वक़्त मुक़र्रर था ... वंदना ग्रोवर की कवितायें | Poems of Vandana Grover (hindi kavita sangrah)


वंदना ग्रोवर की कवितायें


1 .
मैं क्यों दिन भर सोचती रहूँ
क्यों मैं रात भर जागती रहूँ
मैं क्यों थरथरा जाऊं आहट से
क्यों मैं  सहम जाऊं दस्तक से
मैं क्यों चुप रहूँ
मैं कुछ क्यों न कहूँ

मैं क्यों किसी के बधियाकरण की मांग करूँ
क्यों मैं किसी के लिए फांसी की बात करूँ
मैं क्यों न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाऊं
क्यों मैं जा जाकर आयोगों में गुहार लगाऊं
मैं क्यों न जीऊं
मैं क्यों खून के घूँट पिऊं

मैं क्यों खुद अपने दोस्त तय न करूं
क्यों मैं घर से बाहर न जाऊं
मैं क्यों अपनी पसंद के कपडे न पहनूं
क्यों  मैं रात को फिल्म देखने न जाऊं
मैं क्यों डरूं
मैं क्यों मरूं

वंदना ग्रोवर

शिक्षा :पी एच डी
जन्म स्थान :हाथरस
वर्तमान निवास :गाज़ियाबाद
सम्प्रति :लोक सभा सचिवालय  में राजपत्रित अधिकारी
कविता-संग्रह : मेरे पास पंख नहीं हैं (2013)
अन्य :  स्त्री होकर सवाल करती है (बोधि प्रकाशन),सुनो ,समय जो कहता है (आरोही प्रकाशन ),अपनी अपनी धरती (मांडवी प्रकाशन ) ,शतदल  (बोधि प्रकाशन ) कविता संग्रहों में रचनाओं का प्रकाशन
email id : groverv12@gmail.com

मैं क्यों अस्पतालों में पड़ी रहूँ वेन्टिलेटरों पर
क्यों मैं मुद्दा बनूँ कि चर्चा हो मेरे आरक्षणों पर
मैं क्यों इंडिया गेट के नारों में गूंजती रहूँ
क्यों मैं विरोध की मशाल बन कर जलती रहूँ
मैं क्यों न गाऊं
मैं क्यों न खिलखिलाऊं

मैं क्यों धरती-सी सहनशीलता का बोझ ढोऊँ
क्यों मैं मर मर कर कोमलता का वेश धरूँ
मैं क्यों दुर्गा, रणचण्डी, शक्तिरूपा का दम भरूं
क्यों न बस मैं जीने के लिए ज़िन्दगी जियूं
मैं क्यों खुद को भूलूं
मैं क्यों खुद को तोलूं

मैं क्यों अपने जिस्म से नफरत करूं
क्यों मैं अपने वज़ूद पर शर्मिंदा होऊं
मैं क्यों रोज़ अपने लिए खुद मौत मांगूं
क्यों मैं हाथ बांधे पीछे  पीछे रहूं
मैं क्यों होऊं तार-तार
मैं क्यों रोऊं जार-जार

मेरे लिए क्यों कहीं माफ़ी नहीं
क्यों मेरा इंसान होना काफी नहीं





2 .

विधि

एक औरत लें
किसी भी धर्म, जाति, उम्र की
पेट के नीचे
उसे बीचों-बीच चीर दें
चाहें तो किसी भी उपलब्ध
तीखे पैने औज़ार से
उसका गर्भाशय, अंतड़ियां बाहर निकाल दें
बंद कमरे, खेत, सड़क या बस में
सुविधानुसार
उसमे कंकड़, पत्थर, बजरी,
बोतल, मोमबत्ती, छुरी-कांटे और
अपनी सडांध भर दें
कई दिन तक, कुछ लोग
बारी बारी से भरते रहें
जब आप पक जाएँ
तो उसे सड़क पर, रेल की पटरी पर
खेत में या पोखर में छोड़ दें
पेड़ पर भी लटका सकते हैं
ध्यान रहे, उलटा लटकाएं .
उसी की साडी या दुपट्टे से
टांग कर पेश करें

काम तमाम न समझें
अभिनव प्रयोगों के लिए असीम संभावनाएं हैं।





3 .
हिंसा होती है तोपों से,बमों से
हिंसा होती है बंदूकों से, तलवारों से
हिंसा होती है लाठियों से, डंडों से
हिंसा होती है लातों से, घूसों से
हिंसा होती है नारों से, इशारों से
हिंसा होती है वादों से, आश्वासनों से
हिंसा होती है ख़बरों से, अफवाहों से
हिंसा होती है आवाज़ों से, धमाकों से
हिंसा होती है खामोशी से भी।





4 .
किशोरवय बेटियाँ
जान लेती हैं
जब मां होती है
प्रेम में
फिर भी वह करती हैं
टूट कर प्यार
माँ से
एक माँ की तरह
थाम लेती है बाहों में
सुलाती हैं अपने पास
सहलाती हैं
समेट लेती हैं उनके आंसू
त्याग करती हैं अपने सुख का
नहीं करती कोई सवाल
नहीं  करती खड़ा
रिश्तों को  कटघरे में
अकेले जूझती हैं

अकेले रोती हैं

और

बाट जोहती हैं माँ के घर लौटने की






5 .
घुटता है दम
लरज़ता है कलेजा
दरवाज़े खोल दो

मेरी सुबह को अंदर आने दो








6
शुक्र है
मुझे कोई गफलत
कोई गुमां न था कि
मैं दुनिया बदल डालूंगी

शुक्र है
मुझे पता था कि
मैं वह हूँ
इंसान के तबके में
जिसे औरत जैसा कुछ कहा जाता है
शुक्र है
मैंने कभी कोई कोशिश नहीं की
नेता बनने  की
क्रान्ति लाने की
यह सोचने की कि
सोचने से सपने साकार होते हैं

शुक्र है
इससे पहले ही
मैं अनचाहे पत्नी
और
अनजाने ही
मां बना दी गई

शुक्र है ..





7
तुम्हारे आने से पहले
तय था तुम्हारा जाना
वक़्त मुक़र्रर था

तुम आये सकुचाते, रुके, संवरे और निखर गए
मेरी आँखों के आईने में
अपना अक्स निहारा
गरूर झाँक रहा था तुम्हारी आँखों से
आखिर सबसे हसीन मौसम का
खिताब जो मिला था तुम्हे      
तुम्हारा खुद पर यूँ इतराना
अच्छा लगा मुझे
हर मौसम मेरा ही तो हिस्सा है
वो पतझड़ भी, जो अब आया है
वो भी मेरा है
तुम भी तो मेरे थे .
तुम बदल गए
क्यों कि तुम्हे बदलना था
मैं जानती थी
बदलाव बनाया भी तो मैंने ही था
तुम जाओ
कि
जाते मौसम का
सोग नहीं मनाती मैं
विलाप नहीं करती
कभी कभी बरस जाती हूँ
कि तपते दिल को राहत मिले
बह जाती हूँ कि  ज़ख्म धुलें
उठती हूँ गुबार बन के
कि न देखूं तुमको जाता

प्रकृति होने की यह सजा
खुद तय की है मैंने
अपने लिए



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