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कवि को न पढ़े गए से पढ़ें! — सुधा सिंह — आलोकधन्वा की कविताओं का सार, संसार


आलोकधन्वा की कविताओं का सार, संसार 

कवि को न पढ़े गए से पढ़ें! —  सुधा सिंह 

आलोकधन्वा सन् सत्तर के दशक के महत्वपूर्ण कवि हैं। 'ब्रूनो की बेटियाँ' , 'भागी हुई लड़कियाँ', 'गोली दागो पोस्टर', 'जनता का आदमी' आदि कविताएं कवि की प्रतिनिधि कविताएं मानी जाती हैं। आलोकधन्वा की कविताओं में एक खास तरह का भाव मिलता है जिसे हम ठीक-ठीक मस्त या फक्कड़ भाव तो नहीं कह सकते। यह आधुनिक बोहेमियन भाव के ज़्यादा क़रीब हैं। इसकी खासियत यह है कि यह दुनिया और दुनियावी संरचना को ज्यों का त्यों नहीं स्वीकार करतीं, इनमें बदलने की तीव्र उत्कंठा है, यथास्थितिवाद से समझौता करने को तैयार नहीं, बराबरी और जनतंत्र के भाव का इनमें स्वीकार भी है साथ ही प्रतिरोध का भाव भी है।


 अपने वर्ग की चेतना को छोड़ जन से जुड़ने का इनमें प्रयास है। छोटे सुखों को पकड़ने की इच्छा, मामूली पर नज़र लेकिन सब कुछ एक खास रुमानी अंदाज में। जन से संबद्ध होने की इच्छा है पर संबंद्धता नहीं, डिसकनेक्शन है। आलोकधन्वा की पीढ़ी जहाँ धूमिल, रघुवीर सहाय से प्रभावित है, वहीं मुक्तिबोध से भी। पर मुक्तिबोध की कविताओं में मौजूद वर्गान्तरण की तीव्र छटपटाहट और ऐसा न हो सकने का तीखा दंश इस दौर की कविताओं में ग़ायब है। जैसे इन्होंने मान लिया है कि वे ‘डि-क्लास’ हो चुके हैं! जबकि इनकी कविताओं से इनका मध्यवर्गीय मन, जीवनशैली तथा जीवनदृष्टि बराबर झांकती दिखती है! मुक्तिबोध ने सच में निम्न मध्यवर्गीय जीवन जिया और उसकी विसंगतियों से छटपटाते रहे। आमदनी के नियमित जरिए का अभाव, पक्की नौकरी का अभाव, पत्नी को शिक्षित करने और बच्चों की परवरिश करने की चिंता, पत्नी को गर्भपात के बाद के अवसाद और चिड़चिड़ेपन से बचाने की चिंता, उसकी सेहत का ख़्याल, जनतंत्र में लेखक की भूमिका से जुड़े ठोस सामाजिक सवाल- मुक्तिबोध के यहां किसी रुमानियत का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन के ठोस प्रश्न बनकर आए हैं। वे औरत की बात करते हैं, कविता में भी, तो वह दूर से देखी हुई या संवेदनात्मक तौर पर दूर करके देखी गई स्त्री का आकारविहीन चेहरा नहीं है। वह ठोस से इतिहास या मिथक की यात्रा है, सदियों का सफरनामा है लेकिन ऐसा नहीं कि जिसे पहचाना न जा सके।


आलोकधन्वा जहाँ व्यक्तिगत संदर्भ से स्त्री पर कविता लिखते हैं, वहाँ वे ज़्यादा सफल हुए हैं और जहाँ वे स्त्री के शरीर और भोग से संबंधित कविता लिखते हैं, वहां वे पुंसवादी दृष्टिकोण को व्यक्त करते हैं और धूमिल के क़रीब चले जाते हैं। उनकी कुछ कविताओं में स्त्री का पहचाना चेहरा है, खासकर जब वे माँ पर लिखते हैं तो बड़े सुंदर ढंग से उस ग्राम्य स्त्री कवि को याद करते हैं जिसका गाना चौके में जाने के कारण बाधित हो जाता था और वह गाते-गाते चुप होकर अपने बच्चों से दूर रसोई में ओझल हो जाती थी। कवि कहता है कि वह अपनी माँ का वह गाना आज भी नहीं भूला।
शाम की रोशनी के सामने वह गाती
हम सब भाई-बहन उसके बदन से लगकर
चुप हो उसे सुनते
वह इतना बढ़िया गाती कि लगता
वह कोई और काम न करे
लेकिन तभी उसे जाना पड़ता रसोई में 

