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डॉ सच्चिदानंद जोशी की कहानी — भाई दूज

दिस॰ 14, 2017

छोटी कहानी में 'बड़े' मानवीय रिश्तों और मूल्यों को आधुनिक-आवश्यक-सामाजिक बदलावों की महत्ता दिखाते हुए कह पाना और साथ में कहानीपन का बने रहना, 'बड़ी' बात है! कहानीकार डॉ सच्चिदानंद जोशीजी को हार्दिक बधाई — भरत तिवारी



भाई दूज

— डॉ सच्चिदानंद जोशी


जैसी कि उम्मीद थी एयरपोर्ट पर बेतहाशा भीड़ थी। दिवाली के बाद दूसरा दिन था। सभी अपने-अपने घर या काम की जगह वापिस जाना चाहते थे। वैसे तो दिन भाई दूज का था लेकिन अब शायद जिंदगी में इस दिन की कोई महत्ता नहीं बची थी। रविवार होने के कारण भीड़ और ज्यादा थी। पहले टर्मिनल के अंदर जाने की मारामारी, उसके बाद सिक्योरिटी के लिए लंबी कतारें, उस पर लोगों का उतावलापन अलग से खीज पैदा कर रहा था।

डॉ सच्चिदानंद जोशी
डॉ सच्चिदानंद जोशी


वो तो भला हो अजय का जिसने वेब चेक-इन कर बोर्डिंग पास ला दिया वर्ना चेक-इन काउंटर पर लगी कतार देख कर तो दिल ही बैठा जा रहा था। एक तरह से अच्छा ही हुआ कि बहुत कहने के बाद भी मां के दिए कम्बल और चादरें वहीं छोड़ दिए, नहीं तो सामान ज्यादा हो जाता और उसे भी चेक-इन लगेज बना पड़ता। आजकल तो बैगेज ड्रॉप की भी लाइनें लंबी होती है।

सिक्योरिटी में आधा घंटा लग गया। सभी जल्दी में थे। लोहार से लौटने के कारण शायद शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह की थकान सबके चेहरे और व्यवहार में झलक रही थी। ऐसे में आपस में वाद-विवाद होना स्वाभाविक ही था। मन तो था कि एक दो दिन और रुक जाऊं पापा के पास। मां ने कई बार कहा भी। लेकिन पहले ही दो बार टिकिट बदलवा चुका था। और फिर ये वाला टिकिट तो नॉन रिफंडेबल था।

दिवाली में घर आना है इसलिए बहुत पहले से इन तारीखों के टिकिट बुक करवाए थे। तब भी टिकट खासे महंगे मिले थे। लेकिन फिर अचानक पापा के हार्ट अटैक और फिर ऑपरेशन की खबर आई तो जल्दी भाग कर आना पड़ा। पापा को दिल का दौरा पड़ा था और उनकी तीन आर्टरीज़ ब्लॉक थी। ऑपरेशन करना ही एकमात्र विकल्प था। पिछले दो हफ्ते बहुत तनाव में बीते। दिवाली तो बस आई और चली गई। भगवान का शुक्र है कि पापा का ऑपरेशन ठीक से हो गया। अब उनकी देखभाल करनी है। संयोग से एक एजेंसी के माध्यम से मेल नर्स भी अच्छा मिल गया, जो पूरा दिन पापा के साथ रहता है। इससे मां को थोड़ा आराम मिल जाता है। पूरा दिन बेचारी घर के कामों में और पापा की सेवा में लगी रहती है। ऊपर से दूसरे सामाजिक लोकाचार निभाने का भी जिम्मा उसी का है। वो तो फिर भी नर्स के लिए मना ही कर रही थी। लेकिन जिद करके लगवाया है और कसम दी है कि कम से कम उसे एक महीने तक लगा रहने देना। मां की तो बस एक ही रट थी 'मैं कर लूंगी सारा काम। मुझे नहीं अच्छा लगता कोई बाहरी आदमी पूरे समय घर में घूमता रहे, सिर पर सवार रहे।" हार कर डॉक्टर से ही कहलवाना पड़ा तब जाकर मां ने नर्स रखने की बात मानी।




