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मन्नू भंडारी वाया राजेन्द्र यादव — गीताश्री

फ़र॰ 10, 2016


मन्नू भंडारी वाया राजेन्द्र यादव

गीताश्री

मैं सोचती कि मन्नूजी इस मामले में वाकई खुशनसीब हैं। लेखन को सपोर्ट करने वाले पति लेखिकाओं के भाग्य में कम ही होते हैं। जिनके होते हैं वे आसमान छू लेती हैं। मैं मन्नूजी को बता नहीं सकी ये सब — गीताश्री 

गीताश्री ने मन्नूजी पर यह जो संस्मरण लिखा है, इसमें एक बेमिसाल शिल्प दिखता है... हम कहानियों में प्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष व तृतीय पुरुष संवाद को तो जानते हैं लेकिन यहाँ ... यहाँ गीताश्री ने – मन्नूजी के बारे में अपनी सारी जानकारियाँ'/धारणाएं राजेंद्रजी के साथ हुए अपने सवादों से – इतनी खूबसूरती से कही हैं जो कम से कम मेरे लिए बेमिसाल है... वाह गीताश्री वाह !!!
पढ़िए – संस्मरण लेखन की एक अद्भुत मिसाल जिसमे एक मन्नूजी के बारे में दूसरे राजेंद्रजी के माध्यम से तीसरी गीताश्री किस तरह एक ही समय में दो इंसानों के एक-दूसरे के होने का पता देती हैं. 

भरत तिवारी



मैं काम की बात कम करुंगी, आपकी तरफ से लड़ जाऊंगी | मन्नू भंडारी वाया राजेन्द्र यादव — गीताश्री #शब्दांकन





“सुना है, तुम मुझसे बहुत डरती हो...?”

वह मुस्कुरा रही थीं।

“जी...नहीं… बस ऐसे ही… किसने कहा आपको...?”

अपने स्वभाव के अनुरूप मैं शरारती हंसी हंस रही थी। पहली बार अनौपचारिक माहौल में मिल रही थी। धुंधली सी याद है उस मुलाकात की। उसके पहले जब भी मिलती थी, उन्हें नमस्ते करके खिसक जाया करती थी। वे गंभीर लगती थीं और अतिरिक्त और सायास गंभीरता मुझे भयभीत कर देती है। ओढ़ी हुई गंभीरता मैं तुरत पकड़ लेती हूं और उससे भय नहीं खाती, उस पर तरस खाती हूं। मन्नूजी हमेशा मुझे आंतरिक रुप से गंभीर लगती रहीं। राजेन्द्रजी ने कई बार फोन पर भी बातें करवाईं और मिलवाया भी, मौके पर। मैं उनसे बात करने के लिए कभी इच्छुक नहीं हुई। नमस्कार करके खिसक लेने का मन होता था। यही करती थी। एकाध बार उनके पास बैठने का मौका मिला तो मैं बहुत असहज महसूस करती रही।

जाने क्यों मैं सहज नहीं रह पाई उनके सामने। इसकी पड़ताल बाद में करुंगी। पहले इस संवादी मुलाकात के बारे में।

वे मुझसे पूछ रही थीं—

“तुम मुझसे डरती क्यों हो ?”

“किसने कहा आपको... राजेन्द्रजी ने...?”

“अपने सहयोगी को तुमने भेजा था न इंटरव्यू के लिए, वह आई थी, वही बता रही थी... मुझे बहुत हंसी आई, तुम्हें डरने की क्या जरूरत...?”

और मैं खिलखिला पड़ी। यह सब मेरी सहयोगी का किया धरा। मजे-मजे में उसने कहा होगा। सारा भय हवा। मैं वहां कह नहीं पाई कि भय और संकोच में महीन रेखा होती है। वही सालो खींची रही हमारे बीच। वे सवाल पूछ कर चली गईं लेकिन कई और सवाल जगा गईं। मैंने उनसे भय की बात अपनी कुलीग से की थी। आउटलुक, हिंदी के साहित्य विशेषांक का मैं संपादन कर रही थी। हिंदी साहित्य के टाप टेन कथाकारों का चयन होना था, पाठकों के वोट से। उदय प्रकाश और मन्नू भंडारी दो नाम सबसे आगे चल रहे थे। आखिर परिणाम भी इसी तरह आया। मन्नूजी लोकप्रियता में दूसरे नंबर पर रहीं। यह वोटिंग श्रेष्ठता के आधार पर नहीं, लोकप्रियता के आधार पर हुई थी। इसके लिए मैंने और मेरी पत्रिका ने बहुत आलोचना झेली। कुछ दोस्तों ने ब्लॉग पर मेरे खिलाफ खूब जहर उगला।

इस तरह की हेडिंग लगाई गई — गीताश्री की समझ बकरी चरने चली गई...

