head advt

उषाकिरण खान वाया वंदना राग "हमारे बीच उषा की एक किरण" | Ushakiran Khan Via Vandana Rag

किसी एक व्यक्ति के सुख से न तो खेतों में हरियाली छा जाती है, न उसके दुख के ताप से खेत, नदियां तालाब सूख जाते हैं। जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोरें लेने लगता है तब भी चेहरे पर मुस्कान रखना पड़ता है, सामने की पौध के लिए। 

 


उषाकिरण खान वाया वंदना राग

हमारे बीच उषा की एक किरण


उषाकिरण खान जी को साहित्य से जुड़े लोग कितना कितना तो जानते हैं लेकिन, मैं यह कह सकता हूँ कि बगैर कभी बिहार गए, सिर्फ फेसबुक, व्हाट्सअप, फोन से जुड़ाव और मात्र एक छोटी-सी मुलाक़ात जो मेरे झोले आयी है के बावजूद उन्होंने कब मुझे अपना बना लिया पता ही नहीं, वह सच में मेरी उषा “दीदी” हैं। उनके जन्मदिन 24, अक्टूबर, 2021 पर हज़ार शुभकामनाओं के साथ, दोस्त गीताश्री के सम्पादन में आ रही पुस्तक ‘हमारे बीच उषा की एक किरण’ से वंदना राग का संस्मरण पढ़िए। जिसकी की भूमिका में गीताश्री लिखती हैं – 

“उषादी से बातचीत उठौना (रोज़ का) है। उनसे बात करना एक काम है जीने की तरह... जिसे गंभीरता से करती हूँ। नहीं तो, कुछ खोया-खोया सा लगता है। आप इसे “समथिंग मिसिंग” कह सकते हैं। कोई इंसान आपकी आदत बन जाता है। ये लत सबसे प्यारी होती है। कोई संबंध उस प्रार्थना की तरह होता है जिससे आप अपने दिन की शुरुआत करते हैं।”

बहुत हुआ, अब आप पढ़ना शुरु कीजिएउषाकिरण खान वाया वंदना राग वाया गीताश्री संपादित 'हमारे बीच उषा की एक किरण'  ~ सं० 

लोक ही तो इहलोक है 

~ वंदना राग


सबसे पहले उनकी किताब जलाधार हाथ में आई थी। उनकी बड़ी बेटी अनुराधा शंकर, जो मेरे पति की नौकरी में साथ थी, बैचमैट हुआ करती थी, उसी ने दोस्ताने में मुझे एक प्रति पकड़ा दी थी। उस समय मैंने नया–नया लिखना शुरू किया था और अनुराधा और हम शहर भोपाल के चौहत्तर बंगले मोहल्ले में पड़ोसी हुआ करते थे। आज ठीक-ठीक गणना करने पर यह बात बहुत पुरानी लगती है। 

किताब के पहले पन्ने पर लिखा था, प्रिय अंशु के लिए — माँ 9.12.01 — पटना पुस्तक मेले से। अंशु यानि अनुराधा शंकर। उषाकिरण खान की वही बड़ी बेटी, मेरे पति पंकज राग की दोस्त, मेरी सहेली। 

“माँ को नहीं पढ़ा है, तो ये लो पढ़ो।“ उसने यूँ ही मुझसे कहा था। 

मैंने बहुत चाव से किताब को पढ़ डाला था और मन में एक जाने पहचाने लेकिन वक्त की मार से विस्मृत होते लोक से दोबारा संबंध जोड़ा था। पुनर्नवा-सा लगा था। जानने सीखने और समझने के दिन थे वे । धीरे–धीरे अपने पुरोधाओं को जान रही थी, समझ रही थी, उनकी किताबों के ज़रिये । फिर पता नहीं कब और कैसे यह हुआ कि अनुराधा शंकर से ज्यादा उषाकिरण खान से उनकी किताबों के मार्फत मुलाकातें होने लगीं, फोन पर गप्प होने लगी और मैंने साहित्यिक गर्भनाल का जो सिरा मिला उसे मज़बूती से पकड़ लिया।

