामाजिक विमर्श 
• अपनी धरती अपने लोग
• यात्रा वृतांत : बादलों में बारूद
सम्मान 
• कथा क्रम पुरस्कार 2008
• हेमचन्द्र स्मृति साहित्य सम्मान -2009
• समाज गौरव सम्मान -2009 (अखिल भारतीय मारवारी युवा मंच द्वारा)
• विजय वर्मा कथा सम्मान  2012
अनुवाद
• सूखते चिनार का तेलगु में अनुवाद
• Telefilm - रहना नहीं देश विराना है, प्रसार भारती
• पोलिथिन  में पृथ्वी कहानी पर फिल्म निर्माणाधीन
सम्पर्क :
H-602,Green Wood Complex, Near Chakala Bus Stop,
Anderi Kurla Rd, Andheri (East),
Mumbai-400093.
Mobile:-09167735950.
e-mail: madhu.kankaria07@gmail.com


    “तो फिर घर में पैसे कहां से आए? दिखा, मनीऑर्डर की रसीद!” बोलते-बोलते मेरी आवाज के कोने अनायास ही नुकीले हो जाते। उसके डर का रंग और भी गाढ़ा हो जाता। अपने मटमैले फिरन से आंसू पोंछते, और सामने के दो टूटे दांतों को दिखाते हुए वह फिर कलपता, “ साहब जी, पैसे तो बेटे ने अपने किसी आदमी के मार्फत भेजे थे।” बोलते-बोलते किसी अनिष्ट की आशंका से वह फिर कांपने लगा। उसके कांपते होंठ लड़खड़ाते कदमों और झरझर झरती आंखों से दुःख की महागाथा फूटती। वह मुझे इसी सदी का सबसे अभिशप्त पिता लगता।

    मेरे भीतर की आवाज कहती दुःखी मत होओ बाबा, वह आ जाएगा। पर मैं कहता सच-सच बता, तू उससे कब मिला था, कहां मिला था? वह फिर कलपता और अपने छोटे बेटे के सिर पर हाथ रख रोते हुए कहता, “ साहब जी, छह महीने हो गए उसकी शक्ल देखे।”

    मैं जानता था कि जमील का अब्बू ठीक कह रहा था कि छह महीने से उसने जमील का चेहरा भी नहीं देखा था क्योंकि मिलिटेंसी के भी अपने सख्त नियम होते हैं जिसके तहत मिलिटेंट का एरिया और ऑपरेशन उसके घर से खासी दूरी पर रखा जाता है जिससे उसमें किसी भी प्रकार की भावनात्मक कमजोरी न आने पाए। पर वह अभी कहां है। उसका थोड़ा-बहुत अंदेशा उसके घर वालों को जरूर होगा यह भी मैं जानता था। बहरहाल उस दिन मैं निहायत शराफत से पेश आया।

    पर मेरे दिमाग की बत्ती जल गई। छह महीने से यदि जमील अभी तक घर नहीं आया है तो निश्चित ही वह आने वाले दिनों में घर आने की योजना बना रहा होगा। आखिर आदमी कितना भी कठोर क्यों न हो जाए, पूरी तरह कंकड़-पत्थर तो बन नहीं सकता है और यदि बनता भी है तो बनते-बनते बनता है पर जमील अभी महज बीस साल का था। कोमल पत्ता था।

    जमील के अब्बू से बात कर मैं उसकी अम्मी की तरफ मुखातिब हुआ। वह मरते हुए कबूतर की तरह फड़फड़ा उठी। उसकी आंखें डर से फटी पड़ी जा रही थीं। एक बार तो वह समझ ही नहीं पाई कि माजरा क्या है। न किसी से दुश्मनी, न झगड़ा-टंटा। न जमीन, न जायदाद। किसी से धत् तेरी की भी नहीं...फिर उसके यहां आर्मी का क्या काम।

    क्या घर में जवान लड़के का होना मतलब आर्मी का आना-जाना? उसने उन घरों में देखा था आर्मी और पुलिस को अकसर आते-जाते जहां लड़के जवान थे या जेहादी हो गए थे। तो क्या उसके घर में भी है कोई जेहादी?