‘रसोई’ जो घर का जरूरी हिस्सा है, वहाँ जाते ही स्त्री गुम हो जाती है। बच्चे उसे ढूँढना चाहते हैं, उसके पास रहना चाहते हैं, लेकिन रह नहीं पाते, क्योंकि औरत अब गाँव की सीमा के बाहर नहीं, जहाँ शाम ढल रही है और वह अपने बच्चों को घर जाने के लिए बुलाने आई है इसी क्रम में उन्हें मधुर कंठ से गीत सुना रही है, वह  स्त्री अब ‘रसोई’ में है। इस अंश को खोलने पर सामाजिक श्रम विभाजन के अनेक परिचित, दमनकारी चेहरे सामने आ सकते हैं। वह स्त्री जो गाती थी, रसोई में गुम हो जाती है, बच्चों को अंधेरे से डर लगता है और वे रात होने पर अपनी माँ से बिल्कुल अलग नहीं रह पाते लेकिन उन्हें ऐसा ही करना पड़ता है क्योंकि माँ की घर में अन्य प्रकार की भूमिका भी है, बच्चों को उसके समय का एक अंश ही मिल सकता है।
हम उसे देखते रसोई में जाते हुए
जैसे-जैसे रात होती जाती
हम माँ से तनिक दूर नहीं रह पाते
 लेकिन जब आलोकधन्वा शरीर की निजता की बात करते हैं तो स्त्री के संदर्भ में इतिहास और सामाजिक बरताव से अपुष्ट, काव्य-सत्य ढूँढ लाते हैं जिसका स्त्री के जीवन-सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। निजता स्त्री की बनाई नहीं है। स्त्रियों ने अगर शरीर को निजी बनाया होता, तो सबसे पहले वे अपनी निजता रचतीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। स्त्रियों के लिए निजता, उपहार की चीज नहीं रही है, वह आज भी निजता हासिल करने के लिए संघर्षरत है।
स्त्रियों ने रचा जिसे युगों में
युगों की रातों में उतने निजी हुए शरीर
आज मैं चला ढूँढ़ने अपने शरीर में
कवि यहाँ स्त्रियों द्वारा रची गई किस निजता की बात कर रहा है, स्पष्ट नहीं है। स्त्रियों ने सभ्यता का निर्माण नहीं किया, उन्हें ऐसा करने नहीं दिया गया। उसने पुरुष को पैदा किया, रच न सकी, उल्टे उसीने स्त्री को स्त्री बनाया! स्त्रीकी सभ्यता में जितनी हिस्सेदारी रही, उनके निशान मिटा दिए गए, जो अब बरताव में है, वह अनुकरणकर्ता की भूमिका है। स्त्रियों को न तो पुंसवादी सभ्यता ने सिखाया है न उनसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा की गई है कि युग-युग से रातों में शरीर ‘निजी’ हो जाएं और वह उसे अपनी इच्छानुसार हासिल कर सके! कामसूत्र से लेकर व्यवहार ज्ञान तक स्त्री को पुरुष की इच्छा के अनुकूल ही दिन तो दिन, रात को भी बरतना सिखाया गया है। फिर कवि किस तरह की और किसकी निजता की बात कर रहा है? और आखिरी पंक्ति कि ‘आज मैं चला ढूँढ़ने अपने शरीर में’, प्रश्न उठता है कि क्या ढूँढ़ने चला कवि अपने शरीर में? स्त्रियों ने जिसे युगों में रचा, उतने युगों की रातों में शरीर ‘निजी’ कैसे हुए? किसके लिए हुए? पुरुषों के लिए हो सकते हैं कि रात उनके लिए शरीर की निजता की जन्मदात्री हो पर कम से कम स्त्री के लिए तो ऐसा कहीं से नहीं हुआ! यह अपनी संवेदना में पुंसवादी कविता है।
 यह 1995 की लिखी कविता है यानि तब जबकि भारत में भी स्त्रीवादी लेखन और साहित्य की धमक ठीक से सुनाई दे रही थी और जनतंत्र में, स्त्री अधिकारों को एक नागरिक के नाते सुनिश्चित किया जा चुका था। आलोकधन्वा की कविताएँ आज वैसे ही नहीं पढ़ी जाएंगी जैसे सन् सत्तर में पढ़ी गईं थीं। 

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और सुधा सिंह जी की फेसबुक पोस्ट 
"मैं नहीं उन लोगों में
जो भुला पाते हैं प्यार की गई स्त्री को
और चैन से रहते हैं "
हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि की ये काव्य पंक्तियां हैं और आज उनका जन्मदिन है, ऐसा फेसबुक बता रहा है। इस कवि की बहुत सी कविताएं मुझे बेहद पसंद हैं और इनसे थोड़ा बहुत परिचय कलकत्ते में हुआ। मेरी नई नवेली पहली पक्की नौकरी, जिसकी मियाद छह महीने की थी, और जब मुझे कॉलेज के अनकहे नियम के अनुसार लदर फदर टखने से ऊंची साड़ी बांधने का कौशल हस्तगत हो रहा था, नये नये साहित्यिक कार्यक्रम करवाने के ज़ोम में जो पहला नाम सहज ही आया, वह इसी कवि का था।

मेरी तरफ से भी कवि को जन्मदिन की हार्दिक बधाई। लेकिन उन्हें जन्मदिन की बधाई देने के लिए मैं इन पंक्तियों का चयन नहीं करूंगी। इन पंक्तियों को मैंने दूसरों की वॉल से उधार लिया है, जन्मदिन की बधाई के अलावा एक बात कहने के लिए।

बात जो कहनी है वह यह कि आज सुबह से बहुत रोका अपने को कि लोग खुशी से इन पंक्तियों को लगा लगा रहे हैं, लगाने दो, चुप रहो। कुछ न बोलो। पर लोग हैं कि इन्हीं पंक्तियों को कॉपी पेस्ट किए जा रहे! कोई और अंश कवि की कविता का बधाई देने को जैसे मिल ही न रहा हो!

इस काव्य अंश को प्रशंसा भाव से अलग कर तटस्थ रूप में पढ़िए। सामान्य रूप में जो हासिल होगा वह अर्थ कवि की बीते हुए प्रेम की स्मृतियों और प्रेमिका को याद रखने की 'क्षमता' का है! वह अन्य पुरूषों को धिक्कार रहा, ललकार रहा कि वे बीते प्रेम को भुला देते हैं, जबकि उसी धिक्कार में एक थोथा अहंकार युक्त स्वीकार है कवि का कि मैं ऐसा नहीं करता। लेकिन इसे स्त्री पक्ष पर व्यक्त करने के लिए वह जिन शब्दों को चुनता है, वे शब्द उसके पुरुष दम्भ की मुखर चुगली कर जाते हैं! वह लिखता है -

' मैं उन लोगों में नहीं
जो भुला पाते हैं प्यार की गई स्त्री को
और चैन से रहते हैं!'

यह जो काव्य पंक्ति का हिस्सा है- "प्यार की गई स्त्री को " , कानों में यों ठुक रहा है जैसे 'इस्तेमाल किया हुआ कप, ब्रश, बिस्तर या फिर आराम के लिए आमंत्रित करता, बुहारा हुआ घर' , आदि आदि। स्त्री न हुई किसी किराने की दूकान का सामान हो गई!!! तब कवि अपनी इस उन्नत मस्तक घोषणा के बाद भी आदिम भाव में ही दिखता है और दुखद कि उन जैसा ही दिखता है, जिनके जैसा नहीं दिखने की घोषणा कर रहा है!
कह सकते हैं ऐसा शब्द के बरतने के अभ्यासवश ही हुआ होगा या मैं ही बाल की खाल निकाल रही। लेकिन मेरे प्रिय और अपने समय के महत्त्वपूर्ण कवि की यह चूक बहुतों को बरज सकती है, और आज के संदर्भ में भाषा के सावधान प्रयोगों के लिए सजग कर सकती है, इस कारण लिखना ज़रूरी लगा।

पुनः: जन्मदिन की बधाई

—  सुधा सिंह
संपर्क ईमेल singhsudha.singh66@gmail.com

1. ब्रूनो की बेटियाँ

वे ख़ुद टाट और काई से नहीं बनी थीं
उनकी माताएँ थीं
और वे ख़ुद माताएँ थीं।


उनके नाम थे
जिन्हें बचपन से ही पुकारा गया
हत्या के दिन तक
उनकी आवाज़ में भी
जिन्‍होंने उनकी हत्या की !