सिक्योरिटी के झंझट से निकल कर वेटिंग लॉउंज में आया तो देखा वहां तिल रखने को जगह नहीं थी। एयरपोर्ट का हाल किसी कस्बे के बस स्टैंड से भी बदतर था। लोग जमीन पर भी पेपर बिछा कर बैठे थे। अभी फ्लाइट में समय था। इधर-उधर कहीं बैठने की जगह नहीं थी तो सोचा कॉफी पी ली जाए। कॉफी शॉप के पास कुर्सियां होती हैं बैठने के लिए, इसलिये वहां बैठने की जगह मिलने की संभावना अधिक थी।

ज्यों ही कॉफी शॉप की ओर मुड़ा तो वहां खड़ी दीदी दिख गई। उसे यूं देखकर एक क्षण को तो स्तब्ध रह गया। क्या किया जाए कुछ सूझ नहीं रहा था। संकोच भी था और गुस्सा भी। दीदी यानी मेरी बड़ी बहन, मुझसे तीन साल बड़ी है। आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके दो साल नौकरी के लिए अमेरिका चली गई थी। हम सब के लिए आशा का केन्द्र और हमारे परिवार की धुरी थी, दीदी। हमारे पूरे परिवार का सारा क्रियाकलाप उसी के इर्दगिर्द घूमता था। इतना ज्यादा कि कभीकभी तो मुझे ईर्ष्या होने लगती थी उससे। उसकी तरह होशियार कभी नहीं रहा मैं। जैसे तैसे मैकेनिकल इंजीनियरिंग पास की थी। वो तो भाग्य अच्छा था कि बंगलौर में अभी ठीक-ठाक नौकरी मिल गई, नहीं तो इस रिसेशन के जमाने में मुझ जैसे या मुझसे बेहतर कितने ही बेकार घूम रहे थे।

दीदी अगर हमारे साथ बनी रहती तो शायद मेरा 'वर्तमान' इससे भी बेहतर हो सकता था। लेकिन आठ साल पहले दीदी के एक निर्णय ने हमारे परिवार में भूचाल ला दिया। वह अपने कॉलेज के साथी अकरम से शादी करना चाहती थी। बाद में तो यह भी मालूम पड़ा कि वो और अकरम तो अमेरिका में साथ ही रह रहे थे। इस विवाह को हमारे परिवार में सहमति मिलना संभव ही नहीं था। ब्राह्मणों के परिवार में इस शादी को कैसे सहमति मिल पाती। पापा-मां ने उसे लाख समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही। हार कर पापा, मां ने उसके लिए घर के दरवाजे बंद कर दिए। पिछले आठ साल से हमारा उससे कोई संबंध नहीं है। न मां-पापा का, न मेरा। गुस्सा मुझे बहुत आया था उस पर। इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले अपने छोटे भाई को, जिसे तुम अपना राजदार मानती हो, एक बार बता तो सकती थी।

अभी उसकी खबर मिलती रहती है, दोस्तों के जरिए। उसके एक बेटा, एक बेटी है और वो अभी कनाडा में है। संयोग ऐसा रहा कि इन आठ सालों में उससे कभी मुलाकात नहीं हुई। अकरम का परिवार भी दिल्ली का ही है और उसके परिवार में दीदी का आना-जाना है। लेकिन दिल्ली इतना बड़ा शहर है कि उसमें यदि कोई न चाहे तो बरसों बिना मुलाकात रह सकता है।

कॉफी शॉप से दीदी ने देखकर हाथ हिलाया तो मुड़कर जाने का मन नहीं हुआ।

'कैसा है तू? दीदी ने पूछा।

"ठीक हूं। तुम ठीक हो न!' मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया।

'हां! भली चंगी हूं। हो गई दिवाली?" दीदी ने पूछा।

'तुम्हें शायद पता नहीं होगा। पापा की बायपास सर्जरी हुई है दो हफ्ते पहले। भगवान की कृपा है कि सब समय से हो गया नहीं तो क्या अनिष्ट हो जाता, कह नहीं सकते। पंद्रह दिन हॉस्पिटल में थे। लेकिन तुम्हें उससे क्या?" न चाह कर भी मन की कड़वाहट बाहर आ गई। ज्यादा बुरा इस बात का लग रहा था कि दिल्ली में होकर भी उसने पापा की कोई खोज-खबर नहीं ली।

'तू कुछ दिन और रुक जाता उनके पास।'

'दूर से उपदेश देना आसान है दीदी। मेरी नई नौकरी है। उसमें भी मैं पंद्रह दिन छुट्टी ले चुका हूं। लेकिन महीने भर बाद दोबारा आऊंगा। अभी एक मेल नर्स का इंतजाम किया है।"