    क्या जमील? उसका सर्वांग कांप उठा।

    और जब उसकी अठारह वर्षीया बेटी रूबीना ने उससे कश्मीरी में कहा, भाई जान जिहादी हो गए हैं तो वह इस कदर चीखी कि आसमान शामियाने की तरह हिल उठा। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि जिसे वह कल तक उंगली पकड़े-पकड़े मदरसे छोड़कर आती थी उसने जाने कब उठा ली गन और बन गया जिहादी।

    और उसके बाद यातना की ऊंघी सुरंग में लुढ़के उस परिवार का जीना मौत से बदतर हो गया। खुशियां तो उस घर में शायद ही कभी उगी हों पर थोड़ी जो सुकून-शांति थी वह भी बसेरा छोड़ जा चुकी थी और अब वहां था ठंडा गहरा अंतहीन अंधेरा जिसमें जिंदगी से खौफ खाए पांच जीव थे। हर आंतरे-पांतरे हम उस घर में पहुंच जाते, उन्हें धमकाते, उसके दोनों छोटे भाइयों को अपने फौलादी हाथों के झन्नाटेदार थप्पड़ का स्वाद चखाते और पूछते, “नसे कैटि छुई” (बता, तेरा जमील कहां है)। उसके दोनों भाई थप्पड़ खा बिलबिलाते जमीन पर गिर पड़ते, चीखते पर मुंह नहीं खोलते।

    उसकी अम्मी कफन की तरह ओढ़े अपने फटे बुरके से थोड़ी देर के लिए बाहर निकलती, छाती-माथा पीटती बच्चों को खींचती फिर उसी कफन को वापस ओढ़ लेती।

    यहां तक तो फिर भी गनीमत थी क्योंकि हम आर्मी वाले थे। कलफ लगी लकदक चमचम वर्दी वाले थे, शरीफ थे। हम मारते तो भी सभ्यता से, शराफत से। लेकिन बहुत शीघ्र ही इस केस में पुलिस भी आ गई और अब यह हमारा और पुलिस का ज्वाइंट वेंचर था। यूं भी हम पुलिस को साथ लेकर ही चलते थे जिससे हमारी किसी भी कार्यवाही पर पुलिस एक्शन न ले सके। हमें कोर्ट में नहीं घसीट सके।

    पुलिस के अपने तौर-तरीके, अपनी भाषा और अपना शिल्प। पुलिस वालों ने बहुत जल्दी उस परिवार की वीक लिंक यानी कमजोर कड़ी खोज निकाली रूबीना की जवानी और वयःसंधि की ओर बढ़ते जमील के छोटे भाई हमीद का कच्चा मन।

    अब पुलिस ने अपने टॉर्चर, हिंसा, खौफ और जिल्लत का वह चंदोवा ताना कि घर की ईंट-ईंट सिसक उठी। वह हर सप्ताह हमीद को थाने पर बुलाती, उसे पीट-पीट नीला कर देती। उसके बदन पर पिटाई के निशान न उभरें, इसलिए पुलिस उसे गीले कंबल में लपेटकर पीटती, जिससे किसी भी सूरत में मानवाधिकार हस्तक्षेप न कर सकें। यूं भी वह बेहद गरीब परिवार था, विरोध और सामर्थ्य से कोसों दूर। हमीद मार खाता रहता पर मुंह नहीं खोलता तो पुलिस का गुस्सा और बढ़ जाता। वह उसके घर आ धमकती, वहां अड्डा मारती। सिगरेट के छल्ले उड़ाती, उसकी जवान बहन रूबीना को घूरती, उससे गंदे-गंदे मजाक करती, भद्दे इशारे करती। उसके सामने मां-बहन की ऐसी अश्लील और भद्दी गालियां निकालती कि जमील के अब्बू रो पड़ते, सिर पीटने लगते। पुलिस के जवान उसकी मां को समझाते कि यदि वह अपने परिवार, अपनी बेटी और बाकी बच्चों की खैर चाहती है तो बता दे जमील कहां है या कब आने वाला है। जमील की मां माटी के लोंदे सी घर के कोने में पड़ी रहती और पथराई आंखों से देखती रहती।

    सिलसिला चलता रहा। परिवार स्वप्नविहीन और भविष्यहीन होता रहा। यातना और उत्पीड़न का अंधेरा अमावस्या की रात की तरह बढ़ता रहा। हर नए दिन के साथ घना होता रहा।