उनके चेहरे थे
शरीर थे, केश थे
और उनकी परछाइयाँ थीं धूप में।


गंगा के मैदानों में उनके घंटे थे काम के
और हर बार उन्हें मज़दूरी देनी पड़ी !
जैसे देखना पड़ा पूरी पृ‍थ्वी को
गैलीलियो की दूरबीन से !


वे राख और झूठ नहीं थीं
माताएँ थीं और कौन कहता है ? कौन ?  कौन वहशी ?


कि उन्होंने बग़ैर किसी इच्छा के जन्म दिया ?


उदासीनता नहीं था उनका गर्भ
ग़लती नहीं था उनका गर्भ
आदत नहीं था उनका गर्भ
कोई नशा-
कोई नशा कोई हमला नहीं था उनका गर्भ


कौन कहता है?
कौन अर्थशास्त्री ?


उनके सनम थे
उनमें झंकार थी


वे माताएँ थीं
उनके भी नौ महीने थे
किसी ह्वेल के भीतर नहीं - पूरी दुनिया में
पूरी दूनिया के नौ महीने !


दुनिया तो पूरी की पूरी है हर जगह
अटूट है
कहीं से भी अलग-थलग की ही नहीं जा सकती
फिर यह निर्जन शिकार मातृत्व का ?


तुम कभी नहीं चाहते कि
पूरी दुनिया उस गाँव में आये
जहाँ उन मज़दूर औरतों की हत्या की गयी ?


किस देश की नागरिक होती हैं वे
जब उनके अस्तित्व के सारे सबूत मिटाये जाते हैं?
कल शाम तक और
कल आधी रात तक
वे पृथ्वीत की आबादी में थीं
जैसे ख़ुद पृथ्वी
जैसे ख़ुद हत्यारे
लेकिन आज की सुबह?
जबकि कल रात उन्हें जिंदा जला दिया गया !


क्या सिर्फ़ जीवित आदमियों पर ही टिकी है
जीवित आदमियों को दुनिया ?


आज की सुबह भी वे पृथ्वी की आबादी में हैं


उनकी सहेलियाँ हैं
उनके कवि हैं
उनकी असफलताएँ
जिनसे प्रभावित हुआ है भारतीय समय
सिर्फ़ उनका वर्ग ही उनका समय नहीं है !


कल शाम तक यह जली हुई ज़मीन
कच्ची मिट्टी के दिये की तरह लौ देगी
और
अपने नये बाशिंदों को बुलायेगी।


वे ख़ानाबदोश नहीं थीं
कुएँ के जगत पर उनके घड़ों का निशान हैं
उनकी कुल्हाड़ियों के दाग़
शीशम के उस सफ़ेद तने पर


बाँध की ढलान पर उतरने के लिए
टिकाये गये उनके पत्थर


उनके रोज़-रोज़ से रास्ते बने हैं मिट्टी के ऊपर


वे अचानक कहीं से नहीं
बल्कि नील के किनारे-किनारे चलकर
पहुँची थीं यहाँ तक।


उनके दरवाज़े थे


जिनसे दिखते थे पालने
केश बाँधने के रंगीन फ़ीते
पपीते के पेड़
ताज़ा कटी घास और
तंबाकू के पत्ते-
जो धीरे-धीरे सूख रहे थे
और साँप मारने वाली बर्छी भी।


वे धब्बा और शोर नहीं थीं
उनके चिराग़ थे
जानवर थे
घर थे


उनके घर थे
जहाँ आग पर देर तक चने की दाल सीझती थी
आटा गूँधा जाता था
वहाँ मिट्टी के बर्तन में नमक था
जो रिसता था बारिश के दिनों में
उनके घर थे
जो पड़ते थे बिल्लियों के रास्तों में।


वहाँ रात ढलती थी
चाँद गोल बनता था


दीवारें थीं
उनके आँगन थे
जहाँ तिनके उड़ कर आते थे
जिन्हें चिड़िया पकड़ लेती थीं हवा में ही।


वहाँ कल्पना थी
वहाँ स्मृति थी।


वहाँ दीवारें थीं
जिन पर मेघ और सींग के निशान थे
दीवारें थीं
जो रोकती थी झाड़ियों को
आँगन में जाने से।


घर की दीवारें
बसने की ठोस इच्छानएँ
उन्हें मिट्टी के गीले लोंदों से बनाया गया था
साही के काँटों से नहीं
भालू के नाख़ून से नहीं


कौन मक्कार उन्हें जंगल की तरह दिखाता है
और कैमरों से रंगीन पर्दों पर


वे मिट्टी की दीवारें थीं
प्राचीन चट्टानें नहीं
उन पर हर साल नयी मिट्टी
चढ़ाई जाती थी !
वे उनके घर थे - इन्तज़ार नहीं।
पेड़ के कोटर नहीं
उड़ रही चील के पंजों में
दबोचे हुए चूहे नहीं।


सिंह के जबड़े में नहीं थे उनके घर
पूरी दुनिया मे नक़्शे में थे एक जगह
पूरे के पूरे


वे इतनी सुबह काम पर आती थीं
उनके आँचल भीग जाते थे ओस से
और तुरत डूबे चाँद से


वे इतनी सुबह आती थीं
वे कहाँ आती थीं ? वे कहाँ आती थीं ?
वे क्यों आती थीं इतनी सुबह
किस देश के लिए आती थीं इतनी सुबह ?


क्या वे सिर्फ़ मालिकों के लिए
आती थीं इतनी सुबह
क्याथ मेरे लिए नहीं?
क्याथ तुम्हारे लिए नहीं?


क्या उनका इतनी सुबह आना
सिर्फ़ अपने परिवारों का पेट पालना था ?