जिसने लिखा, वे तब मुझे नहीं जानते थे। उन्होंने साहित्य विशेषांक की घोषणा देखी और अंक के संपादक की धज्जियां उड़ा दी। बाजार में साहित्य को देख कर सब हाय-हाय कर उठे थे।

हम आलोचनाओं से बेपरवाह अंक की तैयारी में लगे थे। उदय प्रकाशजी से संवाद करने का मेरा जिम्मा था और मैंने अपने सहयोगी को कहा कि मन्नूजी से बात कर ले। इससे पहले मैंने राजेन्द्रजी को पूरा मामला बताया और कहा कि मैं मन्नूजी से बात नहीं कर पाऊंगी। राजेन्द्रजी चाहते थे मन्नूजी से मैं बात करुं। मैंने उन्हें तर्क दिया —

“मैं काम की बात कम करुंगी, आपकी तरफ से लड़ जाऊंगी। बेहतर हो मैं उनसे दूर ही रहूं, जैसे अब तक रही।“

यादवजी हंसे—

“अबे, तुझे खा जाएगी क्या... जा मिल कर आ। कुछ नहीं कहेगी तुझे। तुझे ही जाना चाहिए। तेरे मन में जितनी भड़ांस है निकाल लेना... बिना मिले इमेज बना कर बैठी है... गीता की बच्ची...”

और एक प्यारी गाली उन्होंने उछाल दी जो अक्सर फोन करते ही दिया करते थे। जिसके बिना बात शुरु होती नहीं थी। वह गाली नहीं, हैलो टयून थी मेरे लिए। जो हमारे संबंधों की ऊष्मा मापक यंत्र की तरह काम करती थी।

इस अंक के आने तक यादवजी रोज फोन करके वोटिंग ट्रेंडस के बारे में पूछते। रोज दो तीन उत्सुकताएं होतीं कि कितनी चिट्ठियां आईं, मन्नू को कितने वोट मिले...कौन आगे चल रहा है...

मुझे हैरानी होती कि टॉप टेन की प्रतियोगी सूची में खुद राजेन्द्र यादवजी का नाम शामिल है पर किसी रोज फोन करके ये नहीं पूछा कि मेरे लिए कितने खत आए या मुझे कितना वोट मिला... उनकी सारी चिंताएं मन्नूजी को लेकर थीं और वे रोज खबर रख रहे थे। ज्यादातर चिट्ठियों में मन्नूजी को वोट मिलता था। लोकप्रियता में वे अपने समकालीनों में बहुतों को पीछे छोड़ रही थीं। राजेन्द्रजी तो वोट में हमेशा मन्नूजी से बहुत पीछे रहे। मैं उनसे कहती — देखिए, मन्नूजी ने आपको पीछे छोड़ दिया। वे आपसे ज्यादा पॉपुलर साबित हो रही हैं।

वे हंसते —

“मन्नू तो है ही पॉपुलर। इसमें कोई शक। मन्नू ने मुझसे अच्छी कहानियां लिखीं हैं...”

मैं पूछती — “आप इतने बेचैन क्यों है रिजल्ट के लिए ? जिस दिन फाइनल होगा, छपने से पहले आपको बता दूंगी (ये अलग बात है कि हमने फाइनल रिजल्ट उनको नहीं बताया)।“ पर वे नहीं माने. रोज सुबह की आदत थी फोन करना, सो करते और कहते, आफिस जाकर चिट्ठियां देख कर बताना। उनकी उत्सुकता और बेचैनी चरम पर थी। यह बात मुझे हैरानी के साथ-साथ सुख से भर देती थी। अलगाव के बावजूद इतना कन्सर्न... नामुमकिन। वह भी तब जब खुद भी प्रतियोगिता में शामिल हों। मेरा मन होता कि मन्नूजी को फोन करके या मिल कर ये बातें बताऊं कि देखिए... कितने चिंतित रहते हैं आपके लिए। अपने बारे में कभी नही पूछते, सिर्फ आपके बारे में चिंता है। संकोचवश नहीं कह पाती कि पता नहीं वे इस बात को किस तरह लें।

