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क्या अंग्रेज़ भारतीयों की हत्या कर सकते थे? — डॉ शशि थरूर | अन्धकार काल (पार्ट 4)


Could Englishmen murder Indians?

Dr Shashi Tharoor — An Era of Darkness — Book Excerpts

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क्या अंग्रेज़ भारतीयों की हत्या कर सकते थे? 

डॉ शशि थरूर —  अन्धकार काल : भारत में ब्रिटिश साम्राज्य —  पुस्तक अंश


(डॉ शशि थरूर की अवश्य पढ़ी जाने वाली किताब 'An Era of Darkness/अन्धकार काल' के अंश, एक ज़रूरी अध्याय 'प्रजातन्त्र, प्रेस, संसदीय प्रणाली एवं विधि सम्मत नियम' / Democracy, The Press, The Parliamentary System' की श्रृंखला English और हिंदी में, आप शब्दांकन पाठकों के लिए.

डॉ शशि थरूर जी का 'रूपा पब्लिकेशन' द्वारा अंग्रेज़ी अंश तथा 'वाणी प्रकाशन' द्वारा अनुवादित हिंदी अंश उपलब्ध कराने का आभार, धन्यवाद...भरत एस तिवारी/शब्दांकन संपादक.)

विधि सम्मत नियम: बूट और तिल्ली

इस तर्क के पीछे कि ब्रिटेन ने भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की और प्रजातन्त्र दिया, यह धारणा है कि उसने देश में ‘क़ानून के राज’ की स्थापना की। यह अनेक प्रकार से ब्रिटेन की साम्राज्य के उद्देश्य की आत्मधारणा का केन्द्र था। हमने पहले उन पहलुओं को देखा है जिन्हें बरतानवी भारत में अपने ‘मिशन’ के रूप में देखते थे। इस देश के निवासियों तक बरतानवी क़ानून पहुँचाना इस मिशन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटक तत्त्वों में से एक था। किपलिंग क़ानून से विहीन लोगों को क़ानून देने के शुभ कार्य पर भावपूर्वक बोलते थे। बरतानवी शासकों ने क़ानून को लागू किया एवं ऐसा करके स्वयं अपनी दृष्टि में और विश्व की नज़रों में वैधता प्राप्त की। निःसन्देह क़ानून के माध्यम से ही ब्रिटिश अधिकारों का प्रयोग किया गया परन्तु जहाँ बरतानवी क़ानूनी व्यवस्था से पहले ही क़ानूनों की व्यवस्था मौजूद थी, जैसाकि भारत में था, वहाँ स्वयं अपनी क़ानूनी संस्कृति वाली एक प्राचीन एवं अधिक जटिल सभ्यता पर ब्रिटिश क़ानून थोपा जाना पड़ा और यहाँ किपलिंग जैसे लोग किनारों से उधड़ने लगते हैं। भारत में बरतानवी अपनी बात मनवाने के लिए बल-प्रयोग एवं क्रूरता के प्रयोग के लिए विवश थे, क्योंकि प्रायः उन्हें पुरानी प्रथाओं एवं पारम्परिक व्यवस्था को समाप्त करना पड़ता और इस प्रक्रिया में सिविल समाज को पुनः स्वरूप प्रदान करना पड़ता। एक ब्रिटिश विद्वान ने टिप्पणी की है कि इन परिस्थितियों में ‘जो क़ानून बनाया गया, वह ऐसा नहीं कहा जा सकता कि औपनिवेशिक प्रजा के हितों की रक्षा करता था।’