    एकाएक उन दिनों आतंकवादी वारदातों में इजाफा हो या। राजौरी में हुए एनकाउंटर में हमारे दो मेजर शहीद हो गए। इस घटना से हमारे ऊपर दबाव बढ़ता जा रहा था।

    हमारा गुस्सा बढ़ता जा रहा था।

    उस परिवार की चुप्पी ने हमारे भीतर दुबके बैठे पशु को हिंसक कर डाला। हमारा टॉर्चर इतना बढ़ा कि परिवार मुर्दा हो गया। जीवन के चिह्न दिन पर दिन मिटते गए।

    झेलम सी इठलाती रूबीना सूखती गई। उसके चेहरे पर बदसूरत रेखाएं खिंचती जा रही थीं। हमीद की पढ़ाई छूट गई थी। वह विक्षिप्त होता जा रहा था। दोनों बूढ़े घोड़े सैलानियों को घुमाने की बजाय बाहर बंधे मिलते। उसके अब्बू घर के कोने में कंबल ओढ़े अपने आप से बतियाते मिलते। मैं जब भी उस घर में घुसता मुझे मरी हुई सभ्यता की बदबू आती। मेरा दम वहां घुटने लगता क्योंकि वहां हवाएं रुकी हुई थीं और जिंदगी किसी कोने में मुंह छिपाए सुबक रही थी।

    एक बार तो इंतिहा हो गई। जैसे ही हम पुलिस के साथ उस घर में घुसे, हमें देखते ही डर के मारे हमीद का पेशाब निकल गया। मुझे लगा, उसका पेशाब नहीं निकला वरन् आदमी होने की जो शुरुआत मैंने कभी की थी उसकी डोर पूरी तरह मेरे हाथ से निकल चुकी है। उसी शाम मैंने अपने कमांडिंग ऑफिसर से पिनपिनाते हुए कहा, “सर, मुझे लग रहा है कि हम उस परिवार पर कुछ ज्यादा ही जुल्म ढा रहे हैं।”

    कमांडिंग अफसर कर्नल अभिषेक पांडे ने गुस्से से तमतमाते हुए मुझे जवाब दिया, भूल गए उन दरिंदों ने किस प्रकार मारा था कैप्टन अनुज को। कैसे निकाल डाली थी उसकी आंखें और कैसे सलाद की तरह काट डाला था उसके अंग-अंग को। याद रखो हमें यहां सभ्यता और उच्च कोटि के समाज निर्माण के लिए नहीं वरन् मिलिटेंसी का सफाया करने के लिए भेजा गया है। हम अगर एक मिलिटेंट को बख्श देंगे तो वह हमें मार गिराएगा और भविष्य में भी न जाने कितनी हिंसक वारदातों को अंजाम देगा। इसलिए सोचो मत और सोचना ही चाहो तो यही सोचो कि हमारा काम है राष्ट्र को एक उज्ज्वल भविष्य देना।

    पर सर, हम किसका दंड किसको दे रहे हैं?

    नहीं चाहते हुए भी मेरे मुंह से निकल गया था। यद्यपि आर.आर. पोस्टिंग में इस प्रकार अपने कमांडिंग ऑफिसर से तर्क करना भी अनुशासन के खिलाफ था पर शायद उन्होंने मेरे भीतर होने वाले रक्तपात को देख लिया था इसलिए मुझे समझाते हुए उन्होंने फिर कहा, देखो हमें उस गांव में एक मिसाल कायम करनी है। इतना डर उस धरती पर बो देना है कि आने वाले सालों में वहां इनसान तो क्या परिंदा भी मिलिटेंट बनने की न सोचे। मेरी बात याद रखना तभी तुम एक कामयाब फौजी अफसर बन पाओगे और वह बात यह है कि युद्ध और बुद्ध एक साथ नहीं चल सकते।

    ‘युद्ध और बुद्ध एक साथ नहीं चल सकते।’ यह उन दिनों का मेरा मूलमंत्र था जिसे जप-जप कर मैं उन दिनों अपनी घायल आत्मा और लहूलुहान विश्वचेतना की मलहम-पट्टी किया करता था। मैं मेजर राणा अभी तक एक भी मिलिटेंट को ढेर नहीं कर पाया था, एक भी ऑपरेशन को सफल अंजाम तक नहीं पहुंचा पाया था जबकि मेरे ही एक कुलीग मेजर विक्रम पालीवाल को चौदह आतंकवादियों को अकेले मार गिराने के पराक्रम के लिए शौर्यचक्र मिल चुका था।

