शादी की कहानी बताइए : हंस में प्रकाशित मलय जैन की कहानी 'शालिगराम की नतबहू' - #Shabdankan
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शादी की कहानी बताइए : हंस में प्रकाशित मलय जैन की कहानी 'शालिगराम की नतबहू'

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हंस नवम्बर' 18 में प्रकाशित शालिगराम की नतबहू — मलय जैन,


ऊंचाई ठीक-ठाक, रंग कन्हैया को मात देता और बचपन में निकली बड़ी माता से चेहरा छप्पन टिकलियों का कोलाज़, मगर वधू चाहिए एकदम भक्क गोरी, छरहरी लावण्य मयी कंचन काया । सर्वगुण संपन्न। जैसे लम्बरदार फुरसत में पड़े पड़े मधुबाला और वहीदा रहमान के नाना प्रकार के चित्र कल्पनाओं में खींचते रहते हैं न, वैसे ही फुर्सत में बनाई हुई कोई अतुल्य सुंदरी उनकी सौभाग्यवती हो। उनकी बुआ कहतीं थीं, " लम्बरदार के लाने लड़की देखने जाने है। कोई मजाक थोड़ी है कि चाहे जिस ऐरे गैरे की, चाहे जैसी लूली, कंटी लड़की उठा लाओ और बांध दो लल्ला के गले।"
शादी की कहानी बताइए : हंस में प्रकाशित मलय जैन की कहानी 'शालिगराम की नतबहू'

शालिगराम की नतबहू

— मलय जैन






"सुदर्शन बाबू घोड़ी पर चढ़ ही गये अंततः। यों निकले हुए पेट वाले ऐसे अधेड़ दूल्हे को देख एक पल तो घोड़ी भी ठिठकी होगी मगर गुलाबी नोटों वाले ठीक ठाक नेंग के हाथ आते ही मालिक ने उसकी ठुनक दूर कर दी और ठाठ से बैठे दूल्हे राजा को लेकर घोड़ी ठुमकती हुई चल पड़ी। दुल्हन का डील डौल देख घोड़ी से ज़्यादा तो सुदर्शन बाबू ठिठके, मगर अब वक्त ठिठकने का नहीं, लम्बरदारी की ठसक और अपनों की ठिल ठिल करती निगाहों को ठेंगे पर धर ठीक ठाक ढंग से ठिकाने लग जाने का था सो यार दोस्तों के ठहाकों के बीच सुदर्शन बाबू ने दूल्होचित ठनगन के साथ फेरे लिये और इस प्रकार वे विधिवत वर दिये गये "

मलय जैन
जन्म: 27 फरवरी 1970, सागर मप्र
लेखन: दो किशोर उपन्यास प्रकाशित
'ढाक के तीन पात' 2015 में प्रकाशित।
नया ज्ञानोदय, हंस, आउटलुक, व्यंग्य यात्रा,
आदि पत्रिकाओं में व्यंग्य प्रकाशित।
पुरस्कार: साहित्य अकादमी मप्र से
उपन्यास 'ढाक के तीन पात' पर
बाल कृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार से सम्मानित।
सम्प्रति: सहायक पुलिस महानिरीक्षक
पुलिस मुख्यालय, भोपाल
सम्पर्क: मलय जैन,
सेक्टर K- H50, अयोध्यानगर,
भोपाल मप्र 462041
मोबाईल 9425465140
ई मेल: maloyjain@gmail.com
अस्सी के पेटे में पड़े शालिगराम यदि इस उमर में हर वक्त एक अप्सरा सी सुंदरी की कल्पना करते थे तो इसके पीछे वह खुद नहीं, उनके खानदान का इकलौता चिराग, नाती सुदर्शन बाबू थे जिनके ब्याह की चिंता में वह दस बरस से घुले जा रहे थे और इस वक्त शालिगराम की बाँछें यदि इतनी खिली थीं जितनी शायद बरसों में न खिली होंगी तो इसके पीछे मोंटी की दी हुई वह झन्नाट खबर थी जिसके हिसाब से सब ठीक रहा तो सुदर्शन बाबू भी दूल्हा बनने वाले थे। मोंटी भले आप दूल्हा नहीं हुए थे लेकिन जोड़े मिलाने की कला में निष्णात थे। शादी कराओ बैंड बजवाओ डॉट कॉम नाम से जहां बाजे बजवाने वह ऑनलाइन सक्रिय रहते थे, वहीं ऑफ़लाइन मोड में भी मिलन की तुरही बजाने हरदम तैयार मिलते थे। समाज के विभिन्न परिचय सम्मेलनों के फटों में उनकी टांगें सम्मान पाती थीं और ऐसा माना जाता था कि मोंटी मोटा माल ज़रूर कमीशन के रुप में ले लें, लेकिन मजाल है, उनकी मिलायी जोड़ी में कोई ऐब निकल आवे।

शालिगराम को कुछ माह पहले ही यह तारणहार मिला था जिसके पास हर मर्ज का तोड़ था और जिसे दृढ़ विश्वास था कि जिसका जोड़ भगवान न जोड़ सका, उसका जोड़ उनके पास है। इसी भयंकर विश्वास के साथ वह शालिगराम से मिले थे और उनका भव सुधारने मोंटी बस पहुंचने ही वाले थे।

शालिगराम उस इलाके के लम्बरदार थे और एक ज़माने में उनका अपना चरचराटा हुआ करता था। बरसों से वह नातीराजा सुदर्शन के लिये रिश्ता खोजते फिर रहे थे, मगर नातीराजा के भाग देखो, हाड़ तरस गए थे उनके

