रवीन्द्र कालिया पर कथाकार अखिलेश का संस्मरण #जालंधर_से_दिल्ली_वाया_इलाहाबाद (1) - #Shabdankan
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रवीन्द्र कालिया पर कथाकार अखिलेश का संस्मरण #जालंधर_से_दिल्ली_वाया_इलाहाबाद (1)

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अधिकतर ऐसा ही हुआ : कोई कालिया जी से मिला और उनका होकर ही रुखसत हुआ । उनका अत्यंत महत्वपूर्ण लेखक होना, आकर्षक अनोखा व्यक्तित्व, उनका वातावरण में देर तक गूंजते रहने वाला ठहाका, बढ़िया आवाज और कथन में अप्रत्याशितता, चुस्ती, यारबाशी, चुटीलेपन का सम्मिश्रण - ये सब तत्व मिलकर सामने वाले की कालिया जी से मैत्री का पक्का जोड़ लगाते थे। — कथाकार अखिलेश

मेरा मन हो रहा था कि हर्ष के मारे वहीं कूदने लगूं

— कथाकार अखिलेश

जालंधर से दिल्ली वाया इलाहाबाद ... भाग १

सन 1977 मेरे जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष था; क्योंकि इसी साल मेरी पहली कहानी प्रकाशित हुई थी, मैं सत्रह का हुआ था, इंटर मीडिएट में थर्ड डिवीजन आया था और विख्यात कथाकार, संपादक रवींद्र कालिया से मिला था । कालिया जी से मिलना एक इत्तिफ़ाक़ की वजह से संभव हुआ था । इत्तिफ़ाक़ यह था कि उस रोज इलाहाबाद का सुपर फाइन छापाखाना बंद था...लेकिन जरा रुकते हैं; मैं जानता हैं कि ऊपर लिखी गयी थर्ड डिवीजन वाली बात बेमेल लग रही है इसलिए पहले उसी पर.....

मुझमें कम उम्र में साहित्य पढ़ने, लेखक बनने का शौक पैदा हो गया था, जबकि मैं विज्ञान का विद्यार्थी था । नतीजा हुआ कि पाठ्यक्रम मेरे पल्ले नहीं पड़ता था और मैं एक एक कर होने वाली परीक्षाओं के नतीजों के बाद अपमानित होता रहता था । अतः मैं विज्ञान संकाय से मुक्ति चाहता था जो मुझे कतई न मिलती, यदि इंटर में मेरी डिवीजन बेहतर हो जाती । खैर जो भी हुआ, अच्छा हुआ : एक समय भविष्य में जगदीश चन्द्र बसु अथवा हरगोविन्द खुराना बनने का सपना देखने वाला विज्ञान का विद्यार्थी इंटर की बोर्ड परीक्षाओं में भागते भूत की लंगोटी के रूप में किसी भांति थर्ड डिवीज़न में पास हुआ । उक्त अपमानजनक श्रेणी पाने से मुझमें दो प्रतिक्रियाएं हुईं : पहली यह कि भगवान से भरोसा उठ गया और मैं नास्तिक हो गया; दूसरी, विज्ञान का रणछोरदास, मैं स्नातक में कला संकाय का छात्र बना । मेरे कॉलेज का नाम गनपत सहाय महाविदयालय था जिसमें गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव अंग्रेजी के प्रवक्ता थे लेकिन मेरे लिए महत्वपूर्ण यह था कि वह कहानियां लिखते थे और एक समय में निष्कर्ष नाम की पत्रिका सम्पादित प्रकाशित कर चुके थे । अब हम लिखने पढ़ने वाले कुछ तत्कालीन युवा गिरीश जी के इर्दगिर्द इकट्ठा होने लगे । हमने पूछा - "निष्कर्ष का प्रकाशन बंद क्यों हो गया ?" उन्होंने जवाब दिया - "आर्थिक कारणों से ।" हम उन दिनों उत्साही और बेशर्म थे अतः पत्रिका पुनः शुरू करने के लिए चंदा अभियान में जुट गए और सफल भी हुए । हमारे जोश की पृष्ठभूमि में पत्रिका में अपनी रचनाओं के प्रकाशन की इच्छा भी थी जो फलीभूत हुई : निष्कर्ष के पुनर्प्रकाशन के पहले अंक में हम सभी दोस्तों की कोई न कोई रचना शामिल थी, स्वयं पत्रिका के सम्पादक गिरीश जी की भी ।