    बहरहाल, दिन पर दिन मुझ पर यूनिट का दबाव बढ़ता जा रहा था। हिंदुस्तान की सुरक्षा मेरा पहला कर्तव्य था और कश्मीर विशेषकर गुंड, सोपोर, राजौरी और अनंतनाग जैसे संवेदनशील इलाके मुझे पल भर के लिए भी भूलने नहीं देते थे कि मैं सबसे पहले एक अच्छा इनसान नहीं हिंदुस्तानी हूं कि मेरा अपना न कोई वजूद है, न आत्मा कि मैं एक सामूहिक नियति और भविष्य से बंधा हूं कि व्यक्ति-स्वातंत्र्य और व्यक्ति मन के लिए यहां कोई स्पेस नहीं है। मुझे हर दिन लगता कि मैं गलत जगह पर आ गया हूं कि यह दुनिया मेरी नहीं पर जिस शपथ-पत्र पर 20 वर्ष की उम्र में मैं जीवन के सीमित अनुभवों के आधार पर हस्ताक्षर कर चुका था उसके अनुसार बीस वर्ष की सेवाओं के पूर्व मैं यहां से निकल भी नहीं सकता था।

    बहरहाल मेरा तत्काल लक्ष्य था जमील का सफाया। इस कारण उस परिवार पर हमारा शिकंजा कसता गया। ज्यादतियां, उत्पीड़न-यातनाएं, पूछताछ, मारपीट और बदसलूकियां बढ़ती गईं। ये सब हमारी रणनीति के तहत-अदृश्य गोलाबारियां थीं जो हर दिन परिवार का कंधा जरा-जरा कर तोड़ रही थीं। उस घर की ईंट-ईंट पर एक ही इबारत साफ-साफ लिख रही थी कि उस परिवार के पास अब एक ही विकल्प है-जमील की मौत या पूरे परिवार की तबाही।

    ठंडी क्रूरता और असभ्य शालीनता के साथ मैंने जमील की अम्मा को एक धूल भरी दोपहर समझाया था, “ देखो, जमील को तो देर-सबेर मरना ही है, पर तुम चाहो तो अपने बाकी तीनों बच्चों की तबाही बचा सकती हो। हमीद लगभग पागल हो चुका है। हसन (जमील का छोटा भाई) की छाती की हड्डियां निकल आई हैं और रूबीना उसे तो देखकर लगता है जैसे सालों से बीमार हो। कहीं ऐसा न हो कि जमील भी न बचे और बाकी बच्चे भी जीने के काबिल न रहें।”

    “नहीं, खुदा रहम करे।” उसने अपने कानों को हथेलियों से ढांप लिया था। कमजोर जड़ों वाले पौधे की तरह वह कांपने लगी थी और यदि रूबीना ने उसे सहारा नहीं दिया होता तो वह शायद गिर ही पड़ती।

    बहरहाल, मेरा निशाना ठिकाने पर लगा था। परिवार हर क्षण टूट रहा था। बुद्ध हर क्षण ढह रहे थे। मानवीय हलचलें हर क्षण क्षीण होती जा रही थीं। बच्चे तेजी से जिंदगी से डरे हुए चूहों में तबदील होते जा रहे थे। जमील की मां टुकड़े-टुकड़े हो रही थी। एक टुकड़ा जमील के लिए सोचता तो दूसरा बचे-खुचे परिवार के लिए।

    और एक दोपहर कमाल हो गया। साल बीतते न बीतते सरोवर का सारा पानी सूख गया। हवाएं रुक गईं। सारे अहसास मर गए। जिल्लत, डर, उत्पीड़न और यातना की नोक पर टंगा वह परिवार पूरी तरह ढह गया।

    शायद धरती भी अपनी धुरी पर घूमती हुई उन क्षणों कुछ देर आहत-अचंभित हो ठिठकी होगी, शायद कुम्हार का चाक भी उन पलों घूमते-घूमते रुक गया होगा जब जीने की चरम विवशता में, जीने की अंतिम चेष्टा के रूप में एक रचनाकार को अपनी ममता के कण-कण से संवारी हुई अपनी ही रचना का गला घोंट देने का निर्णय लेना पड़ा होगा। जब एक कामयाब शाम खुद जमील की अम्मा ने आंखों में जल और हृदय में असह्य ज्वाला लिए हमें बताया कि वह आ रहा है कल हमसे मिलने।

    क्या? कौन? जमील?