हल्दी लगवावे। शालिगराम हताशा में आम बूढ़ों की भाँति ज़माने को कोसते। कमबखत जमाना ही खराब आ गया। एक हमारा जमाना था, अंडा में से फूटे नहीं कि घुड़चढ़ी को तैयार। आठवां दर्जा पहुंचे न पहुंचे, दूर दूर से रिश्ते पर रिश्ते। कुछ जमाने को कोसते और कुछ मोंटी के आने की उत्तेजना में करवट लेते शालिगराम खटिया से तो लुढ़कते बचे मगर अतीत में अवश्य लुढ़क गए।

तब मसें भीगनी शुरू ही हुईं थीं शालिगराम की, मगर तमाम बुआ फूफियां, मामियां और भाभियां अपने दूर दूर की रिश्तेदारी से न जाने कहां कहां की हूरों के प्रस्ताव खोज लातीं उनके लिए और वह उमंग से भर भर जाते। शरीर से शालिगराम यों तो स्वतः भगवान के पूरे थे। माने ऊंचाई ठीक-ठाक, रंग कन्हैया को मात देता और बचपन में निकली बड़ी माता से चेहरा छप्पन टिकलियों का कोलाज़, मगर वधू चाहिए एकदम भक्क गोरी, छरहरी लावण्य मयी कंचन काया । सर्वगुण संपन्न। जैसे लम्बरदार फुरसत में पड़े पड़े मधुबाला और वहीदा रहमान के नाना प्रकार के चित्र कल्पनाओं में खींचते रहते हैं न, वैसे ही फुर्सत में बनाई हुई कोई अतुल्य सुंदरी उनकी सौभाग्यवती हो। उनकी बुआ कहतीं थीं, " लम्बरदार के लाने लड़की देखने जाने है। कोई मजाक थोड़ी है कि चाहे जिस ऐरे गैरे की, चाहे जैसी लूली, कंटी लड़की उठा लाओ और बांध दो लल्ला के गले।"

अपने लिए हूर की तलाश में वह दूर दूर तक फिरे। एक से एक लड़कियां देखीं । तब लड़की देखने जाना भी उत्सव और मनोरंजन के विषय से कम न होता। आजकल की बारात में जितने लोग नाचते दिखते हैं न, इतने तो वह लड़की देखने साथ लेकर जाते थे। यानी लड़का जाएगा तो लड़के का फूफा, मौसा, मामा भी साथ जाएंगे ही कई बार तो मौसा के फूफा तो कभी फूफा के फूफा भी साथ जाएंगे l कहीं ललितपुर वाले फूफा जी संग गये तो लड़की को बाकायदा रैंपवॉक कर यह प्रमाणपत्र देना पड़ता कि वह लूली नहीं है। बुआ जी तो एक कदम आगे। वह लड़की से न केवल गाना गववाएं, सिलाई कढ़ाई के नमूने देख उनमें बींगें भी निकालें बल्कि मुंह खुलवाकर दाँत भी देखें। उनका बस चले तो मुंह में बैठकर ही तस्दीक करने लग जाएं, लड़की के दाँत और जीभ सही सलामत हैं या नहीं और लड़की उनकी तरह तोतली बतोली तो नहीं है। पनागर वाले मामा जी की खोजी निगाहें लड़की को एक नजर देख कर ही निष्कर्ष पर पहुंच जातीं कि लड़की शालिगराम के लिए फिट बैठेगी या नहीं। उम्र में बड़ी तो नहीं लगेगी। जोड़ में ऊंची या नाटी तो नहीं लगेगी। मौसी अपनी अलहदा भूमिका में रहतीं। लड़की के मुंह से बोल का एक फूल झरने पर ही चरित्र सत्यापन संपन्न कर लेतीं। लड़की आंख मटका कर बोले तो चालू, नज़र मिलाकर बात करे तो झगड़ालू और पैर के अंगूठे से जमीन खोद खोद कर जमीन में ही गड़ी रहे तो समझ लो पहली परीक्षा में पास।

इसके बाद साक्षात्कार की प्रक्रिया प्रारंभ होती। साथ जाते निरे अपढ़ रिश्तेदार लड़की का साक्षात्कार लेते दुनिया दारी के ऐसे ऐसे सवाल करते कि लोक सेवा आयोग भी हैरान रह जाये। साक्षात्कार के साथ ही लड़की का इम्तिहान समाप्त हो जाता और उसके पिता का शुरू हो जाता। शालिगराम के पिता की ओर से खरचा जैसे कठिन विषय पर अर्थशास्त्र का परचा फ़िल्म के

क्लाइमैक्स की भाँति प्रकट होता जिसे हल करने में लड़की के पिता का दिमाग घूम जाता। लम्बरदार का ब्याह है, कोई हँसी ठट्ठा है क्या ! शालिगराम ने ठंडी सांस ली। उनकी बुढ़िया भले अब नहीं रहीं लेकिन इस घर में आ पाईं थीं बड़ी कठिन परीक्षा के बाद ही।




और अब? शालिगराम ने आँखे मूंदी। जैसे बीते हुए दिन याद कर रहे हों। सुदर्शन जब पूरे अठारह के भी नहीं हुए थे तो उन्होंने सोच लिया था, इसका ब्याह कराएंगे तो वैसी ही अप्सरा से जैसी अप्सरा की कल्पना वह स्वयं के लिए किया करते थे। भले उनके लिए अप्सरा ढूंढने वाली बुआ जी, मौसी, ताऊ, मामा जी सब दुनिया से निकल लिए मगर नातीराजा के लिए बहू पसंद करेंगे वह खुद। लंबरदार शालिगराम की नतबहू होनी भी चाहिए एकदम झक्कास। चाल-ढाल, नाक नक्श, रंगरूप सब एवन, कि चार गांवों में चर्चा भी हो तो बस उनकी नतबहू के रूप की।

