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अथ कथा पलटू उर्फ़ पलट बिहारी की ~ प्रभात रंजन | किस्सा/कहानी/उपन्यास (अंश)

पहली ख़बर यह है कि प्रभात भाई ने उपन्यास पूरा कर लिया है। दूसरी यह कि उसका यह दिलचस्प अंश आप पाठकों के लिए, मेरे निवेदन पर उन्होंने मुहय्या किया है। प्रभात रंजन जी को बधाई। अब आप आनंद लीजिए ~ सं०

 


अथ कथा पलटू उर्फ़ पलट बिहारी की

~ प्रभात रंजन

सीतामढ़ी में गुदरी बाजार से पश्चिम की तरफ़ एक रास्ता जाता है। उस रास्ते पर दो मील चलने के बाद पहले बाएँ और फिर दाएँ मुड़ने के बाद बिसरलपुर गाँव है। छोटा-सा गाँव हैं। मिली जुली आबादी। मुश्किल से 70-80 घर होंगे। पश्चिम की तरफ़ कम से कम बीस घर मुसलमानों के हैं, एक मस्जिद भी है। उनका मतदान बूथ भी अलग है और बाकी गाँव वाले उनको अपने गाँव का नहीं गिनते हैं। उधर वे भी मस्जिद के उधर के हिस्से के गाँव में कम ही आते-जाते हैं। इसी तरह से शांति-सद्भाव से वे न जाने कितने बरसों से रहते आ रहे हैं। 

गाँव में ऐसा कुछ नहीं है कि जिसके कारण उसको याद किया जाए। लेकिन इधर पिछले 20-25 साल से गाँव की ख्याति बढ़ती जा रही है। वहाँ बाबा पलटबिहारी का स्थान है। बाबा पलटबिहारी को लेकर गाँव में दो तरह के मत वाले लोग हैं। 

वैसे दिल्ली-पंजाब के ट्रेन का रास्ता देख लेने के बाद गाँव में रह ही कितने लोग गए हैं। लेकिन कुछ बूढ़-पुरनिया हैं जिनसे बाबा के स्थान के बारे में पता चलता है। 

एक मत के मानने वाले यह बताते हैं कि यह बहुत पुराना स्थान है। करीब सौ साल पहले अयोध्या से जानकी किरतनिए यहाँ आए। जानकी नवमी के उपलक्ष्य में कीर्तन करते-करते यहाँ की आबोहवा में वे इतने रम गए कि यहाँ से वापस जाने का उनका मन ही नहीं कर रहा था। उन लोगों ने अपना गाँव बसाया जानकी स्थान से पांच कोस पश्चिम में जंगल को साफ़ करके। आज तो हर जगह जंगल साफ़ है और आदमी का वास दिखाई देता है लेकिन जब अयोध्या के कीर्तनियों ने यह गाँव बसाया था तब एक कोस जंगल पार करके बिसरलपुर जाना पड़ता था। 

गाँव का मूल नाम क्या था यह तो अब किसी को याद नहीं है। लिखित में कुछ नहीं मिलता। लेकिन यही नाम चल पड़ा है। बिसरलपुर शायद इसलिए क्योंकि वह गाँव आसपास के गाँवों से इतना हटकर था कि किसी को उसके बारे में याद ही नहीं रहता था। लोगों को यह याद करना पड़ता था कि एक गाँव जंगल पार करके भी आता है। उसी गाँव में जन्म हुआ था पलटू का। बात देश में झंडे के रंग के बदलने के पहले की है। उस साल से भी कई साल पहले की जब अंग्रेज़ी पलटन ने शहर में मार्च किया था। 

स्वतंत्रता सेनानी राजा चौधरी बरसों बाद तक सुनाते रहे— ‘शहर में बस एक ही आवाज़ सुनाई दे रही थी— कड़ाम! कड़ाम! कड़ाम! कड़ाम! फ़ौजी बूटों की आवाज़ से शहर जैसे काँप रहा था। अंग्रेज़ी सेना के फ़ौजी तो एक दिन मार्च करके चले गए लेकिन शहर में लोग कई दिनों तक सहमे-दुबके रहे। सैकड़ों घरों के दरवाज़े कई दिन तक नहीं खुले थे। न जाने किसने बनाया किसने पहले गाया लेकिन एक गीत चल पड़ा था उन दिनों— 
  ‘घर में र ह बाउआ घर में र ह/ बहरा कड़ाम कड़ाम बाजे! 
  घर में र ह बबुनी घर में र ह/ बहरा कड़ाम कड़ाम बाजे’/ 
  मोछ संभारे बाबू गद्दी के बाबाजी
  कोनो काम आए न डिप्टी न लालाजी
  छुप के दुबक के परल रह/ बहरा कड़ाम कड़ाम बाजे!’