भारत में बरतानवी साम्राज्यवाद की बपौती में साम्राज्य द्वारा भारत को दी गयी दण्ड संहिता को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है, जिसका प्रारूप मैकॉले द्वारा ‘विजित प्रजाति के लिए विधि-निर्माण के स्पष्ट उद्देश्य से तैयार किया गया था। एक ऐसी प्रजाति के लिए, जिस पर हमारे संविधान के प्रावधान सुरक्षित रूप से लागू नहीं किये जा सकते। मैकॉले तीन वर्ष तक उन लोगों से, जिनके लिए वे तथाकथित रूप से काम कर रहे थे, पूरी तरह से कटकर ऊँची दीवारों के पीछे बैठे और एक ऐसी आपराधिक विधि संहिता की रचना की जो ऐसा न्यायशास्त्रीय निकाय थी कि प्रत्येक के लिए होकर भी किसी के लिए नहीं थी और जिसका पहले के भारतीय क़ानूनों अथवा शासन के किसी भी स्वरूप से कोई सम्बन्ध नहीं था।’ बरतानवी भी उसके प्रयास के सम्बन्ध में आश्वस्त नहीं थे और मैकॉले की दण्ड संहिता 1837 में उनके द्वारा पूरी कर ली जाने के बाद चौबीस वर्ष तक अकार्यान्वित ही रही। अन्ततः 1861 में लागू होकर यह अपनी सम्पूर्ण विक्टोरियन गरिमा के साथ अधिकांशतः लागू ही है। इसके अतिरिक्त बरतानवियों ने न्यायपीठ द्वारा मुक़दमे, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं क़ानून की उचित प्रक्रिया के सम्बन्ध में अपने विचारों को लागू किया। येे उनकी वास्तविक कार्य-पद्धति को छोड़कर निर्विवाद क़ानूनी मूल्य हैं क्योंकि औपनिवेशिक युग में इनके व्यवहार में अथवा इन्हें प्रयुक्त करते हुए विधि सम्मत नियम पूर्णतः निष्पक्ष नहीं थे।


ब्रिटिश भारत में न्याय को अन्धा नहीं कहा जा सकता; यह प्रतिवादी की त्वचा के रंग के प्रति अत्यधिक सचेत था। भारतीयों के विरुद्ध श्वेतों द्वारा किये गये अपराधों में न्यूनतम दण्ड होता था; अपने भारतीय नौकर की गोली मारकर हत्या कर देने वाले एक अंग्रेज़ को छह माह की जेल और लगभग एक सौ रुपये का नाममात्र का जुर्माना लगाया गया जबकि एक अंग्रेज़ महिला के साथ बलात्कार का प्रयास करने वाले एक भारतीय को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा दी गयी। ब्रिटिश शासन के प्रथम 150 वर्षों में केवल मुट्ठी भर अंग्रेज़ों को भारत में हत्या का दोषी पाया गया। ब्रिटिश व्यक्ति द्वारा एक भारतीय की हत्या सदैव एक दुर्घटना होती थी और एक भारतीय द्वारा होने के कारण एक अंग्रेज़ की हत्या सदा मृत्युदण्ड का एक अपराध होती थी। न्यायमूर्ति सैयद महमूद के मामले में जैसाकि हमने देखा है, भारतीय जज भी नस्लवादी भेदभाव के शिकार थे। उन्नीसवीं सदी में भारत में भेजे गये एकमात्र सुहृदय एवं ग़ैर-प्रजातिवादी वाइसराय लॉर्ड रिपन ने जब भारतीय न्यायाधीशों को बरतानवी प्रतिवादियों के मुक़दमे सुनने एवं नगरपालिका मुद्दों में सुदृढ़ भूमिका (इल्बर्ट विधेयक के माध्यम से) निभाने की अनुमति देने का प्रयास किया तो इसका कड़ा विरोध हुआ। उसके सहायकों ने विरोध किया कि ‘एक बंगाली बाबू को उसके अपने स्कूलों एवं नालों की चर्चा किये जाने की अनुमति देने से ब्रिटिश शासन समाप्त नहीं हो सकता, परन्तु जहाँ तक बरतानवियों का सम्बन्ध है न तो अदालतें और न ही नगरपालिकाएँ भारतीयों की भागीदारी के लिए स्वीकृत क्षेत्र हैं। ब्रिटिश प्रवासियों द्वारा रिपन का विरोध किया गया और प्रजातिवादी शोर के परिणामस्वरूप इल्बर्ट विधेयक रद्द हो गया और रिपन को समय-पूर्व पद से हटा दिया गया।