    अविश्वसनीय !

    मैं हैरान! गद्गद। मेरे साथ आए चारों लांसनायकों और नायकों की आंखें सर्चलाइट सी चमकीं। चेहरे पर सौ-सौ गुलाब खिले।

    मुझे समझ में नहीं आया कि उन्हें इस सूचना पर क्या कहूं। मैं इनसानियत के सबसे निचले पायदान पर खड़ा था। वह बेबसी और यातना की पराकाष्ठा पर खड़ी अपने बाकी तीनों बच्चों को बचा पाने की नसतोड़ मुहिम में अपने ही हाथों अपनी ममता का गला घोट रही थी।

    तो जमील कल आ रहा है तुमसे मिलने? मैं जैसे पूरी तरह आश्वस्त हो जाना चाहता था।

    उसने गर्दन हिलाई और घुटने में सिर दबाए रोने लगी। उसके तीनों बच्चे उससे चिपक सुबकने लगे। उसके अब्बू दुःख के आवेग को न सह सकने के कारण हांफते हुए छाती मलने लगे थे। घर में हवा जैसे रुक गई थी। मौत की बदबू भर गई थी पर हम चहक रहे थे।

    पूरे साल भर की मशक्कत के बाद हमें सफलता मिली थी। एक सफल ऑपरेशन हमारे खाते में आने वाला था।

    22 घंटे। पूरे बाईस घंटे थे हमारे पास मौत के इंतजाम के लिए। रात के सर्पीले सन्नाटे में हमने उसके घर के आसपास पूरी घेराबंदी की। हम जानते थे कि जमील रात के अंधेरे में ही घुसेगा। दो सौ मीटर की दूरी पर हम HHTI (एक कीमती कैमरा जो अंधेरे में कई किलोमीटर तक देख सकता है।) PNVG (अंधेरी रात में तीन किलोमीटर दूर तक देखने वाला चश्मा) हैंड ग्रेनेड, रॉकेट, लांचर, एके 47 आदि सामानों के साथ अपनी पोजीशन लिए अंधेरे में दुबके रहे और उसके घर को फोकस करते हुए नजर गड़ाए रहे।

    ठीक आधी रात के ठंडे और कांपते अंधेरे में घर का शहजादा रेंगता-छुपता घर में घुसा।

    हमने उसे घुसने दिया।

    पूरी रात हम घेरा डाले बैठे रहे। HHTI से उसके घर में निगाहें गड़ाए रहे। हम चाहते थे कि ‘कोलेटरल डैमेज’ कम से कम हो, यानी सिर्फ जमील ही हमारी गोली का निशाना बने, एक भी सिविलियन हमारी चपेट में न आएं और जहां तक संभव हो उसके घर को न ढहाया जाए। पिछले एक ऑपरेशन में हमने थोड़ी सी जल्दबाजी की। हमने आसपास के घरों को तो खाली करवा लिया था पर जिस घर में छुपा था मिलिटेंट उसे हमने रॉकेट लांचर से ढहा दिया था। बाद में मानवाधिकार आयोग ने हम पर केस ठोक दिया था कि जब हम उस घर को ढहाने से बचा सकते थे तो हमने उसे ढहाने से क्यों नहीं बचाया। इस बार हम कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते थे।

    हमने पूरे धैर्य से काम लिया।

    दूसरे दिन भी हम डेरा डाले बैठे रहे। उस घर पर नजर जमाए रहे। दूसरी रात भी निकल गई।

    तीसरे दिन दोपहर को हमारी आशा के अनुरूप जमील ने भूल की। मर्द कलंदर की तरह खतरे को सूंघने के लिए वह मिनट भर के लिए बाहर निकला। हमने पहला फायर किया, वह तुरंत भीतर दुबक गया।

    बस उसके बाद फौजी भाषा में उससे हमारा ‘डुऐल कांटेक्ट’ हो गया यानी अब हम और वह आमने-सामने थे। उसे मालूम पड़ गया था कि वह घेरा जा चुका है।

