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तरुण विजय : #हिन्दुस्तानियत से जिन्दा है कश्मीरियत @Tarunvijay

जुल॰ 14, 2017

tarun vijay

हिन्दुस्तान के अलावा किसी कश्मीरियत का कोई मायने ही नहीं है

तरुण विजय

जो कश्मीरी मुस्लिम नेता अमरनाथ यात्रियों के लिए एक इंच जमीन भी न देने की दम्भोक्तियां करते रहे और हिन्दुओं को कश्मीर से निकाले जाते समय चुप रहे, वे किस मुंह और किस हक से कश्मीरियत की बात करते हैं ?


अमरनाथ यात्रियों की जघन्य हत्या करने वाले इस्लामी आतंकवादी न केवल इंसानियत पर धब्बा लगा गए बल्कि अपने मजहब को भी कलंकित कर गए। देश के हिन्दू-मुसलमानों ने जिस एकता से इस हत्याकाण्ड की निन्दा की है वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। लेकिन सेकुलर मीडिया का एक पक्ष — जो वस्तुतः हिन्दू-विरोधी मानसिकता का द्योतक है, वह भी इस घटनाक्रम में उजागर हुआ। वह पक्ष है हिन्दू समाज की वेदना को हिन्दू के नाते न प्रकट करना और न ही उसका हिन्दू पहलू उजागर होने देना।



यदि किसी भारतीय मुस्लिम पर अत्याचार या हमला होता है तो न केवल पीडित का मजहब सुर्खियों में आता है बल्कि हमलावरों को "हिन्दू कट्टरपंथी" वगैरह बल्कि त्रिशूलधारी खूंखार और सर पर केसरिया पट्टी बांधे लोगों को सारे हिन्दू समाज का प्रतिनिधि बता कर दिखाया जाता है। 

यदि किसी भारतीय मुस्लिम पर अत्याचार या हमला होता है तो न केवल पीडित का मजहब सुर्खियों में आता है बल्कि हमलावरों को "हिन्दू कट्टरपंथी" वगैरह बल्कि त्रिशूलधारी खूंखार और सर पर केसरिया पट्टी बांधे लोगों को सारे हिन्दू समाज का प्रतिनिधि बता कर दिखाया जाता है। पर यदि पीड़ित हिन्दू है और हमलावर मुस्लिम तो न पीड़ित की आस्था का उल्लेख होगा और न ही इस्लामी आतंकवादियों को खूंखार चेहरे वाला दिखाया जाएगा।

क्या हिन्दू की वेदना, वेदना नहीं और वेदना का भी हम सम्प्रदायीकरण करेंगे, वह भी सेकुलरवाद के नाम पर ?

जो कश्मीरी मुस्लिम नेता अमरनाथ यात्रियों के लिए एक इंच जमीन भी न देने की दम्भोक्तियां करते रहे और हिन्दुओं को कश्मीर से निकाले जाते समय चुप रहे, वे किस मुंह और किस हक से कश्मीरियत की बात करते हैं ? केवल और केवल हिन्दुस्तानियत से ही कश्मीरियत जिन्दा है। हिन्दुस्तान के अलावा किसी कश्मीरियत का कोई मायने ही नहीं है। क्योंकि जब तक जिहादी दरिन्दों द्वारा इस्लामियत के नाम पर निकाले गये 5 लाख हिन्दू सुरक्षा और सम्मान के साथ वापस नहीं लौटते तब तक कैसा गणतंत्र और कैसी संसद। सब अधूरा ही है। कश्मीर से सीधे केरल आ जाइये। हर दिन हम उन हिन्दुओं की हत्याओं के आंकडे जोडते चले जाते हैं जिन्हें केवल आग्रही एवं निष्ठावान हिन्दू होने के नाते मारा जा रहा है। जब कोई स्वयंसेवक सुबह काम पर जाता है तो मालूम नहीं होता कि शाम तक सुरक्षित घर लौटेगा। घर में खाना बनाकर बच्चों को परोस रही मां आशंकित रहती है कि शाखा से घर लौटकर आये उसके बेटे के पीछे पीछे माकपाई ना आ रहे हों। जो घर तोड़ देंगे, जला देंगे, बूढ़े मां-बाप को भी शायद मार दें। प. बंगाल में हिन्दू बस्तियों का उजाड़ा जाना बदस्तूर जारी है क्योंकि ममता बन्द्योपाध्याय को मुस्लिम वोट चाहिए। पाकिस्तान से 12, 14, 16 साल की हिन्दू बच्चियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह की खबरें आती ही हैं — कौन इस पर दर्द महसूस करता है बांग्लादेश के हिन्दू आज भी, तमाम राजकीय आत्मीय सम्बंधों के अरक्षित एवं आक्रांत हैं।

