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#स्वराज्य क्या है? लेखक : श्रीयुत भाई परमानंद, एम.ए., एम.एल.ए. | What is Swarajya - Bhai Parmanand

अक्तू॰ 7, 2015

The state that do not do not distinguish Myth and history will always prefer Faith over Discretion - Vibhuti Narayan Rai
अगस्त 1935 की ‘सरस्वती’ में हिन्दू महासभा के भाई परमानंद ने स्वराज्य की एक मजेदार अवधारणा प्रस्तुत की थी। उनके अनुसार धर्म और राष्ट्र का अविभाज्य सम्बन्ध है और भारत के सन्दर्भ में स्वराज्य हिन्दुओं का राज्य ही हो सकता है। इसके उत्तर में जवाहर लाल नेहरू ने अल्मोड़ा जेल में बैठकर अपने जीवन का पहला हिंदी लेख लिखा और विस्तार से भाई परमानंद के तर्कों का जवाब दिया। यह लेख अक्तूबर 1935 की ‘सरस्वती’ में छपा। यह देखना दिलचस्प होगा कि 1935 में भी हिंदुत्ववादियों और धर्मनिरपेक्ष खेमे में बहसों का स्वरूप और चरित्र आज जैसा ही था। यहाँ हम दोनों लेखों का पुनर्प्रकाशन कर रहे हैं। — संपा. ‘वर्तमान साहित्य’

स्वराज्य क्या है?

लेखक : श्रीयुत भाई परमानंद, एम.ए., एम.एल.ए.


श्रीभाई जी हिन्दुओं के एक परम आदरणीय नेता हैं। कांग्रेस से आपका मतभेद है और उस मतभेद को आपने सदैव ज़ोर के साथ प्रकट किया है। स्वराज्य किसे कहते हैं? इस प्रश्न का आप कांग्रेस से भिन्न उत्तर रखते हैं। इस लेख में आपने अपने उसी भिन्न दृष्टिकोण को स्पष्ट किया है। — सम्पा. ‘सरस्वती’

‘स्वराज्य’ शब्द ऐसा आम हो गया है कि हमको कभी ख़याल भी नहीं आता कि ज़रा इसका वास्तविक अर्थ समझने का प्रयत्न करें। इस समय यदि किसी बच्चे से भी पूछा जाय तो वह कह देगा कि हम स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं। उसने अपने मन में स्वराज्य का कोई-न-कोई चित्र भी ज़रूर बना रक्खा होगा। परन्तु वह चित्र कोई हक़ीक़त रखता है या सिर्फ़ ख़याल है, यह बात वह बच्चा नहीं जानता। पाठक यह सुनकर हैरान हो जायँगे अगर मैं यह कहूँ कि कांग्रेस और हिन्दू-महासभा के बीच में भेद या ग़लतफ़हमी का कारण ही यह है कि यद्यपि दोनों स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं, तथापि वास्तव में वे स्वराज्य को एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न समझते हैं । यदि आज हम इस बात का फैसला कर लें कि स्वराज्य किसे कहते हैं तो हमारे बहुत-से पारस्परिक मतभेद तुरन्त दूर हो जायँ।

‘स्वराज्य’ का शाब्दिक अर्थ ‘अपना राज्य’ या ‘सेल्फ़-गवर्नमेंट’ है । राज्य-शब्द के प्रयोग में भी बहुत मतभेद हो सकता है। एक मनुष्य ‘राज्य’ का अर्थ राजसत्तात्मक गवर्नमेंट समझता है। एक भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत रहते हुए ‘सेल्फ़-गवर्नमेंट’ को स्वराज्य कह देता है तो दूसरा इसके अर्थ ब्रिटिश गवर्नमेंट से स्वतंत्र होना समझता है। विधायक रूप के संबंध में इस प्रकार के भेदभाव हमारे दर्मियान हो सकते हैं, परन्तु जिस भेद को मैं यहाँ प्रकट करना चाहता हूँ वह स्वराज्य-शब्द के पहले भाग ‘स्व’ के सम्बन्ध में है।