    अब मौत का इंतजाम बड़ी शांति और व्यवस्थित ढंग से हुआ। आसपास के घरों को खाली करवाया गया। एक-एक कर गांव के लोगों की शिनाख्त करवाकर उन्हें घेरे के बाहर किया गया। जमील की तस्वीर हमारे पास थी इस कारण इसकी संभावना न्यूनतम थी कि वह अपने हथियार कहीं छिपाकर लोगों के साथ बाहर निकल जाए।

    अब आसपास सब कुछ खाली था, स्वप्नविहीन था।

    तिकोने झोंपड़ीनुमा घर में जमील था और उससे महज 200 मी. की दूरी पर हम थे। वह घर में दुबका रहा। हम बाहर डटे रहे।

    वह अकेला था, हम पूरी यूनिट के साथ थे। फिर एक रात गुजरी, सफेद रात। और पूरे चौदह घंटे, चौबीस मिनट के बाद वह फिर बाहर झांका। वह संभला-संभला कि छत पर बैठे हमारे जवान ने फायर किया। गोली माथे पर लगी और देखते-देखते कुल दीपक बुझ गया।

    छलांग-मारता समुद्र जमीन पर लोट गया।

    एक दुस्साहसिक जीवन का दुःखद असामयिक अवसान! हमारी पूरी यूनिट संतुष्ट थी कि बिना ‘कोलेटरल डैमेज’ के हम अपने मिशन में कामयाब हुए।

    बड़ी शराफत और शिष्टता के साथ हमने जमील की मृत देह को नौ फीट लंबे लोहे की हुक लगी छड़ी से खींचा। कई बार आतंकवादी की मृत देह में भी ग्रेनाइड छिपा मिलता है और जैसे ही जवान मृत देह की तलाशी शुरू करता है, मृत देह जवान को उड़ा देती है। जिंदगी खत्म हो जाती है पर मिलिट्री और मिलिटेंट की नफरत जिंदा रहती है।

    बासी चावल से सफेद उसके चेहरे पर जगह-जगह ताजे खून की धारियां पड़ी हुई थीं। बड़ी शराफत और नफासत के साथ हमने उसके शव को चादर में लपेटकर पुलिस के हवाले किया जिसे बाद में कानूनी खानापूर्ति कर पुलिस ने उसके परिवार को सौंप दिया।

    जमील को मारकर मैंने भारत के भविष्य को कितना सुरक्षित किया मुझे नहीं पता पर इस ऑपरेशन ने मुझे कुछ दिनों के लिए अपनी यूनिट में हीरो बना दिया था। जिस समय मेरे सभी सीनियर अफसर और कुलीग मुझे बधाइयां दे रहे थे, मैं सोच रहा था कि समय के कुछ कालखंड बाद मैं नेपथ्य में चला जाऊंगा पर बची रह जाएंगी एक बेबस मां की सिसकियां और मेरे मन की अशांति। और सचमुच, दिन तो मेरा भागदौड़, आपाधापी में निकल जाता पर गहरी रात के सन्नाटे में उदासियां मुझे दबोच लेतीं और मेरा मन एक अशांत समुद्र बन जाता। जहां रह-रहकर मेरी मानसिक शांति और सुकून को लीलने वाली लहरें उठतीं जो मुझे अतीत और स्मृतियों के घाट पर ले जा पटकतीं। मुझे याद आता, जब मैंने पहली बार कश्मीर की सरहद में पांव रखा था तो धरती का यह टुकड़ा मुझे इतना सुंदर, कोमल और स्वप्निल लगा था कि मेरी सारी इंद्रियां सौंदर्य से भर गई थीं। पर अढ़ाई साल में ही इस शहर ने मुझे हत्यारा बना मेरी अंतरात्मा मुझसे छीन मुझे कंगाल बना डाला था। अब मेरी इंद्रियों में सौंदर्य नहीं, कुरूपता भर गई थी। मेरी घ्राणेंद्रियां अब पत्तों, हवा की सरसराहट, बादलों की गड़गड़ाहट और मेरे भीतर की आवाज नहीं सुनतीं, वे सुनती हैं, गोलियों की, चीखों की, बमों की, दिलों के टूटने की, भरोसों के मरने की और मांओं के उजड़ने की आवाजें। मेरी आंखें अब पहाड़ियों, पानियों, कश्मीर के गुलाबों और दूधिया बादलों के सौंदर्य को नहीं देख पातीं क्योंकि उन आंखों में रह-रहकर कुछ और ही दृश्य कौंधते हैं, खून से सना जमील का चेहरा, मरी छिपकली की तरह डर से बाहर निकली जमील की मां की आंखें और घरों के पीछे बनी कब्रें।

