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गजब नेता – मैत्रेयी पुष्पा

मार्च 10, 2016

गजब नेता 

– मैत्रेयी पुष्पा

मैत्रेयी पुष्पा – हमने तुमको क्यों वोट दिये थे तुमको? #शब्दांकन
यह दहशत कम तो नहीं और स्त्रियों का अपमान भी कम नहीं जब एक मंत्री कहता है — कुछ दिन बाद पत्नी पुरानी हो जाती है तो मजा नहीं रहता। तभी दूसरा बोलता है —फलां औरत सौ परसेंट टंच माल है


हमारी राजनीति लोकतंत्र पर आधारित है, ऐसा हम मानते हैं।


मगर हमारे नेताओं का जवाब नहीं। गजब की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजर जाते हैं कि हम उनकी राजनीतिक तहजीब पर हक्के-बक्के रह जायें। असल में वे आजादी के बाद लागू हुए लोकतंत्र के साथ अपने मर्दतंत्र के व्यवहार को जोड़कर चलना भी राजनीतिक हक में शामिल मानते हैं और बेशक अपनी चली आ रही भाषा का खुला व्यवहार स्वतंत्र नागरिक के रूप में करते हुए दिखाई देते हैं। 'ये भारत देश मेरा...' जैसे गीत गाने वाले इस देश की 'पारम्परिक सभ्यता' को आचरण में न लायें तो अपनी नागरिकता को सिद्ध कैसे करेंगे।

हमारे देश में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते...' का विधान है और इस विधान की बढ़-चढ़कर जोर-जोर से मुनादी की जाती है। लेकिन हमारे इसी महान देश में देवता सरीखे लोग जो नेताओं के रूप में विभिन्न विभागों के सिंहासनों पर विराजते हैं, उनके भी अपने कुछ 'नियम धरम' हैं। विभिन्न वर्गों और वर्णों के लिए व्यवहारगत भिन्नताएं हैं। अत: जो कुछ मंच श्लोकों में कहा गया है, वह मंच श्लोकों की अपनी थाती है। समाज का चलन इस थाती को लेकर चले, यह जरूरी तो नहीं। नारी की पूजा हो तो वह देवी हो जाती है, तभी देवता वहां निवास करते हैं। राजनीति के देवता अदृश्य अगोचर थोड़ेई होते हैं, वे तो हाड़ मांस के बने मर्दमानुस होते हैं, जिनका व्यवहार औरत को लेकर उसकी औकात तय करता है —

'अरी नर्सो ! धूप में क्यों बैठी हो, रंग काला हो जायेगा। फिर ब्याह कैसे होगा? यानी कि काली औरत मर्द के मन की नहीं होती।' ऐसा कुछ एक राज्य का महाराजानुमा शासक कहता है। अब बेचारी नर्सें जो ड्यूटी कर रही हैं, वे विवाह की चिंता में ड्यूटी भूल जायें। यानी इन औरतों का मकसद अपनी सेवा और तरक्की के लिए मेहनत नहीं, विवाह के लिए गोरा होना है। तभी दूसरा बोल पड़ा, जो मंत्री की हैसियत रखता है और अपने विभाग का सर्वेसर्वा है — एक बात तो है कि राजीव गांधी अगर किसी नाइजीरियन औरत से ब्याह कर लेते तो क्या कांग्रेस उस महिला का नेतृत्व स्वीकार करती (कहकर तालीपीटू ठहाका)? यहां भी गोरे रंग ने बाजी मारी, मरदाने बयान के जरिए। ऐसे ही रंगभेदी तमाम उदाहरण मिल जायेंगे। काले या सांवले रंग को इंसानियत के तराजू में बेवजन ठहराते हुए। फिर क्या ताज्जुब कि चेहरे को गोरा बनाने की क्रीम का सालाना व्यापार लाखों करोड़ का जाता है और बाजार विज्ञापनों में मुनादी करता है कि स्त्रियो/ लड़कियो, तुम्हारे राजनीतिक कर्णधार किस कदर इन प्रसाधनों को जरूरी बना रहे हैं। समाज के युवक तुमको तुम्हारे कुदरती रंग में स्वीकार नहीं करेंगे, यह दहशत कम तो नहीं और स्त्रियों का अपमान भी कम नहीं जब एक मंत्री कहता है — कुछ दिन बाद पत्नी पुरानी हो जाती है तो मजा नहीं रहता। तभी दूसरा बोलता है —फलां औरत सौ परसेंट टंच माल है
I am the only lady member in this assembly, even though one half of the population are women [sic]. You know, Sir, that our position in society is still backward and we have many grievances one of which is that only two women out of every one hundred are able to read and write. So you will side with me in all my attempts to ameliorate their condition realising that no country or nation will prosper without the active support and cooperation of its women. 

