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हिंदी कहानी "छोटू" — लव तोमर | #Hindi #Kahani #Shabdankan

अग॰ 6, 2017


छोटू 

— लव तोमर

हिंदी कहानी
Luv Tomar


भारी-भरकम पढ़ते पढ़ते हम ज़रूर किसी वजन-तले हो जाते हैं, यही कारण है कि ऐसे में कुछ ऐसा जो अच्छा साहित्य हो लेकिन जो गरिष्ठ नहीं हो, पढ़ने का मन होता है। लव तोमर की प्रस्तुत कहानी इस वर्ग की एक खूबसूरत कहानी है। उदयीमान युवा लेखक लव तोमर अपने बारे में बताते हुए लिखते हैं, "मैं पिछले कुछ वर्षों से थिएटर कर रहा हूं खुद को तलाशने का एक प्रयास। बचपन से हिंदी साहित्य को पढता आया हूँ, सुनता आया हूँ, इसका श्रेय मेरे स्वर्गीय बाबा को जाता है। जिन्होंने मुझे होश सम्हालते ही हिंदी के महान साहित्य से परिचित कराना आरम्भ कर दिया था। दिन में बाबा का सानिध्य और रात को मेरी दादी की मनोरंजक और अनजाने में ही बहुत कुछ सिखा देने वाली कहानियाँ। इन दोनों ने मिलकर मेरे अंदर साहित्य को पढ़ने और सुनने की ललक जगा दी, घंटों घंटों तक उनके द्वारा सहजे गये वर्षों पुराने साहित्य को मैं तलाशता रहता पर ये सब सिर्फ पढ़ने और सुनने की ललक तक ही सीमित नही रहा।  कहीं कुछ था जो अपना आकार ले रहा था ,समय के साथ वो बढ़ता ही गया उस पीड़ा की तरह जो अपने चरम पर पहुंच गयी थी,और एक दिन ये दोनों मिल गए ,मैंने अपनी क़लम उठायी और लिखना आरम्भ किया..."।


लव को बधाई देते हुए आप पाठकों से भी निवेदन होगा कि उसकी हौसलाअफजाई कीजिये और मुझे ऐसी और कहानी आप तक लाने की प्रेरणा दीजिये।

भरत तिवारी
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छोटू 

लव तोमर

ड्राइंग शीट के कोरे कागज़ पर आड़ी तिरछी रेखाएं खींचते मेरे हाथ यकायक उस कूँ कूँ की आवाज़ से रुक गए जो काफी देर से मेरे कानों में पड़ रही थी, एक बार को लगा कि ना जाऊं पर अनायास ही क़दम खिड़की की तरफ बड़ गए, देखा तो मिट्टी से सना एक छोटा सा, प्यारा सा, पिल्ला नाली के उस पार खड़ा था, शायद इस पार आना चाहता था, पर नाली बहुत चौड़ी थी और वो बहुत छोटा।

उसकी बेचैनी उसके नटखट और चुलबुले स्वभाव को दर्शा रही थी, उसे देख कर जैसे छोटू की कहानी फिर से ज़िंदा हो गयी। जिसकी शुरुआत उस दोपहर से हुई जब मै स्कूल से मार खाकर बुझे मन और भारी क़दमो से घर लौट रहा था, मेरी उम्र उस वक़्त 9 या 10 वर्ष रही होगी।

सड़क पर पड़े कंकड़ों को ठोकर मारता कब मै घर पहुँच गया पता ही नही चला। घर पर ताला लगा था माँ शायद अभी काम से लौटी नही थी । घर में माँ और मैं दो ही जन थे, कुछ दिन पहले ही मेरे पिता इस भीड़ भरी दुनिया में हम लोगों को अकेला छोड़ गये।

मैं घर के बाहर बनी सीढ़ियों पर बैठ कर माँ का इंतज़ार करने लगा, घर के सामने ही एक सड़क है जिसके दूसरी तरफ एक नाली बहती है जिसे मोहल्ले वालों ने पानी की निकासी के लिए बना दिया था। घर के एक ओर नीम का एक घना सा पेड़ है जो मुझे चिलचिलाती धूप से बचा रहा था, क्योंकि उसकी ठण्डी छाया सीढ़ियों से होती हुई घर के पीछे तक जा रही थी। मै माँ को देखने बार बार सड़क तक जाता और आकर बैठ जाता ।