कैसे देखते हो तुम इस श्रम को ?
भारतीय समुद्र में तेल का जो कुआँ खोदा
जा रहा है
क्या वह मेरी ज़िंदगी से बाहर है?
क्या वह सिर्फ़ एक सरकारी काम है ?

कैसे देखते हो तुम श्रम को !


शहरों को उन्होंने धोखा और
जाल नहीं कहा


शहर सिर्फ़ जेल और हारे हुए मुक़दमे
नहीं थे उनके लिए


उन्होंने शहरों को देखा था
किसी जंगली जानवर की आँख से नहीं !


शहर उनकी ज़िंदगी में आते-जाते थे
सिर्फ़ सामान और क़ानून बनकर नहीं
सबसे अधिक उनके बेटों के साथ-साथ
जो इस समय भी वहाँ
चिमनियों के चारों ओर
दिखाई दे रहे हैं !


उनकी हत्या की गयी
उन्होंने आत्महत्या नहीं की
इस बात का महत्व और उत्सव
कभी धूमिल नहीं होगा कविता में !


वह क्या था उनके होने में
जिसके चलते उन्हें जिंदा जला दिया गया?
बीसवीं शताब्दी के आख़िरी वर्षों में
एक ऐसे देश के सामने
जहाँ संसद लगती है?


वह क्या था उनके होने में
जिसे ख़रीदा नहीं जा सका
जिसका इस्तेमाल नहीं किया जा सका


जिसे सिर्फ़ आग से जलाना पड़ा
वह भी आधी रात में कायरों की तरह
बंदूक़ों के घेरे में ?


बातें बार-बार दुहरा रहा हूँ मैं
एक साधारण-सी बात का विशाल प्रचार कर रहा हूँ !


मेरा सब कुछ निर्भर करता है
इस साधारण-सी बात पर !


वह क्या था उनके होने में
जिसे जला कर भी
नष्ट नहीं किया जा सकता !


पागल तलवारें नहीं थीं उनकी राहें
उनकी आबादी मिट नहीं गयी राजाओं की तरह !
पागल हाथियों और अंधी तोपों के मालिक
जीते जी फ़ॉसिल बन गये
लेकिन लकड़ी का हल चलाने वाले
चल रहे हैं


रानियाँ मिट गयीं

ज़ंग लगे टिन जितनी क़ीमत भी नहीं
रह गयी उनकी याद की


रानियाँ मिट गयीं
लेकिन क्षितिज तक फ़सल काट रही
औरतें
फ़सल काट रही हैं।

(1989)


2. भागी हुई लड़कियाँ

एक

घर की ज़ंजीरें 
कितना ज़्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है


क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भागती थी? 
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट 
सिर्फ़ आँखों की बेचैनी दिखाने-भर उनकी रोशनी?


और वे तमाम गाने रजतपर्दों पर दीवानगी के 
आज अपने ही घर में सच निकले !


क्या तुम यह सोचते थे कि 
वे गाने सिर्फ़ अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए 
रचे गये थे ?
और वह खतरनाक अभिनय 
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी ज़िदगियों में फैल जाता था?
दो

तुम तो पढ़कर सुनाओगे नहीं
कभी वह ख़त
जिसे भागने से पहले वह 
अपनी मेज़ पर रख गयी
तुम तो छिपाओगे पूरे ज़माने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा, उसका पारा
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव 
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र 
जो अभी काफ़ी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?


उसकी बची-खुची चीज़ों को 
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूँज रही है उसकी उपस्थिति से 
बहुत अधिक 
संतूर की तरह
केश में


तीन

उसे मिटाओगे 
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहाँ से भी मिटाओगे

उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर 
वहाँ से भी
मैं जानता हूँ 
कुलीनता की हिंसा !

लेकिन उसके भागने की बात 
याद से नहीं जायेगी 
पुरानी पवन चक्कियों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अंतिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियाँ होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है 
जैसे फूलों में गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

चार

अगर एक लड़की भागती है 
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
सिर्फ़ जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है


तुम्हारे टैंक जैसे बंद और मज़बूत
घर से बाहर 
लड़कियाँ काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाज़त नहीं दूँगा
कि तुम अब 
उनकी संभावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह ख़ुद शामिल होगी सब में
ग़लतियाँ भी ख़ुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी
शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जायेगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पाँच

लड़की भागती है
जैसे सफ़ेद घोड़े पर सवार 
लालच और जुए के आर-पार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है !

तुम 
जो 

पत्नियों को अलग रखते हो 
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो 
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेख़ौफ़ भटकती है 
ढूँढ़ती हुई अपना व्यक्तित्व 
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों 
और प्रेमिकाओं में !

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में भी
जहाँ प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा !

छह

कितनी-कितनी लड़कियाँ 
भागती हैं मन ही मन 
अपने रतजगे, अपनी डायरी में 
सचमुच की भागी लड़कियों से 
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में 
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं ?
क्या तुम्हें दांपत्य दे दिया गया ?
क्या तुम उसे उठा लाये
अपनी हैसियत, अपनी ताक़त से ?
तुम उठा लाये एक ही बार में 
एक स्त्री की तमाम रातें
जिसके निधन के बाद की भी रातें !

तुम नहीं रोये पृथ्वी पर एक बार भी 
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ़ आज की रात रूक जाओ 
तुम से नहीं कहा किसी स्त्री ने

सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ 
कितनी-कितनी बार कहा कितनी
स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाज़ों तक दौड़ती हुई आयीं वे
सिर्फ़ आज की रात रूक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ़ आज की रात भी रहेगी।


(1988)

3. गोली दागो पोस्टर

यह उन्नीस सौ बहत्तर की बीस अप्रैल है या 
किसी पेशेवर हत्यारे का दायाँ हाथ या किसी जासूस
का चमड़े का दस्ताना या किसी हमलावर की दूरबीन पर 
टिका हुआ धब्बा है
जो भी हो - इसे मैं केवल एक दिन नहीं कह सकता !