'मां अकेली क्या-क्या करेगी। मुझे तो उसकी चिंता होती है।' दीदी ने कहा। इतनी ही फिकर थी उसे मां की तो एक बार उसकी ही खोज-ख़बर ले लेती। दीदी को लेकर मेरी चिढ़ लगातार बढ़ती जा रही थी। कोई कैसे अपने आपको इस तरह काट सकता है अपने परिवार से।

‘मां की चिंता करने की क्षमता है मुझमें। मैंने अजय और नरेंद्र को कह दिया है। वो लोग रोज मां से फोन पर बात करेंगे। फिर हमारे नाते-रिश्तेदार तो हैं ही।" मैं दीदी को जता देना चाहता था कि हमें उसकी सहानुभूति की या उसके भावनात्मक आडंबर की कोई जरूरत नहीं है।

इस चिढ़ की एक वजह और भी थी। उस दिन जब पापा की बायपास सर्जरी हो रही थी तो ऑपरेशन थियेटर के बाहर मैं और मां एक दूसरे को सहारा और दिलासा देते बैठे थे। सवाल ऑपरेशन और अस्पताल के खर्चे का भी था। मैं चिंतित था लेकिन मां कहती थी, व्यवस्था हो जाएगी। पापा ने शायद अपनी बीमारी का अहसास पाते ही कुछ रकम अलग से निकाल कर रखी थी। कुछ पैसा मां ने भी जोड़ रखा था। पापा की बीमारी की बात पर ही मां ने यह भी बताया कि उन्होंने अपनी वसीयत भी कर डाली है। इस वसीयत में अपनी सम्पति के तीन हिस्से किए हैं उन्होंने। एक मां का, एक मेरा और एक दीदी का। इतना आश्चर्य हुआ था जानकर। मैंने तब भी मां से पूछा था, 'दीदी को? उसे क्यों? वो तो हमसे बिल्कुल भी रिश्ता नहीं रखना चाहती और आप लोग उसे सिर चढ़ाए जा रहे हैं।' तब मां ने कहा था,"बेटा, बच्चे कितना भी मुंह फेर लें हमसे लेकिन हम तो बच्चों से मुंह नहीं फेर सकते। आखिर बिटिया है हमारी। हो सकता है उसे कभी हमारी जरूरत महसूस हो।'

'दीदी को पता है इस बारे में।' मैंने पूछा था।

'नहीं उसे कुछ नहीं मालूम। और तू भी उसे कुछ मत बताना कभी। कसम है तुझे मेरी।' मां ने कहा और विषय वहीं समाप्त हो गया। ऑपरेशन और अस्पताल का खर्च मां उठाती रही।

एक बार को मन हुआ कि दीदी को बता दूं कि जिस पिता से तुम्हें मिलने की इच्छा तुक नहीं हुई, देखो वह तुम्हारे लिए कितना सोचता है। लेकिन अपने आपको जब्त कर लिया। जिसका दिल पत्थर का हो गया हो, उसे यह सब कहने का क्या फ़ायदा।

'कॉफी पिएगा? दीदी ने पूछा तो विचार की तन्द्रा टूटी। मेरे हां या न कहने से पहले उसने दो कॉफी का ऑर्डर काउंटर पर दे दिया। मैं जेब से पैसे निकालने लगा तो बोली, 'रुक न, दे रही हूं पैसे। जानती हूं बड़ा आदमी हो गया है।" इतना कह कर दीदी ने अपना पस खोला। उसका बड़ा सा झोलेनुमा पर्स हमेशा से उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा रहा है। उसमें से चीजें निकालना यानी समुद्र मंथन करने जैसा होता है। वो हमेशा से ऐसी है। पर्स में से बटुआ निकालते समय एक बड़ा लिफाफा नीचे गिर गया। उठा लिया। लिफाफा हॉस्पिटल का था। नीचे गिरने से लिफाफे के अंदर के कागज बिखर गए थे। कागज क्या थे, बिल थे। दीदी एकदम चौंकी और बोली, 'छोड़ दे उसे, बेकार का लिफाफा है।' और इतना कहते हुए उसने लगभग मेरे हाथ से में रख लिए। इतनी तेजी करने के बाद भी हॉस्पिटल के उन बिलों पर पेशेंट के रूप में पापा का नाम मैं साफ-साफ देख सकता था।



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