    मेरी घ्राणेंद्रियों को अब गुलाबों और केसर की सुंगध नहीं वरन् गंधक, बारूद और जलते हुए इनसानी मांस के गंध की आदत पड़ गई है। जो शहर कभी मुझे लुभाता था, स्वप्न जगाता था वही शहर अब मुझे डराने लगा था। मेरी सामान्य मनःस्थिति दिन पर दिन मुझसे छिनती जा रही थी। रात होते ही जमील की मौत मुझे अपनी अंगुलियों के पोर-पोर से छूने लगती, मेरी नींद उचट जाती। जबरदस्ती नींद को रिझाते-रिझाते सोने की चेष्टा करता तो दुःस्वप्न पीछा नहीं छोड़ते। एक रात स्वप्न में देखा जमील की मां मुझसे कह रही थी, घर आए और गोद में बैठे मेरे बेटे को मारकर तुमने कैसा पराक्रम किया? सच, हमने जमील को पराक्रम से नहीं, उस परिवार पर अमानुषिक बर्बरता ढहाकर मारा था। हमारा पराक्रम सिर्फ इतना था कि, हमने मां से उसकी मां को छीन लिया था।

    बहरहाल, सप्ताह भर बाद ही गुंड गांव में गश्त लगाते-लगाते मैं फिर उनके घर गया, शायद यह देखने के लिए कि जीवन उठकर खड़ा हुआ या नहीं, या शायद यह जानने के लिए कि उस घर में अब घर कितना बचा हुआ था।

    उस दिन भी अकेली थीं वे। मन से, देह से आत्मा से आसपास जैसे पछतावा, आत्मग्लानि, हताशा, दुःख और बेचैनियां बंजारों की तरह भटक रही थीं। मुझे देख शायद उनका चेहरा क्षण भर के लिए तमतमाया था, पर मैंने आंखें झुका ली थीं। थोड़ी देर बाद मुझे लगा वे कुछ बुदबुदा रही हैं, मैंने ध्यान से सुना। वे शायद मुझसे ही पूछ रही थीं, वारे छुक? (कैसे हो?) मैं चुप रहा। क्या जवाब देता। मैं देखता रहा सांय-सांय करते खंडहर में खंडहर बनी उस बेचैन आत्मा को। जाने कहां-कहां के दुःख इतिहास से निकलकर मेरे भीतर इकट्ठे होने लगे। मानव सभ्यता का वह काला पृष्ठ जब सदियों से गुलाम बनी नीग्रो मांओं ने स्वयं ही अपने नवजात बच्चों को मार डाला कि उन्हें गुलामी की जिंदगी न जीना पड़े। समय बदला पर मानवनियति, मानव-त्रासदी किसी न किसी रूप में आज भी वहीं की वहीं है। विचारों के प्रवाह में मैं बहता जा रहा था कि लगा वे फिर कुछ कह रही हैं। हां, इस बार वे मुझसे ही कर रही थीं। हांफते-हांफते वे जो कुछ बोलीं उसका भाव था कि अब तो तुम अच्छे होगे, कश्मीर में भी खुशहाली होगी क्योंकि अब मेरा जमील जो मर गया है। बोलते-बोलते वे फिर थम गईं। गर्दन हिला-हिला कहने लगीं, “ नहीं मरा नहीं, मैंने ही उसे मरवा डाला। वह तो अपने घर अपनी मां से मिलने आया था और मैंने...” बोलते-बोलते उन्हें फिर दौरा पड़ा और वे उन्मत्त हो चीख-चीखकर बिसूरने लगीं। कलेजा फाड़कर निकला था उनका क्रंदन। उन्हें शांत होने में काफी समय लगा। सुस्थिर होने पर फिर एक गहरी सांस छोड़ी उन्होंने।

    मैं अंदर तक हिल उठा। उनके भीतर से जैसे सदियों का दुःख बोल रहा था। याद आया मैंने ही उनसे बार-बार कहा था कि जमील कश्मीर की शांति के लिए बहुत बड़ा खतरा है।