एक दिन गिरीश जी का आदेश हुआ - "तुम कल मेरे साथ इलाहाबाद चलोगे पत्रिका सुपर फाइन प्रेस में देने ।" मैंने गर्व और आज्ञाकारिता से 'हां' कहा । अगले रोज हम निकल पड़े । पैर, बस, रिक्शा की सवारी करते हुए जब हम प्रेस के सामने पहुंचे, वहां ताला लटका था । मैंने गहन निराशा से कहा - "अब ?" वह जीवट वाले थे - "अब रवींद्र कालिया के यहां चलते हैं: वह लेखक हैं और प्रेस भी चलाते हैं ।" "कालिया जी के यहां !” मैं आश्चर्य और खुशी से बोला । मेरे दोनों हाथों में लड्डू थे : बहुत बड़े कथाकार से मिलना होगा और हे भगवान वहां तो एक और बड़ी कथाकार ममता जी भी मिलेंगी । दूसरी बात यह कि अब निष्कर्ष यानी मेरी रचना का भी प्रकाशन लटकने वाला नहीं था । मैं इतने उमंग में आ गया था कि जब चलने के लिए गिरीश जी ने रिक्शा रोका तो मैंने कहा - "छोड़िये रिक्शा विक्शा, चलिए पैदल चलते हैं " बहरहाल हम रिक्शा से मोहल्ला रानीमंडी में दाखिल हए ।

रवींद्र कालिया के प्रसिद्ध उपन्यास खुदा सही सलामत है में 'बेलन के आकार वाली’ जिस गली का सजीव वर्णन हुआ है, रानीमंडी की वह 'बेलन के अकार वाली गली' लगभग वैसी ही थी । बहुत मामूली काम धंधों से जुड़कर किसी तरह जीवनयापन करने वाले संघर्षरत मुस्लिम परिवारों की बहुसंख्या वाली बस्ती । वहां अपने छोटे से घर में, कोठरी में, अपने बड़े परिवार के साथ मामूली काम धंधे करने वाले लोग रह रहे थे । कोई रंग अबीर गुलाल बनाने बेचने का रोजगार करता था कोई पतंग बनाने का । डिब्बे, लिफाफे तैयार करने वाले, रजाई गद्दे में रुई भरने, पिचकारी बेचने, कपड़ों पर इस्तरी करने तथा उनके फटे की मरम्मत करने जैसे कई साधारण साधारण से कामों से स्त्रियां बच्चे बुजुर्ग जुड़े हुए थे । ये श्रमजीवी बदली हुई पहिचान और कथात्मक रूपांतरण के साथ खुदा सही सलामत है में दाखिल हुए हैं । इक्का दुक्का अपेक्षाकृत संपन्न घर भी दिख रहे थे । 'बच्चा जी का धर्मशाला’ भी था जिसका जिक्र उपन्यास में हआ है; हालांकि वह उपन्यास अभी कुछ वर्ष बाद लिखा जाना था । उसी गली में एक बोर्ड देखा जिस पर निकहत प्रकाशन लिखा हुआ था । मैं खुश हो गया क्योंकि इसी प्रकाशन से जासूसी उपन्यासों के मशहर लेखक इब्ने सफी बीए के उपन्यास छपते थे जिनमें कर्नल विनोद और कैप्टन हमीद और यदाकदा कासिम की जोड़ी / तिगड़ी अपराधियों का पर्दाफाश करती थी । उसी गली में सबखून का बोर्ड लगा हुआ मिला; तब मैं नहीं जानता था कि सबखून उर्दू साहित्य का बेहद सम्मानित रिसाला है जिसके संपादक शम्सुर्रहमान फारुकी हैं जो बहुत बड़े आलोचक हैं और उन्हें करीब पच्चीस बरस बाद उच्चकोटि का किस्सागो भी बन जाना है । हम थोड़ा आगे बढ़े तो मंजिल सामने थी - एक दोमंजिला मकान पर इलाहाबाद प्रेस का बोर्ड एक बहत बड़े दरवाजे के ऊपर लगा था । जाहिर है दरवाजे पर दरवाजे के ही समानुपात में बड़ी सी कुंडी लटक रही थी जिसको उत्साही युवक मैंने भरपूर जोश तथा ताकत से खटखटाया । दरअसल यह मेरी व्यक्तिगत बेसहूरी अथवा असभ्यता नहीं थी, मैं एक कस्बाई शहर सुल्तानपुर का ऐसा बाशिंदा था जो छः वर्ष पहले उससे भी अधिक पिछड़ी जगह तहसील कादीपुर में रहता था । इस भूगोल में, कुंडी कैसे बजायी जाये, इसके लिए उन दिनों दिमाग नहीं केवल हाथ का इस्तेमाल किया जाता था । निश्चय ही कुंडी भीतरी हिस्से में हथौड़े की तरह बजी होगी क्योंकि प्रेस के एक कर्मचारी ने तमतमाए चेहरे के साथ गेट खोला, लेकिन उसकी उदारता थी कि वह बगैर फटकारे हमें अंदर ले गया ।




