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हिंदी, प्रेम उपन्यास — बेदावा: एक प्रेम कथा — तरुण भटनागर


हिंदी, प्रेम उपन्यास — बेदावा: एक प्रेम कथा — तरुण भटनागर 

उपन्यास अंश

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‘ अच्छा छोड़ो...कुछ और बताओ...कहाँ रहे इतने दिनों... क्या किया...?’
तरुण भटनागर

‘ नहीं बता सकता...।’

‘ क्यों...?’

‘ आज तुम्हें सुनना है...।’

अंधेरे में उसकी मुस्कान अजनबी की मुस्कान लग रही थी। जब वह मुस्कुराता तो ख़ामोशी और गहरी हो जाती। उसकी मुस्कान के जवाब में वह भी मुस्कुराई। पर अपनी मुस्कान को उसने बीच में ही जप्त कर लिया।

‘ लौट आओ अदीब...हमेशा के लिए लौट आओ...।’
पार्क की बैंच से लटककर हिलते-डुलते अदीब के पैर रुक गये...क्या कहे वह, क्या कह सकता है, क्या नहीं... क्या कह दे कि अपने ही शहर में रहते हुए अपने ही घर लौटना नामुमकिन होता है... घर के इतना पास होकर अम्मी-अब्बू को एक पल के लिए देख पाना बिल्कुल ही नामुमकिन...क्या कह दे कि, ...क्या...कि वह एक ऐसी दुनिया में है, जहाँ से लौटने का कोई कायदा नहीं, जहाँ से मौत के अलावा और किसी तरह से लौटा नहीं जा सकता है...लौटना एक झूठ है, एक फ़रेब...एक दिल्लगी है जिसे लौटना कहते हैं...एक ख़याल जिस पर हँसी आती है...।

‘ जब इस शहर में था, तब तो लौटने का एक बार सोच भी सकता था...पर अब नहीं...बिल्कुल नहीं...।’

‘ दुनिया इतनी खराब भी नहीं अदीब...।’

वह विस्फ़रित आँखों से मुस्कुराया। उसे मोबाइल, राष्ट्रीय समाचार चैनलों और सोशल मीडिया में उस पर पिल पडे अरबों लोगों में से कुछ याद आये...उनकी गालियाँ, उनकी नफ़रतें और उनकी ज़हालत। वह मुस्कुराता रहा। उसकी मुस्कान में दबी हँसी फूट पड़ी। उसकी हँसी अट्टाहस में बदल गई। अपर्णा उसे ताकती रह गई। उसके मन में अपर्णा के लफ़्ज़ थे, अटकते, गूँजते... दुनिया इतनी खराब भी नहीं अदीब...और वह पेट पकड़कर हँस रहा था। फिर बेतहाशा हँसी से निढाल होकर बैंच पर पेट पकडे-पकडे लेट गया। उसको हँसता देख अपर्णा को अच्छा लगा। अबकी बार उसकी हँसी, सच्ची हँसी थी, कॉलेज के दिनों वाली हँसी...।

‘ तुम्हारे अब्बू अब इस दुनिया में नहीं है...अदीब...।’

अपर्णा कहना नहीं चाहती थी, पर वक़्त बीत रहा था। किसी को उसके पिता के मर जाने की खबर भला कोई इस तरह देता है। अचानक। पर क्या किया जाये। आधा घण्टा कितना तो कम वक़्त होता है। कितना कम। अदीब चुपचाप पार्क की कुर्सी पर लेटा रहा। आसमान को घूरता। बेख़याल। फिर वही चुप्पी। वही कातिलाना ख़ामोशी।

‘ देवाषीश तुम्हारा केस लड़ रहा है। वह कहता है आख़री मुकाम तक लडेगा...।’

...चुप्पी...सिर्फ साँसों की आवाज...सिर्फ एक चिडिया की कातर सी आवाज किसी ताड़ के पेड़ से रह-रहकर...चुप,चुप,चुप...