कितने विध्वंस और आर्तनाद हिन्दुओं को भी और देखने होंगे ? सिर्फ इसलिये क्योंकि वे हिन्दू हैं?

निपुर शर्मा ने वैसी अभद्रता प्रदर्शित करने वाली राणा अयूब के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज करा दी 

प्रसिद्ध विचारक और राष्ट्रीय भावनाओं से अपनी कलम को मजबूत बनाने वाली निपुर शर्मा ने वैसी अभद्रता प्रदर्शित करने वाली राणा अयूब के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज करा दी 


सदानंद झूमे जैसे विदेशी अखबारों के स्तंभकार इसे लोकतंत्र एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान बैठे



श्री रामनाथ कोविन्द का राष्ट्रपति पद के लिये नामांकन होना तो प्राय: सभी को अच्छा लगा। लेकिन कतिपय मुस्लिम व कम्युनिस्ट, जो सोशल मीडिया के जिहादी हैं, भाजपा के इस असाधारण लोकप्रिय निर्णय से बौखला उठे और उन्हें गाली गलौच की भाषा में ट्वीट किया। प्रसिद्ध विचारक और राष्ट्रीय भावनाओं से अपनी कलम को मजबूत बनाने वाली निपुर शर्मा ने वैसी अभद्रता प्रदर्शित करने वाली राणा अयूब के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज करा दी तो सदानंद झूमे जैसे विदेशी अखबारों के स्तंभकार इसे लोकतंत्र एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान बैठे। विदेशों में रह के मन कैसे विदेशी हो जाता है यह हम नहीं समझ पाते क्योंकि स्वदेश में रहने वाले भी ऐसे कुछ लोग है जिनके मन कहीं बाहर है, तन भले ही भारत में हो। केरल में मारे जा रहे स्वयंसेवकों का दर्द दर्द नहीं, कश्मीर के हिन्दुओं का दर्द दर्द नहीं। लेकिन प्रणय रॉय के फर्जीवाड़े बेनकाब होने का दर्द बेहद तकलीफदेह हो जाता है — इन अमन के रखवालों के लिये। जैसे अफजल खां और स्टॉलिन ने अपने सूबे अपने से भिन्न मत वालों के लिये बंद किये हुये थे वैसे सेक्युलर चैनल और अखबार वाले अपने संपादकीय पृष्ठ तथा अग्रलेख की जगहें केवल और केवल हिन्दुत्व समर्थक राष्ट्रीय विचार के अनुगामियों के लिये बंद करके रखते रहे। इनके लिये अभिव्यक्ति की आजादी का एक ही अर्थ था- राष्ट्रीयता समर्थक केसरिया विचार वर्ग पर एकतरफा आक्रमण तथा हिन्दुत्व को एक गाली का रूप देना।

बांग्लादेश के हिन्दू आज भी, तमाम राजकीय आत्मीय सम्बंधों के अरक्षित एवं आक्रांत हैं।