इधर सुदर्शन बीस के न हुए और उनके मां-बाप दोनों न रहे। रिश्तेदार बाहर गांवों में या दूर शहरों में। अब घर में बचे बस विधुर शालिगराम और नाती सुदर्शन बाबू। शालिगराम तब जवान होते सुदर्शन को मनभर निहार निहाल होते। यूं उम्र के हिसाब से उनके मन में कभी यह भय भी रहता कि ऐसा न हो, सुदर्शन बाबू गांव की किसी छोरी से प्रेम प्यार कर बैठें और बैठे बिठाये उनके सपनों पर पानी फिर जाए। सुदर्शन बाबू हैं भी बड़े संजीदा स्वभाव के सो कौन सी लड़की कब इन्हें फांस ले, पता नहीं। फिर उन्हें यह सोचकर सुकून भी आता कि गांव भर की लड़कियां या तो पढ़ने शहर चली गईं या शादी ब्याह कर फुरसत पा गईं। सो वह ऐसे भय को झट मन से निकाल देते।

शालिगराम को उम्मीद थी, जमाने के हिसाब से चलो तो भी सुदर्शन बीस इक्कीस की उमर पूरी न करेंगे और उनके लिए रिश्तो की ऐसी ही झड़ी लग जाएगी जैसी एक जमाने में उनके लिए लगा करती थी। लेकिन सुदर्शन बाबू तेईस चौबीस की उमर पार करते ग्रहस्थ आश्रम की अवस्था में भी पहुंच गए, मगर रिश्तों की झड़ी लगना तो छोड़ो, एक बूंद भी न पड़ी उनके आँगन में। उन्होंने खुद ही रिश्तेदारियों में पैगाम भेजे मगर सब टाल गए। ' कोई लड़की आज के जमाने में गांव में जाकर रहेगी क्या? ' ऐसे सवाल सुन सुनकर वह निरुत्तर हो जाते। हर लड़की पढ़ी-लिखी और तो और नौकरीपेशा भी। कुछ रिश्तेदार कहते, " एक ही स्थिति में बात बन सकती है लम्बरदार, या तो सुदर्शन गांव का मोह छोड़ आप ही शहर जाकर बस जावें। चाहें तो ससुराल में ही रहने खाने का इंतजाम हो जाये और अगर जी में ज्यादा ही खुद्दारी की सनक है तो लड़की वाले बढ़िया किसी कॉलोनी में अलग से रहने की व्यवस्था को भी तैयार हैं और काम धंधे में लगवाने को भी। " मगर सुदर्शन बाबू ! वह गांव का जमा जमाया कामधंधा छोड़कर शहर जाएं भी तो क्यों, तिस पर घर जमाई बनकर? छि: ... वह सुनते ही उखड़ जाते।

 शालिगराम तब और जल भुन जाते जब शहर के रिश्तेदार कहते, " अरे लंबरदार, तुम्हें काहे की फिकर, अपना सुदर्शन तो हीरो है हीरो। वैसे भी ज़माना कैरियर बनाने का है आजकल सो पहले सबै नौकरी ही दिखती है। इतनी जल्दी शादी ब्याह के टंटों में कोई नहीं पड़ता। न लड़का न लड़कियां। "

शालिगराम अपने हीरो को लाड़ से निहारते और यह सोच, नातीराजा को क्या कैरियर की चिंता, पहले ही पुश्तैनी दुकान बढ़िया सम्भाल रहे हैं, निशफ़िकर हो जाते। मगर जब तीस के होते हीरो के माथे पर चांद उतरने लगा और कनपटियों पर चांदनी, ऊपर से पेट भी सतमासी गर्भिणी सा मुँह चिढ़ाने लगा तो शालिगराम हीरो को निहारने की जगह निराशा से हारने लगे। उन्हें कभी-कभी अपने नौकरों हरकारों बुधिया मंगतू के भाग्य से ईर्ष्या हो उठती। देखो सालों को, बाप दादा के जमाने से मजदूरी करते आ रहे लेकिन मुओं की किस्मत तो देखो, बहुएँ कैसे चट से मिल जाती हैं इन्हें। इनकी औलादों को देखो, कैसे फटफटिया पर अपनी ब्याहताओं को बिठाए हवा से बातें करते हैं और एक वह हैं जो इलाके के लंबरदार होकर एक नतबहू के लिए तरस रहे हैं। अपने तो छोड़ो, हवाएं भी उनसे इस बारे में बात करना नहीं चाहतीं। लंबरदारी उन्हें व्यर्थ मालूम होती। कहां लेकर जाएंगे ये पचासों एकड़ में फैली जमीनें और लक्ष्मी की माया। वह बुदबुदाते, " गोधन, गजधन, बाजीधन और रतन धन खान, जो आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान .." मगर यह संतोषधन आए तो आए कहां से !