अनुराधा के घर के पास रहने की वजह से जब भी उषाजी भोपाल आती जाती उनसे मुलाकातें होती रहतीं। हम टहलते हुए दिन के किसी भी पहर अनुराधा के घर चल पड़ते, और उससे बातें करते-करते कब उषाजी से मुखातिब हो जाते पता ही नहीं चलता। उनकी बातें सुनना बड़ा अच्छा लगता। बेहद दिलचस्प ढंग से अपने बचपन, अज्ञेय और बाबा की कहानियाँ सुनातीं। पटना की साहित्यिक महफिलों की बातें सुनातीं। कैसे रिक्शे में बैठ आयोजनों में चल देतीं और लोग चकित रह जाते उनके गैर पारंपरिक तेवर से। एक आईपीएस् अफसर की पत्नी कितनी जुझारू और साहित्य जुनूनी हो सकती है, सारे सामाजिक दबावों के बावजूद अपनी स्वतंत्र हस्ती निर्मित कर उसे सहेज समेट सकती है, ऐसी अनेक बातें उनसे सीखीं और जानीं। ज़िंदगी में कुछ रचने, गढ़ने और लोगों तक पहुँचाने के लिए आप अपने आप ही कितने सक्षम और प्रतिष्ठित हो सकते हैं, उनका जीवन इसकी तस्दीक करता है। 

उनके बारे में सुधि आलोचक करमेंदू शिशिर की एक टिप्पणी पढ़ी — उषाजी बिहार की उन महिला कथाकारों में हैं, जिन्होंने हिन्दी-परिदृश्य के शोर और कलरव से अलग रहकर अपनी मूक रचनाशीलता से प्रतिष्ठा अर्जित की है। प्रबुद्ध होने के कारण उनमें स्त्रियों के सवालों और समस्याओं के प्रति सहज संवेदना और जागरूकता है। 

टिप्पणी कई बरस पहले की गयी थी और आज जब मेरे सामने आई तो मैं यह सोच हैरान रह गयी कि कैसे कुछ बातें और मूल्यांकन हरदम समीचीन बने रहते हैं। कैसे इतने दिनों पहले कही हुई बात आज भी इतनी मौजूं है। कैसे उषाकिरण खान ने अपनी साहित्यिक जीवन यात्रा शुरू की चुपचाप, धीरे–धीरे! पटना जाने पर कुछ तस्वीरें देखीं उनकी युवावस्था की जिसमें वे शर्मीली सी खड़ी हैं, प्रिय शिष्य की मुद्रा में — एक ओर बाबा नागार्जुन हैं तो दूसरी ओर अज्ञेय। इन श्वेत–श्याम तस्वीरों का जादू गजब का है। मुझ जैसे नवजात लेखकों के लिए यह एक अभूतपूर्व सौगात है, जिसकी सूक्ष्मताओं कोचाक्षुक ढंग से बताने के लिए उषाजी हमारे पास अनमोल पुरोधा-सी मौजूद हैं। पीढ़ियों की साहित्यिक यात्रा को मुकम्मल करती एक निश्चल सहयात्री समान वे हमें उस गुज़रे ज़माने की अनगिनत कहानियाँ सुनाती हैं।

“बाबा कहते थे धीरज नहीं तो कुछ भी नहीं। साहित्यिक यात्रा बच्चों को पालने–पोसने के कर्म जैसी निस्वार्थ और धैर्य भरी होनी चाहिए।“ वही हमने सीखा — वे बहुत गंभीर हो कहती हैं। 

उनके अनोखे कमरे में उनकी किताबें रखी रहती हैं। मैं जब भी जाती हूँ उन्हें टटोलती हूँ। हर बरस किताबों की संख्या बढ़ती जाती है। उनके घर में मनुष्यों के उठने बैठने की जगह से अधिक सभी स्थानों पर किताबें विराजती हैं। अनुकरणीय धीरज से, प्रेरणादायी जिजीविषा से वे हमेशा लिखने में निमग्न दिखलाई पड़ती हैं। उनके पलंग पर उनके कलम और कागज, हमेशा काम चल रहा है इसका आभास देते हैं।

अनुराधा कभी भोपाल जाने पर शिकायत करती है — “अब तुम माँ की ज्यादा दोस्त हो गयी हो!”