शहर में अंग्रेज़ी फ़ौज ने कड़ाम कड़ाम क्यों किया? क्यों लोग घरों ने छिपे रहे? इसकी भी पूरी कहानी थी। जिसको अनेक पीढ़ियों तक राजा बाबू सुनाते रहे। क़िस्सा ही ऐसा है। मैंने सुन रखी थी इसलिए मुझे लगता है कि मुझे याद है। जैसी याद है जितनी याद है सुना देता हूँ— 

बात 1942 के कुछ समय बाद की है। शहर में अंग्रेज़ कलक्टर दौरे पर आया हुआ था। मॉरिस जॉनसन नामक उस कलेक्टर को अपने कारनामों के लिए आज भी याद किया जाता है। चंपारण के जंगलों में नरभक्षी बाघों का उन दिनों बड़ा आतंक था। रात के अंधेरे में बाघ आसपास के गाँवों से मवेशी उठाकर ले जाते, दिशा-मैदान के लिए निकली औरतों को भी उठा ले जाते। किसी को शहर से गाँव लौटने में रात बेरात हो जाती तो घर क्या पूरे गाँव वाले तब तक जगे रहते जब तक कि शहर गया व्यक्ति वापस न आ जाए। शहर से गाँव आने के रास्ते में थोड़ी दूर तक घना जंगल था। गाँव के कई लोगों का कभी पता ही नहीं चला। लोग डरे सहमे रहते। कहते हैं मॉरिस जानसन ने चार नरभक्षी शेरों का शिकार किया था। इस कारण उसको लोग बाघ सरकार कहने लगे थे। 

कहते हैं कि वही कलेक्टर साहब जब सीतामढ़ी बाज़ार में फिटन से उतरे तो नीचे केले का छिलका पड़ा था। उनका पैर फिसला और वे मुँह के बल गिर पड़े। कहते हैं ग़ुस्से में आकर उन्होंने आसपास के सभी दुकानदारों से सड़क पर झाड़ू लगवा दिया। दुकानदारों के साथ-साथ दुकान में खड़े लोगों को भी सड़क साफ़ करने का आदेश दिया गया। 

बस इसी बात से बवाल हो गया। 

दुकान व्यापारियों के थे लेकिन कुछ दुकानों में आसपास के बाबू ज़मींदार भी बैठे थे। उनको भी झाड़ू लगाने का आदेश दिया गया। कहते हैं खबर आग की तरह फैल गई कि बाबू साहब लोग शहर में झाड़ू लगा रहे हैं। बस क्या था गाँवों से लोग उमड़-उमड़ कर आने लगे और सरकारी गाड़ियों, दफ़्तरों पर पत्थर मारने लगे। सरकारी वर्दी में जो दिखा उसी को दौड़ाने लगे। चार दिन तक शहर में साहब लोगों के जान पर आफ़त बनी रही। जो अफ़सर बाघ बहादुर की वीरता की कहानियों की मज़बूत डोर पर सवार होकर उस शहर की जनता पर सवारी करने आया था वह खुद गीदड़ की तरह कहाँ दुबका छिपा रहा कोई नहीं जानता था। उसी की गुहार पर गोरी पलटन आई थी शहर में शांति स्थापित करने। शहर की सड़कों पर एक दिन मार्च किया फ़ौजी जवानों ने और शहर के लोग ऐसे दुबके कि फिर से बाघ बहादुर के क़ब्ज़े में आ गए। सदियों से यहाँ की और न जाने कहाँ की जनता का यही हाल होता रहा है…