मुझे याद है : हम लोग मेज के इस तरफ थे; दूसरी ओर एक घूमने वाली कुर्सी थी । कुर्सी की तरफ से कुर्सी के दायीं ओर तीन चार सीढ़ियां बनी थीं जिनके ऊपर जाओ तो एक दरवाजे के पार एक कमरा था; उस रोज तो नहीं मगर बाद में अनगिनत बार उस कमरे की बैठकी में शामिल हुआ । कमरे के चारों तरफ किताबें रैक में लगी हुई थीं । किताबों के पीछे कभी कभी शराब की बोतलें छिपी हुई मिल जाती थीं । जमीन पर ही गद्दे चादरें बिछी थीं । एक कोने में रिकॉर्ड प्लेयर था जिसके बगल में मेहदी हसन, बेगम अख्तर वगैरह अनेक विख्यात गायकों/गायिकाओं के तवे थे । मुझको याद आता है, गुलजार की मीरा फिल्म का रेकॉर्ड कालिया जी खरीकर जब ले आये तो उनके सारे दोस्तों ने उसे सुना था ।

कुर्सी की तरफ से कुर्सी के बायीं और का एरिया दो हिस्सों में विभाजित था । पहले के हिस्से में कम्पोजिंग का काम होता था जिसमें सात आठ कम्पोजीटर अपने सामने लकड़ी के खांचों में रखे अनेक महीन महीन अक्षरों के फॉण्ट चिमटियों से निकालकर नीचे रखी स्क्रिप्ट के अनुसार लकड़ी के फ्रेम में क्रम में रखते...। आखिरी हिस्से में छपाई की मशीनें थीं । दो या शायद तीन आटोमेटिक मशीनें और एक ट्रेडिल मशीन । कम्पोजिंग सेक्शन और कुर्सी के बीच की जगह से ऊपर की मंजिल के लिए सीढ़ियां गयी थीं । कालिया जी प्रायः ऊपर रहकर ही प्रेस का काम करते थे; नीचे के ऑफिस में वह तभी आते जब कोई मिलने आता था । हम लोग भी काम के सिलसिले में मिलने ही गए थे।

उनकी कुछ कहानियां मैंने पढ़ रखी थीं जिसमें उन्हीं दिनों पहल में प्रकाशित कहानी चकैया नीम भी थी । लेकिन जाहिर है उनसे मिलना पहली बार हो था । खूब लम्बे, सुंदर, एक हाथ में कड़ा पहने कालिया जी आकर घूमने वाली कुर्सी पर बैठ गए । उन्होंने होठों में सिगरेट लगाकर लाइटर से जलाया और कश खींचकर धुंआ छोड़ा, धुंए में छल्ला बन रहा था । मैं मंत्रमुग्ध था : एक, इतने चर्चित लेखक को देख रहा था, किसी को इतनी बढ़िया और लंबी सिगरेट पीते हुए देख रहा था वह भी इस तरह कि छल्ले बन रहे थे जबकि मेरा जो परिवेश था उसमें ज्यादातर यदि धूम्रपान करते तो बीड़ी पीते थे या बहुत तरक्की कर गए तो पनामा अथवा कैंची कट सिगरेट । इस क्रम में अगली बात यह, मैं जीवन में पहली बार किसी को घूमने वाली कुर्सी पर बैठा देख रहा था । गिरीश जी ने मेरा परिचय कराया और बताया - यह बीए पहले साल का स्टूडेंट है । इसने आपको भी पढ़ रखा है । कालिया जी थोड़ी देर मुझसे बात करते रहे । इसी बीच ममता जी आ गयीं । वह गिरीश जी से अंग्रेजी में बात करने लगी, शायद इसलिए कि दोनों हिंदी के लेखक होने के साथ साथ अध्यापक अंग्रेजी के थे । खैर, निष्कर्ष की पाण्डुलिपि छपने के लिए दी गयी, गिरीश जी ने पत्रिका छप जाने और उसे लेने के लिए सुल्तानपुर से अगली बार आने की तारीख पछी । सब स्पष्ट हो जाने के बाद हम इलाहाबाद प्रेस से बाहर निकले ।

अब हम बस अड्डे के रास्ते पर थे । मुझमें दो भावनाएं उछलकूद मचाये हुई थीं । पहली खुशी की थी, आज पहली बार मैं दो ऐसे बड़े लेखकों से मिल पाया था जिनको पत्रिकाओं में पढ़ता रहा था और जिनकी किताबें मैंने लाइब्रेरी से निकलवाकर पढ़ी थीं । दूसरी भावना जो आफत मचाये थी वह भूख की थी । शाम होने को थी और हमने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था । मुझे उम्मीद थी कि गिरीश जी अब कहीं खाना खिलाएंगे लेकिन गिरीश जी ने एक ठेले की दुकान से टिक्की खिलाई । खैर वह भी कोई कम बात नहीं थी क्योंकि अगली यात्रा में उन्होंने वह भी नहीं खिलाई।