पड़ोस के दालान वाली आंटी अपने दालान से हमेशा की तरह मुझे देख रहीं थीं , अपने इतने बड़े घर में वो हमेशा अकेली ही नज़र आती थीं मैंने आज तक उनके अलावा उस घर में किसी और को नही देखा । माँ के डर से न उन्होंने मुझ कभी बुलाया और न मै गया, पता नही माँ उनके यहाँ जाने से मना क्यों करती थीं मै आज तक नही समझ पाया ।

बैठे बैठे ही मैंने माँ को तलाशने का असफल सा प्रयास किया लेकिन सड़क से आते जाते अपरिचित चेहरों में माँ का परिचित चेहरा कहीं नही दिखायी दिया उदास होकर मै सीढ़ियों पर सिकुड़ कर बैठ गया, धूप अब जाने लगी थी पेड़ की परछाईं भी लगभग ख़त्म हो चुकी थी, आकाश में घने काले बादल उमड़ आये थे हवा में नमी और ठंडक महसूस होने लगी थी, स्कूल बैग को सिर के नीचे लगा कर मै सीढ़ियों पर ही लेट गया ।

"क्या हुआ बेटा माँ आयी नही अभी तक" ? दालान वाली आंटी पास में खड़ी पूछ रहीं थीं, मैंने सिर्फ न में सिर हिला दिया " भूख लगी है"? उनके इस प्रश्न के उत्तर में भी सिर्फ मेरा सिर ही स्वीकृति के भाव में हिला ।

"आओ मै कुछ खिला देती हूँ, आ जाओ" मै मंत्र मुग्ध सा उनके पीछे चल दिया। दालान से होते हुए जब घर के अंदर प्रवेश किया तो दुनिया बदल सी गयी सब कुछ इतना साफ़ और चमकदार था जैसे माँ से कहानियों मे सुना था मेरा अबोध् मन सब निहार ही रहा था कि जूतों मे लगी मिट्टी नीचे बिछे कालीन में लग गयी। अपराध बोध से मेरी आँखें आँटी के चेहरे पर जा टिकीं ।

"कोई बात नही बेटा, आ जाओ" ।



हँसते हुए जब उन्होंने ये कहा तो लगा ये तो माँ से बहुत अच्छी हैं, माँ तो हर छोटी छोटी बात पर डाँटती है " ये मत कर वो मत कर"।

घर मे अनेक रंग बिरंगी चीजों को देख मेरा बाल मन खुशी के ना जाने कितने रंगो से भर गया ।

बचपन भी कितने कमाल का होता है कुछ क्षणो में ही हम अपनी दुनिया बना लेते है और उन क्षणो को अपनी ज़िन्दगी। इस वक़्त आंटी मुझे अपनी माँ से ज़्यादा अच्छी लग रहीं थी, उनके साथ इस ममतामय संबंध को तोडा माँ की आवाज़ ने जो शायद नीचे आ गयीं थी और मुझे आवाज़ें लगा रही थीं, बचपन में बनायी हुई ख़्यालों की दुनिया सच में बहुत अस्थायी होती है रेत के महल की तरह । कुछ पल पहले जो सब कुछ मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, अपना सा लग रहा था सब अजनबी ही गया, एक दम अनजाना। अब सिर्फ माँ की आवाज़ ही मुझे अपनी सी लग रही थी,

" माँ मै यहाँ हूँ । " मैंने छत से ही उन्हें आवाज़ दी, माँ की क्रोध भरी दृष्टि जैसे ही ऊपर उठी मै समझ गया की मुझ से ग़लती हो गयी है नीचे आया तो माँ ने मुझे खींचा और एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।

सिर उठाकर चारों ओर नज़र घुमाई तो अँधेरा घिर आया था मैं अभी भी सीढ़ियों पर ही था। आकाश की ओर देखा बारिश की बूंदे चेहरे पर गिरने लगीं। अभी अभी जो स्वप्न देखा उसकी यादें अब तक ताज़ा थीं। झाँककर ऑन्टी के दालान की तरफ देखा तो पीली रोशनी वाला बल्ब जलता नज़र आया। सब कुछ एकदम शांत था। माँ अब तक नहीं आयी, कितनी देर में आएगी? आएगी भी या नहीं? ऐसे ही न जाने कितने सवाल मन में आ रहे थे।