ब्रिटिश औपनिवेशिक अदालतों में एक विशेष प्रकार का मामला आमतौर पर आता था। अनेक भारतीय मलेरिया अथवा अन्य रोगों के कारण बढ़ी तिल्ली के बड़ा हो जाने की शिकायत से ग्रस्त थे। जब भी एक ब्रिटिश मालिक एक भारतीय नौकर को पेट में लात मारता—जो कि उन दिनों एक सामान्य व्यवहार था—भारतीय नौकर की बढ़ी हुई तिल्ली फट जाती और उसकी मृत्यु हो जाती। यह न्यायशास्त्रीय प्रश्न था कि लात मारने से हुई मृत्यु हत्या का मामला था अथवा आपराधिक व्यवहार का? इन्हीं परिस्थितियों में जब रॉबर्ट आॅगस्तस फुलर ने अपने नौकर को 1875 में घातक रूप से पीटा तो फुलर ने दावा किया कि उसने तो चेहरे पर मारा था, परन्तु तीन प्रत्यक्षदर्शियों ने गवाही दी कि फुलर ने पेट में लात मारी थी। उसे केवल ‘जानबूझकर ज़ख़्मी’ करने का दोषी पाया गया और उसे पन्द्रह दिन की कै़द अथवा नौकर की विधवा को तीस रुपये का भुगतान करने के जुर्माने का दण्ड दिया गया (कोरोनर के अनुसार नौकर की तिल्ली इतनी बड़ी हो चुकी थी कि हल्की-सी मार से भी यह फट गयी होती)।

कैप्टेन स्टेनले डी वेर जूलियस ने 1903 में अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑन स्ट्राइकिंग नेटिव्स’ में लिखा, ‘गर्मियों की एक मध्यरात्रि में पंखा रुक जाता है और बैठक के एक कमरे में गर्मी और अनिद्रा से क्रोधित एक व्यक्ति दौड़ता हुआ जाता है एवं बिना परिणाम की चिन्ता किये पंखाकुली को ग़लत स्थान, उसकी तिल्ली पर लात मारता है। क्या आप उसे दोष देंगे? हाँ या नहीं। यह कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि क्या वह अपने जूते पहनने के लिए रुका था।’ पंच ने भारतीयों को ठीक रखने के एक प्रिय औज़ार ‘द स्टाउट ब्रिटिश बूट’ पर एक पूरी कविता लिखी थी। इसकी समापन पंक्ति थी: ‘लेट अस सिंग, लेट अस शाउट फॉर द लैदर—शोड फुट, एण्ड इन्स्क्राइब ऑन आवर बैनर्स ‘द स्टाउट ब्रिटिश बूट।’

भारत में ब्रिटिश जजों की किसी अंग्रेज़ को हत्या का दोषी ठहराए जाने की अनिच्छा विक्टोरियाई लन्दन में हत्या के मामलों में दर्ज हुई गिरावट में प्रतिबिम्बित होती है। मार्टिन वेनर ने ‘नियति’ का एक नमूना प्रस्तुत किया: ब्रिटेन में हत्या की दर कम हो गयी है क्योंकि ‘सर्वाधिक आक्रामक नागरिक विदेश में तबाही करने में व्यस्त हैं।’ इससे स्पष्ट हो गया कि लात की घातक मार को लन्दन में निःसन्देह ‘जानबूझकर की गयी हत्या’ समझा जाता था जबकि भारत में इसे—यदि पीड़ित भारतीय हो—‘चोट पहुँचाने’ अथवा ‘उतावलेपन और लापरवाही से किये गये काम’ का आरोप माना जायेगा।

यह सत्य है कि बीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में भारतीय राष्ट्रवादियों से आतंकवाद का ख़तरा था और सम्भव है कि इसने भारतीयों पर श्वेतों द्वारा की गयी हिंसा के मामलों में जजों के निर्णय को प्रभावित किया हो। परन्तु यूरोपीय लोगों द्वारा की गयी भारतीयों की हत्या के मामले में स्वदेशी बम फेंकने वालों के स्थान पर नौकर अथवा अन्य छोटा-मोटा काम करने वाले लोग होते थे और इन मामलों का राजनीतिक आतंकवाद से कोई सम्बन्ध नहीं था। परन्तु फिर भी एक अंग्रेज़ द्वारा की गयी हत्या की गम्भीरता को कम करने के लिए परिस्थितियों को सदा विस्तार दिया जा सकता था। बंगलौर में लेफ्टिनेंट थॉम्पसन और नीव ने एक भारतीय लड़के की जब गोली मारकर हत्या कर दी और भारतीय गाँववासियों ने नीव की बन्दूक़ को जबरन ज़ब्त कर लिया तो इस मामले में दो ग्रामीणों को एक श्वेत की बन्दूक़ को ज़ब्त करने के अपराध में छह माह के कारावास का दण्ड दिया गया जबकि हत्यारों को कोई दण्ड नहीं मिला। निःसन्देह ‘यूरोपीय लोगों के विरुद्ध भारतीयों’ की घटना के रूप में यह मामला दर्ज हुआ।