एकाध बार मैंने यादवजी को उनका वोट बताने की कोशिश की तो वे निर्विकार भाव से सुनते रहे, जैसे अरुचि हो रही हो। वे अपनी लोकप्रियता के दम पर मन्नूजी को कमतर नहीं करना चाहते थे। शायद वे मन ही मन पाठकों को धन्यवाद भी दे रहे थे, जो उन्हें कम वोट कर रहे थे। मैं सोचती कि मन्नूजी इस मामले में वाकई खुशनसीब हैं। लेखन को सपोर्ट करने वाले पति लेखिकाओं के भाग्य में कम ही होते हैं। जिनके होते हैं वे आसमान छू लेती हैं। मैं मन्नूजी को बता नहीं सकी ये सब। उनके रिएक्शन से भय लगता था। हो सकता वे इस पूरी प्रतियोगिता को ही खारिज करके हमें फटकार दें। उस दौर में कई साहित्यकारों ने बहुत फटकारा और बाजारवाद का प्रभाव बताकर इस सर्वे को ही खारिज कर दिया।

इसी कारण यादवजी के बार-बार आग्रह पर भी मैं मन्नूजी के पास नहीं जा पाई। उन्हें नमस्ते करके खिसक जाना चालू रहा। उस शाम जब वे मुझसे पूछ रही थी तब मैं भीतर से हल्की हो रही थी। मेरे मन में बर्फ-सी जमी थी उन्हें लेकर, वो पिघलने लगी। कुछ शब्द गुस्से में लरजने लगते थे कि इतने साल निभाया तो कुछ साल और निभा लेतीं। इस उम्र में अलग होने का फैसला हमें रास नहीं आया...।

बोल फूटते नहीं थे।

उसके बाद कई मुलाकातें हुईं, हल्की बातें हो जाती थीं। मैं उनके बहुत करीब कभी नहीं जा पाई। मैं जितनी यादवजी के करीब थी, उतनी ही मन्नूजी से दूर थी। पर क्या सचमुच मैं उनसे दूर थी...

यही सारे सवाल तो वो जगा गईं थीं।

नहीं...! कैसे दूर हो सकती थी ? स्थानों की दूरियां थीं, पर मैं मन्नूजी को जानती थी... मार्फत राजेंद्रजी। बहुत जानती थी... अच्छे से जानती थी। मन्नूजी मेरी उत्सुकताओं में शामिल थीं। बातचीत में जिक्रे-यार जरूर होता। चूंकि अनगिन अकेली शामें मैंने राजेन्द्रजी के साथ घर पर बिताईं हैं, जहां हम साहित्य से लेकर दुनिया भर की बातें करते थे। हर बार दो स्त्रियां चर्चा में जरूर आती, वो भी मेरी तरफ से। एक मन्नूजी और दूसरी मीता। मीता से कई बार उन्होंने फोन पर मेरी बात भी करवाई। मैं उनसे मिलने आगरा जाने की सोचती रह गई। जिन दिनों यादवजी पर किताब संपादित कर रही थी, उन्हीं दिनों मीता से भी बातचीत करके किताब में शामिल करने की योजना थी। उन्हें मैंने खत भी लिखा था। बात बन भी जाती पर यह बात रह ही गई। शायद मेरे भीतर यादवजी जितना साहस नहीं था कि मीता से मिल आऊं। मन्नूजी क्या सोचेंगी... यही सोचती रह गई। क्योंकि मैं मन्नूजी का स्वभाव यादवजी के जरिए जान चुकी थी। वे निडर थे, भयहीन । मुझे लगता था कि मैं मन्नूजी के सामने पड़ूंगी तो कहीं गिल्ट न महसूस करुं... यादवजी चाहते थे कि मैं आगरा जाकर उनसे मिल आऊं। कहीं भीतर में सहज स्त्रीसुलभ संकोच था, जो रोक रहा था।

उस दौर में मन्नूजी की आत्मकथा के अंश छपे थे। जिसमें उन्होंने यादवजी के आरोपों का जवाब गिन-गिन कर दिया था।

मुड़-मुड़ के देखता हूं के बदले मुड़-मुड़ के देखा था तो इसे भी देखते... जवाब की शक्ल में मुझे शाम को पहुंचते ही यादवजी ने थमा दिया।

“ले पढ़... मन्नू ने बहुत बढिया लिखा है...”

“ये बढिया लिखा है... आपको धो डाला है.... क्या भिगो-भिगो कर मारा है...”