जहाँ मैं लिख रहा हूँ 
यह बहुत पुरानी जगह है
यहाँ आज भी शब्दों से अधिक तम्बारकू का 
इस्तेमाल होता है

आकाश यहाँ एक सूअर की ऊँचाई भर है
यहाँ जीभ का इस्तेकमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ आँख का इस्तेदमाल सबसे कम हो रहा है
यहाँ कान का इस्ते माल सबसे कम हो रहा है
यहाँ नाक का इस्ते माल सबसे कम हो रहा है

यहाँ सिर्फ़ दाँत और पेट हैं
मिट्टी में धँसे हुए हाथ हैं
आदमी कहीं नहीं है
केवल एक नीला खोखल है
जो केवल अनाज माँगता रहता है-
एक मूसलाधार बारिश से
दूसरी मूसलाधार बारिश तक

यह औरत मेरी माँ है या
पाँच फ़ीट लोहे की एक छड़
जिस पर दो सूखी रोटियाँ लटक रही हैं-
मरी हुई चिड़ियों की तरह
अब मेरी बेटी और मेरी हड़ताल में
बाल भर भी फ़र्क़ नहीं रह गया है 
जबकि संविधान अपनी शर्तो पर
मेरी हड़ताल और मेरी बेटी को
तोड़ता जा रहा है

क्या इस आकस्मिक चुनाव के बाद
मुझे बारूद के बारे में
सोचना बंद कर देना चाहिए?
क्या उन्नीस सौ बहत्तहर की इस बीस अप्रैल को 
मैं अपने बच्चे के साथ
एक पिता की तरह रह सकता हूँ?
स्याही से भरी दावात की तरह-
एक गेंद की तरह
क्या मैं अपने बच्चों के साथ
एक घास भरे मैदान की तरह रह सकता हूँ?

वे लोग अगर अपनी कविता में मुझे
कभी ले भी जाते हैं तो
मेरी आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर
मेरा इस्तेमाल करते हैं और फिर मुझे
सीमा से बाहर लाकर छोड़ देते हैं

वे मुझे राजधानी तक कभी नहीं पहुँचने देते हैं
मैं तो जिला-शहर तक आते-आते जकड़ लिया जाता हूँ!

सरकार ने नहीं - इस देश की सबसे
सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया

बहन के पैरों के आस-पास
पीले रेंड़ के पौधों की तरह 
उगा था जो मेरा बचपन-
उसे दारोग़ा का भैंसा चर गया
आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर
एक दारोग़ा को गोली दागने का अधिकार है
तो मुझे क्यों नहीं?

जिस ज़मीन पर 
मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ
जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ
जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ
जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और
जिस ज़मीन से अन्न निकालकर मैं
गोदामों तक ढोता हूँ
उस ज़मीन के लिए गोली दागने का अधिकार
मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को
सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

यह कविता नहीं हैं
यह गोली दागने की समझ है
जो तमाम क़लम चलानेवालों को
तमाम हल चलानेवालों से मिल रही है।

1972

4. जनता का आदमी

बर्फ़ काटने वाली मशीन से आदमी काटने वाली मशीन तक
कौंधती हुई अमानवीय चमक के विरूद्ध
जलतें हुए गाँवों के बीच से गुज़रती है मेरी कविता;
तेज़ आग और नुकीली चीख़ों के साथ
जली हुई औरत के पास
सबसे पहले पहुँचती है मेरी कविता;

जबकिं ऐसा करते हुए मेरी कविता जगह-जगह से जल जाती है
और वे आज भी कविता का इस्तेमाल मुर्दागाड़ी की तरह कर रहे हैं
शब्दों के फेफड़ों में नये मुहावरों का ऑक्सी जन भर रहे हैं,
लेकिन जो कर्फ़्यू के भीतर पैदा हुआ,
जिसकी साँस लू की तरह गर्म है
उस नौजवान खान मज़दूर के मन में
एक बिल्कुल नयी बंदूक़ की तरह याद आती है मेरी कविता।

जब कविता के वर्जित प्रदेश में
मैं एकबारगी कई करोड़ आदमियों के साथ घुसा
तो उन तमाम कवियों को
मेरा आना एक अश्लील उत्पात-सा लगा
जो केवल अपनी सुविधाके लिए
अफ़ीम के पानी में अगले रविवार को चुरा लेना चाहते थे
अब मेरी कविता एक ली जा रही जान की तरह बुलाती है,

भाषा और लय के बिना, केवल अर्थ में-
उस गर्भवती औरत के साथ
जिसकी नाभि में सिर्फ़ इसलिए गोली मार दी गयी
कि कहीं एक ईमानदार आदमी पैदा न हो जाय।

सड़े हुए चूहों को निगलते-निगलते
जिनके कंठ में अटक गया है समय
जिनकी आँखों में अकड़ गये हैं मरी हुई याद के चकत्ते
वे सदा के लिए जंगलों में बस गये हैं -
आदमी से बचकर
क्यों कि उनकी जाँघ की सबसे पतली नस में
शब्द शुरू होकर
जाँघ की सबसे मोटी नस में शब्द समाप्त हो जाते हैं
भाषा की ताज़गी से वे अपनी नीयत को ढँक रहे हैं
बस एक बहस के तौर पर
वे श्रीकाकुलम जैसी जगहों का भी नाम ले लेते हैं,
वे अजीब तरह से सफल हुए हैं इस देश में
मरे हुए आदमियों के नाम से
वे जीवित आदमियों को बुला रहे हैं।

वे लोग पेशेवर ख़ूनी हैं
जो नंगी ख़बरों का गला घोंट देते हैं
अख़बार की सनसनीख़ेज़ सुर्खियों की आड़ में
वे बार-बार उस एक चेहरे के पालतू हैं
जिसके पेशाबघर का नक़्शा मेरे गाँव के नक़्शे से बड़ा है।

बर्फीली दरारों में पायी जाने वाली
उजली जोंकों की तरह प्रकाशन संस्थाएँ इस देश कीः
हुगली के किनारे आत्महत्या करने के पहले
क्यों चीख़ा था वह युवा कवि - ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’
-उसकी लाश तक जाना भी मेरे लिए संभव नहीं हो सका
कि भाड़े पर लाया आदमी उसके लिए नहीं रो सका 
क्योंकि इसे सबसे पहले 
आज अपनी असली ताक़त के साथ हमलावर होना चाहिए।

हर बार कविता लिखते-लिखते
मैं एक विस्फोटक शोक के सामने खड़ा हो जाता हूँ 
कि आखिर दुनिया के इस बेहूदे नक़्शे को
मुझे कब तक ढोना चाहिए,
कि टैंक के चेन में फँसे लाखों गाँवों के भीतर
एक समूचे आदमी को कितने घंटों तक सोना चाहिए?