बरतानवी जजों द्वारा दिये जाने वाले दण्ड कभी भी भारतीयों और यूरोपीय लोगों के मामलों में समान नहीं होते थे। कलकत्ता में एक आकलन के अनुसार, एक समान अपराध के लिए भारतीय कै़दियों की सज़ा यूरोपीय लोगों की तुलना में दस गुना अधिक होती थी। हिंसक अपराधों के लिए हत्या अथवा हत्या के प्रयास के आरोप का सामना करने वाले भारतीय प्रतिवादी यूरोपीय प्रतिवादियों की तुलना में दोगुने से अधिक होते थे। आँकड़ों के अनुसार भारतीयों द्वारा यूरोपीय लोगों पर आक्रमण की अपेक्षा यूरोपीय लोगों द्वारा भारतीयों पर आक्रमण अधिक होते थे परन्तु फिर भी सभी भारतीयों पर हत्या का आरोप लगाया जाता और यूरोपीय लोगों के अधिकतर कुकृत्यों को दुर्घटना अथवा आत्मरक्षा में किया गया हमला करार देकर किसी भी प्रकार से हत्या से कम करके मात्र आक्रमण बना दिया जाता। एक मामले में जहाँ ब्रिटिश जज को अपराध के ‘स्पष्ट’ हत्या होने का सबूत मिल गया, वहाँ ब्रिटिश हत्यारे को विक्षिप्त पाया गया और इसलिए वह इस अपराध के लिए उत्तरदायी नहीं था।

इस प्रकार के न्याय पर सभी बरतानवी खुश नहीं थे। 1902 में नौवीं लान्सर्स के तीन अश्वारोहियों ने एक भारतीय को सियालकोट में पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि उसने रात में उन्हें एक औरत मुहैया करवाने से इनकार कर दिया था। रेजीमेंट के अधिकारियों ने मामले की जाँच-पड़ताल का कोई प्रयास नहीं किया और मृत व्यक्ति को एक शराबी बनाकर मामले को दबाने की कोशिश की परन्तु इस दुर्घटना से भारत में बड़ी संख्या में रहने वाले बरतानवियों को धक्का लगा और अपमानित महसूस हुआ। वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न, जो भारतीयों को कतई पसन्द नहीं करते थे, भी इससे बहुत सन्त्रस्त थे और उन्होंने घोषणा की: ‘मैं ग़लत मामलों को अपमानजनक ढंग से दबाने में, जो इस देश में बहुत अधिक हैं अथवा इस सोच में कि एक श्वेत एक काले व्यक्ति को बिना कोई दण्ड पाये लात मार सकता है अथवा पीट-पीटकर हत्या कर सकता है, क्योंकि वह केवल एक हब्शी है—भागीदार नहीं बनूँगा।’ कर्ज़न दण्ड को तो नहीं बढ़ा सके परन्तु उन्होंने पूरी रेजीमेंट को एडन में स्थानान्तरित कर दिया। फिर भी कुछ सप्ताह बाद दिल्ली में एक परेड में मार्च पास्ट करती इस रेजीमेंट को लोग ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाकर प्रोत्साहित करते मूक दर्शक बन देखने के लिए विवश थे। यदि कर्ज़न तक ने द्रवित होकर भारतीयों के प्रति यह सहानुभूतिपूर्वक वक्तव्य दिया तो समस्या के स्तर की सहज ही कल्पना की जा सकती है।

एक विद्वान जोर्डन्ना बेल्किन ने उल्लेख किया है कि प्रजाति आधारित न्याय की इस प्रथा के कुछ (यद्यपि गिने-चुने) अपवाद भी थे। तीन दुर्लभ मामलों में बरतानवियों को भारतीयों की हत्या के अपराध में सज़ा हुई—
बंगाल में जॉन रड्ड (1861), बम्बई में चार नाविक विल्सन, एपोसल, निकोलस और पीटर्स (1867 में) और बंगाल में जॉर्ज नेन्र्स (1880)। परन्तु दो सौ वर्ष के ब्रिटिश शासनकाल में हज़ारों मामलों में, जिनमें भारतीयों की अपने औपनिवेशिक मालिकों के हाथों हत्या हुई, केवल ये तीन मामले अपवाद हैं। सामान्यतः बरतानवी सिविल जज एवं ग्रामीण क्षेत्रों के मजिस्टेªट यूरोपीय लोगों को दण्ड देने में संकोच करते थे जबकि सैनिक अदालतें एवं शहरी क्षेत्रों के उच्च न्यायालय भारतीयों पर हुए हमलों के लिए अपेक्षाकृत अधिक गम्भीर दण्ड देने के इच्छुक होते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तीस वर्ष तक सेवा में रहे एक आईसीएस अधिकारी के अनुसार ‘लोगों व अदालतों में एक बड़ी एवं भयंकर खाई है और इस खाई को पाटने का कोई उपाय नहीं।’