“मन्नू के साथ सबसे बड़ी समस्या है कि वह हर चीज के लिए मुझे ही कसूरवार समझती है। दुनिया में कहीं कोई घटना घट जाए, उसके लिए मैं ही कसूरवार हूं... सबके पीछे मुझे ही दोष देगी...”

बोलते हुए हंसने लगते। इतने आराम से वह ये सब कह जाते थे। मैं सुखद आश्चर्य से भर जाती कि अलग होने के बाद भी इतना प्रेम बचा रखा है।

“सच बताइएगा... कौन-सी बात है जो आपको मन्नूजी से बांधे हुए है... आप अलग नहीं हो पाते उनसे...?”

“मेरी आत्मकथा पढ़ लो...सारे सवालों के जवाब हैं वहां... मन्नू ने मुझे हमेशा कुंठारहित साथ दिया। उसने उस वक्त मुझसे शादी की जब मैं लंगड़ा था। वह असाधारण साहस की महिला है, उसने मेरे लिए बहुत सुना और सहा है…”

मेरे मन में मन्नूजी “आपका बंटी” और “महाभोज” की लेखिका के तौर पर दर्ज थीं। “रजनीगंधा” फिल्म की खुमारी इस दौर में भी हावी थी। राजेन्द्र यादव से ज्यादा कहूं तो मन्नूजी का असर था। हम जब बड़े हो रहे थे तब लेखिकाएं ही हमारा आदर्श रहीं। कमला दास, अमृता प्रीतम, मृदुला गर्ग और मन्नू भंडारी सबसे ज्यादा हमारे जीवन और सोच में घुसी हुई थीं। “आपका बंटी” ने तो हमें खूब रुलाया। परसाद की तरह बांट-बांट कर होस्टल में हमने कुछ किताबें पढ़ीं जिनमें एक “आपका बंटी” रहा। वह दौर था जब समाज में बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी। लड़कियां बदल रही थीं और उनका साहित्य भी। मन्नूजी ने उसी समय हमारे कच्चे मन पर दस्तक दिया और वहां छप गईं।

“आपका बंटी” की लेखिका से कभी मिल पाएंगे, ये छोटे शहर की धुर सामंती, गैर साहित्यिक परिवार की लड़की कभी नहीं सोच सकती थी। अमूर्त चाहतें भीतर बहुत पोसाती रहती हैं अपने आप। दिल्ली में आने के बाद क्या पता था कि लेखिका से नहीं, उनके पति से मित्रता हो जाएगी वो भी इतनी ज्यादा कि मेरी प्रिय लेखिका के बारे में बिन मिले ही सबकुछ जान सकूंगी।

पहली बार किसी स्त्री को किसी पुरुष के मुंह से इतना सुना और समझा जाना। जितनी रुचि लेकर वह मन्नूजी के बारे में बताते वह बहुत भावुक कर देने वाले पल होते। कई बार हम झल्ला कर कहते कि उन्होंने तो आपको नकार दिया, अपनी जिंदगी और साथ से बेदखल कर दिया, आप क्यों अब भी नहीं बदले उनके प्रति...।

यह तस्वीर का एक ही पक्ष था जो मैं देख रही थी। दूसरा राजेन्द्रजी दिखा रहे थे। मुझे हजम नही होती थी ये बात कि वे मन्नूजी को लेकर खुद से ज्यादा चिंतित रहें। मैं सचमुच नादां थी कि रिश्तों की गहराई समझ नहीं पा रही थी। मैंने अब तक रिश्तों को टूटते, उनकी छीछालेदर होते देखा था। वे बड़े साधारण लोग थे। यहां दो असाधारण लोगों से मेरा पाला पड़ा था। जो दूर रह कर भी एक दूसरे के लिए इतने बेचैन और चिंतित थे। जो रोज बात करते और एक दूसरे का हाल पूछते थे। मैं एक तरफ की बेचैनी और चिंताएं देख रही थी, दूसरी तरफ के बारे में अंदाजा लगा सकती थी। उम्र के इस पड़ाव पर राजेन्द्रजी का अकेलापन मुझे खलता और मैं चिढ़ कर कहती –

 “आप दोनों को साथ रहना चाहिए। दोनों को एक दूसरे का साथ देना चाहिए... क्यों अकेले-अकेले...”

“नहीं... अब संभव नहीं। यह अकेलापन मन्नू का चयन है और मैं निर्वाह करुंगा। उसने बहुत साल निभाया। मुझे झेलना-सहना बहुत आसान काम नहीं... अच्छा ही हुआ हम अलग हुए, खुशी और सुकून से हैं… कम से कम घरेलू कलह में हम दोनों की रचनात्मकता नष्ट तो नहीं हो रही है...”