दार्जिलिग में गोरखा समाज पर भाषा के नाम पर ममता का अत्याचार, वस्तुतः मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये हिन्दू समाज पर आघात ही है। गोरखा समाज पराक्रमी और देशभक्त है। अत्यन्त धर्मनिष्ठ है। गोरखा शब्द का जन्म ही गोरक्षा से हुआ। जो गोरक्षक था -उसे गोरखा कहा गया। उन्हें अपनी भाषा, संस्कृति की रक्षा का हक क्यों नहीं होना चाहिये ? यदि दार्जिलिंग मुस्लिम बहुल होता तो ममता दीदी का ऐसा रवैया कभी नहीं होता। उनका बस चले तो वह मुस्लिम वोटों के लिए उर्दू को ही सब पर लाद दें। पर हिन्दू गोरखा समाज की भाषा उन्हें नहीं स्वीकार है।

भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में अगर भारत नहीं जीत पाता तो ये किसके लिये खुशी का कारण होना चाहिये ? और जिसे खुशी हो उसे क्या कहना चाहिये ? आखिर हमारा आपस में कोई रिश्ता है और उस रिश्ते का नाम भारतीयता है इसलिये तो हमें दूसरे से अपनापन महसूस करते हैं। अगर ये अपनापन एक दूसरे के सुख दुख में सुखी और दुखी नहीं होता तो फिर अपनेपन की परिभाषा ही बदलनी पड़ेगी।

कश्मीर में पिछले दिनों शहीद हुये लेफ्टीनेट उमर फैयाज और सब इंस्पेक्टर फिरोज डार से जिहादी दुश्मनी का कारण सिर्फ यही था कि वे भारत के तिरंगे और संविधान के लिये वफादार थे। सही बात यह है कि 99 प्रतिशत कश्मीरी मुस्लिम आज भी एक भारतीय के नाते सम्मान और सुख की जिंदगी बिताना चाहता है। जो थोड़े बहुत गद्दार और अपने ही खून और मिट्टी से द्रोह करने वाले लोग हैं उन्हें दिल्ली की मीडिया का सहारा मिलता है। हमने गद्दारों के साक्षात्कार सेक्युलर समाचारपत्रों में पढ़े हैं। क्या कभी किसी ऐसे पत्र पत्रिका अथवा चैनल ने उन कश्मीरी मुस्लिमों के साक्षात्कार भी छापें है जो भारत की मिट्टी की सुगंध में लिपट राष्ट्रीयता की बात कहते हैं ? दिल्ली की मीडिया यह दिखानी चाहती है कि कश्मीर के पत्थरबाज और हुर्रियत के गद्दार ही घाटी के प्रतिनिधि है। जबकि यह गलत है।

लगातार लगातार विदेशी आक्रमणकारियों से निबटते निबटते हम इस मुकाम पर आ पहुंचे है कि राम कृष्ण और शिव के ध्वस्त किये हुये मंदिर पुनर्निर्मित करने की बात करना भी सेक्युलर आक्रमण आमंत्रित करता है। कश्मीर में सात सौ से ज्यादा ऐसे सुंदर और बड़े मंदिर जिहादियों ने ध्वस्त कर दिये जिनका पूरा विवरण दस्तावेजों में दर्ज है। लेकिन आज भी आत्मरक्षा की मुद्रा में खड़ा हिन्दू उन ध्वस्त किये गये मंदिरों के पुनर्निर्माण की बात तक करने से हिचकता ही रहता है। अगल बगल में पहले देख लेता है, फिर धीरे से कहता है —सर वो जो कश्मीर में मंदिर ढ़ाये गये थे उनके पुनर्निर्माण की तो बात कीजिये न सर।

सदियों का दर्द है। संभाले नहीं संभलता। थमते थमते थमेंगे आंसू — ये रोना है कोई हंसी तो नहीं।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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टिप्पणियां

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-07-2017) को "हिन्दुस्तानियत से जिन्दा है कश्मीरियत" (चर्चा अंक-2668) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं

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