दूसरी यात्रा जैसे स्वप्न किन्तु यथार्थ साबित हुई थी । जब हम पत्रिका लेने इलाहाबाद प्रेस, 370 रानीमंडी, इलाहाबाद में दाखिल हुए तो अनेक लोगों का समूह इकट्ठा था । ममता जी ऊपर जाने वाले बैठके की सीढ़ियों पर बैठी थीं; शायद अपने घर में उनकी वह प्रिय स्थली थी । कालिया जी पिछली बार की तरह ही घूमने वाली कुर्सी पर बैठे सिगरेट पर सिगरेट पिए जा रहे थे । वह एक बुझती हुई सिगरेट की आग से नई सिगरेट सुलगा लेते । मैं अपने उस समय तक के जीवन में चोरीछिपे अपने मामा की प्रिय बालक छाप बीड़ी पी चुका था और बाबा का हक्का गुडगडा चुका था लेकिन सिगरेट के जायके से नावाकिफ था । फिर भी कालिया जी का इस तरह सिगरेट के कश लेना मुझको खासा आकर्षक लग रहा था । क्यों, यह मैं नहीं जनता था । कालिया जी ने वहां उस समय मौजूद लोगों से परिचय कराना शुरू किया - "ये अमरकांत जी हैं ।" मैं चौंक पड़ा; अरे अमरकांत जी, बहुत बड़े लेखक । कालिया जी ने अगला परिचय कराया - "ये मार्कंडेय जी" खुश होकर मैंने स्वगत कहा - हंसा जाय अकेला वाले । कालिया जी आगे बढ़े - "ये शैलेश मटियानी जी, ये सत्य प्रकाश, ये सतीश जमाली, ये...ये...” मैं अपनी विह्वलता को जामे में रखने का जतन कर रहा था क्योंकि बार बार मेरा मन हो रहा था कि हर्ष के मारे वहीं कूदने लगूं । सचमुच छोटे शहर से बावस्ता मुझ सरीखे नौसिखुआ के लिए उपरोक्त नामचीन साहित्यिक शख्सियतें कल्पनाओं में हीरो का दर्जा हासिल कर लेती थीं, हम उनके बारे में तरह तरह के बेहतरीन, हकीकत से उच्चतर ख्याल बनाया करते । अब एक ही वक्त पर एक साथ कई लोगो को देखना विरल क्षण था; वह भी इतने पास से, इतनी देर तक, बातचीत करते हुए, हालचाल लेते हुए । मैं निहाल हो गया था । निश्चय ही आज का युवा लेखक होता तो न जाने कितनी सेल्फी खींच चुका होता और उनको अविलम्ब फेसबुक पर लगा चुका होता; वहीं पर बैठे बैठे, बतियाते संवाद करते हुए विडियो बनाकर यू ट्यूब चैनल पर डाल देता । पर वह 1977 था जब न मोबाइल था न फेसबुक । कोई बात नहीं, मेरे मन में सारी फोटो छप चुकी थीं और छापा ऐसा शानदार कि आज इतने लम्बे अंतराल के बाद भी एकदम सद्यः महसूस हो ।




वापसी के समय कालिया जी ने स्नेह से कहा - "अच्छा अखिलेश फिर आना ।" उन्होंने अपना लैंड लाइन फोन नंबर भी दिया जोकि मेरे लिए व्यर्थ था, वजह यह कि मेरे घर बल्कि सुल्तानपुर में मेरे किसी परिचित के यहां फोन नहीं लगा था । स्थिति यह थी कि उसके बाद के कुछ वर्षों तक, फोन कर सकने को कौन कहे, मैंने फोन छुआ तक न था । फोन को लेकर मेरे इल्म का स्तर यह था कि मैं सोचता था, यह बिजली से चलता है । बाद में तीन चार साल बाद फोन का पहली बार इस्तेमाल कालिया जी के माध्यम से ही हआ । घटना यं घटी : फोन बजने लगा था । कालिया जी ने मुझे आदेश दिया - "तुम बात करो ।” मुझे घबराहट होने लगी, मैंने बहाना प्रस्तुत किया - “फोन आपको किया गया है ।"

मेरा पिंड नहीं छूटना था - "तुम कह दो, मैं नहीं हूं।"

फोन मेरे हाथ में कांप रहा था, नहीं, मेरा हाथ ही कांप रहा था । और तो और, मैंने फोन उल्टा पकड़ा था जिसे कालिया जी ने सीधा किया ।

“हेलो ।” मुझको कहना ही पड़ा ।

उधर से आवाज आई । अरे ये तो मालती तिवारी मैम हैं, यूनिवर्सिटी में मेरी टीचर मेरी गुरु । ओह अब गुरु से झूठ बोलना पड़ेगा । खुद को तसल्ली दी, कौन सा पहली और आखिरी बार बोलूंगा - "कालिया जी नहीं हैं ।"

"कब तक आयेंगे ?" अब मैं संभलने लगा था - "मालूम नहीं ।" "कहां गए हैं ?" "नहीं मालूम ।" "आप कौन ?"