नरमपन्थी राष्ट्रवादी ‘प्रभात’ पत्रिका ने अपने दिसम्बर, 1925 के अंक में एक अंग्रेज़ द्वारा एक भारतीय की लात मारकर हत्या करने के मामले में अंग्रेज़ को दोषमुक्त सिद्ध कर उसकी रिहाई के बाद दुख प्रकट करते हुए लिखा था—

भारतीय ब्रिटिश शासन से क्यों असन्तुष्ट हैं, इसका उत्तर ऐसी घटनाओं में देखा जा सकता है। भारतीय जीवन का ऐसा असम्मान प्रत्येक भारतीय के हृदय पर एक गहरी छाप छोड़ने के अलावा कुछ नहीं कर सकता और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि महात्मा गाँधी के अहिंसा के सम्बन्ध में बलपूर्वक आग्रह के बावजूद गुमराह भारत में क्रान्तिकारी षड्यन्त्र सुनाई पड़ते हैं। बूट और तिल्ली के बीच जब तक यह सम्बन्ध बना रहेगा, भारत विश्व का सर्वाधिक अस्पृश्य एवं निम्न कोटि का देश बना रहेगा।
क़ानून की साम्राज्यवादी प्रणाली की रचना एक विदेशी प्रजाति द्वारा की गयी और इसे उन विजित लोगों पर थोपा गया जिनसे इसकी रचना में कोई परामर्श नहीं लिया गया। यह सीधे-सीधे एवं विशुद्ध रूप से साम्राज्यवादी नियन्त्रण का उपकरण था। हेनरी नेविनसन ने भी टिप्पणी की है कि विधि सम्मत नियम, जैसाकि यह था, एक ऐसी व्यवस्था में लागू था जिसमें भारतीय ‘स्थायी रूप से सरकारी निगरानी में रहने के लिए विवश थे, जिसमें उनके निजी पत्र पढ़े जाते थे, उनके तार रोके जाते थे और उन पर निगरानी रखने के लिए आदमियों को नौकरी पर रखा जाता था।’

तो यह विधि सम्मत नियम था जो बरतानवियों ने हमें पढ़ाया। हमें बहुत कुछ अनसीखा करना होगा, भुलाना होगा।

समस्याएँ और भी थीं। औपनिवेशिक ‘विधि सम्मत नियम’ प्रायः भारत में रह रहे श्वेतों, प्रबुद्ध वर्ग एवं पुरुषों के हित में काम करता था। प्रजातीय भेदभाव वैध था। जैसा कि हमने देखा है, केवल श्वेतों को प्रवेश देने वाले निजी क्लबों के अलावा अनेक ब्रिटिश होटलों व संस्थानों के बाहर एक बोर्ड लगा रहता, जिस पर लिखा होता—‘भारतीयों एवं कुत्तों का प्रवेश निषिद्ध’ (ऐसे ही एक होटल—बम्बई में वॉटसन होटल—से निकाले जाने के अनुभव ने जमशेद जी टाटा को अपने समय के विश्व के बेहतरीन एवं भव्य होटलों में से एक ताजमहल होटल के निर्माण के लिए प्रेरित किया जिसके द्वार सभी भारतीयों के लिए खुले थे)।


(अगली कड़ी में: नारी द्वेषात्मक क़ानून)
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Dr Shashi Tharoor — An Era of Darkness — Book Excerpts

Could Englishmen murder Indians?