शालिगराम अकेले इतने क्षीण पुण्य हों ऐसा भी नहीं था। वह जानते थे, उनके अपने गांव में सुदर्शन बाबू से भी पकी उमर के पन्द्रह पचीस लड़के कुंवारे बैठे हैं और गांव तो छोड़ो, पास के बड़े-बड़े कस्बों में भी तमाम लड़के ऐसे ही बुढ़ाये जा रहे हैं बिना ब्याह के। घिसपिट के दसवां बारहवां दरजा पास किए और लग गए पुश्तैनी काम धंधे में। शुरू सात तीन का फेर। और लड़कियां ! सब पढ़ने लिखने शहर में। न गांव की लड़की गांव में रहना चाहती है न शहर की लड़की गांव में ब्याही जाना। जिसे देखो पढ़ लिखकर कंप्यूटर की नौकरी ... मुंबई पूना न जाने कहां कहां ! कई तो हवाई जहाजों में आती जाती हैं और गांव तक अपनी कारों से आती हैं। इनकी साथ की उमर के लड़के ... साले निखट्टू .. पढ़ लिख जाते तो ये भी कुछ कर दिखाते।

इधर उठते बैठते शालिगराम को तमाम घरों के किस्से सुनने मिलते। फलां सेठ तो सुदूर समुद्री देहात से बहू लाए हैं लाख दो लाख देकर। जिन घरों में बिना छाने पानी न पिया गया हो, चींटी भी भूल से दब जाने का परिणाम प्रायश्चित में होता हो वहां मत्स्यभक्षी बहू ! हे भगवान ... उनके बदन में झुरझुरी दौड़ जाती। इसे कहते हैं कलजुग। अर्थशास्त्र तो पहले ही चूल्हे में चला गया, अब तो समाज की चाल भी उल्टी हो गई। वह जमाने को पानी पी पीकर कोसते। कभी अपने जमाने के उन कर्मों को जब लड़की के जन्मते ही घर में मातम सा हो जाता था। बुआ ताई यूं ही लड़की को यह ताकीद कर अफीम दे देती थीं कि जाओ लली, अबकी बस लला को ही भेजना। अब? अब बच गए बस लला ही लला ... धर लो इन बिनब्याहे ललों को मूड़ पर ' शालिगराम अपराध बोध से भर जाते। उनकी ही आत्मा भीतर से गरियाती, तुम्हारे ही तो कर्मों का फल है लम्बरदार जो आज लड़कियां ढूंढे नहीं मिल रहीं और मिल भी रही है तो सभी तुम्हारे इन निखट्टू गँवार लड़कों से इक्कीस।

समय के साथ शालिगराम की सोच भी उल्टी हो गई ..'जो शालिगराम कुछ बरस पहले यह भय खाते थे कि नातीराजा प्रेम में पड़कर ऊंच नीच न बांध लें, वही अब मन में कसमसाते, ' इससे तो अच्छा था सुदर्शन बाबू प्रेम व्रेम में ही पड़ जाते। भले किसी को भगाकर ही ले आते तो नतबहू की गमक तो इन सूनी देहरियों पर दौड़ती। ' संस्कारों और सिध्दांतों के पक्के शालिगराम का बेबस मन शास्त्रों में लिखें गंधर्व विवाह औऱ राक्षस विवाह तक की अनुमोदना कर बैठता। फिर सुदर्शन बाबू के धीर गम्भीर चेहरे को देखते तो उल्टे उन्हें चिढ़ हो आती। ' यह भी भगवान के पूरे हैं ... अल्लाह मियां की गाय .. इनसे तो यह भी ना होगा। थोड़े भी चंट फंट होते तो कहीं न कहीं से फांस लाते किसी को .. मगर किसको? ' उनका मन उन्हीं से प्रश्न करता, ' लड़कियां हैं कहां? किसे भगा लाते? ' वह स्वयं अपने आगे निरुत्तर हो जाते। इस प्रकार खुद से उलझते सुलझते वह इसी निष्कर्ष पर आ गये कि अब बहुत हुआ। जो मिले, जैसी मिले जितने में मिले, सब चलेगा बस सुदर्शन बाबू के हाथ पीले हो जायें। '

और जो हो, जैसी हो की बात पर अब श्री श्री मोंटी आने को ही थे। फोन पर उन्होंने इतना बता दिया था कि एक तो लड़की अपने ही समाज की है, ऊपर से घर परिवार भी जाना पहचाना है .... बस्स .... "

इतना कहकर मोंटी चुप हो गए थे। यह कमबख्त बस्स .... बड़ा रहस्यमय था। पूछने पर मोंटी ने कहा था, " कोई खास बात नहीं, बस लड़की की उमर कुछ ज्यादा है। "




शालिगराम पहले तो तनिक सोच में पड़े। फिर स्वगत बुदबुदाए, ' अपने नाती राजा भी कौन सी कम उमर के हैं, उन्होंने ही जन्मपत्री में कई साल से उन्हें तीस की उमर पर स्थिर कर रखा है मगर असल में तो वह पैंतीस भी पार कर चुके हैं। '

उनकी उधेड़बुन ज़ारी थी कि एक तेज आवाज़ वाली बुलट आकर रुकी और मोंटी आ पहुंचे। शहर में रहकर एकदम आधुनिक ढब की चकाचक शैली वाले मोंटी। कब अंगरेजी में बतियाने लग जाएं और कब उसमें अमरीकी के साथ बुन्देली लहजे का फ्यूजन घुसा होठों को दायें बायें कट मारते बातों में दम ले आएं, पता नहीं।

मोंटी ने आते ही मोबाइल निकाला और होने वाली नतबहू की जो शकल दिखाई कि शालिगराम का दिल डूब गया।

" यह... यह लड़की है? यह तो ऐसा मालूम होता है, दो चार बच्चों की मां होगी !"

