गीताश्री की पसंदीदा किताबें: रुई लपेटी आग - अवधेश प्रीत | GeetaShree - Rui Lapeti Aag: Avadhesh Preet

'गीताश्री की पसंदीदा किताबें' की तीसरी कड़ी में पढ़ें वरिष्ठ लेखक अवधेश प्रीत के उपन्यास रुई लपेटी आग (राजकमल प्रकाशन) की समीक्षा ~ सं0 

GeetaShree - Rui Lapeti Aag: Avadhesh Preet


अगर भावुकता सचेत करती हो तो हर्ज क्या! 

:: गीताश्री 

पत्रकार एवं लेखक। अब तक सात कहानी संग्रह ,पाँच उपन्यास !  स्त्री विमर्श पर चार शोध किताबें प्रकाशित .  कई चर्चित किताबों  का संपादन-संयोजन। वर्ष 2008-09 में पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयनका, बेस्ट हिंदी जर्नलिस्ट ऑफ द इयर समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त। 1991 से 2017 तक सक्रिय पत्रकारिता के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन ! संपर्क: C-1339, Gaur green avenue, Abhay khand-2, Indirapuram, Ghaziabad -201014, मो० 9818246059, ईमेल: geetashri31@gmail.com 


दिनकर याद आते हैं--
दो में से तुम्हें क्या चाहिए -- कलम या कि तलवार! 

वरिष्ठ लेखक अवधेश प्रीत का यह उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार सवाल मन में कौंधता रहा। 
    परमाणु या कि पखावज! 
        युद्ध या कि शांति! 
            घृणा या प्रेम! 

ज़ाहिर है दुनिया को दूसरा विकल्प चुनना चाहिए। हम चुनते क्या हैं? उसे, जिसे नहीं चुनना चाहिए। जो इस सुंदर दुनिया को कत्लगाह में बदल देता है। हमारा चयन ही दुनिया का स्वरूप तय करता है। 

मैं प्रिय कथाकार को पढ़ती जाती हूँ... तरह-तरह के भावों से भर उठती हूँ। ख़ौफ़ के साये से गुजरते हुए उम्मीद के दरवाज़े पर जाकर फूल चुन लेती हूँ। उसी तरह विध्वंस के बीच भी लेखक का कबीर-मन पखावज को चुनता है। 

उपन्यास का कथानक एकदम अनछुआ है। 
किसी ने इस बारे में विचार ही नहीं किया। दुनिया परमाणु ख़तरे के मुहाने पर खड़ी है। हर देश ख़ुद को परमाणु संपन्न देश बनाने पर आमादा है। भारत भी 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण कर ऐसे देशों की क़तार में आ खड़ा हुआ। उस समय देश की राजनीति करवट ले चुकी थी। जो आज देश में मौजूदा हालात हैं, उसकी बुनियाद तभी पड़ी थी। तब सिर्फ़ परमाणु परीक्षण नहीं, देश के राजनीतिक और सामाजिक हालात के परीक्षण का दौर था। केंद्र में जिस दल के सुप्रीमो थे, वे लोग आज भी क़ाबिज़ हैं। जिनकी विचारधारा ने तभी से समाजिक सद्भाव के तले में विस्फोट करना शुरु कर दिया। नतीजा आज देख रहे हम कि कैसे उसके चिथड़े उड़ रहे हैं। 

मैं अपनी बात कहूँ तो उस दौर की राजनीतिक संवाददाता होने के नाते उपन्यास में वर्णित घटनाओं और परिस्थियाँ की साक्षी रही हूँ। मैंने भारतीय राजनीति को बदलते और वीभत्स होते देखा है। उसको कवर किया है। घटनास्थल पर मौजूद रही हूँ। मैं उपन्यास में वर्णित तथ्यों से अवगत हूँ। मानो यह कहानी घटित होते देखा हो। दावे के साथ कह सकती हूँ कि देश को रुई में आग लगाकर तभी रख दिया गया था। आज उसकी लपटें दिखाई दे रही हैं। 

बहुत विराट फलक का उपन्यास है। 
उपन्यास एक सवाल है। वैश्विक सवाल जिसका जवाब समूची दुनिया को ढूँढना चाहिए। संसार को क्या चाहिए? कानों में बम और बंदूकों की विस्फोटक आवाज़ें, लहूलुहान बच्चे, उजड़ी बस्तियाँ या वह संगीत जो सुकून दे। वह फूल जो गुलशन का पता बताए। वह बोल जिसमें बुद्ध की अहिंसा और करुणा सुनाई देती हो। 

यहाँ अरुंधती और बया जैसी दो विपरीत सोच वाली स्त्रियों के माध्यम से कथा का चिंतन और विचार पक्ष सामने आता है। इस उपन्यास की दो स्त्री किरदारों बया और अरुंधती से मुझे प्यार हो गया है। अरुंधती शुरु से अलग और उदार है। बया का चरित्र जिस तरह से उठान लेता है … जैसे संगीत में सुर मंद से द्रुत की तरफ़ जाते हैं। किरदारों का चारित्रिक विकास विलक्षण है। 

अंश पेश हैं --
वह ऐसी ही थी! क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा। उसकी रगो में राग-रागिनियाँ बहती थीं। फ़ितरत में झरने-सी आवेगमयता थी। अरुंधती मैम उसके बारे में ठीक ही कहती हैं-- काश! दुनिया की सारी लड़कियाँ बया होती।

 

यह बया है, इसकी चहचहाहट ही इसकी पहचान है। इसकी उड़ान पर कोई पाबंदी नहीं लगनी चाहिए