– From inaugural speech of Muthulakshmi Reddy, (Editor of Stri Dharma) first woman member of the Madras Legislative Council in 1927.
यह क्या माजरा है? जिनको वोट देकर चुना जाता है, उनकी मानसिकता में औरत की औकात बस इतनी सी है कि वे कह दें अगर बलात्कार होता है तो इसके लिए लड़कियां ही जिम्मेदार हैं। उनके छोटे कपड़े लड़कों को उकसाते हैं और लड़कों से 'गलती' हो जाती है। एक पार्टी के सिरमौर बोल पड़ते हैं — नृत्य करना अच्छा है, देखो दक्षिण की औरतों के सुडौल शरीर!

हमारी देह से उनकी नजर हटती नहीं। वे हमें कभी फूल कहते हैं तो कभी मिठाई मान लेते हैं, जो हर तरह से उनको आनन्द और स्वाद की वस्तु लगती है। हम औरत के रूप में मादा हैं, बस भोग की चीज हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं?

ओ हमारे देश के राजनयिको! हमने क्यों वोट दिये थे तुमको? हमने जनप्रतिनिधि को वोट दिया था या औरतखोरों को? कितने बलात्कारी हैं रे विधानसभा और संसद के बीच, कोई सांभा बतायेगा? यदि साहस हो तो बताये कोई पुरुष प्रवर, नहीं तो ये हमारे नेतारूपी मर्द हमें स्त्री शोषक और स्त्री भक्षक के रूप में ही दिखाई देते रहेंगे। अगर कोई लोकतंत्र का रखवाला है तो खारिज करे इनकी संसद की सदस्यता, इनका मंत्री पद, हम कब से इंतजार कर रहे हैं। भंवरी और सोनी सोरी को न्याय अभी तक नहीं मिला तो जो कुछ इन दिनों शाब्दिक अत्याचार हुए हैं, उनका इंसाफ कौन करेगा? ये नेता का अर्थ नहीं जानते, बस पद, पोशाक और गद्दी पहचानते हैं। ये पद की गरिमा से भी बावस्ता नहीं हैं, शोहदों की तरह औरतों से व्यवहार करने में अभ्यस्त हैं। ये स्त्री का किसी भी रूप में आदर करने के लिए तैयार नहीं, बस 'आदरवादी' गीत कंठस्थ कर लिए हैं। सामान्य, मामूली और विशेष महिला का भी यहां कोई अंतर नहीं, क्योंकि इन्होंने महिलाओं के लिए 'बेइज्जत लोकतंत्र' की रचना कर डाली है। 

मुझे वे सब याद आते हैं जो ढोल पीट-पीटकर कहते पाये जाते हैं कि अब तो स्त्रियां बहुत आगे आ गयीं। हर क्षेत्र में उन्होंने अपना झंडा बुलन्द किया है। मेरे मन में ये बातें निरंतर दस्तक देती रहती हैं, लेकिन स्त्रियों के पढ़ने-लिखने, कला और विज्ञान में पारंगत होने, पुलिस और फौज में उपस्थिति दर्ज करने, खेल जगत में लोहा मनवाने और राजनीति में हस्तक्षेप करने के बावजूद हमारे आजाद देश के नेता मंत्री तक स्त्री की देह में रिड्यूस करके देखने से बाज नहीं आते और औरत को घेरने की फिराक में रहा करते हैं। तब स्त्रियों का वजूद उनसे निरंतर टकराने में अपनी शक्ति क्षय करता नजा आता है। 

ऐसे बदतमीज क्यों हैं नेता लोग?  फिक्र हमें भी है कि ऊंचे से ऊंचे पद पर बैठकर भी इनको मनुष्यता की हत्या करना ही रास आता है। औरत को मादा मानना ही इनकी तमीज बन जाती है। ये गोरी वाली चमड़ी का खेल खेलते हैं, फिर भी इनके आकाओं को कुछ अनर्गल नहीं लगता। एक औरत चार-चार बच्चे पैदा करे, यह भी गलत नहीं लगता और यह भी गलत नहीं कि चार बच्चे ही तो पैदा करने के लिए कहा था चालीस पिल्ले तो नहीं। रामजादे और हरामजादे के मर्द का भी बोलबाला रहा। खांटी मर्द और मर्दपरस्त साध्वियां क्या-क्या कमाल नहीं दिखा रहीं और हम इन्हीं कमाल-धमालों की दुनिया में खुद को तरक्कीयाफ्ता, प्रगतिशील और शिक्षित सभ्य मनुष्यों के बीच रहने की कल्पना कर रहे हैं। कल्पना इसलिए कर रहे हैं या करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि मंत्री जी या मंत्रियों ने खेद प्रकट कर दिया है। उनका खेद बड़ा भारी है जो स्त्री-बलात्कार और स्त्री हत्या पर भी वजनदार बैठता है। इस आजाद देश में स्त्रियां और स्त्रियों के लिए भाषा आज भी गुलाम है। यह गुलामी हमारे पुरुषतंत्र की देन है, वह धर्म, समाज या राजनीति में, जहां भी रूल करे। फिर क्यों शिकायत हो जब कोई फूलनदेवी बैलेट की जगह बुलट से काम ले?

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