मोंटी ने आदत के मुताबिक मुंह को तिरछा किया फिर आंखों में शरारत भर कर बोले, " होने को तो अपने लला भी चार बच्चों के बाप से कम नहीं दिखते नन्ना। रही चार बच्चों की अम्मा की बात तो लड़की एकदम कुंवारी है ... सौ टंच खरा माल। आप समझ रहे हैं न? "

मोंटी के इशारे पर शालिगराम खुद ही झेंप गये। आजकल के लड़के देखो, साले कैसे धुर बकलोल ! न किसी से शरम न लिहाज।

मोंटी ने कुर्सी पास खींचकर कहा, " लड़की गरीब घर की है। बिन बाप की। माँ ही जैसे तैसे ख़र्चा चलाती है। वह रिश्ते को तैयार है। शर्त एक ही है कि सारग परसों तक ही है तो बस्स...। "

 इस बार फिर बस्स ... के आगे ब्रेक लगा मोंटी ने लम्बरदार को पशोपेश में डाल दिया।

" इतनी जल्दी? " शालिगराम सोच में पड़ गए, " ज़रा समय तो दो। चार जगह रिश्तेदारी में खबर करनी होगी। तारीख सधवानी होगी। मुहूरत देखना होगा। "

" उसकी फ़िकर आप छोड़ दो नन्ना। मैंने मुहूरत के लिए पण्डित से भी सैटिंग ज़मा ली है। कल नहीं तो परसों, जब आप कहो, आपका काम फिट। "

" अरे भाई मोंटी, शादी ब्याह में ऐसे सेटिंग थोड़ी चलती है। एक एक मिनट के अंतर में ग्रह नक्षत्र फिर जाते हैं। "

मुँहफट मोंटी ने ऐसी शक्ल बनाई मानो कह रहे हों किस अहमक से पाला पड़ गया। उनकी आंखों से चिढ़ और मुंह से आईना दिखाते शब्द एकसाथ फटे,

" और नन्ना, आप जो कुंडली में बरसों से सुदर्शन बाबू की उमर तीस पर रोके बैठे हो तब? "

 शालिगराम निरुत्तर हो गये। ठीक ही तो कह रहे हैं मोंटी।

मोंटी चेताते हुए बोले, " नन्ना, लड़की के लिए और भी घरों के लोग पड़े हैं मेरे पीछे। दो दो लाख देने को तैयार हैं। आप हाँ करो तो आज अपनी जेब से लाख रुपये दे आऊं लड़की की मां को और नक्की करूँ ये रिश्ता? "

शालिगराम मनधरी में पड़ गये। बल्कि किंकर्तव्यविमूढ़ ही हो गए। क्या करें क्या न करें। एक और कुँआ तो दूसरी ओर खाई। ' तस्वीर देख क्या सोचेंगे सुदर्शन बाबू, नन्ना को यही मिली उनके लिए ! ' फिर ख़ुद को समझाते बुदबुदाए, ' सुदर्शन बाबू ऐसी अवस्था में हैं कि अप्सरा तो मिलने से रही। अप्सरा क्या, दासी मिल जाये, इसका भी आसरा नहीं। इस बार चूके तो क्या पता फिर ..... !'

 उनके भीतर से आवाज़ आई, ' मत दिमाग़ लगा लम्बरदार। अवसर द्वार खटखटा रहा है। इस बार जो चूका सो तुझसे बड़ा मूरख नहीं कोई। '

लम्बरदार अंतरात्मा से नहीं झगड़ पाये। फिर भी अपना कबूलनामा और साथ ही मन की शल्य में संतुलन रखते बोले, " भइया लाख दो लाख की बात नहीं है। लड़की वाले जो चाहेंगे सो हम देने में कसर न छोड़ेंगे, मगर सुदर्शन बाबू? वह तैयार होंगे इस लड़की के लिए? "

मोंटी मन में व्यंग्य से बुदबुदाए, ' सुदर्शन बाबू अब वैसे भी सुदर्शन नहीं रहे कि इनके लिए विश्व सुंदरी आहें भरे। ' फिर प्रकट में चहक कर बोले,

 " उसकी फिक्र आप मत कीजिए। मुझ पर छोड़िए "

और वाकई, न जाने कौन सी जड़ी फिराई, मोंटी ने एक बार में सुदर्शन बाबू को लपेटे में ले लिया। एकबारगी फोटो देख सपने तो सुदर्शन बाबू के भी टूटे थे। लंबरदार के नाती जो ठहरे। मगर हालात ऐसे थे कि वह कुबूल है, कुबूल है, कुबूल है जैसे मुंडी हिलाकर रह गए और उनकी मुंडी के हां में हिलते ही शालिगराम मानो मनों बोझ से मुक्त हो गए।

प्रगल्भ मोंटी के पास चट मंगनी पट ब्याह के रेडीमेड पैकेज थे। जैसे जादूगर विशिष्ट मुस्कान के साथ खाली रुमाल को हवा में झटक नाना प्रकार के आइटम निकलता है न, वैसी ही मुस्कान के साथ मोंटी एक एक कर हवा में सारे समाधान प्रकट कर रहे थे। प्रकट क्या, तय ही करते जा रहे थे और शालिग्राम हैरानी से मुँह बाये इस चमत्कार को देखे जा रहे थे।

विवाह की तिथि तय। विवाह का स्थान तय। भोजन तय। भोजन के ठेके वाला तय। आतिशबाजी तय। पण्डित तय। पण्डाल तय। खाम तय। खवास तय। ख़ास कश्मीर से बुलाईं खुशबुएँ तय। बाजे तय। घोड़ी तय। सब कुछ तय। मगर बाराती? मोंटी का बस चलता तो रुमाल झटककर बाराती भी तय कर देते और बारात में नाचने वाले भी, मगर यह ज़िम्मेदारी शालिगराम ने ही उठाई।