मन होता है कहूँ — हाँ, कोई कैसे ना हो उनका दोस्त? स्नेह से जिस कदर सबको अपना बना लेती हैं, यह उनके जीवन मर्म, आत्मविश्वास और उदारता को ही तो दर्शाता है। विभिन्न मतों के लोग बसते हैं पटना के साहित्यिक समाज में, लेकिन मेरे जानने में सब उनका नाम कितने आदर से लेते हैं, खुशदिली से उन्हें याद करते हैं।

मैं जानती हूँ अनुराधा यह सुन खुशी से भर जाती है। उनके बच्चे जानते हैं कि उनकी माँ क्या हैं। वे उसका अधिक प्रचार नहीं करते लेकिन मन ही मन माँ की खूबियों का जश्न मनाते हैं। गाहे बगाहे अपने खास दोस्तों से उसकी चर्चा कर देते हैं और बस — नियमित जीवन जीते है! यह बात मुझे बड़ी आकर्षक लगती है। उनकी सभी बेटियों ने एक सघन साहित्यिक संस्कार विरासत में पाया है और वे उसे अगली पीढ़ी तक ले जा रही हैं। मैं उन बच्चों की रचनात्मकता से भी परिचित हूँ। सभी बच्चों के मन के गवाक्ष खुले हैं। वहाँ आधुनिकता की हवा के साथ-साथ जड़ों से उठती खुशबू भी तिरती है। जैसे तनुजा उनकी दूसरी बेटी ने सामा–चकेवा पर जब फिल्म बनाई तो माँ ही नेरैटर हो गईं। लोक से जुड़ी कहानियां जुबानी याद जो हैं उन्हें। एक मनमोहक तस्वीर याद आ रही है उनकी — बैलगाड़ी पर अपने बच्चों के संग बैठ गाँव जा रही हैं। जैसे सहेज रही हैं कुटुंब को लोक के साथ। प्रकृति का सहचर बन रचनाकार रचना का अंग हो जाए जैसे वैसी छवियाँ कौंधती हैं उनको लेकर। कोसी नदी और बाढ़ से उपजे कितने संस्मरण हैं उनके पास। उनकी कहानियों में नदी दुलारती है, तो डराती भी है और संघर्ष के नए मायने भी सिखलाती है। बहुत प्रेम है उनको उससे। जैसे प्रेम है उनको भाषाओं से, क्षेत्र से भी। दरभंगा के राजघराने से लेकर मखान निकालने वाले जन मानस की कहानियाँ हैं उनके पास। लागि नाही छूटे राम की तर्ज़ पर लोक छूटता नहीं उनसे। उसकी बोली-बानी, भाषा और जन जीवन। कहाँ गए मेरे उगना और हीरा डोम नाटकों के अंशों का पाठ उनके मुँह से सुना पहले, फिर उन नाटकों को देखा भी। सिर्फ नाटकों में नहीं, उनकी कहानियों और उपन्यासों में भी कस्बाई और ग्रामीण जीवन दिप-दिप करता है। एक साइड हीरो की तरह नहीं, प्रशस्त नायकत्व की तरह हुंकार भरता हुआ, वृहतर साहित्यिक परिदृश्य में अपनी ज़बरदस्त उपस्थिति दर्ज करता हुआ। बहुत पहले रामचन्द्र सिंह ने दैनिक आज में एक टिप्पणी की थी जिसकी प्रासंगिकता से मैं भी इत्तेफाक़ रखती हूँ — “उषा किरण खान अपनी कहानियों के माध्यम से जनसाधारण अथवा आम लोगों के दुख दर्द का मार्मिक चित्रण करती हैं। आज़ादी के बाद के गाँवों में क्या परिवर्तन हुआ है इसकी झलक इनकी ग्रामीण कथाओं में मिलती है। प्रकृति चित्रण और सौन्दर्य वर्णन इनकी कथाओं में समान रूप से मिलता है।“ इसी आलोक में मैं उनके आगामी जीवन की साहित्यिक यात्रा का अवलोकन करती हूँ और उनके नवीन उपन्यासों को एक गतिशील यात्रा के जरूरी पड़ाव मानती हूँ। 2018 में उनका उपन्यास गयी झूलनी टूट शाया हुआ। उसके ब्लर्ब की यह पंक्तियाँ जैसे उनके जीवन के सत को पाठकों के समक्ष साफ़गोई से रख देती है — “किसी एक व्यक्ति के सुख से न तो खेतों में हरियाली छा जाती है, न उसके दुख के ताप से खेत, नदियां तालाब सूख जाते हैं। जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोरें लेने लगता है तब भी चेहरे पर मुस्कान रखना पड़ता है, सामने की पौध के लिए।“ यह उसी यात्रा की धमक है जिसकी जिजीविषा सफल लंबी दूरी के बावजूद मद्धिम नहीं पड़ी है और मुझे खूब–खूब प्रेरित करती है। 