"उन्हीं का वाकिफ हूं, उनका इंतजार कर रहा हूं ।” वार्ता समाप्त हुई । चोंगा कालिया जी को सिपुर्द कर मैंने राहत की सांस ली और कालिया जी से पूछा - "आपने ऐसा क्यों किया ?"

"देखना चाहता था कि अचानक कोई विपरीत स्थिति आ जाने पर तुम सामना कैसे करते हो ।” "जैसा भी किया पर कितना झूठ बोलना पड़ा ?" मुझमें ग्लानि थी । "पर तुम अपनी आवाज क्यों बदल रहे थे ?" "डर रहा था कि मालती मैम आवाज से पहचान न लें..."

यह वाकया तब का है जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एमए करने के लिए आ चुका था । इस वाकये की बात को आगे बढ़ाते हुए बताऊं कि मेरी अब तक फोन पर सबसे अधिक बातें कालिया जी से ही हुई हैं । फोन ही क्यों वैसे भी मैंने सर्वाधिक संवाद उनसे किया है । मैं जब बेतहाशा खुश हुआ या दुखी, साझा करने के लिए सबसे पहले कालिया जी होते । एक बार जोहानसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मलेन में कालिया जी, ममता जी, चित्रा मुद्गल, डॉ. निर्मला जैन, विभूति नारायण राय, बद्री नारायण, मो. आरिफ, मनीषा कुलश्रेष्ठ सरीखे अनेक हिंदी लेखक वहां गए थे । मुझे भी जाने का मौका मिला था । स्पष्ट था : मैं और बद्री नारायण, दोनों दोस्त ज्यादातर समय कालिया जी के साथ रहते । एक रोज मनीषा कुलश्रेष्ठ ने मुझसे कहा - "आप बुजुर्गों की सोहबत में ज्यादा रहते हैं । युवाओं के बीच रहना चाहिए आपको ।"

"देखिये ।” मैंने जवाब तैयार कर लिया था - "उम्र एक सापेक्षिक चीज है । मसलन तीस पैंतीस की युवती युवा है किन्तु वह सोलह सत्रह की लड़की के लिए उतनी युवा नहीं रह जाती । यही बात पुरुषों के सन्दर्भ में भी लागू होती है लेकिन कुछ लोग होते हैं जो अपने विचारों, समकालीनता बोध, ऊर्जा के कारण हमेशा युवा रहते है । इस नियम से एक सत्तर का इंसान युवा हो सकता है जबकि एक युवा काफी पुराना और व्यर्थ ।" कालिया जी पचहत्तर की अवस्था में हमारे आदर्श युवा थे । संभवतः यही बात थी कि उनके बाद के हर दौर की युवा पीढ़ी में उनके लिए उसी तरह दीवानगी थी जैसी कि खुद कालिया जी में युवा पीढ़ी के लिए जूनून था । वैसे क्या युवा क्या वरिष्ठ, कोई भी कालिया जी की उपस्थिति को अनदेखा नहीं कर सकता था : एक शानदार गद्यकार के साथ साथ उनका व्यक्तित्व भी अत्यंत आकर्षक था - वह करीब छः फुट लंबी सुंदर शख्सियत थे । एक बार यूनिवर्सिटी के दिनों में मैंने उनसे कहा कि वह फिल्म अभिनेता सुनील दत्त से काफी मिलते हैं । निश्चय ही अपने बारे में यह टिपण्णी पहले भी सुने होंगे किन्तु जताया यूं कि पहली मर्तबा सुन रहे हैं; वह खुश होकर ममता जी को बुलाने लगे । ममता जी के आने पर उन्होंने बच्चों की तरह उत्साहित कहा - "ममता देखो अखिलेश कह रहा है कि मैं सुनील दत्त की तरह दीखता हूं।"

वह अक्सर बच्चों सरीखे उत्साह भाव से भर जाते थे । यूनिवर्सिटी के ही दौर की बात है, मैं रानीमंडी पहुंचा था; वह किसी ट्रांजिस्टर के तमाम सारे पुर्जे खोलकर बैठे हुए थे । उन्होंने बताया - "रेडियो ख़राब हो गया था, बना रहा हूं।"

"आप इसे बनाना जानते हैं ?"