अचानक आंटी के दालान की झाड़ियों में हल्की सी हलचल हुई, देखने की कोशिश की तो कुछ नज़र नहीं आया। झाड़ियाँ अभी भी हिल रहीं थीं लेकिन कुछ नज़र नहीं आ रहा था उत्सुकतावश जब वहां जाकर देखा तो एक बहुत छोटा सा पिल्ला जो कि बारिश से भीग गया था अपने आपको झाड़ियों में छुपाने का असफल प्रयास कर रहा था।

उसकी गोल गोल भोली सी आँखे मुझे ऐसे देख रहीं थी जैसे मदद की गुहार कर रहीं हों। अपने नन्हे नन्हे हांथो में मैंने उसे उठाया और वापस सीढ़ियों पर आकर बैठ गया। मुझे खेलने के लिए एक साथी मिल गया। अब वो और मैं दोनों मिलकर माँ का इंतज़ार करने लगे। मेरी तरह शायद उसे भी भूख लग रही थी इसलिए स्कूल बैग में रखे टिफिन को सूँघकर कूँ कूँ कर रहा था।

बालमन कितना निस्वार्थ और निश्छल होता है कोई बनावट नहीं। कुछ देर में ही हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए और मैंने उसका नाम भी रख लिया "छोटू"। यहाँ के सारे लड़के मुझसे बड़े थे और मुझे छोटू बुलाते थे पर यहाँ मैं उससे बड़ा था इसलिए यही नाम मुझे सबसे अच्छा लगा।

"ये छोटू चल माँ को देखकर आते हैं। " मैंने उसे गोद में उठाते हुए कहा। जैसे ही हम रोड पर आये दूर सुनसान सड़क पर माँ आती दिखाई दी। "माँ" मैं ख़ुशी से चिल्ला उठा। "छोटू तू पहले आ जाता तो माँ भी जल्दी आ जाती न, मैं बार-बार देखने आया पर माँ नहीं आयी और तू एक बार आया और माँ आ गयी। "

माँ के करीब आते ही मेरी शिकायतें शुरू हो गयीं। "माँ तूने इतनी देर क्यों लगा दी? मुझे भूख लग रही है,

मुझे तो लगा कि तू आएगी ही नहीं। " माँ जवाब में सिर्फ मुस्कुराई और सिर्फ इतना बोली, "आती कैसे नहीं। मुझे पता था मेरा राजा बेटा इंतज़ार कर रहा होगा। "

"फिर तूने इतनी देर क्यों लगा दी?" मैंने सवाल किया। "मैं जहाँ काम करती हूँ वहां आज दावत थी तो बहुत सारा काम था न इसलिए देर हो गयी। " माँ ने जवाब दिया।

एक दो दिन तो माँ ने ना-नुकुर की पर मेरी ज़िद के आगे माँ को झुकना पड़ा और छोटू हमारे छोटे से परिवार का सदस्य बन गया। मुझे खेलने को एक साथी मिल गया था अब ना तो स्कूल की शरारतों में मेरा मन लगता था और ना ऑन्टी के दालान में फूलों पर मँडराती तितलियों को देखने में जिनके अलग-अलग रंग मुझे हमेशा आकर्षित करते थे और माँ के डर से दालान में जाकर उन्हें ना पकड़ पाने की टीस हमेशा सालती रहती। अब जब मैं स्कूल से लौटता तो वो मुझे दरवाज़े पर मिलता, मुझे लगभग गिरा ही लेता था और चाटने लगता जैसे हम ना जाने कितने सालों बाद मिल रहे हों।

सर्दियाँ आ चुकीं थी इसलिए सोते समय मैं अक्सर माँ से छुपाकर छोटू को रजाई में लिटा लेता था लेकिन छोटू न एकदम बुद्धू था। हमेशा कुनकुनाकर माँ को अपने होने का एहसास करा देता और माँ उसको रजाई से निकालकर उसके बिस्तर पर लिटा देती। वो



अपनी गोल मासूम आँखों से हमें ऐसे ताकता जैसे कह रहा हो, " मैंने क्या कर दिया?" लेकिन अब ठण्ड बढ़ती जा रही थी और छोटू को लेकर मेरी चिंता भी। माँ ने मेरा एक पुराना सा स्वेटर काटकर उसके लिये लबादा सा बना दिया। उसे देखकर मैं ख़ूब हँसा था, "बच्चू ये पहनकर तो तुम छोटे से बैल लग रहे हो। "