बाद में लोग केले के छिलके को भूल गए, मॉरिस जॉनसन को भूल गए। कहानी यह बनाई सुनाई जाने लगी कि 9 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा हुई और उसके महीने भर के अंदर ज़िले के हज़ारों लोगों ने जिलादार खान, रामधारी राय और राजा चौधरी के नेतृत्व में सरकारी दफ़्तरों पर धावा बोल दिया। सीतामढ़ी में भारत छोड़ो आंदोलन की इस कथा को लोग गर्व से सुनाते। कहते कि शहर के तीन सम्मानित परिवार के युवकों को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया और बड़ी मुश्किल से एक साल बाद उनको रिहाई मिली। आज भी खान, साह और राय परिवार को लोग स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार के रूप में याद करते हैं।

आप कहेंगे कि बात शुरु हुई थी बाबा पलट बिहारी के स्थान से, कथा में पलटन नाथ के रूप में गाँव बिसरलपुर में उनके जन्म की कहानी शुरु ही हुई थी पलटन मार्च की कहानी और फिर क्या क्या कहानी शुरु हो गई? तो बताते चलें कि किस्से कहानी में यही होता है। क़िस्सा कोई एक लीक पर चलने वाली रेल की तरह नहीं होती है कि एक स्टेशन से शुरु हो और पटरी पर चलते हुए अपने गंतव्य पर पहुँच जाए। क़िस्सों में विषयांतर न हों तो उनका मजा ही क्या! असल में इस किस्से का संबंध पलटन से है और पलटन के पलटबिहारी होने से। 

फ़ौजी बूटों की आवाज़ शहर को पार कर गाँवों की सड़कों को भी रौंदने लगी। वैसे तब शहर था ही कितना बड़ा। समझ लीजिए कि आसपास के गाँवों के बाज़ार की तरह था। तो गोरी फ़ौज के सिपाही शहर की सड़कों को पार कर कब आसपास के गाँवों की सड़कों पर कड़ाम कड़ाम करते चलने लगे उनको पता ही नहीं चला। कहते हैं कि चलते-चलते वे बिसरलपुर गाँव पहुँच गए। जब फ़ौजी गाँव के पुराने पाकड़ के पेड़ के पास से गुजर रहे थे कि एक आवाज़ सुनाई दी— पलट! 

जाने क्या था उस आवाज़ में कि गोरी फ़ौज वहीं से वापस मुड़ गई। पलट की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि दोपहर की ख़ामोशी में उस आवाज़ की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी। अपने घरों में दुबके किरतनिया परिवारों के वंशज फ़ौजी बूटों की कड़ाम कड़ाम से डरे हुए थे लेकिन वे इस बात को लेकर उत्सुक भी थे कि आख़िर इतनी ज़ोर से किसने पलट कहा कि गोरे फ़ौजी वापस लौट गए। वे गोरे फ़ौजी जो  किसी के कहने पर न मुड़ते थे, न रुकते थे आख़िर किसकी आवाज़ सुनकर पीछे मुड़े और चले गए। 

जब बूटों की आवाज़ शांत हो गई और गाँव वालों को इस बात का पक्का भरोसा हो गया कि अब ख़तरे की कोई बात नहीं थी तो पहले कुछ लोग निकल कर पाकड़ के पेड़ के पास पहुँचे। वहाँ पहुँचने के बाद जब उन लोगों ने आवाज़ लगाई तो कुछ और लोग निकले और फिर देखते-देखते सभी ग्रामीण पुरुष वहाँ पहुँच गए। सामने जो दिखाई दे रहा था उसको देखकर उनको अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था। सामने पलटू खड़ा था और जिस दिशा से फ़ौजियों के लौटने की धूल दिखाई दे रही थी उसी दिशा में क्रोधित आँखों से देख रहा था। उसकी आँखें लाल टहटह लग रही थीं जैसे अड़हुल के फूल। वह कुछ नहीं बोल रहा था बस उसी दिशा में देखे जा रहा था और लोगों के वहाँ पहुँचने के पहले ही ज़मीन पर केले के खड़े खम्भे की तरह गिर गया। 

सब भागे लेकिन सबसे पहले पलटू के पास पहुँचा परीक्षण पांड़े। जब उसने औंधे मुँह पड़े पलटू को सीधा किया तो उसको देखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा— ‘इसके ऊपर कुछ आ गया है। अपने पलटू पर लगता है कोई भूत-दूत न तो देवी-देवता आ गए हैं। आओ भाई लोग देखो…’ 

