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RSS: राजेन्द्र बाबू से क्यों चिढ़े थे नेहरू-आरके सिन्हा | Nehru / Rajendra

दिस॰ 3, 2015


राजेन्द्र बाबू से क्यों चिढ़े थे नेहरू

आरके सिन्हा




राजेन्द्र प्रसाद की शख्सियत से पंडित जवाहरलाल नेहरू हमेशा अपने को असुरक्षित महसूस करते रहे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू को नीचा दिखाने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं दिया। हद तो तब हो गई जब 12 वर्षो तक राष्ट्रपति रहने के बाद राजेन्द्र बाबू पद मुक्त होने के बाद पटना जाकर रहने लगे तो नेहरू ने उनके लिए वहां सरकारी आवास तक की व्यवस्था नहीं की। उनकी सेहत का ध्यान नहीं रखा गया। दिल्ली से पटना पहुंचने पर राजेन्द्र बाबू बिहार विद्यापीठ, सदाकत आश्रम के एक सीलनभरे कमरे में रहने लगे। उनकी तबीयत पहले से खराब रहती थी, पटना जाकर ज्यादा खराब रहने लगी। वह दमा के रोगी थे। सीलनभरे कमरे में रहने के बाद उनका दमा ज्यादा बढ़ गया। वहां उनसे मिलने के लिए जयप्रकाश नारायण पहुंचे। वह उनकी हालत देखकर हिल गए। उन्होंने उस सीलनभरे कमरे को मित्रों और सहयोगियों से कहकर कामचलाऊ रहने लायक करवाया। उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हुई। क्या आप मानेंगे कि उनकी अंत्येष्टि में पंडित नेहरू ने शिरकत करना तक भी उचित नहीं समझा। वह उस दिन जयपुर में ‘‘तुलादान’ करवाने जैसे एक मामूली से कार्यक्रम में चले गए। यही नहीं, राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. संपूर्णानंद को राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में शामिल होने से रोका।


आरके सिन्हा  (राज्यसभा में भाजपा बिहार से संसद के सदस्य) 1999 से 2004 तक मानव संसाधान विकास मंत्रालय के सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी सक्रिय रहे। सिन्हा, जेपी की लीडरशिप में बिहार में हुए छात्र आंदोलन पर पहली रिसर्च बुक 'जनआंदोलन' के लेखक भी हैं।

इस मार्मिक और सनसनीखेज तय का खुलासा खुद डॉ. संपूर्णानंद ने किया है। संपूर्णानंद जी ने जब नेहरू को कहा कि वह पटना जाना चाहते हैं, राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए तो नेहरू ने उनसे कहा कि कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। इसके बाद डॉ. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया। हालांकि, उनके मन में हमेशा मलाल रहा कि राजेन्द्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं कर सके। यही नहीं, नेहरू ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डॉ. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दे दी। लेकिन, डॉ. राधाकृष्णन ने नेहरू के परामर्श को नहीं माना। राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे। यह बात भी अब सबको मालूम है कि पटना में डॉ. राजेन्द्र बाबू को उत्तम क्या मामूली स्वास्थ सुविधाएं तक नहीं मिलीं। मानो सब कुछ केंद्र के निर्देश पर हो रहा हो। उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी। इसे दूर करने के लिए पटना मेडिकल कॉलेज में मशीन थी ही कफ निकालने वाली। उसे भी केंद्र के निर्देश पर मुख्यमंत्री ने राजेन्द्र बाबू के कमरे से निकालकर वापस पटना मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया। जिस दिन यह मशीन वापस मंगाई गई उसके दो दिन बाद ही राजेन्द्र बाबू खास्ते-खास्ते चल बसे।

दरअसल, नेहरू अपने को राजेन्द्र प्रसाद के समक्ष बहुत बौना महसूस करते थे। इसलिए उनसे छतीस का आंकड़ा रखते थे। वह डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को किसी न किसी तरह से आदेश देने की मुद्रा में रहते थे। नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद से सोमनाथ मंदिर का 1951 में उद्घाटन न करने का आग्रह किया था। तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उद्घाटन से बचना चाहिए। हालांकि, आग्रह को न मानते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की थी। नेहरू एक तरफ तो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर में जाने से मना करते रहे लेकिन, दूसरी तरफ स्वयं 1956 के इलाहाबाद में हुए कुंभ मेले में डुबकी लगाने चले गए। बताते चलें कि उनके वहां अचानक पहुंच जाने से कुंभ में अव्यवस्था फैली। भारी भगदड़ में करीब 800 लोग मारे गए।