जैसे जैसे ठण्ड बड़ रही थी माँ को भी छोटू की चिंता होने लगी थी। मैंने रात में अक्सर उन्हें उसे एक पुराने शाल से ढँकते देखा था जब वो गहरी नींद सो रहा होता। एक दिन माँ ने ख़ुद मेरे मन की बात कह दी, "सुन तू छोटू को रजाई में सुला लिया कर। उसे रात में ठण्ड लगती है। " शायद छोटू के लिए माँ का मातृत्व जाग गया था। जब तक माँ सोने नहीं आ जाती थी हम दोनों बिस्तर पर एक प्यार भरी लड़ाई लड़ते थे। वो अपने नन्हे मुँह से मेरी कमीज़ खींचता जैसे कह रहा हो, "हट यहाँ से आज मैं माँ के पास लेटूँगा। " माँ भी लड़ाई देखकर मुस्कुरा देती। मैं जब भी कुछ खाता वो अपनी एक टांग मेरे हाथ पर रख देता जैसे कह रहा हो, " मुझे भी तो दे। "

मैं जब-जब माँ को बाहों में भरकर कहता, "ऐ छोटू मेरी माँ हैं" पता नहीं उसे क्या समझ आता वो एक पतली सी गुर्राहट अपने गले से निकलता। माँ खिलखिलाकर हँस उठती और उसे गोद में उठा लेती और वो उन्हें अपनी छोटी सी जीभ से चाटने लगता। हम एक सुखी परिवार थे माँ और हम उसके दो बेटे। मुझे वो बहुत ही प्यारा लगता, वो था भी तो प्यारा लटके हुए कोमल कान, भरा हुआ शरीर, भूरा रंग, घने चमकीले बाल, जड़ से घूमी हुई घने लम्बे बालों वाली पूँछ और उसकी गोल मासूम सी आँखे जिन्हें शायद मैं कभी नहीं भूल सकता।

वो नटखट भी कम नहीं था दूधवाला दूध देने जब घर के अंदर आता तो वो उसकी चप्पल मुह में दबाकर चम्पत हो जाता। "ऐ बेटा तुम्हारा कुत्ता हमारी चप्पल ले गया। " मुझे उसका कुत्ता बोलना कभी पसंद नहीं आया और ये मैं उसे उसकी चप्पल वापस करते समय बोल भी देता, "उसका नाम छोटू है। "

रोज़ की तरह छोटू के संग खेलने की बेताबी में उछलता-कूदता मैं स्कूल से लौटा तो हमेशा घर दरवाज़े पर इंतज़ार करता छोटू आज वहां से नदारद था, मैं अन्दर गया पर छोटू कहीं नज़र नहीं आया, "माँ छोटू कहाँ है" मैंने पूछा । होगा यहीं कहीं माँ ने बेफ़िक्री से जवाब दिया, मैंने सारा घर छान मारा पर छोटू का कहीं पता नहीं था , मैंने बाहर जाकर देखा पर वो कहीं नज़र नहीं आया न आंटी के दालान में न सड़क पर न घर के पीछे। उदास होकर मैं घर की सीढ़ियों पर बैठ गया इस इंतज़ार में की छोटू कहीं से आएगा और चाटते हुए मुझे नीचे गिरा लेगा । पर वो नहीं आया, मैं लगभग रुआँसा हो चुका था गला भर आया था। शायद उठकर मैं अंदर आने वाला था कि कूँ कूँ की एक जानी पहचानी सी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। मैं एक पल में उछल पड़ा । ये तो छोटू है, हाँ वही तो है पर इस आवाज़ मे कराह और दर्द सा क्यों है? मै जानने को उत्सुक हो उठा । ग़ौर किया तो आंटी के दालान की झाड़ियों की तरफ से तो आवाज़ आ रही थी जहां छोटू मुझे पहली बार मिला था। मैंने जाकर देखा तो लगा की मिट्टी का एक बड़ा सा ढेला पड़ा है पर ये छोटू ही था जो कीचड़ में इतना सन चुका था और उसके कीचड़ से सने जिस्म पर ख़ून की पतली सी तीन चार रेखाएं फ़ैल रहीं थीं, मैंने घबराकर माँ को आवाज़ लगायी, माँ जैसे ही दरवाज़े पर मुझे दिखाई दी "माँ देखो छोटू को क्या हो गया?, " रुआँसे स्वर से मैंने कहा, दालान वाली आंटी भी निकल कर आ गयी थीं।