कलकत्ते के ज़ू में एक गैंडे ने मुझसे कहा 
कि अभी स्वतंत्रता कहीं नहीं हैं,  सब कहीं सुरक्षा है;
राजधानी के सबसे सुर‍क्षित हिस्से में
पाला जाता है एक आदिम घाव
जो पैदा करता है जंगली बिल्लियों के सहारे पाशविक अलगाव
तब से मैंने तय कर लिया है
कि गैंडे की कठिन चमड़ी का उपयोग युद्ध के लिए नहीं
बल्कि एक अपार करूणा के लिए होना चाहिए।

मैं अभी मांस पर खुदे हुए अक्षरों को पढ़ रहा हूँ-
ज़हरीली गैसों और खूंखार गुप्तचरों से लैस
इस व्यवस्था का एक अदना सा आदमी
मेरे घर में किसी भी समय ज़बर्दस्ती घुस आता है
और बिजली के कोड़ों से 
मेरी माँ की जाँघ 
मेरी बहन की पीठ

और मेरी बेटी की छातियों को उधेड़ देता है,
मेरी खुली आँखों के सामने
मेरे वोट से लेकर मेरी प्रजनन शक्ति तक को नष्ट कर देता है,
मेरी कमर में रस्से बाँध कर 
मुझे घसीटता हुआ चल देता है, 
जबकि पूरा गाँव इस नृशंस दृश्य, को
तमाशबीन की तरह देखता रह जाता है।
क्योंकि अब तक सिर्फ़ जेल जाने की कविताएँ लिखी गयीं
किसी सही आदमी के लिए
जेल उड़ा देने की कविताएँ पैदा नहीं हुईं।

एक रात
जब मैं ताज़े और गर्म शब्दों की तलाश में था-
हज़ारों बिस्तरों में पिछले रविवार को पैदा हुए बच्चे निश्चिंत सो रहे थे, 
उन बच्चों की लम्बाई
मेरी कविता लिखने वाली क़लम से थोड़ी-सी बड़ी थी।
तभी मुझे कोने में वे खड़े दिखाई दे गये, वे खड़े थे - कोने में
भरी हुई बंदूक़ो की तरह, सायरानो की तरह, सफ़ेद चीते की तरह,
पाठ्यक्रम की तरह, बदबू और संविधान की तरह।
वे अभिभावक थे, 
मेरी पकड़ से बाहर- क्रूर परजीवी,
उनके लिए मैं बिलकुल निहत्था था
क्योंकि शब्दों से उनका कुछ नहीं बिगड़ता है
जब तक कि उनके पास सात सेंटीमीटर लम्बी गोलियाँ हैं
- रायफ़लों में तनी-पड़ी।
वे इन बच्चों को बिस्तरों से उठाकर 
सीधे बारूदख़ाने तक ले जायेंगे।
वे हर तरह की कोशिश करेंगे
कि इन बच्चों से मेरी जान-पहचान न हो
क्योंकि मेरी मुलाक़ात उनके बारूदख़ाने में आग की तरह घुसेगी।

मैं गहरे जल की आवाज़-सा उतर गया।
बाहर हवा में, सड़क पर
जहाँ अचानक मुझे फ़ायर स्टेशन के ड्राइवरों ने पकड़ लिया और पूछा-
आखिर इस तरह अक्षरों का भविष्य क्या होगा ?
आखिर कब तक हम लोगों को दौड़ते हुए दमकलों के सहारे याद     किया जाता रहेगा ?

उधर युवा डोमों ने इस बात पर हड़ताल की
कि अब हम श्मशान में अकाल-मृत्यु के मुर्दों को
सिर्फ़ जलायेंगे ही नहीं
बल्कि उन मुर्दों के घर तक जायेगें।

अक्सर कविता लिखते हुए मेरे घुटनों से 
किसी अज्ञात समुद्र-यात्री की नाव टकरा जाती है
और फिर एक नये देश की खोज शुरू हो जाती है- 
उस देश का नाम वियतनाम ही हो यह कोई ज़रूरी नहीं
उस देश का नाम बाढ़ मे बह गये मेरे पिता का नाम भी हो       सकता है,
मेरे गाँव का नाम भी हो सकता है
मैं जिस खलिहान में अब तक
अपनी फ़सलों, अपनी पंक्तियों को नीलाम करता आया हूँ
उसके नाम पर भी यह नाम हो सकता है।

क्यों पूछा था एक सवाल मेरे पुराने पड़ोसी ने- 
मैं एक भूमिहीन किसान हूँ,
क्या मैं कविता को छू सकता हूँ ? 
अबरख़ की खान में लहू जलता है जिन युवा स्तनों और बलिष्ठ कंधों का
उन्हें अबरख़ ‘अबरख़’ की तरह
जीवन में एक बार भी याद नहीं आता है

क्यों हर बार आम ज़िंदगी के सवाल से
कविता का सवाल पीछे छूट जाता है ?


इतिहास के भीतर आदिम युग से ही
कविता के नाम पर जो जगहें ख़ाली कर ली जाती हैं-
वहाँ इन दिनों चर्बी से भरे हुए डिब्बे ही अधिक जमा हो रहे हैं,
एक गहरे नीले काँच के भीतर
सुकान्त की इक्कीस फ़ीट लंबी तड़पती हुई आँत
निकाल कर रख दी गयी है,
किसी चिर विद्रोह की रीढ़ पैदा करने के लिए नहीं;
बल्कि कविता के अज़ायबघर को
पहले से और अजूबा बनाने के लिए।
असफल, बूढ़ी प्रेमिकाओं की भीड़ इकट्ठी करने वाली 
महीन तम्बाकू जैसी कविताओं के बीच
भेड़ों की गंध से भरा मेरा गड़रिये-जैसा चेहरा
आप लोगों को बेहद अप्रत्याशित लगा होगा, 
उतना ही
जितना साहू जैन के ग्ला‍स-टैंक में
मछलियों की जगह तैरती हुई गजानन माधव मुक्तिबोध की लाश।