"मैं यदि लेखक न होता तो एक बहत सफल इंजीनियर बनता ।"

काफी समय बीत जाने के बाद भी वे कलपुर्जे वैसे ही पड़े रहे और अंततः रेडियो ज्यादा दुर्दशा को प्राप्त हो चुका था । लेकिन यहां यह अंदाजा लगाने की भूल नहीं करनी चाहिए कि कालिया जी साहित्येतर नए क्षेत्रों में सफलता नहीं अर्जित कर पाते थे । उन्होंने अपना प्रेस तो सफलतापूर्वक चलाया ही, कई अन्य क्षेत्रों में रुचि जगी तो उनमें वह न केवल आगे बढ़े बल्कि निष्णात हो गए । एक बार होमियोपैथी में दिलचस्पी बढ़ी तो वह इस कदर काबिल हो गए थे कि नगर का सर्वश्रेष्ठ होमियोपैथ मुश्किल पड़ने पर परामर्श हेतु कालिया जी के पास आता था । बागवानी में जब रुचि जगी, रानीमंडी वाले घर का काफी बड़ा हिस्सा बागीचे में परिवर्तित हो चला था । जब पाककला में दिलचस्पी पैदा हुई तो उन दिनों उनके घर जाना खुशनसीबी हो सकती थी क्योंकि उनके द्वारा पकाई गयी कोई बेहतरीन जायके वाली चीज खाने को मिल सकती थी । किसी वक्त उनमें ज्योतिष को लेकर उत्सुकता पैदा हई तो उसमें खासे रम गए । वह कांग्रेस की राजनीति में भी गए और वहां कई बेहद खास लोगों से उनके निजी और नजदीकी सम्बन्ध थे । मगर यह भी हकीकत है कि कुछ दिनों के बाद उनका मन उचट जाता था । होमियोपैथी ही है जिससे कालिया जी आजीवन जुड़े रहे और अपने तथा कई अन्य के स्वास्थ्य के मामले में अनेकानेक चमत्कार तक किये । बाकी शौक जिस तरह अचानक शुरू हुए उसी प्रकार अचानक ख़त्म हो गए । दरअसल उनके व्यक्तित्व के एक हिस्से में ऊब की घेरेबंदी रहती थी जो साहित्य, दोस्तों, परिवार और होमियोपैथी के अलावा अन्यत्र कहीं बहुत दिनों तक उनके मन को टिकने नहीं देती थी ।

यह सही है कि अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़कर कालिया जी उससे विमुख होते गए थे लेकिन उसका परिणाम यह था कि उनके प्रशंसकों, उन्हें प्यार और इज्जत देने वालों का विशाल तथा विविधतापूर्ण समूह बन गया था जिसमें लेखक, पत्रकार, डॉक्टर, पाठक, रंगकर्मी, राजनीतिज्ञ, व्यवसायी, ज्योतिषी, अधिकारी, वकील तरह तरह के लोग थे । इन सब से इतर संघर्षरत युवा विद्यार्थी परीक्षार्थी, श्रमिक, कबाड़ी, अनेक मामूली जन के भी वह अजीज थे । जाहिर है यह रिश्ता दोतरफा था और केवल इलाहाबाद तक सीमित न रहकर समूचे देश में फैला था । अधिकतर ऐसा ही हुआ : कोई कालिया जी मिला और उनका होकर ही रुखसत हुआ । उनका अत्यंत महत्वपूर्ण लेखक होना, आकर्षक अनोखा व्यक्तित्व, उनका वातावरण में देर तक गूंजते रहने वाला ठहाका, बढ़िया आवाज और कथन में अप्रत्याशितता, चुस्ती, यारबाशी, चुटीलेपन का सम्मिश्रण - ये सब तत्व मिलकर सामने वाले की कालिया जी से मैत्री का पक्का जोड़ लगाते थे ।

मेरे साथ भी यही हुआ, जब मैं सुपर फाइन प्रेस के ताले और गिरीश जी के सम्मिलित सौजन्य से 1977 में कालिया जी से मिला था । मैं प्रसन्नता और गर्वानुभूति से से इस कदर बावला हो गया था कि लेखक तो लेखक गैर साहित्यिकों को मिलने पर बताता - “कालिया जी से मेरी मुलाकात हो चुकी है, जानते नहीं कालिया जी बहुत बड़े लेखक हैं, देश के जाने माने साहित्यकार ।” साथ ही यह बताने से मैं कतई नहीं चूकता - "मुझको बहुत मानते हैं, अरे भाई चलते समय यह भी कहा कि मैं उनसे मिलता रहा करूं ।" जल्द ही हालत यह थी, मां, पिता, भाई, बहन, बुआ मामा मौसी, मेरे गांव के पुरोहित, कहार तक को कालिया जी के बारे में इतनी जानकारी हासिल हो चुकी थी कि रवींद्र कालिया विख्यात साहित्यकार हैं जो इलाहाबाद में रहते हैं और उन्होंने अखिलेश से मिलते रहने के लिए कहा है।