“आप फिर से साथ क्यों नहीं रहना चाहते...?”

“अब हम रह भी नहीं सकते... मैं हूं महफिलबाज, मन्नू को शांति पसंद। वो ये सब पसंद नहीं करती। मुझे चौपाल बहुत पसंद है, खाना पीना, शोर शराबा... बहुत लोगबाग मिलने-जुलने वाले आते हैं... इसीलिए बीमार पड़ने पर भी नहीं जाता वहां...”

“मन्नू तो बहुत बुलाती है...मैं नहीं जाना चाहता… उसे मेरी वजह से दिक्कत होगी... मैं ये नहीं चाहता... हम अलग अलग रुटीन जीने वाले लोग बन चुके हैं... मेरी स्वतंत्रता उसके लिए विरोध की वजह है, मुझे अपने लिए अलग स्पेस चाहिए था, मन्नू को मुझमें समर्पित पति की तलाश थी... जो मैं कभी हो न सका...”

मुस्कुराते हुए सिगार मुंह में लगा लेते।

“क्या आप मन्नूजी को लेकर गिल्ट में रहे हैं...?”

“हां, बहुत ज्यादा... हमेशा मन में बना रहा... मैं सचमुच घरेलू किस्म का जीव नहीं था... मन्नू टिपिकल स्त्री है, खोंटी घरेलू, इतनी बड़ी लेखिका होते हुए भी उसका पारिवारिक मूल्यों में अगाध विश्वास रहा है, मैं ही पकड़ में नहीं आ सका। हमेशा छिटकता रहा... ये सब मैं लिख चुका हूं... किताब में पढ़ लेना...”

सिगार के धुएँ में उनके चेहरे की सिलवटें छुप जातीं। चश्मे के भीतर आंखें बरसती रही होंगी शायद। मैं गौर से देख नहीं पाती थी। क्योंकि हमारी बातचीत का मुद्दा मन्नूजी के अलावा भी बहुत कुछ था।

मन में हमेशा एक बात खटकती कि मन्नूजी इन पर इतना आरोप लगाती हैं, क्या उनके जीवन में कभी कोई पुरुष नहीं आया। कोई दूसरा आदमी...!

राजेन्द्र यादव की लोकतांत्रिकता ही इस तरह के सवाल पूछने की अनुमति दे सकती थी। किसी और महिला के पति से आप ये सवाल नहीं पूछ सकते। यह असाधारण जोड़ा था।

“ये कैसे हो सकता है कि यादवजी की इतनी बेवफाई झेलने और लेखन में उच्चतर मुकाम पाने के वावजूद मन्नूजी की किसी पुरुष से दोस्ती की बात कहीं नहीं सुनाई देती।“

इस बात पर राजेंद्रजी की अबूझ मुस्कान फूटती।

“मन्नू के मित्र रहे हैं। कमलेश्वर, मोहन राकेश से खूब अच्छी दोस्ती रही है, मन्नू ने दोनों पर लिखा भी है, जिस दौर में हमारी राकेश से खटपट चलती थी उस दौर में मन्नू ने राकेश की सराहना की थी। मैं हमेशा इस बात का पक्षधर रहा हूं कि पति पत्नी हुए तो क्या हुआ, दोस्ती अपने हिसाब से की और निबाही जानी चाहिए। ये ना हो कि पति की लड़ाई हो तो पत्नी भी रुठ जाए उनसे। लेखकीय दोस्तियां होती हैं। इसमें सनसनी मत ढूंढो तुम लोग...”

इतना कह कर वे डांटने लगते–

“क्यों जानना है तुमलोगो को ये सब…?”

“आप लगातार उनके आरोप झेलते रहे, पलट कर कोई ऐसा आरोप जड़ा नहीं तो हमें हैरानी हुई... आमतौर पर दोतरफा आरोप-प्रत्यारोप होते हैं... आप पर तो घाघरा पल्टन के सरगना होने के आरोप तक लगे हैं...”

“लगने दे... क्या फर्क पड़ता है, क्या इससे हमारा मूल्यांकन होगा कि हमारे कितनों से संबंध रहे हैं, हम कितनों के साथ सोए-जागे रहे। हिंदी पट्टी की सारी चिंताएं मुद्दो से हटकर इसी के ईर्दगिर्द रहती है। इस सब में मत घुसो तुम लोग।“

लेकिन आप दोनों ने अपने संबंधों की हर बात सावर्जनिक कर दी। साहित्य में पर्सनल संबंध पहली बार इस तरह उछले। हिंदी पट्टी क्या करे...