बम विस्फोट में घिरने के बाद का चेहरा मेरी ही कविताओं में क्यों है?
मैं क्यों नहीं लिख पाता हूँ वैसी कविता
जैसी बच्चों की नींद होती है, 
खान होती है, 
पके हुए जामुन का रंग होता है, 
मैं वैसी कविता क्यों नहीं लिख पाता 
जैसी माँ के शरीर में नये पुआल की महक होती है,
जैसी बाँस के जंगल में हिरन के पसीने की गंध होती है,
जैसे ख़रगोश के कान होते हैं,
 जैसे ग्रीष्म के बीहड़ एकांत में
नीले जल-पक्षियों का मिथुन होता है,
जैसे समुद्री खोहों में लेटा हुआ खारा कत्थईपन होता है, 
मैं वैसी कविता क्यों नहीं लिख पाता 
जैसे हज़ारो फ़ीट की ऊँचाई से गिरनेवाले झरने की पीठ होती है ?
हाथी के पैरों के निशान जैसे गंभीर अक्षरों में 
जो कविता दीवारों पर लिखी होती है
कई लाख हलों के ऊपर खुदी हुई है जो
कई लाख मज़दूरों के टिफ़िन कैरियर में
ठंढी, कमज़ोर रोटी की तरह लेटी हुई है जो कविता ?

एक मरे हुए भालू से लड़ती रहीं उनकी कविताएँ
कविता को घुड़दौड़ की जगह बनाने वाले उन सट्टेबाज़ों की
बाज़ी को तोड़ सकता है वही
जिसे आप मामूली आदमी कहते है;
क्योंकि वह किसी भी देश के झंडे से बड़ा है।
इस बात को वह महसूस करने लगा है,
महसूस करने लगा है वह
अपनी पीठ पर लिखे गये सैकड़ों उपन्यासों,
अपने हाथों से खोदी गयी नहरों और सड़कों को


कविता की एक महान सम्भावना है यह
कि वह मामूली आदमी अपनी कृतियों को महसूस करने लगा है-
अपनी टाँग पर टिके महानगरों और 
अपनी कमर पर टिकी हुई राजधानियों को
महसूस करने लगा है वह।
धीरे-धीरे उसका चेहरा बदल रहा है, 
हल के चमचमाते हुए फाल की तरह पंजों को
बीज, पानी और ज़मीन के सही रिश्तों को

वह महसूस करने लगा है।
कविता का अर्थ विस्तार करते हुए
वह जासूसी कुत्तों की तरह शब्दों को खुला छोड़ देता है,
एक छिटकते हुए क्षण के भीतर देख लेता है वह
ज़ंजीर का अकेलापन,
वह जान चुका है -
क्यों एक आदिवासी बच्चा घूरता है अक्षर,
लिपि से डरते हुए,
इतिहास की सबसे घिनौनी किताब का राज़ खोलते हुए।


(1972)




(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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अवैध डाटा चोरी से लोकतंत्र की रक्षा हो — शशि थरूर


अवैध डाटा चोरी से लोकतंत्र की रक्षा हो — शशि थरूर

अवैध डाटा चोरी से लोकतंत्र की रक्षा हो   — शशि थरूर 

: 7 जून 2019, ब्यूरो
यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है और मैं सरकार से यह निवेदन करता हूँ कि निजता के हमारे मौलिक अधिकार की रक्षा और हमारे लोकतंत्र को बचाने के लिए व्यापक कानून लाया जाए। — शशि थरूर

केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस पार्टी के सांसद शशि थरूर ने आज संसद में अवैध डाटा चोरी रोके जाने के लिए क़ानून बनाये जाने की बात उठाते हुए कहा —  

मैं संसद का ध्यान डाटा चोरी और डाटा-सुरक्षा के लिए मजबूत ढाँचे के नहीं होने के कारण देश को होने वाली कमज़ोरी की तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ। स्मार्ट फोन, एप, सोशल मीडिया और इन्टरनेट के इस युग में हमारे द्वारा अकल्पनीय डाटा उत्पन्न होता है, जिसका दुरुपयोग हमारी प्रोफाइलिंग के द्वारा आर्थिक और राजनीतिक लाभ उठाने के लिए किया जा सकता है। हाल ही में अमेरिका के संघीय व्यापार आयोग (Federal Trade Commission) ने सोशल मीडिया एप्प टिकटोक पर अवैध डाटा एकत्र करने के लिए 5.7 मिलियन डॉलर का जुर्माना ठोंका है। कैंब्रिज एनालिटिका ने 87 मिलियन लोगों के डाटा से फायदा उठाया है। हमें इन संस्थाओं और विदेशी ताकतों के आपसी संबंधों का ठीक-ठीक नहीं पता है। ऐसी रिपोर्टे भी हैं जिनमें चीनी सरकार को पूर्णतया राज्य-संचालित ‘चाइना टेलिकॉम’ की एप टिकटोक द्वारा डाटा पहुंचाए जाने की बात उठती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है और मैं सरकार से यह निवेदन करता हूँ कि निजता के हमारे मौलिक अधिकार की रक्षा और हमारे लोकतंत्र को बचाने के लिए व्यापक कानून लाया जाए।


I wish to the draw the attention of this House to the vulnerability of our country to data leakage and surveillance due to the absence of a robust comprehensive data protection framework. In the age of smart phones, apps, social media and the internet, the extent of data we generate is mind-boggling, and it can be exploited by vested interests to engage in profiling, to make profits and for political control. Recently, the federal regulators in the US slapped a fine of 5.7 million dollars on the social media app TikTok for illegally collecting data on children. The data of 87 million people had been harvested by Cambridge Analytica. We do not know the exact connections between these companies and foreign entities. There are reports, for example, that the Govt of China receives data from TikTok through the wholly state-owned China Telecom. This is a national security issue and I urge the Government to introduce a comprehensive legal framework to protect our fundamental right to privacy and save our democracy.