इसी तरह स्त्रीमन की बातें उनके लेखन में बहुत अदृश्य और चुपचाप होकर अपना वाजिब हक़ रखती हैं। अत्यंत सादे और सीधे सच्चे ढंग से । गयी झूलनी टूट का अंतिम प्रसंग इस संदर्भ में याद आ रहा है — एक आजीवन संघर्षरत स्त्री की कथा का अंत कितना मार्मिक बन पड़ा है — “बढ़िए आखरी नाव जा रही है। बस भी मिल जाएगी।“ मैया को थामे चल जा रहा है छोटकू सिंह। यहाँ का सब कुछ याद आने लगा, नाच भी। कमलमुखी के मन में नाच के गीत की आवृत्ती हो रही थी। 

दगा दे गए बालम, गयी झूलनी टूट। 
सागरों सोनरवाँ से गयी यारी छूट ।
दगा दे गए बालम, गयी झूलनी टूट। 

उनकी कई कहानियाँ विवाह व्यवस्था और स्त्री अस्मिता के व्यापक मायनों पर सवाल उठती हैं और इन्हें वे अपने अनुभव जगत से उपजाती और सींचती हैं। मैंने उन्हें इतने वर्षों के जानने के दौर में कभी किसी के प्रति जजमेंटल होते नहीं देखा। वे फतवे जारी करती नहीं दिखतीं। मुझे याद है जब उन्होंने आयाम संस्था बनाने के बारे में सोचा था, तो मुझसे अनेक चर्चाएं हुई थीं, जिसमें संस्था के उद्देश्य और उसकी प्रासंगिकता पर भी खूब सोचने की प्रक्रिया से भी वे गुज़री थीं। स्त्रियों के लिए, खासतौर से ऐसी स्त्रियों के लिए जो पटना शहर में रहकर साहित्य रचना चाहती हैं, उसकी प्रक्रिया से गुजरना चाहती हैं, उनके लिए एक साझा मंच उपलब्ध करवाना उनकी आंतरिक बुनावट का ही ताना बाना बन उभरा है। लेखन के साथ ऐक्टिविज़म के रेशे गुँथे हुए हैं उनके संसार में। उन्हें चीख-चीख कर दिखलाना नहीं आता उन्हें। शायद कभी आएगा भी नहीं। लेकिन मैंने देखा है उन्हें अनेक स्त्रियों का अवलंब बनते हुए, उन्हें प्रोत्साहित करते हुए उनके रचना संसार को पंख देते हुए। स्त्री अस्मिता को ज़मीनी और प्रासंगिक बनाते हुए। 