‘RULE OF LAW’: THE BOOT AND THE SPLEEN
A corollary of the argument that Britain gave India political unity and democracy is that it established the ‘rule of law’ in the country. This was, in many ways, central to the British self-conception of imperial purpose. We have noted earlier other aspects of what the British saw as their ‘mission’ in India. Bringing British law to the natives was arguably one of the most important constituent elements of this mission; Kipling would wax eloquent on the noble duty to bring law to those without it. The British both laid down the law and derived legitimacy, in their own eyes and in those of the world, from doing so. It was, of course, through ‘the law’ that British authority was exercised; but where a system of laws pre-existed the British legal system, as was the case in India, British law had to be imposed upon an older and more complex civilization with its own legal culture, and here the Kiplingesque arguments began to fray at the edges. In India the British were forced to use coercion and cruelty to get their way; often they had to resort to the dissolution of prior practices and traditional systems, as well as, in the process, to reshape civil society. In the circumstances, as a British scholar has noted, ‘the law that was erected can hardly be said to have served the interests of colonial subjects.’

Pride of place to the legacy of British imperialism in India is often given to the Empire giving India its penal code, drafted by Macaulay with the avowed purpose of ‘legislating for a conquered race, to whom the blessings of our constitution cannot as yet be safely extended’. Macaulay sat for three years behind high walls, completely disconnected from the people he was ostensibly working for, and created a code of criminal law that was ‘a body of jurisprudence written for everyone and no one, which had no relationship to previous Indians laws or any other form of government at all’. Even the British were uncertain about his effort, and Macaulay’s penal code sat un-enacted for twenty-four years after he finished it in 1837. Finally enacted in 1861, it is still largely in force in all its Victorian glory. In addition, the British introduced their ideas of trial by jury, freedom of expression and due process of law. These are incontestable legal values, except in their actual manner of working, for in its application during the colonial era, the rule of law was not exactly impartial.

Justice, in British India, was far from blind: it was highly attentive to the skin colour of the defendant. Crimes committed by whites against Indians attracted minimal punishment; an Englishmen who shot dead his Indian servant got six months’ jail time and a modest fine (then about 100 rupees), while an Indian convicted of attempted rape against an Englishwoman was sentenced to twenty years rigorous imprisonment. Only a handful of Englishman were convicted of murder in India in the first 150 years of British rule. The death of an Indian at British hands was always an accident, and that of a Briton because of an Indian’s actions always a capital crime. Indian judges also suffered racial discrimination, as we have seen with the case of Justice Syed Mahmud. When Lord Ripon—the only humane, non-racist viceroy sent to India in the nineteenth century—attempted to allow Indian judges to try British defendants and to play a stronger role in municipal matters (through the ‘Ilbert Bill’), the backlash was severe. His aides protested that it would hardly ‘subvert the British Empire to allow the Bengali Baboo to discuss his own schools and drains’, but neither courts nor municipalities were acceptable terrain for Indian participation as far as the British were concerned. Ripon was boycotted by British expatriates and the racist outcry resulted in the collapse of the Ilbert Bill and Ripon’s premature removal from office.

A certain type of case popped up frequently in the British colonial courts. Many Indians suffered from enlarged spleens as a result of malaria (or other diseases); when a British master kicked a native servant in the stomach—a not uncommon form of conduct in those days—the Indian’s enlarged spleen would rupture, causing his death. The jurisprudential question was: did the fatal kick amount to murder or criminal misconduct? When Robert Augustus Fuller fatally assaulted his servant in these circumstances in 1875—Fuller claimed he struck him on the face, but three witnesses testified that he had kicked him in the stomach—he was found guilty only of ‘voluntarily causing hurt’, and was sentenced to fifteen days’ imprisonment or a fine of thirty rupees to be paid to the widow. (According to the coroner, the servant’s spleen was so enlarged that even ‘moderate’ violence would have ruptured it.)

‘In the middle of the hot night,’ wrote Captain Stanley de Vere Julius in his 1903 Notes on Striking Natives, ‘the fan stops, and a man in the barrack-room, roused to desperation by heat and sleeplessness, rushes forth, careless of the consequences, and kicks the fan-puller in the wrong spot, his spleen. Do you blame him? Yes and No. It depends partly on whether he stopped to put his boots on.’ Punch wrote an entire ode to ‘The Stout British Boot’ as the favoured instrument of keeping the natives in order.

It ended: ‘Let us sing, let us shout for the leather-shod foot,/ And inscribe on our Banners, “The Stout British Boot”.’

