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अनामिका की कवितायेँ : 'कुत्ते की दुम' व अन्य



अनामिका की कवितायेँ   Poems of Anamika

इतिहास

इतिहास मुझको नहीं चीन्हता,
लेकिन मैं खूब जानती हूँ उसे।
वह मेरी कक्षा का हीरो था!
हाल-फिलहाल हम टकराए।
हाँ, उसने मुँह नहीं बनाया,
      वह मुस्काया
      एक अजनबी सी मुस्कान!
जो भी सिकंदर से राजा पुरू बोले थे,
मैंने उससे नहीं कहा,
एक राजा दूसरे से मिलता है ज्यों —
वह मुझसे नहीं मिला,
      लेकिन मैं उससे ऐसे ही मिली!
तंग गली थी वजूद की!
एक ही निकल सकता था!
एक ओर मैं हट गई,
उसे रास्ता दिया
और अपनी राह चल दी!
बेचारा बीमार दीख रहा था!
तोंद निकल आई थी उसकी
चाल बतख की हो गई थी,
सन्तुलन गड़बड़ा गया था,
आँखें जवाब दे गई थीं
या कि स्मृतियाँ ही छोड़ गई थीं उसको बीच रास्ते,
अब यह कौन कहे!




कुत्ते की दुम

जो जहाँ है, जैसा है —
कैद है अपने होने में,
जैसे कि तोड़े हुए फूल
प्लास्टिक-मढ़े हुए दोने में!
ठीक ही कहती थी दादी —
‘चिड़िया से मत पूछो —
चिड़िया क्यों चिड़िया है — पेड़ नहीं!
मत पूछो नदियों से —
क्यों वे उमड़ती हैं!
पर्वत को दिक् मत करो पूछकर
कि इतना भी क्या अटल रहना!
मत भेजो सम्मिलित आवेदन
महामहिम बिच्छू परिषद् को कि श्रीमान,
सेवा में सविनय निवेदन है —
डंक जरा कम मारें,
सुध ज़रा कम लें हमारी,
और अपनी राह जाएँ!
मत करो बेचारे कीकर से प्रार्थना
कि आँचल भर दे हमारा वह
रस से मताए हुए आमों से!
प्रार्थना सुन भी लेगा तो क्या,
सुनकर ज़रा कसमसाएगा
और उसके कसमसाते ही
एक और काँटा
बेचारे की छाल फोड़कर
बाहर चला आएगा!”
जानते हैं हम ये फिर भी
कितनी सदियाँ बीत जाती हैं
अदद आस तोड़ लेने में।
जो जैसा है, उसको वैसा स्वीकार कर!
चुपचाप हाथ जोड़ लेने में।
खुद क्या मैं कम ऐसी-वैसी हूँ?
मेरा सत्यानाश हो —
मैं ही कीकर हूँ, चिड़िया, नदी और पर्वत
बिच्छू और मंजरी — समेत
एक धरती हूँ पूरी-की-पूरी
मैं ही हूँ धरती की जिद्दी धमक —
क्यों - कैसे - ‘हाँ-ना’ से पूरी हुई रस्सी!
और मुई रस्सी के बारे में
कौन नहीं जानता —
रस्सी जल भी गई तो
बलखाना नहीं छोड़ती।




खूंटी पर बरसाती

बारिश घनघोर,
मिट गये हैं घरों के नम्बर!
शायद ये घर मेरा है!
एक खूँटी है यहाँ —
           सीढ़ियों के सामने
           दरवाजे के बाएँ!
हाँ, ये घर मेरा ही होगा!
भींगी बरसाती-सा
अपना वजूद टाँगती हूँ मैं
घर के बाहर वाली खूँटी पर
और बाँध लेती हूँ साड़ी का फेंटा —
इंतज़ार में होंगे
घर के सब काम —
अँकुरा गई होगी मूँग,
दही जम गया होगा,
फूल गये होंगे चने —
उथले भगौने के पानी से बाहर
गर्दन निकाले —
देख रहे होंगे रस्ता मेरा
          गोलू-मोलू से चने —
          फूलकर कुप्पा!
‘प्रवेश नगर कीजे सब काजा’
          चलो, ठीक है
          करती हूँ प्रवेश,
पर पाँव पोंछने जरूरी हैं!
समय एक पाँवपोश है गीला
          मेरे दरवाजे का।
रोज यहाँ घिसती हूँ पाँव
तिल-तिलकर
घिस जाती है मेरी मिट्टी
पाँव से सर तक
          मैं मिट्टी ही —
          केवली मिट्टी!
पानी-पानी मिट्टी,
मिट्टी यह आकाशभाषित,
अग्निसम्मता -
दहलीज पर
थकमकाई खड़ी मिट्टी
और फिर साँस की तरह लगातार
          भीतर-बाहर,
          बाहर-भीतर:
भींगी बरसाती —
उतरी हुई देह-सी,
          खूँटी पर टँगी हुई
          मारती है मुझको
          मुस्काके कनखी!




विज्ञाप्ति

आज की कथा
चिरानंद की व्यथा!

पहले आया तो दिया उसने न्योता —
“बैठो हरी घास पर क्षण-भर!
कल का क्या, कल किसने देखा है,
कुछ भी नहीं टालते कल पर!

हरियाली की दी दुहाई, बिठाया मुझे
और खुद हरियाली पर फिर वह कंकरीट ढाने लगा,
“होटल तुरन्ता की अद्भुत यह साइट है” —
हँसा और ढोल पीट गाने लगा।
खल्वाट मैदानों पर अब वह हर सूँ ही
खोल रहा है अपना होटल तुरन्ता।
चारों तरफ हैं नज़ारे उसी के अब
उफ, हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता।

होटल तुरन्ता ये ऐसा कि घंटी बजाते ही —
हाजिर हो जाते हैं दुनिया के सारे आस्वाद अजी
रोग-भोग की चटपटी चटनी सैशे में,
बाई वन, गेट वन फ्री!
पहले उजाड़ता है बस्ती यह,
फिर लोगों को देता है नौकरी,
‘हायर ऐण्ड फायर’, अरे जेनरल डायर,
प्यार की खातिर भी यही पाॅलिसी!

विज्ञापित जैसे अबूझ अक्षरों में
सिगरेट पर चेतावनी मृत्यु की,
लिखता ही रहता है धूमिल क्षितिज पर
अजग-गजब आप्तवाक्य यह भी!

महाजाल बिछा हुआ है हर तरफ
ऋषि के पढ़ाए हुए तोते आते हैं —
परमभाव में सारे आप्तवाक्य गाते हैं,
परमभाव में ही फँस जाते हैं!

तोतापंखी चेनावनियों से पटा पड़ा यह शहर
“हर पग पर खाई खुदी है, जी धँसना नहीं,
शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा,
दाना डालेगा, भूल से उसमें फँसना नहीं।”


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यह भी देखें