माँ ने पिल्लू को देखा और घबराकर उसके पास बैठ गयीं । सड़क के एक तरफ से कुछ लड़के आ रहे थे, माँ को छोटू के पास देखकर उनमे से एक ने कहा "आंटी ये आपका पिल्ला है? इसे वहां तीन चार बड़े कुत्ते भंभोड़ रहे थे बुरी तरह, हमने बचाया इसे" वो कहते हुए निकल गए ।

माँ छोटू को उठाकर घर के अंदर चली गयी और दालान वाली आंटी अपने घर, मैं वहीं खड़ा सिर्फ कल्पना कर रहा था कि कितना दर्द हुआ होगा छोटू को जब उन बड़े कुत्तों के बड़े बड़े दाँत मेरे छोटू के जिस्म मे पैवस्त हो रहे होंगे, कितनी तकलीफ़ हुई होगी उसे घिसट घिसटकर घर तक आने मे।

माँ ने आवाज़ लगायी, जाकर देखा तो माँ ने छोटू के शरीर को साफ़ कर दिया था और अब उसके शरीर पर लगे घाव साफ़ नज़र आ रहे थे और उनसे रिसता ख़ून भी। अँधेरा घिर चुका था और बल्व की पीली रोशनी फैली हुई थी।


भोजन का समय हो चुका था लेकिन न तो मैंने खाने का शोर मचाया और न माँ ने कहा शायद माँ को भी उतनी ही तकलीफ थी जितनी मुझे या शायद ज़्यादा।

हम दोनों उसके पास बैठकर उसे देख रहे थे, उसकी तक़लीफ़ को समझने की नाकाम कोशिश कर रहे थे कि अचानक छोटू ने गहरी-गहरी साँसे लेना शुरू कर दिया। उसकी गोल मासूम सी आँखों में दर्द सा उभर आया। वो कभी मुझे देखता कभी माँ को। उठने की नाकाम कोशिश कर रहा था उसकी मासूम आँखे मुझ पर टिक गयीं... हमारे बीच बिना बोले एक बातचीत शुरू हो गयी, लगा जैसे वो कह रहा हो, "तुम्हारे साथ और खेलना चाहता हूँ, तुम्हारे 'तुम्हारी माँ है' कहने पर और गुर्राना चाहता हूँ, तुम्हारे स्कूल से लौटने पर तुम्हारा इंतज़ार करना चाहता हूँ" उसकी गहरी चलती साँसे और तेज़ हो गयीं। माँ ने उसका सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया। उसने अपनी गोल मासूम आँखों से जी भरकर माँ को देखा फिर मुझे और उसके शरीर में होती हलचल शान्त

हो गयी। माँ की आँखों में छलक आये आँसुओ ने मुझे समझा दिया अब छोटू कभी मेरे साथ रजाई में नहीं सोयेगा, न दूधवाले की चप्पल उठाकर भागेगा और न ही अब मुझसे माँ के लिए लड़ेगा।

कूँ कूँ की आवाज़ ने मुझे छोटू की यादों से लौट दिया वो छोटा सा पिल्ला नाली के उस पार से अब भी इस पार आने की कोशिश कर रहा था। दिल में ख़्याल आया कि जाकर उसे गोद में उठा लूँ लेकिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी क्योंकि मुझे सँभालने के लिए माँ भी तो नहीं थी अब। भारी मन से बाहर आया तो देखा दालान वाली आँटी अपने दालान में बैठी हैं काफी बूढ़ी हो गयीं हैं अब।

 "आँटी आज चाय नहीं पिलायेंगी" उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठते हुए मैंने कहा।

लव तोमर

माता का नाम - श्रीमती ममता सिंह 
पिता का नाम- श्री प्रेमपाल सिंह  
आयु -    27 
लॉ ग्रेजुएट 
संपर्क: 377, निकट हरपाल मंदिर, गणेश नगर, बरेली  
मोबाईल: 7669927551, 9719134010
ईमेल: lavtomar48@gmail.com


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टिप्पणियां

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (07-08-2017) को "निश्छल पावन प्यार" (चर्चा अंक 2698 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    बाई-बहन के पावन प्रेम के प्रतीक रक्षाबन्धन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं

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