मेरा संकेत मन्नूजी की आत्मकथा – एक कहानी यह भी – की तरफ था। जिसे मैं तब तक पूरा पढ़ चुकी थी। मन्नूजी से पूछ नहीं सकी थी, लेदे के राजेन्द्रजी थे जिनसे आप कुछ भी पूछ सकते थे और जवाब की उम्मीद कर सकते थे।

वह हमेशा उकसाते कि तुझे मन्नू से पूछना चाहिए। इंटरव्यू कर सकती हो। मैं खुद पर आश्चर्य कर रही हूं कि कौन सी बात थी जो मन्नूजी तक जाने से रोकती थी। कहीं मन में उनके प्रति गुस्सा कि वे अलग क्यों हुईं या उन्हें लेखक पति के प्राइवेट स्पेस की चाहत का सम्मान करना चाहिए था। या उनकी बेटी रचना की तरह सोच रही थी कि दोनों को बहुत पहले अलग हो जाना चाहिए था। अब जबकि दोनों शिखर पर थे, उम्र के इस दौर में जहां साथी की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब अलग होने का फैसला मुझे जंचा नहीं। शायद पारिवारिक मूल्य मुझे जकड़ कर रखते हैं इसलिए इन दोनों के संबंधों पर मैंने हमेशा भावुक होकर सोचा और मन्नूजी से हल्की नाराजगी रखती आई।

मन्नूजी की इमेज के पीछे राजेन्द्रजी का ही तो हाथ है जो गाहे-बगाहे चर्चा करके, कुछ लिख-पढ़ कर मेरे मन में उन्होंने बनाई थी जिसके तहत मन्नूजी परिवार पसंद महिला रही हैं। मेरे हमदम मेरे दोस्त में राजेन्द्रजी ने लिखा भी है –

“अक्सर मन्नू उन्हीं लोगो से मेरा मिलना-जुलना पसंद और प्रोत्साहित करती है जो सदगृहस्थ हों, पति लोग सज्जन हों, पत्नियों का हर कहना मानते हों, उनके साथ बाजार जाकर बेड-कवर, क्राकरी, साड़ी पर्दे लाते हों। कभी अकेले बाहर घूमने न जाते हों और सिनेमा के पास से तो बिना पत्नी को साथ लिए निकलते भी न हो । ठीक साढे पांच बजे घर आ जाते हों, रोज बता देते हों कि आज यह पकेगा...।“

पति पर पूरी तरह न्योछावर पत्नी मन्नूजी और आदर्श पति की जिद रही उनकी। जो पूरी न हो सकी। कहीं न कहीं मन टूटा होगा। इसका अहसास राजेन्द्रजी को विछोह के बाद हुआ और मन्नूजी को...? जिनके लिए दुनिया का सबसे “अधम आदमी” राजेन्द्र यादव और दुनिया का “सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति” भी राजेन्द्र यादव रहे...। उनके मन की थाह पर्सनली नहीं मिली। उनकी आत्मकथा में गहरे अवसाद हैं, तकलीफें हैं। उन्होंने लिखा भी है कि ठीक-ठीक उन तकलीफों के शायद न पकड़ पाऊं पर यह तो लिख ही दिया—

“आज जब मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूं, पर राजेन्द्र के साथ रहते हुए भी तो मैं बिल्कुल अकेली ही थी। पर कितना भिन्न था वह अकेलापन जो रातदिन मुझे त्रस्त रखता था । साथ रह कर भी अलगाव की, उपेक्षा और संवादहीनता की यातनाओं से इस तरह घिरी रहती थी सारे समय कि कभी साथ रहने का अवसर ही नहीं मिलता था। आज सारे तनावों से मुक्त होने के बाद अकेले रहकर भी अकेलापन महसूस ही नहीं होता। कम से कम अपने साथ तो हूं।“

उनके अकेलेपन और खुद के साथ होने ने उन्हें मुझसे जोड़ दिया है। उनकी सफरिंग और पीड़ा के अध्याय खुल रहे हैं। मेरे भीतर नाराजगी की गांठ खुलने लगी है। लेखन और जीवन का अंतर एक स्त्री के लिए कभी सह्य नहीं हो सकता।

और यही एक बात... राजेन्द्रजी के मार्फत पता नहीं चली।

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