सब भागते हुए उसको देखने के लिए पहुँचे तो सबका मुँह खुला का खुला रह गया। उसकी आँखें बाहर की ओर निकलने को आतुर लग रही थीं। मुँह से उसके फेन निकल रहा था और अस्फुट सवार में न जाने क्या कही जा रहा था। कोई दौड़ कर पानी लेकर आया और उसके मुँह पर पानी के छींटे मारने लगा। पानी से जैसे उसके शरीर में जान आ गई और वह बिजली की तरह उठकर बैठा और कुछ बोलने की कोशिश करने लगा। दो शब्द लोगों को सुनाई दिए— गोरी पलटन… पलट… 

कहकर वह फिर पलट गया। इस बार परीक्षण ने उसको उठाया और मुँह से पानी का लोटा लगा दिया। वह पानी पीने लगा और अपने आसपास जुटे लोगों को ऐसे देखने लगा मानो उसको यह समझ नहीं आ रहा हो कि वह वहाँ क्यों बैठा था और सारा गाँव उसको घेरे क्यों खड़ा था। एक बुजुर्ग ने आगे बढ़कर उससे पूछा— ‘क्या हुआ पलटू? सच-सच बताओ। कोनो निशाखातिर तो नहीं कर लिए?’

पलटू ने आँखों को मला। लोटे के पानी से कुछ छींटे आँखों पर मारे। गमछे से मुँह को पोछते हुए बताना शुरु किया— ‘हम यहीं पीपल के नीचे बैठे थे। अच्छी हवा आ रही थी। सोचे सूरज की गर्मी कुछ कम हो जाए तो घर जाएँ कि अचानक दूर से धूल का गोला उड़ता दिखाई दिया और उसके पीछे लग रहा था कि कुछ लोग चल रहे थे। हम डर गए। डर के मारे पेड़ पर चढ़ गए। ऊपर से साफ़ दिखाई दे रहा था। बंदूक ताने पलटन चली आ रही थी। देखकर हमको कंपकंपी छूट गई और हम थरथर काँपने लगे। मेरे काँपने से पूरे पेड़ का पत्ता नीचे झरने लगा और उससे एकदम अंधेरा छा गया। देखकर जाने उन फ़ौजियों को क्या लगा कि वे उसी तरह से कड़ाम कड़ाम करते हुए वापस लौट गए…' 

‘हमको साफ सुनाई दिया था—पलट! तुम ही बोले थे। हमको कोनो धोखा नहीं हुआ था!’ इस बार ग्राम रक्षक दल के लालबाबू ने कहा। उसके समर्थन में कई लोग मुड़ी डोलाने लगे। 

‘जब हम देखे कि पलटन पलट गई है तो हमको कुछो नहीं बुझाया। हम झट से पेड़ से नीचे उतरे और जोर से बोले— ‘हम हैं पलटन। पलटन नाथ! आगे ख़तरा के कोनो बात नहीं है। पलट जाइए… पलट जाइए… लेकिन ऊ लोग हमरे बात सुने ही नहीं। कोनो हमर बात नहीं सुन रहा है।’ 

सही में वहाँ कोई उसकी बात नहीं सुन रहा था। सब बोल रहे थे। कोई सुन नहीं रहा था। बीच में से कोई जोर से बोला— ‘पलटू पर गोसाईं असवार हो गए थे। गोसाईं हम लोगों को गोरी पलटन से बचाने के लिए आए थे। उन्होंने पलटनाथ को चुना अपना रौद्र रूप दिखाने के लिए। पलटनाथ के बोलने से नहीं भागी थी। इसके ऊपर असवार गोसाईं ने अपना रौद्र रूप दिखाया था उसी से डर कर पलटन वापस चली गई।’   

सब जोर जोर से जयकारा लगाने लगे- गोसाईं महराज की जय! गोसाईं महाराज की जय!’ 

‘बाबा पलटबिहारी की जय!’ एक आवाज़ आई। 

और फिर बहुत सारी आवाज़ों ने जयकारा लगाया— बाबा पलटबिहारी की जय!’ 

उस दिन से पलटू को लोग पलटबिहारी बुलाने लगे। उसकी महिमा गाने लगे। कहते हैं कि चलते-चलते अगर वह एक बार पलट कर किसी को देख लेता तो या तो उसका भाग्योदय हो जाता। वह जिधर जाता उसके पीछे लोगों की भीड़ चलने लगती। 

क्या पता पलटबिहारी किसको पलट कर देख ले!

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