कम उम्र में शादी और फिर उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई के भी अनगिन किस्से हैं उनके पास। पटना में जब पढ़ने आईं तो नए सिरे से जीवन को देखा और जाना। कहतीं हैं — इतिहास पढ़ा और उससे प्रेम हो गया। उनकी अनेक रचनाओं में इतिहास की धमक मिलती है। मुझे उनका हालिया प्रकाशित उपन्यास-–अगन हिंडोला बहुत रोचक और दिल के करीब लगता है। मैंने भी इतिहास की पढ़ाई की है, इसलिए उनसे मन भर बातें कर पाती हूँ — इतिहास पर, इतिहास से जुड़े साहित्य पर। अगन हिंडोला पर भी खूब बातें हुई। वे शेरशाह के किरदार से बहुत प्रभावित रही हैं। वे कहती हैं — खालिस हिन्दुस्तानी बादशाह था वह। दिल्ली के तख्त पर सिर्फ 5 साल काबिज होने वाले सुल्तान ने जितने प्रशासनिक एवं लोक हित के कार्य किये कोई दूसरा सालों साल हुकूमत करके भी नहीं कर सकता। उसकी ज़िंदगी में इश्क हकीकी भी है, इसी वजह से मलिक मोहम्मद जायसी सरीखे कवि से इतना अधिक लगाव भी है उसे। 

शेरशाह की ज़िंदगी का कोई हिस्सा अछूता नहीं छूटता है उनसे इस उपन्यास में। आज के किसान की दुर्दशा का प्रतिबिंब हमें शेरशाह के काल में भी दिखला देती हैं वे और हुक्मरान को उसके प्रति कैसा बर्ताव करना चाहिए उसकी मिसाल भी मिल जाती है पाठक को इन पंक्तियों में — “तुमने इस किसान को क्यों मारा ?” कड़ककर पूछा सुल्तान ने। 

“माई बाप यह जल्दी से पानी नहीं पिला रहा था।“ सिपाही ने कहा। 

“हुज़ूर रहट जब आकर रुकता तभी तो पानी देते।“ किसान ने जवाब दिया। 

“सुना तुमने। किसानों के काम में खलल डाला तो अंजाम भुगतने को तैयार रहना। उसकी ओर से मैं माफी माँगता हूँ।“ किसान को कहा सुल्तान ने। यह संवेदनशीलता लेखक की आंतरिक न्याय की पुकार को भी प्रतिबिंबित करती है, इसीलिए इतनी अपनी और सघन लगती है। 

जायसी और पद्मावत के रचने के रोचक किस्सों से भरा उपन्यास भी है यह। खूब पसंद किया गया है। दो ही तो बरस हुए है इसको आए हुए। इसको सेलीब्रेट करने का समय है अब। लेकिन दुर्योगवश पिछले डेढ़ बरसों से हम कोरोना महामारी के चंगुल में बुरी तरह फंसे हुए और निराशा में डूबे हुए हैं। ऐसे में जब सबकी रचनात्मकता का सोता लगभग सूख सा रहा है — तब ये स्नेहिल रचनाकार फिर अपने चाहने वालों को चौंका देती हैं। 

मुझे हाल ही में पटना जाने पर अपनी नई किताब का कवर दिखलाती है। 

मैं खुश हो जाती हूँ — ये कितनी ऊर्जा से भर देती हैं अपने मिलने वालों को। 

कब पूरा हुआ। 

अभी! और अब तो कवर भी तैयार है। 

वात वक्षा उनके इसी नए उपन्यास का नाम है जो शीघ्र आने वाला है। स्त्री संघर्ष की कथा उसमें भी है। मुझे कहना होगा तो कहूँगी जीवन जगत की कथा होगी जरूर उसमें भी। एक समग्र भरे-पूरे जीवन की कथा। वे खुद जैसी हैं। एक छायादार, हरदम हरा रहने वाले बरगद की तरह। इस बात का ऐतबार रहता है कि जब भी जाऊँ उनके यहाँ, चाय नाश्ता मिल ही जाएगा। कई कप चाय के साथ गप्पों का सिलसिला भी। कभी बासी नहीं होती उनकी बातें। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा है हर वक़्त माँजती रहती हैं अपने आप को। मोबाईल की नई संचार तकनीक को कितनी जल्दी अपना लिया उन्होंने। कितनी शालीनता से सोशल मीडिया हैंडल्स पर अपने विचार रखती हैं वे। लोगों की गाली गुफ्तार के बीच भी सहज और प्यार भरी बनी रहती हैं। 