" लड्डू पेड़े, पीले चावल, छपे हुए कार्ड सब बीते ज़माने की बातें हैं नन्ना, आजकल तो कम्प्यूटर पर कार्ड बनवाओ और फुर्र कर दो मोबाइल से, जो व्हाट्सएप नहीं चलाना जानते, उन्हें फोन पर ही न्योत दो। " ये कहकर शालिगराम को राह देने वाले मोंटी थे तो काम के आदमी। उन्होंने ही शालिगराम का यह वज़न भी हल्का किया और चट से कार्ड भी कबूतर बन पहुंच गये सबके पास। फोन पर यों ज़्यादातर क़रीबी रिश्तेदारों ने मुंह ही बनाया, ' परसों की शादी? ऐसी भी क्या अबेर पड़ी थी ? इत्ते साल सबर पकड़ी, महीना दो महीना की और सबर पकड़ लेते नन्ना ! दफ़्तर से छुट्टी, बाल बच्चन की परीक्षा। इत्ता आसान है क्या? कछु तो सोचा होता इत्ती बड़ी बात सोचे से पहले ! "

शालिगराम क्या कहते कि उनके लिये भी आसान था क्या यह युद्ध जीतना? कैसे तो अब जाके उनकी साध पूरी हो पा रही है। एक मन तो हुआ, मुंह बनाने वालों से पूछ ही डालें, ' तुमने कौन से हाथ पाँव हिलाये आज तक सुदर्शन बाबू के ब्याह के लिये, और अब जब इतनी तपस्या के बाद अवसाद से उबर प्रसाद का समय आया तो बड़े आये, रिश्तों का उलाहना देने !'

तमाम रिश्तेदार रूठ गये। सुदर्शन बाबू की कैई चचेरी ममेरी जिज्जी बिन्नूएं, जिन्होंने शायद ही किसी दूज पर अपने इस देहाती भाई की फ़िकर की थी, एकदम रिसा बैठीं।

परसों का दिन भी पलक झपकते आ गया। लगे गांव खेड़े और कस्बों की बूढ़ी पुरानी मौसियां, चाची काकियाँ, ताऊ, कक्का अवश्य आ गये हिलती गरदन, चुके हुए घुटनों और अल्जाइमर के मरीज होते हुए भी अपने खून से मिलने की ललक लिये। तमाम ना नुकुर और गुस्सा फ़ज़ीहत के बाद व्यस्तता के घोड़े पर सवार रिश्तेदार भी अपने अपने साधनों से आ पहुंचे।

सुदर्शन बाबू घोड़ी पर चढ़ ही गये अंततः। यों निकले हुए पेट वाले ऐसे अधेड़ दूल्हे को देख एक पल तो घोड़ी भी ठिठकी होगी मगर गुलाबी नोटों वाले ठीक ठाक नेंग के हाथ आते ही मालिक ने उसकी ठुनक दूर कर दी और ठाठ से बैठे दूल्हे राजा को लेकर घोड़ी ठुमकती हुई चल पड़ी।

दुल्हन का डील डौल देख घोड़ी से ज़्यादा तो सुदर्शन बाबू ठिठके, मगर अब वक्त ठिठकने का नहीं, लम्बरदारी की ठसक और अपनों की ठिल ठिल करती निगाहों को ठेंगे पर धर ठीक ठाक ढंग से ठिकाने लग जाने का था सो यार दोस्तों के ठहाकों के बीच सुदर्शन बाबू ने दूल्होचित ठनगन के साथ फेरे लिये और इस प्रकार वे विधिवत वर दिये गये। प्रसन्न देवताओं रिश्तेदारों ने उन्हें यथाशीघ्र दूध से नहाने और पूत फलने का वर दिया सो वर को साकार करने की उत्कट लालसा लिये सुदर्शन बाबू और लजाये लजाये से दिखते, कनखियों से अपनी दुल्हन को देखते फूलों से सजी कार में बैठ घर को लौटे जहां उनके स्वागत में शालिगराम ने अपनी हैसियत से कहीं आगे रौशनियों और आतिशबाजियों से पूरा मोहल्ला गुलज़ार कर रखा था।

सुदीर्घ धैर्योपवास के बाद हुई पारणा की तरह आनन्दकारी था यह अवसर सो शालिगराम के उत्साह का ठिकाना नहीं था। यूँ वरमाला से लेकर फेरों और पाणिग्रहण से लेकर विदा तक नतबहू का मुखमंडल देख वह अचंभित तो खूब हुए थे। सपाट चेहरा, जीवन की इस सबसे महत्वपूर्ण घड़ी पर न खुशी का कोई भाव न माँ से बिछोह का ग़म। शून्यता का स्थायी भाव उन्हें कुछ पल को बेचैन कर गया था मगर नतबहू के आने की प्रसन्नता में शीघ्र ही वह इससे उबर भी गये। जिस मोबाइल को वह नई पीढ़ी को भ्रष्ट कर देने वाला मान उसकी मुख़ालिफ़त करते न थकते थे, उस मोबाइल की ऐसी ज़बरदस्त उपयोगिता उन्हें पहली बार मोंटी के सौजन्य से ही ज्ञात हुई थी और अब वह मोहल्ले भर को इकट्ठा कर फोटो पर फोटो खिंचवा रहे थे और दे दनादन अपने रिश्तेदारों को भिजवा रहे थे। देखें तो लोग एक बार लम्बरदार का ठसका। शालिगराम नतबहू लेकर आये हैं। देर से ही सही, दुनिया में ख़बर फैलनी तो चाहिये, पीठ पीछे तंज़ कसने वालों के सीने से हाय तो निकलनी चाहिये।