 

बया जब कोई फ़ैसला लेती है तो फिर उससे पीछे हटना उसे पसंद नहीं। तितलियों-सी चंचल और हवाओं-सी उन्मुक्त दिखनेवाली यह लड़की अंदर से शांत सतहवाली किसी नदी सरीखी है।

बया के चरित्र को उभारते हुए लेखक की सदिच्छा उस क्लीशे को छिन्न-भिन्न कर देने की है जिसमें चंचल, वाचाल, हँसोड़ लड़कियों की एक छवि निर्मित होती है -- अगंभीर की। ऐसी लड़कियाँ अपने भीतर जितनी संवेदना और सामाजिकता, करुणा दबाए रखती हैं, वह दुर्लभ है। जितनी मसखरी उतनी ही दबंग। जितनी चंचल, उतनी ही गंभीर। 

यहाँ छवि-निर्मिति की कामना अनुस्यूत है। 
वैसे भी यह कथा सिर्फ़ दो स्त्रियों की नहीं… एक देश की कथा है, देश के प्रबुद्ध नागरिक कल्लू की भी है जिसके भीतर इतने तरह के द्वंद्व हैं, जटिलताएँ हैं, चिंताएँ हैं। उसके सामने सत्ता का फ़रेबी चेहरा है। इतिहास की क्रूर कथाएँ हैं जो वर्तमान के सामने खुलती चली जाती हैं। कल्लू तत्कालीन केंद्र सरकार से मुठभेड़ करता है। उपन्यास में कुछ हिस्से में अलग से कल्लू यानि देश का न्यूक्लियर साइंटिस्ट डॉ कलीमुद्दीन अंसारी की आत्मकथा है जिसमें वह अपना सरोकार ज़ाहिर करता है। एक गरीब विद्यार्थी जो बाद में देश का कामयाब वैज्ञानिक बनता है और देश को न्यूक्लियर पावर बनाने में मदद करता है। बावजूद इसके अपने ही मुल्क के बदलते माहौल को देख कर सशंकित नागरिक भी है। यह जानते हुए कि वह मुल्क के विरुद्ध गया तो राष्ट्रद्रोही करार दिया जाएगा। जो इस समय नया नैरेटिव गढ़ा गया है, जो सरकार के साथ नहीं, वह देशद्रोही है। कल्लू सरकार और देश का साथ देकर हमेशा के लिए पछतावे की आग में झुलसता रहता है। कल्लू को अहसास हो गया था कि उसके ही हाथों एक सत्तारूढ़ राजनीतिक दल ने एक ऐसा बम करवाया है जिसे आगे वह धार्मिक बम में तब्दील कर देगा और सामाजिक सद्भाव के परखच्चे उड़ जाएँगे। इतिहास गवाह है मगर उसकी गवाही कौन लेता है। 

लेखक शुरुआत में ही पाठकों को सचेत करते चलते हैं कि हेगेल के हवाले से कि अनुभव बताता है कि लोगों और सरकारों ने इतिहास से न कभी कुछ सीखा और न इतिहास से निकले नियमों के अनुसार किया। लेखक को ऐसी कथा कहनी थी जो अब तक नहीं कही गई। जिसकी और किसी का ध्यान नहीं गया था। 

माया एंजेलों का कथन उनके भीतर कौंधता रहा -- 
अपने अंदर एक अनकही कहानी को समेटे रहने से बड़ी कोई पीड़ा नहीं है।

पोखरण में परमाणु परीक्षण के बाद बहुत कुछ बदल गया था। देश दुनिया पर जो असर हुआ सो हुआ, पोखरण जैसे छोटे-से क़स्बे और उसके आसपास के गाँवों पर, ग्रामीणों पर क्या असर पड़ा? किसी ने नहीं सोचा। उस बदलाव को उपन्यास में गहन शोध के बाद दर्ज किया गया है। ऐसे माहौल में सृजन एकमात्र मरहम साबित होता है। ऐसा उपन्यास की दो स्त्रियों ने सोचा। 

यह उपन्यास पोखरण की धरती पर पखावज का उत्सव है। 
वे संगीत उत्सव के माध्यम से बताना चाहती हैं कि पोखरण विस्फोट का ख़ामियाज़ा वहाँ की ज़िंदा आबादियों को झेलना पड़ा। उनकी संततियाँ असाध्य बीमारियों से जूझ रही हैं। नस्लें तबाह हो रहीं।

जैसे अरुंधती के माध्यम से लेखक कहना चाहता है—
हमें बम नहीं, सृजन चाहिए

एक जगह अरुंधती कहती हैं बया से – 
बया, करुणा हमारे मन को क्रिएटिव बनाती है। दुनिया को मानवीय बनाने का सोर्स है करुणा। इस करुणा को क्रिएटिव बना कर ही कोई बड़ा अर्थ दिया जा सकता है।

यह एक भावुक बयान हो सकता है। अगर भावुकता सचेत करती हो तो हर्ज क्या! 

यह बात सिर्फ़ भारत के संदर्भ में नहीं, सरहद पार देशों के लिए हितों को ध्यान में रख कर कही गई है। पाकिस्तान ने चगाई ज़िले में भी उसके बाद यही जवाबी परीक्षण किया गया था। दुनिया भर में मानवाधिकार कार्यकर्ता एटमी हथियारों के खिलाफ आवाज़ उठा रहे। 
यह उपन्यास वैश्विक चिंताओं को केंद्र में रखता है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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