The disinclination of British judges in India to find any Englishman guilty of murdering any Indian was curiously mirrored in a recorded decline in murder charges in Victorian London. Martin Wiener proposed an ‘export’ model: the murder rate had dropped in Britain, he suggested, because ‘the most aggressive citizens were busily wreaking havoc overseas’. It helped, of course, that fatal kicking in London was handled as ‘wilful murder,’ whereas in India it would only be charged as ‘causing hurt’ or ‘committing a rash and negligent act’—provided the victim was an Indian.

There was, it is true, a threat of terrorism from Indian nationalists in the early years of the twentieth century that may have influenced judges in deciding cases of white violence against natives. But most of the Indian deaths at European hands involved servants or other menials rather than swadeshi bomb-throwers, and their cases were unrelated to political terrorism. Still, circumstances could always be stretched to extenuate the murderous conduct of an Englishman. When an Indian boy was shot dead by Lieutenants Thompson and Neave in Bangalore and Indian villagers forcibly confiscated Neave’s gun, it was two of the villagers who were sentenced to six months’ imprisonment for the crime of misappropriating the white man’s weapon, whereas the murderers went unpunished. Indeed the case was filed as an incident of ‘Natives Against Europeans’.

Sentences handed down by British judges were never equal for Indians and Europeans: in Calcutta, it was estimated that Indian prisoners’ sentences exceeded those for Europeans by a factor of ten for the same crimes. Indian defendants were more than twice as likely as European ones to face murder or attempted murder charges for violent crimes. Statistically, European assaults on Indians were far more frequent than those by Indians on Europeans, yet almost all of the latter were charged as murder whereas most European misdeeds were deemed to be either accidental or in self-defence, and were in any case downgraded from murder to assault. In one case in which a British judge found evidence that a crime was ‘clearly’ murder, the British killer was found insane and hence not responsible for his actions.

Not all the British were equally comfortable with this form of justice. In 1902, when three troopers of the 9th Lancers beat to death an Indian man in Sialkot for refusing to bring them a woman for the night, regimental authorities made no effort to investigate and they tried to get away by painting the victim as a drunkard. But the incident outraged a sizeable number of Britons living in India. Even the viceroy, Lord Curzon, who was no lover of Indians, was horrified enough to declare: ‘I will not be a party to any scandalous hushings up of bad cases of which there is too much in this country, or to the theory that a white man may kick or batter a black man to death with impunity because he is only a d[amne]d nigger.’ Curzon could not increase the punishment, but he had the entire British regiment involved transferred to Aden. Still, he was forced to watch stonily at a parade in Delhi a few weeks later, as the English sections of the crowd cheered the same regiment wildly as it marched past. If Curzon, of all people, was moved to make a statement sympathetic to Indians, one can imagine the scale of the problem.

One scholar, Jordanna Bailkin, points out that there were a few (though very few) exceptions to this norm of race-conscious justice. In three rare cases, Britons were executed for killing Indians: John Rudd in Bengal (1861), four sailors named Wilson, Apostle, Nicholas, and Peters in Bombay (1867), and George Nairns in Bengal (1880). But in two hundred years of British rule, and thousands of cases in which Indians died at the hands of their colonial masters, these three cases were the only exceptions. Generally speaking, British civilian judges and up-country magistrates were reluctant to punish Europeans, whereas military courts and urban High Courts were willing to impose relatively more serious punishments for attacks on Indians. In the view of an ICS officer, who served thirty years in the late nineteenth century, ‘there is a great and dangerous gap between the people and the Courts, and there is no way of bridging it.’

The moderate nationalist Prabhat magazine, in its issue of December 1925, writing after the exoneration and acquittal of an Englishman for kicking an Indian to death, lamented:

The answer to why Indians are dissatisfied with the [sic] British rule is to be found in such incidents. Such painful disregard of Indian life cannot but produce a deep impression upon the heart of every Indian, and no wonder that, despite Mahatma Gandhi’s insistent advice regarding non-violence, revolutionary conspiracies are heard of in the misguided India. So long as this relation exists between the boot and the spleen, India will be the most untouchable and degraded country in the world.

The imperial system of law was created by a foreign race and imposed upon a conquered people who had never been consulted in its creation. It was, pure and simple, an instrument of colonial control. As Henry Nevinson also pointed out, the rule of law, such as it was, functioned in a system in which Indians were ‘compelled to live permanently under a system of official surveillance which reads their private letters, detains their telegrams, and hires men to watch their actions’.
This, then, was the rule of law the British taught us. We have much to unlearn.


(Next in the series: Misogynous Laws )
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