कालिया जी ने मिलते रहने के लिए कहा जरूर था और इलाहाबाद कभी कभार छुट्टियों में मौसी के यहां जाना भी हो जाता था किन्तु तब मुझको यह नहीं मालूम था कि किसी प्रिय रचनाकार से मिलने के लिए बहाने अथवा काम की अनिवार्यता नहीं रहती । मैं संकोच कर रहा था कि कहीं पूछ लिया कि किस काम से आये हो तो क्या जवाब दूंगा । वाकई मैं उनसे मिलना चाहता था किन्तु हिचक भी थी । गर्मी की छुट्टियों में इलाहाबाद जाने का कार्यक्रम बन गया मगर हिचक बदस्तूर कायम थी । उपाय निकालने की गर्ज से मैं गिरीश जी से मिला - "इलाहाबाद जा रहा हूं, कालिया जी के यहां कोई काम हो तो बता दीजिये, करता आऊंगा ।” शिद्दत से चाह रहा था, काश गिरीश जी कोई काम बता देते । उनने इंकार में सिर हिला दिया था परन्तु इलाहाबाद पहंचने पर मैंने काम निकाल लिया था । मुझे याद है, दिन का चार पांच का समय रहा होगा । मैं थोड़े पसीने थोड़ी प्यास के साथ कालिया जी के सामने अपना बहाना प्रस्तुत कर रहा था - "निष्कर्ष पत्रिका के कवर का ब्लॉक यहां होगा, मिल जाये तो गिरीश जी को दे दूंगा ।” कालिया जी ने ब्लाक तो नहीं दिया, खूब ठंडा पानी पीने को दिया और बोले - "चलो ऊपर बैठते हैं ।” ऊपर कालिया जी बड़ी देर तक बातें करते रहे ।

लगभग दो वर्षों के बाद मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया । एम.ए. में जो छात्र साहित्य में दिलचस्पी रखते थे वे मौका मिलते ही चाय समोसे की दुकान अथवा काफी हाउस की तरफ निकल जाते या किसी प्रतिष्ठित लेखक के घर की ओर साइकिल दौड़ पड़ती । मेरी साइकिल सबसे अधिक 370 रानीमंडी की दीवार पर टिकती । ममता जी का बड़ा स्नेह था । उनको मालूम हो जाए यूनिवर्सिटी से सीधे उनके यहां पहुंचा हूं तो चाय के साथ खादय पदार्थों की विविधता और मात्रा ज्यादा हो जाती थी । कहती - "सीधे आ रहे हो, भूख लगी होगी " एक दो बार रात देर हो जाने पर ममता जी ने ही कहा - "इतनी रात में कहां जाओगे, यहीं रह जाओ, सुबह जाना ।" रात ममता जी जल्दी सो जाती थीं लेकिन कालिया जी के साथ देर रात तक संवाद चलता रहता । फिर हुआ यह कि मेरा उत्साह बढ़ गया और लगभग निश्चित हो गया था, मैं प्रत्येक शनिवार की शाम को उनके घर पहंच जाता था और सोमवार की सुबह वहीं से यूनिवर्सिटी आता ।

इस घर के प्रति, कालिया जी ममता जी के प्रति, मेरे लगाव के वे कारण तो थे ही जिनका जिक्र पहले किया गया है । साथ ही यह भी था कि दोनों का मुझ पर काफी स्नेह था । यहां कथा लेखन के पेचीदे गुर भी इधर उधर की बातों के बीच सहज ढंग से आपको सिखा दिए जाते थे; नई नई किताबें यहां उपलब्ध थीं जिन्हें जल्दी से जल्दी पढ़ लेने का अवसर मेरे पास था; अपने घर से सौ किलोमीटर दूर इलाहाबाद आने के बाद भी मेरे पास घर के साथ होने का अहसास था । लेकिन शायद कुछ ज्यादा संश्लिष्ट और महीन वजहें भी थीं... ।