इधर सुदर्शन बाबू का उत्साह भी देखते ही बन रहा था। यों तो दुल्हन के मुंह से हां हूँ के अलावा शब्दों की कोई मिसरी उनके कानों में नहीं घुली थी मगर जो आल्हाद और उत्तेजना उनके चेहरे से रिस रिस चुगली करती फिर रही थी, वह न नई दुल्हन से छिप रही थी न सुदर्शन बाबू के यार दोस्तों से जो न जाने कितने ऐसे वैसे उपहार लाकर कमरे में किसी ख़ास जगह पर रख रहे थे और तमाम ताक़ीदों हिदायतों के साथ दूल्हे राजा से फोश मज़ाक करते उनकी सेज तैयार कर रहे थे।

शालिगराम का कमरा ऐन घर के प्रवेश द्वार से लगा था, उसके बाद लम्बी दाल्हान और उस छोर पर सुदर्शन बाबू का कमरा, जहां से चम्पा, चमेली, चन्दन के खुश्बू भरे झोंके दाल्हान की दहलीज पार कर शालिगराम को गुदगुदाते अपना अतीत याद करने पर विवश कर रहे थे। दीपक राग से झुलसी ज़मीन पर मेघ मल्हार की तान के बाद जो सोंधी महक होती होगी न, उससे कहीं ज्यादा महक रहा था यह बूढ़ा हो चुका घर।




साथ वाले कमरे में मांई और जिज्जी से भी शालिगराम की प्रसन्नता छिपी न थी। बल्कि शालिगराम को दाल्हान की ओर झाँकते पा वे हँसती हुई उलाहना दे बैठीं, " बुढ़ऊ, चुपचाप सो जाओ ज़ल्दी। अच्छी बात नहीं है जे कि झाँके जा रहे हो ऐसे ! "

मगर बुढ़ऊ का दिल भी कहाँ माने। पोपले मुंह में जितने खीसे बचे थे, निपोर कर चूड़ियों की कभी कभी आने वाली उन खनक को सुन झंकृत होते रहे जिसके लिए वह बरसों से तरस रहे थे।

रात कुछ गहरी हुई। सुदर्शन बाबू के यार दोस्त भी कुछ देर उन्हें छेड़ने के बाद धौल धप्पा करते अपने-अपने घर को बढ़ लिये। जिज्जी और मांई मुंह ढाँप सो रहीं मगर एक और पीढ़ी के स्वागत को आतुर शालिगराम मन में लड्डू बनाते फोड़ते न जाने कब तक जागते रहे।

सुबह सुदर्शन बाबू देर तक उनके सामने नहीं पड़े। शालिगराम मुस्कुरा उठे। जानते हैं, शरमाते होंगे। इतने संस्कार तो जीवित हैं ही अभी। लेकिन जब सुदर्शन बाबू दिखे मगर थोबड़ा घुटनों तक लटकाये तो उन्हें हैरानी हुई। समझ न पाये की मामला क्या है। जब दिन चढ़ते नतबहू चौके में न जाती दिखीं न ही परम्परा के मान से मन्दिर जाने को तत्पर दिखीं तो उनके चेहरे पर प्रश्नचिन्ह उभरे और समाधान किया जिज्जी ने, " अरे लम्बरदार, दो चार दिन गम खाने पड़ है अपने नातीराजा को, " खटमिट्ठा अफ़सोस प्रकट कर जिज्जी ज़ोर से हँस पड़ीं।

शालिगराम मुंडी नीची करे बैठे रहे। अब कहें भी तो क्या इस पर। इधर बचे खुचे रिश्तेदार अपनी अपनी अटैचियाँ उठा रवानगी को तैयार दिखने लगे। किसी की बस है तो किसी की ट्रेन। अब वे जमाने तो रहे नहीं कि शादी के नाम पर हफ़्ता भर टिके रहें, रात रात भर हंसी ठट्ठे हों और ढोलक की थापें मोहल्ले भर को जगायी रहें। सबके अपने काम और अपनी शल्य सो दोपहर होते न होते सब अपनी राह पकड़ बैठे। जिज्जी और मांई, ये दो बूढ़ीयां ही बच गईं। महाराजिन के साथ रसोई भी संभालतीं और शालिगराम की नतबहू को भी, जो मालूम होता था, अखण्ड मौन के संकल्प के साथ ही मायके से विदा हुई थी। यदि वह जिज्जी से स्नानघर और दो चार अपरिहार्य चीजों के बारे में न पूछती तो घर में शंका और मोहल्ले भर में चर्चा का एक नया अध्याय और शुरू हो जाता कि शालिगराम की नतबहू तो गूँगी है और क्या पता, बहरी भी न हो।

ये दोनों बूढियां यद्यपि किसी हड़बड़ी में नहीं थीं वापसी की मगर तीसरी सुबह हो न पाई और बेटा बहुओं ने फोन कर कर हलाकान कर दिया, मानो उनका जीवन ठहर गया हो इनके बिना। यूँ समझती ये भी खूब थीं कि उनके बिना बहुओं के क्या क्या काम रुके होंगे, फिर भी बेचारियों ने अपने कपड़े बांध लिये। अब तक सुदर्शन बाबू के यथावत लटके मुंह और उनकी ब्याहता के बिचके मुंह को देख उन्हें यह तो अंदाज़ हो गया था कि कुछ गड़बड़ तो है। मगर क्या, ये न समझ पाईं।