    काफी देर तक हताश चुप्पी हमारे बीच पसरी रही। मैं चाहकर भी बोल नहीं पाया। शब्द घुटते रहे, मरते रहे। अपने समय के यथार्थ से पराजित हम दोनों शायद खामोशी में लिपटे अपने जीने और होने का तर्क ढूंढ़ रहे थे।

    मैं कनखियों से उनकी ओर देखने लगा, सप्ताह भर में ही वे बहुत बूढ़ी लगने लगी थीं। उनकी उम्र चालीस की थी पर उनके आधे से अधिक बाल सफेद हो गए थे। छिपकली के पेट की तरह सफेद चेहरे पर आत्मग्लानि और पछतावे और अवसाद की झांइयां हर कहीं उगी हुई थीं।

    एकाएक मैं चौंक गया। मुझे वहीं छोड़ वे उठीं और धीरे-धीरे घर के कोने में पड़ी खटिया तक गईं। खटिया पर कांच का भांड रखा हुआ था। भांड के भीतर कुछ चॉकलेट रखी हुई थीं। वे उसे बार-बार निकालतीं, उन पर हाथ फेरतीं, गिनतीं और फिर उसी में रख देतीं।

    मुझे अटपटा लगा। इस मरते घर में चॉकलेट?

    निहायत मुलामियत से पूछा मैंने, “ बार-बार क्या गिन रही हैं।”

    “ गिन नहीं रही हूं, छू रही हूं इन्हें।” लगा जैसे आवाज इनके मुंह से नहीं, किसी गहरी अंधेरी बावड़ी से आ रही है। “ क्यों।”

    “ उन्हें जमील ने छुआ था। बहुत पसंद थीं उसे ये। पूरी दस थीं। तुम्हें उसके आने की खबर देने के बाद ही मैं बाजार से उधार लाई थी इन लेमनचूसों को।” उनकी आंखों में यादों के चिराग जल उठे। होंठ कांपे। आंखें किसी अदृश्य को देखने लगीं। एक बोझिल चुप्पी। मेरी आंखों में फिर वही दृश्य कौंध गया...चादर में लिपटा मां का लाड़ला जमील। “क्या जमील ने खाईं?” पंख कटी चिड़िया सी वह फड़फड़ाईं।

    “ हां दो खाईं, पूरी दस थीं, अब आठ हैं।”

    खिड़की से दिखते टुकड़े भर आसमान की ओर नजर गड़ाए बोलती जा रही थीं वह। उनकी आवाज का कंपन्न छू रहा था मुझे। लग रहा था जैसे उस मरते हुए घर में बस एक ही चीज जिंदा थी जो फड़फड़ा रही थी चहुं ओर, तप्त रेत पर पड़ी मछली की तरह जमील की मौत।

    “ तुम्हें कैसे पता कि जमील ने ही खाई। हमीद और रूबीना भी तो खा सकती हैं।” जाने कौन अदृश्य शक्ति हमें और उन्हें बुलवा रही थी।

    “ नहीं।” और वह एकाएक हिचकियां ले-ले रो पड़ीं। आत्मा को दाग देने वाला था उनका क्रंदन। वह कांप रही थीं। पूरी धरती कांपने लगी थी। सारी दुनिया का दुःख और ग्लानि उनकी आंखों में मूर्तिमत हो उठा। काफी देर तक वह कांपती रहीं, सुबकती रहीं। शांत होने पर उन्होंने फिर बोलने की कोशिश की। बहुत धीमे-धीमे, हांफते-हांफते शब्दों को जबर्दस्ती बाहर धकेल रही थीं वह जैसे बोलने में बहुत कष्ट हो रहा हो उन्हें।

    “ नहीं, हमीद, रूबीना, हसन किसी ने भी नहीं खाई। सबको तो पता था न कि भाईजान अब मारे...” बाद के शब्द बोल नहीं पाई थीं वह। कांपती सुबकियों में गुम हो गई थी उनकी आवाज।

    लौटते वक्त देखा, तेज हवा में पेड़ के पत्ते झड़ रहे थे। चिड़ियों की तरह नीचे गिर रहे थे। मन फिर आशंकित हो उठा-कहीं सारी चिड़ियां मर न जाएं। जल्दी ही कुछ करना होगा। 
००००००००००००००००

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