मैं जिस परिवेश में बड़ा हुआ था वह निम्नवर्गीय, कस्बाई । ग्रामीण और पिछड़ा था; इसलिए मैं पहली बार कालिया जी के ही यहां आधुनिकता और नागर सभ्यता से साक्षात्कार कर रहा था । बेशक ये दोनों तत्व मुझको बड़े लुभावने लग रहे थे । घूमने वाली कुर्सी ही नहीं, मैंने पहली बार फ्रिज यहां देखा; उसमें शराब की बोतलों में पानी ठंडा किया जाता था । ग्रामोफोन पहले पहल मेरी अनुभूति का हिस्सा यहीं बना जिसपर सबसे पहले पहले मैनें बेगम अख्तर की गाई कई ठुमरियां सुनी थीं और इसी तरह गुलजार की मीरा फिल्म के गाने भी एक तवे पर सुना था । टेलिफोन का जिक्र ऊपर किया गया है; स्कूटर पर भी पहली मर्तबा बैठने का मौका कालिया जी के मार्फत मिला । याद दिलाना होगा यह उस वक्त की बात है जब इलाहाबाद के प्रगतिशील और समकालीन लेखकों में शायद कालिया जी और दूधनाथ जी के पास स्कूटर था, दूधनाथ जी स्कूटर चलाते कम किक मारते अधिक देखे जाते थे । शेष रचनाकार पैदल, रिक्शा अथवा साइकिल से गंतव्य की तरफ बढ़ते थे । आधुनिकता और भी प्रसंगों में थी; मेरे सुल्तानपुर के परिवेश में सुबह नौ बजे तक बन चुके भोजन को खाकर पुरुष काम पर निकल जाते थे; शाम को जब वे लौटते तो पत्नियां उनका इन्तजार करती हुई मिलतीं । यहां दस बजे तक नाश्ता होता था । ममता जी काम पर निकल जाती थीं; वापसी पर कालिया जी इंतजार करते । हमारी ओर पुरुष आक्रामक रहते और स्त्रियां सहमी हुई; यहां दोनों बराबर थे और अगर कभी कभार कुछ हो ही जाता तो ममता जी बराबर की टक्कर देती । यहां कालिया जी के रूप में एक ऐसा अनोखा पुरुष था जो अपनी खिल्ली उड़ाते हुए बताता - "ममता की लोकप्रियता अपरम्पार है, मैं कहीं नहीं ठहरता, मुझको तो बहुत से लोग ममता कालिया के पति के रूप में जानते हैं ।"

आधुनिकता के अतिरिक्त एक भिन्न संस्कृति का भी लुत्फ़ था यहां । मैं अवध का था जबकि कालिया जी के यहां कालिया जी की वजह से पंजाबियत का असर था; विशेष रूप से खानपान में । हमारे अवध में अरहर की दाल के बगैर अधिक दिनों तक रहा नहीं जा सकता था जबकि कालिया जी यहां दाल के दर्शन कम ही होते थे; हुए भी तो अरहर की दाल का तो सवाल ही नहीं । मूंग की दाल भले पक जाती थी । चावल संभवतः महीने पंद्रह दिन में एक बार बनता था । अवध में पराठा केवल सादा बनता था; भरवा बनना हो तो पड़ियां थीं; तरह तरह की : दाल की, आलू की, मटर की पूड़ियां, कचौड़ी । कालिया जी के यहां पराठे ही पराठे थे । आलू मूली गोभी पनीर के पराठे - नया जायका था; जैसे सरसों का साग और मक्के की रोटी नया जायका था । सुबह नाश्ते पर लस्सी चौकाने वाली बात थी क्योंकि हमारी तरफ शाम को लस्सी पी जाती थी वह भी ज्यादातर दुकानों पर । और गर्म गर्म चाय को बनाने, पेश करने का सलीका बिलकुल निराला था । हमारी तरफ थोड़े से पानी में खूब सारी पत्ती, ढेर सारा दूध तथा उसी अनुपात में चीनी अदरख डालकर देर तक खौलाया जाता था परन्तु यहां ? यहां पानी के खौलने पर पत्ती डालकर तुरंत आंच बंद कर दो । बाद में केतली से चाय कप या ग्लास में ढाली जाती थी फिर ममता जी अलग से जरा सी चीनी और जरा सा दूध मिलाकर प्रस्तुत करतीं । वाह क्या चाय ।

विशेष बात यह थी कि खानपान, रहन सहन जैसी जीवनशैलीगत चीजों के अलावा रवींद्र कालिया के यहां आधुनिकता विचारों में गहरे अनुस्यूत थी । आप उनके लेखन का भी कोई भी सिरा पकड़िये वह आधुनिकता के पक्ष में झुका मिलेगा । नौ साल छोटी पत्नी, डरी हुई औरत, चाल जैसी अनेक कहानियां बगैर आधुनिक जीवनदृष्टि के नहीं लिखी जा सकती थीं । बाद में उन्होंने जब खुदा सही सलामत है उपन्यास के जरिये अपनी किस्सागोई का कायांतरण और विकास किया तब भी वह आधुनिकता के मामले में विषयांतर नहीं विस्तार ही था । जीवन में भी वह सीमित समय के लिए ज्योतिष सम्बन्धी रुझानों के बावजूद बुनियादी रूप में नास्तिक और तर्कवादी थे । कठिन से कठिन मोड़ों पर वह ईश्वर, मंदिर आदि के दरवाजे कभी नहीं गए । स्त्रियों के सन्दर्भ में, बच्चों दोस्तों बड़ों छोटों से संबंधों के सन्दर्भ में उनका रवैया सदैव बराबरी का, लोकतांत्रिक और आधुनिक था ।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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