'वर्तमान साहित्य' अक्टूबर, 2015 vartman sahitya cover Bharat Tiwari
आवरण : भरत तिवारी

कबिरा हम सबकी कहैं / विभूति नारायण राय
आलेख
मुस्लिम नवजागरण के अग्रदूत क्यों नहीं हो सकते मौलवी अब्दुल हफ़ीज मोहम्मद बरकतुल्ला / प्रदीप सक्सेना
महावीर प्रसाद द्विवेदी का अर्थशास्त्रीय चिंतन/ भारत यायावर
धारावाहिक उपन्यास–5
कल्चर वल्चर / ममता कालिया
बहस–तलब 
स्वराज्य क्या है ?     / श्रीयुत भाई परमानंद, एम.एम.एम.एल.ए.
भाई परमानंद और स्वराज्य / पंडित जवाहरलाल नेहरू 29
कविताएं
अशोक पाण्डे / सुरेश सेन निशान्त / फीरोज़ शानी
कहानी
चिल मार / जया जादवानी
भीड़ / एस. अहमद
उजाले की सुरंग / जीवन सिंह ठाकुर
पुस्तक चर्चा
‘अरविंद सहज समांतर कोश’ के बहाने / डॉ. योगेन्द्र नाथ मिश्र
समीक्षा
कवि महेंद्र भटनागर का चाँद / खगेंद्र ठाकुर
सुबह होगी / अणिमा खरे
मीडिया
मीडिया का हालिया तकनीकी नियतिवाद / प्रांजल धर
रपट
राग भोपाली : देख तमाशा हिंदी का / त्रिकालदर्शी
स्तम्भ
रचना संसार / सूरज प्रकाश
तेरी मेरी सबकी बात / नमिता सिंह
सम्मति :  इधर–उधर से प्राप्त प्रतिक्रियाएं
‘स्व’ का अर्थ ‘अपना’ या ‘सेल्फ़’ है। परन्तु तुरन्त ही यह प्रश्न उठता है कि ‘अपना’—शब्द में हम किसको सम्मिलित करते हैं। हमारे कुछ भाई तो यह कह देंगे कि इस प्रश्न के हल करने में दिक्कत ही क्या है; ‘अपना’—शब्द में वे सब लोग शामिल हैं जो इस देश में रहते हैं। परन्तु मैं इस प्रश्न को इतना आसान नहीं समझता। मैं यह पूछूँगा कि अगर इंग्लैंड की गवर्नमेंट यहाँ भारत में कोई ऐसा वाइसराय भेज दे जो यहाँ आकर हमेशा के लिए आबाद हो जाय और अपने शासन के रक्षार्थ समय-समय पर इंग्लैंड से अपने आदमियों को बुलाता रहे तो क्या वह राज्य हमारे लिए ‘स्वराज्य’ होगा या नहीं? कुछ सज्जन कह देंगे कि यह तो काल्पनिक बात है। मैं यह बताना चाहता हूँ कि यह बात काल्पनिक नहीं है। इस देश में मुग़लों का राज्य था। मुग़लों से पहले अन्य कई मुसलमान-वंशों की हुकूमत रही। वे शासक और उनके सिपाही जिनको वे साथ लाये थे, इस देश के निवासी बन गये। क्या उस युग के हिन्दुओं ने उस राज्य को अपना राज्य समझा या गैरों का? अगर उन्होंने उसे गैरों का समझा तो क्या वे ग़लती पर थे या जिन लोगों ने उन विदेशी शासकों को अपना समझा वे सचाई पर थे?