‘ मैं कभी-कभी तुम्हारे घर जाती हूँ...अम्मी ने तुम्हारा कमरा अब भी वैसा ही रख छोड़ा है...आजकल रिद्धी भी शहर में ही है...कभी हम दोनों भी जाते हैं...।’

...अपने ख़ून से सने नाख़ूनों को निहारती ख़ामोशी...दुनिया की बातें...दुनिया की बातें... जो पटककर, जूतों से कुचलकर, तोड़ती, बिखेरती, बेश़्ाक्ल करती जाती है लफ़्ज़ों को...एक ख़ामोशी है, दुनिया की बातों में, जिसके दाँतों में फंसा है...इंसान का माँस और ख़ून...

‘ अब कोई राजा दिव्यनाथ कॉलेज वाले उस वाकये के बारे में बातें नहीं करता है। सिर्फ हम तीन ही करते हैं। कॉलेज में आये नये लोगों को उस वाकये का कुछ भी पता नहीं ।’

...चुप...चुप...चुप...कितना बदमिज़ाज खयाल है कि काला आसमान है तो तारे टिमटिमायेंगे, कैसा फ़रेब कि पास से कहीं से आती मोटर गाडियों और शहर की आवाजों से कुछ शोर होगा...

‘...भले तुम जिंदा हो पर कानूनन उस दिन मरे हुए माने जाओगे जब तुम्हें गायब हुए पूरे सात साल बीत जायेंगे...।’

...आसमान को घूरती उसकी आँखें बेआवाज़ थीं, उसके भीतर बहुत धीरे-धीरे कुछ धड़क रहा था, मुकम्मल तौर पर तन्हा और बेइंतहा ख़ामोश़...अपर्णा की बातें उसके अकेलेपन को और गाढा कर रही थीं, लफ्ज़ों की चमची से...

‘...जब तुम लौट आओगे...’

...कोई कलेजे को काटती हास्यास्पद शांति...

‘...जब सबकुछ बेहतर हो जायेगा...जब फिर से शुरुआत होगी...जब...।’

‘ सुनो मुझे अब चलना चाहिए...।’

Bedava : Ek Prem Katha
Tarun Bhatnagar
Pages: 160p
Year: 2020, 1st Ed.
Binding: Paperback
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
ISBN 13: 9789389598117

वह झटके से उठ खड़ा हुआ।

जब वह जाने लगा अपर्णा उससे लिपट गई। थोड़ी देर बाद अपर्णा का चेहरा उसके चेहरे पर था। अपर्णा को लगा जैसे वे दोनों उस दिन की तरह ही कॉलेज के पार्क में खडे हैं। उस दिन जिस दिन अदीब ने उसके मुँह पर अपनी हथेली रख दी थी, फिर वह गुस्से और दुःख से तमतमा गई थी। उस दिन एक अधूरा प्यार छूट गया था। उसे लगा मानो अभी दिन हो। वे दोनों उसी पार्क में खडे हों। एक दूसरे की बाहों में। उसके होंठों पर दबा उसका हाथ ढीला पड़कर हट गया हो। बिल्कुल अभी-अभी हटी हो उसकी हथेली उन दोनों के होंठों के बीच से...ठीक अभी ही, अभी बिल्कुल अभी...कि कुछ और ख़याल नहीं... घिरते हैं काले बादल और चिपकते जाते हैं ज़मीं और आसमान एक दूसरे पर सरकते... फिसलती है एक द्रव की परत दूसरे द्रव पर साँसों के दरमियाँ... चिकने कागज़ पर फिरती है साफ सफेद पतली गोंद की परत... चिकनी काही पर फिसलती खुद में मगन बारिश की बूँदें... सूखती जबान पर गर्म हवाओं में पानी का कोई अजनबी सा जायका...

जिस रास्ते से वह गया था, अपर्णा उसी तरफ देखती रही थी...।

उसकी गुजरती छाया को, उसकी पीठ को उसने हाथ उठाकर बाय किया। फ़िर दोबारा किया। फिर झिझक कर अपना हाथ नीचे कर लिया।

लौटते हुए अदीब की आँखों में आँसू थे। उसे लगा पल भर को पलटकर देख ले एक बार...पर वह सीधा अंधेरों में उतरता गया...।







1 comment:

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