नए लोगों को यह सब सीखने की ज़रूरत है। 

मुझे याद है एक बार मैं इंदौर गयी थी किसी कार्यक्रम में। उन दिनों वे भी वहीं थीं। अनुराधा की पोस्टिंग वहीं थी। वे अनुराधा समेत पूरे परिवार को ले मुझे सुनने आईं। अगले दिन सुबह मैं अनुराधा के घर चाय पीने गयी। अनुराधा तो जल्दी से नाश्ता कर ऑफिस चली गयी लेकिन मैं और उषाजी देर तक साहित्य चर्चा करते रहे। उस दिन अनुराधा के बगीचे में मोर नाचते हुए चले आए थे और सुहानी सुबह की अमिट छाप हृदय में रह गयी थी दिलकश अंदाज़ में, जो आज तक ज़िंदा है। 

और जब उन्हें पद्मश्री मिला और उस पुरस्कार की खुशी को उनके कुछ चाहने वालों ने दिल्ली में सेलीब्रेट करने का निर्णय लिया तो मैं भी उस आयोजन में शामिल हुई थी। मुझे याद है उस दिन मेज़बान ने अचानक ही मुझे उनके लिए दो शब्द कहने को कह दिया था। वहाँ बहुत नामचीन लोग बैठे थे, सबके बीच औचक धरे जाने पर मैं क्या कहती? दूसरे उपस्थित लोगों की तरह मैं भी तो अभिभूत हो बैठी थी। चंद मिनिट लगे मुझे अपने को व्यवस्थित करने में। आखिर वे मेरी सहेली की माँ भी तो थीं, मैं उन्हें आँटी ही तो कहकर पुकारती हूँ... लेकिन उस वक़्त वे एक पुरस्कृत रचनाकार थीं और बहुत सारे प्रेम के साथ बहुत सारी इज्जत की हकदार भी। मैंने एक रचनाकार की तरह ही उनके सम्मान में दो शब्द कहे। फिर जब भीड़ उनके आस-पास से हट गयी तब मैं उनके पास जाकर बैठ गयी। वे मेरी आँटी हो गईं फिर से। मैं स्नेहाकांक्षी और वे दुलार करने वाली मेरी अभिभावक। वह अद्भुत एहसास था। 

अपने शहर से अटूट प्रेम है उनको। कहती हैं — देखो न, सारा जीवन यहीं बीत गया। कहानियाँ भी तो यहीं से आएंगी न? रतनारे नयन पटन देवी के नयन हैं। उनका यह उपन्यास पटना के लिए है। पटना ही इसका हीरो है। वही पटना जिसने मुझे उषाकिरण खान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। 

नौवीं शतब्दी के कवि राजशेखर ने अपनी पुस्तक काव्य मीमांसा में लिखा है-–
श्रुयते च पाटलीपुत्रे शास्त्रकार परी 
अत्रो पवर्ष वर्ष विह पाणिनि पिंगलविह न्याडी :
वरुची –पतंजलि इह परीक्षित :ख्याति मुप जज्ञमु:

जिस तरह इन महानुभावों को पटना ने बनाया। उन्हें ख्याति प्रदान की उसी तरह पटना का आधुनिक इतिहास उषाकिरण खान के बिना पूरा नहीं होगा। ख्याति बड़ी अजीब शै है!

अपनी आगामी पीढ़ियों को राह बताने वाली उनको बेटन थामने वाली उषाकिरण खान पर सिर्फ मैं ही नहीं, जो भी लिख रहा है या लिखेगा वह सोचेगा ज़रूर उनके किस-किस आयाम पर लिखा जाए? इतनी विविध आयामी स्त्री हैं वे। इतना काम किया है उन्होंने। 

रही बात मेरी — तो मैं बस बहुत प्यार से याद रखना चाहूँगी उन्हें और उनकी तर्ज़ पर खूब–खूब लिखना चाहूँगी। वे यूँही बनी रहें सदा के लिए!


 

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

००००००००००००००००

यह भी देखें