इस बात को स्पष्ट करने के लिए हमें समझ लेना चाहिए कि स्वराज्य लेने के दो विभिन्न तरीक़े हैं। एक तो यह कि हम राज्य की शकल को बदल दें और दूसरा यह कि हम अपनी शकल को बदल लें। इस देश पर जब मुसलमानों ने आक्रमण किये और स्थान-स्थान पर अपना शासन कायम करने का प्रयत्न किया तब भारत की हिन्दू-आबादी में दो प्रकार के मनुष्य पाये जाते थे। एक वे थे जिन्होंने यह समझा कि उनके लिए स्वराज्य लेना बहुत मामूली बात है। उन्होंने अपना धर्म छोड़ दिया, अपने पूर्वजों को तिलांजलि दे दी, अपनी जातीयता को त्याग दिया और इस्लामी मजहब इख्तियार कर लिया। मुसलमान होते ही वे इस्लामी राज्य को अपना राज्य समझने लगे। उनके लिए स्वराज्य लेने का तरीक़ा बहुत आसान था। केवल ‘स्व’ को बदल लेने से, बिना किसी प्रकार का बलिदान किये, बिना किसी चरित्र के, बगैर किसी मेहनत के उन्होंने स्वराज्य प्राप्त कर लिया। उस समय जितने लोग स्वधर्म तथा स्वजाति को छोड़कर मुसलमान बन गये वे महमूद ग़ज़नवी और तैमूर को अपना भाई समझने लगे और नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के हिन्दुओं पर किये गये अत्याचार उन्हें हर्ष एवं गर्व प्रदान करनेवाले कार्य दिखलाई पडऩे लगे। और, आज उन लोगों के वंश के जितने मुसलमान भारत में आबाद हैं उन सबके लिए इस्लामी शासन स्वराज्य हो गया है। भारत के इतिहास के सम्बन्ध में उनका दृष्टिकोण ही बदल गया है। स्वराज्य-प्राप्ति का यह एक निहायत आसान तरीक़ा है।

भाई परमानंद और #स्वराज्य  लेखक : पंडित जवाहरलाल नेहरू | Bhai Parmanand and Swarajya : Jawaharlal Nehru

एक अन्य तरीक़ा था जिससे दूसरे लोगों ने स्वराज्य प्राप्त करने का प्रयत्न किया। उसका एक उदाहरण हमें राजपूतों के इतिहास में मिलता है। उसका दूसरा उदाहरण हमें महाराज शिवाजी और मराठों के उत्कर्ष में मिलता है। उसका एक और उदाहरण हमें गुरु गोविंदसिंह, वीर वैरागी और सिक्ख-साम्राज्य में मिलता है। राजपूतों, मराठों और सिक्खों ने भी स्वराज्य प्राप्त किया। स्वराज्य-प्राप्ति का इनका तरीक़ा पहले तरीक़े से सर्वथा विरुद्ध था। इन्होंने बड़े भारी बलिदान किये, बड़ी-बड़ी यातनायें उठाईं, अपने कुटुम्बियों एवं महिलाओं तक को क़त्ल करवा दिया। इस प्रकार इन्होंने अपनी गिरी हुई जाति के अंदर सच्चरित्र उत्पन्न किया और नवजीवन संचार किया। यह उसी नये जीवन की बदौलत था कि महाराष्ट्र के मामूली देहातियों ने और पंजाब के ग्रामीणों ने अपने-अपने साम्राज्य बना लिये। परन्तु स्वराज्य-प्राप्ति का यह तरीक़ा इस लेख के विचार के बाहर की बात है।
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वर्ष 32 अंक 10  अक्टूबर, 2015
सलाहकार संपादक: रवीन्द्र कालिया
संपादक: विभूति नारायण राय
कार्यकारी संपादक: भारत भारद्वाज
कला पक्ष: भरत तिवारी