चलते चलते जिज्जी अपने दशकों के अनुभवों की गठान खोलतीं शालिगराम के कान में इतना अवश्य कह गईं, " तुम्हारी नतबहू के लच्छन कछु ठीक नहीं दिख रये लम्बरदार, देखे रहियो तनक। "

शालिगराम की समझ में कुछ न आया। अभी भी उन पर मेघ मल्हार का सम्मोहन तारी था। दो दिन और गुज़र गये मगर न नतबहू चौके की ओर झाँकी न कमरे से बाहर निकलने में रुचि दिखाई उलटे महाराजिन को ही खाना पकाने के अलावा कमरे से महारानी की जूठी थाली उठानी पड़ी तो शालिगराम के मन में द्रुत पर जारी संगीत लहरियां मद्धिम पड़ीं। महाराजिन ने भी जब उनके कानों में नतबहू के रंग ढंग ठीक न दिखने का अंदेशा दिया तो शालिगराम के कान खड़े हुए। जिज्जी की कही बात अब चेतन में आ कुछ अघट का संकेत देने लगी। दिन सोचते विचारते कटा। रात भी यूँ ही करवटें बदलते रहे। कुछ खुटका उनके मन में भी हुआ। ब्याह के बाद से नातीराजा पहले से कहीं ज़्यादा संजीदा दिख रहे हैं। सामने भी नहीं पड़ते। या पड़ भी जाएं तो कटकर निकल जा रहे हैं आजकल। दिन दिन भर दुकान पर ऐसे क्या व्यस्त हो गये जबकि नई नई शादी में तो आदमी बहाने ढूंढ़ ढूंढ़, घड़ी घड़ी घर भागता है !

अलसुबह टूटी नींद में उन्होंने मन को समझाया, ' नैक गम खा ले बुढ़ऊ, हर बात में उलटा ही क्यों सोचता है। ' फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सुदर्शन के जागते ही बुलाकर डपट देंगे, ' क्या नई बहू को कमरे में बंद कर रखा है। आज ही अटैची उठा और निकल जा बहू को कुल्लू मनाली घुमाने। '

इधर उन्होंने यह सोचा, उधर कमरे की ओर कुछ खटपट हुई। अगले क्षण दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई तो शालिगराम ने उस ओर झाँका और जो देखा तो चौंक पड़े। सुदर्शन बाबू तो सचमुच अटैचियाँ लिये बाहर खड़े थे। मगर, ऐसे कहाँ जा रहे हैं ये, रात के पहने गुड़ी मुड़ी कपड़ों में? जबकि वह तो बग़ैर इस्तरी किये कपड़ों के घर से बाहर कदम नहीं रखते !

उधर एकाएक बाहर कार आकर भी रुकी। वही, जिसमें बिठाकर नातीराजा अपनी दुल्हन को लाये थे। कार से उतरने वाले सज्जन सुदर्शन के बालसखा थे, शशिमोहन। उन्होंने आते ही बग़ैर कुछ बोले शालिगराम के पैर छुए।

शालिगराम कुछ पूछते, तब तक पीछे से चूड़ियों की आवाज़ आई तो वह उस ओर घूमे।

नतबहू सिर झुकाये खड़ी थीं। मगर ये भी ऐसी ही अवस्था में मानो सोकर उठते ही कहीं जाने को उद्यत हो गई हों।

" बेटा, अचानक कहां चल दिये तुम लोग, वह भी घर के कपड़ों में? "

नतबहू कुछ न बोलीं और गरदन नीची किये चुपचाप कार में जा बैठीं। शशिमोहन सुदर्शन के हाथ से अटैचियाँ ले कार की ओर बढ़े तो शालिगराम चिल्लाये, " सुदर्शन, ये सब क्या हो रहा है? नतबहू कहाँ जा रही है और तू ऐसे क्यों खड़ा है पुतले जैसा? "

पैर के अंगूठे से ज़मीन को खोदते सुदर्शन कुछ न बोल सके तो शशिमोहन ही पास आकर अपराधी से स्वर में बोले, " नन्ना, मोंटी भइया हमारे साथ चोट कर गये "

" चोट? मतलब क्या? "

" नन्ना, भाभी तो पहले ही घर से भग के शादी कर चुकी हैं दूसरे समाज में। इनकी माताराम जबरन पकड़ लाईं थीं इन्हें वहां से और अपने मरने की कसमें दिलाकर बांध गईं हमारे पल्ले। जे न चल पायेंगी अपने यहाँ सो इनके ओरिजनल हसबैंड के पास पहुंचाने को कहा है सुदर्शन बाबू ने। "

" ओरिजनल हसबैंड ! तो ये क्या है जो भरी पंचायत में ब्याह के लाया है? " शालिगराम सुदर्शन बाबू की ओर देख शक्ति भर चीखे लेकिन उनकी आवाज़ कार की आवाज़ में दब गई।

जिस कार को फूलों से सजाकर लाया गया था, उसके फूल कभी के नोंच लिये गये थे और अब उस पर धूल और गर्द के बदरंग धब्बे ही बचे थे। कार धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। अवाक शालिग्राम कभी बुत बने खड़े सुदर्शन बाबू को देख रहे थे तो कभी जाती हुई नतबहू को। एकदम हतप्रभ, हतसंज्ञ।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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4 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट कहानी. कहानीकार कहानीकार को बधाई एवं शुभकामनाएँ.

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  2. अच्छी कहानी... लोक अंचल की भाषा और गंध को समेटे यह कहानी पाठक को कई सवालों के बीच छोड़ जाती है...

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