हिंदू कोड बिल पर भी नेहरू से अलग राय रखते थे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद। जब नेहरू हिंदूओं के पारिवारिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए हिंदू कोड बिल लाने की कोशिश में थे, तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इसका खुलकर विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि लोगों के जीवन और संस्कृति को प्रभावित करने वाले कानून न बनाए जाएं। दरअसल, नेहरू चाहते ही नहीं थे कि डा. प्रसाद राष्ट्रपति बनें। उन्हें रोकने के लिए उन्होंने ‘‘झूठ’ तक का सहारा लिया। नेहरू ने 10 सितम्बर, 1949 को डॉ. प्रसाद को लिखे पत्र में कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी. राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना बेहतर होगा। नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डॉ. प्रसाद को घोर कष्ट हुआ। उन्होंने पत्र की प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। पटेल उस वक्त बम्बई में थे। कहते हैं कि पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा नहीं हुई थी कि राजाजी (राजगोपालाचारी) या डॉ. प्रसाद में से किसे राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। न ही उन्होंने नेहरू के साथ मिलकर तय किया था कि राजाजी राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पसंद के उम्मीदवार होंगे। यह बात उन्होंने राजेन्द्र बाबू को बताई। इसके बाद डॉ. प्रसाद ने 11 सितम्बर,1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था, ‘‘पार्टी में उनकी (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद) जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वह बेहतर व्यवहार के पात्र हैं।’ नेहरू को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। फजीहत कराने के बदले उन्होंने गलती स्वीकारी। डॉ. प्रसाद नेहरू के विरोध के बावजूद दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गए।

नेहरू और डॉ. प्रसाद में वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद बराबर बने रहे थे। नेहरू पश्चिमी सभ्यता के कायल थे जबकि प्रसाद भारतीय सभ्यता को देश की एकता का मूल तत्व मानते थे। राजेन्द्र बाबू को देश के गांवों में जाना पसंद था, वहीं नेहरू लन्दन और पेरिस में चले जाते थे। पेरिस के धुले कपड़े पहनते थे। अगर बात बिहार की करें तो वहां गांधीजी के बाद प्रसाद ही सबसे लोकप्रिय नेता थे। गांधीजी के साथ ‘राजेन्द्र प्रसाद जिन्दाबाद’ के भी नारे लगाए जाते थे। लंबे समय तक देश के राष्ट्रपति रहने के बाद भी राजेन्द्र बाबू ने कभी भी अपने किसी परिवार के सदस्य को न पोषित किया और न लाभान्वित किया। हालांकि नेहरू इसके ठीक विपरीत थे। उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी और बहन विजयालक्ष्मी पंडित को सत्ता की रेवड़ियां खुलकर बांटीं। दूर-दराज के रिश्तेदारों को राजदूत, गवर्नर, जज बनाया। वास्तव में डा. राजेंद्र प्रसाद एक दूरदर्शी नेता थे वो भारतीय संस्कृति सभ्यता के समर्थक थे, राष्ट्रीय अस्मिता को बचाकर रखने वालों में से थे। जबकि नेहरू पश्चिमी सभ्यता के समर्थक और, भारतीयता के विरोधी थे।

बहरहाल आप समझ गए होंगे कि नेहरू जी किस कद्र भयभीत रहते थे राजेन्द्र बाबू से। अभी संविधान पर देशभर में चर्चायें हो रही हैं। डा. राजेन्द्र प्रसाद ही संविधान सभा के अध्यक्ष थे और उन्होंने जिन 24 उप-समितियों का गठन किया था, उन्हीं में से एक ‘‘मसौदा कमेटी’’ के अध्यक्ष डा. भीमराव अम्बेडकर थे। उनका काम 300 सदस्यीय संविधान सभा की चर्चायें और उप-समितियों की अनुशंसाओं को संकलित कर एक मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करना था जिसे संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते डा. राजेन्द्र प्रसाद स्वीकृत करते थे। फिर वह ड्राफ्ट संविधान में शामिल होता था। संविधान निर्माण का कुछ श्रेय तो आखिरकार देशरत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद को भी मिलना ही चाहिए।

साभार राष्ट्रीय सहारा ३/१२/२०१५
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