खैर, इन लोगों ने ‘स्व’ का अर्थ बिलकुल दूसरा समझा। इनके ‘स्व’ या ‘सेल्फ़’ और उनके ‘स्व’ या ‘सेल्फ़’ में ज़मीन-आसमान होगा कि वे लोग मिस्रियों और ईरानियों के समान थे जिन्होंने अपनी जातीयता का नाम मिटा दिया और अपने आपको एक विदेशी जाति के अंदर जज़्ब करवा दिया। नस्ल और खून, जाति और रक्त की जो अखंडता हज़ारों सालों से उनकी रगों में चली आती थी उसे उन्होंने मिटा दिया और अपनी कायरता या पतन के कारण कुछ से कुछ बन गये। यह अखंडता जातीयता है; यही जाति का जीवन और उसकी आत्मा है। जो लोग इस अखंडता को मिटाकर दूसरे तरीक़े से स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं उनका स्वराज्य गर्हणीय है। उनके स्वराज्य की अपेक्षा मृत्यु हज़ार दर्जे बेहतर है।

वर्तमान काल में हमारे सामने स्वराज्य की वही दोनों शकलें विद्यमान हैं। हमारे कांग्रेसी भाई हैं जो इस जातीय अखंडता को इसलिए मिटा देना चाहते हैं कि उन्हें स्वराज्य प्राप्त हो जाय। वे कहते हैं कि भारत के पुराने इतिहास को भुला दो; महाराज शिवाजी, महाराना प्रताप, गुरु गोविंदसिंह और वीर वैरागी को भूल जाओ, क्योंकि उनको जातीयता का ठीक ज्ञान न था। आज हमको जातीयता का ठीक-ठीक ज्ञान है; न हमें हिन्दुत्व की परवा है, न हिन्दू-इतिहास की; हम तो स्वराज्य लेना चाहते हैं। हमने एक नई जातीयता ढूँढ़ निकाली है, जिसमें पिछला सारा ज़माना मिट जायगा और इस देश में एक नई जातीयता उत्पन्न होगी। मैं इस ‘थियरी’ या कल्पना को बिलकुल ग़लत समझता हूँ। यह उन लोगों का-सा ख़याल है जिन्होंने मुग़लों के समय में बड़ी आसानी के साथ स्वराज्य लेना चाहा। उन्होंने अपना ‘स्व’ बदल लिया। हमारे ये भाई भी अपना ‘सेल्फ़’ मिटा देना चाहते हैं। मैं ऐसे स्वराज्य को धिक्कार देता हूँ। अगर हमें इसी तरीक़े से स्वराज्य लेना है तो इससे भी ज़्यादा एक और आसान तरीक़ा है। हम सब अपना धर्म छोड़कर ईसाई बन जायँ। हमारा ‘स्व’ इंग्लैंड के लोगों का ‘सेल्फ़’ हो जायगा और हम स्वतन्त्र हो जायँगे। यह बात कि इससे हमें वास्तविक स्वतन्त्रता मिलेगी या नहीं, सर्वथा असंगत है। सवाल तो सिर्फ़ समझने का है। हम अपने ‘स्व’ को मिटाकर उसे इंग्लैंड के ‘स्व’ में जज़्ब करवा देंगे तो इंग्लैंड का राज्य हमारे लिए स्वराज्य का समानार्थक हो जायगा।

एक अन्य युक्ति जो मैं इस ‘थियरी’ या कल्पना के विरुद्ध देना चाहता हूँ वह यह है कि हम हिन्दू अपने आपको चाहे कितना ही भुला दें और नई जातीयता की खातिर हिन्दू-जातीयता को मिटा दें, पर पिछला सारा अनुभव हमें यही बतलाता है कि मुसलमान लोग कांग्रेस की इस थियरी को मानने के लिए बिलकुल तैयार नहीं हैं। वे किसी भी अवस्था में न इस्लाम को भुलायँगे और न नई जातीयता को ग्रहण करेंगे। इसलिए कांग्रेस की यह थियरी जहाँ तर्क की दृष्टि से बिलकुल ग़लत है, वहाँ क्रियात्मक दृष्टि से भी सर्वथा असंभाव्य है।

[‘सरस्वती’, अगस्त 1935 से साभार]


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