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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बैल बाजार भाव, साहित्य, समाज और अनुज की कहानी 'खूँटा'


बैल बाजार भाव, साहित्य, समाज और अनुज की कहानी "खूँटा"



मेरे एक जानकार ने कहा हिंदी की साहित्यिक कहानी मुझसे नहीं पढ़ी जाती... मैं सोच में पड़ गया कि क्यों आख़िर कहानी पढ़ना हर किसी को क्यों नहीं भाता, उसे भी जो हिंदी से दूर नहीं है? इस विषय में सोचा जाना ज़रूरी है. यदि गूगल पर "हिंदी" लिखिए तो वह सुझाव देता है: 'हिंदी व्याकरण', 'हिंदी समाचार', 'हिंदी गाना', 'हिंदी न्यूज़', 'हिंदी शायरी', 'हिंदी शायरी प्यार', 'हिंदी कविता', 'हिंदी भाषा', 'हिंदी छोटे सुविचार' और 'हिंदी तो इंग्लिश ट्रांसलेशन'. "हिंदी क" लिखिए तो 'हिंदी कविता', 'हिंदी कैलंडर', 'हिंदी कुंडली सॉफ्टवेयर', हिंदी कैलंडर 2019', हिंदी कविता संग्रह', 'हिंदी के प्रसिद्ध निबंध', 'हिंदी काउंटिंग १ तो १००' और 'हिंदी कैलंडर तिथि ' सुझाव में आते है. "हिंदी कवी" लिखने पर वह 'हिंदी कवि'...'हिंदी कविता',...'हिंदी कवि और उनकी रचनाएं' आदि सुझाव देता है. लेकिन "हिंदी कहा" लिखने पर गूगल जैसे ज्ञानी को भी यह अंदाज़ा नहीं होता कि कोई 'हिंदी कहानी' सर्च कर रहा हो सकता है; वह कोई सुझाव नहीं देता. आशावादी हों तो आप सिर्फ "कहानी" गूगल कर सकते हैं लेकिन गूगल क्या सुझावेगा यह मैं पहले ही बता देता हूँ: 'कहानी विडियो', कहानी करवाचौथ की', कहानी शेर की', 'कहानी भूतों की', 'कहानी राजा हरीशचंद्र की'...

तो यहाँ मौजूद हिंदी के ख़वातीन-ओ-हज़रात 'जा~आ~गो मोहन प्यारे सुनिए' और नया लिखने के चक्कर में हिंदी के लेखकों का कहानी के नाम पर गुलज़ार साहब से उधार ली गयी हिंदी में मीठे-मीठे शब्दों को घोल कर नीरस कहानियाँ ढकेलने में माहिर होते जाना न देखते रहिये. मुझे तो फिर भी अनुज जैसे कहानीकार दोस्तों के होने का फ़ायदा मिल जाता है और भली कहानियाँ पढ़ने मिल जाती हैं. अनुज की 'खूंटा' वह कहानी है जिस पर प्रिय गुरुवार रवीन्द कालिया जी अपने 'नया ज्ञानोदय' की सम्पादकीय में लिखते हैं:


पशु मेलों पर एक अत्यन्त मार्मिक और प्रमाणिक कहानी

"यथास्थितिवाद के पोषक तथा सेंस ऑव ह्यमर से रहित लोगों को तो किसी प्रकार का बदलाव रास नहीं आता। ऐसे में वे शुद्धतावादी चोला अख्तियार कर लेते हैं और उनकी समझ में नहीं आता कि अनुज तो कथाकार है, वह बैलों की खरीद फरोख्त क्यों करेगा। जबकि अनुज का इससे बेहतर परिचय नहीं हो सकता था। उसने पशु मेलों पर एक अत्यन्त मार्मिक और प्रमाणिक कहानी लिखी है। बैल खरीदने वाले कैसा बैल खरीदते हैं, बैल की कौन-सी विशेषताएँ उसका मूल्य निर्धारण करती हैं, इसे जानना हो तो अनुज की कहानी से बेहतर कहानी पूरे हिन्दी कथा साहित्य में न मिलेगी। अब यदि उसका परिचय यों दिया गया कि जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र, दाढ़ी रखने की प्रेरणा वहीं मिली। बैलों की खरीद फरोख्त का अच्छा अनुभव' तो कौन-सा कहर बरपा हो गया! मूर्ख को मूर्ख कहने पर आपत्ति हो सकती है, परन्तु किसी को ‘सुन्दर' कहना उसे गाली देना नहीं है।"

रवीन्द्र कालिया, नया ज्ञानोदय, जुलाई 2007

खूँटा के अन्य पहलू जो मुझे भाये उनमें कहानी में छुपी वह तरंग शामिल है जो हमें  खूंटे से बंधा दिखलाती रहती है और यह भी कि समाज के सबसे प्राचीन व्यापार में आज भी महिलाओं को खूँटे में कसा जा रहा है, वह बात और कि कहानी के व्यापारी कहानीकारों को इस घृणित व्यापार में से भी अधिकतर पोर्न मिल जाता है.

भरत एस तिवारी
२८ जून २०१९, नयी दिल्ली

खूँटा 

— अनुज  


अवध का पूरा घर आज तड़के उठ गया था। माँ जलखई तैयार करने में लगी थीं। रोटियाँ सेंकती हुर्इं बार-बार जाकर नाद पर बैलों को देख आतीं थीं। कभी किसी पुरानी साड़ी के टुकड़े को सरसों के तेल में डुबोकर सींगों को पोंछ आतीं, तो कभी नथुनों से लेकर मस्तक तक सहलाने लगतीं। जब सींगों के बीच मस्तक पर पीछे की ओर बने गड्ढे से अठइल निकालते हुए गर्दन पर हाथ फेरतीं तो बैल ऊपर की ओर धीरे-धीरे मुँह उठाने लगते और नब्बे डिग्री का कोण बनाते हुए आसमान की ओर देखने लगते। माँ बार-बार नाद तक जातीं और फिर रसोई में लौट आती थीं। जलखई के हिस्से की पता नहीं कितनी ही रोटियाँ अबतक बैलों को खिला चुकी थीं ! लेकिन जैसे उनका जी नहीं भर रहा था!

बैलों को मुँह अँधेरे ही नहलाया जा चुका था। फिर उनके माथे पर टीका लगाया गया और गले में घंटी बाँध दी गयी थी। माँ बड़े प्यार से सींगों पर सिन्दूर लगातीं लेकिन तेल से चप-चप करते सींगों पर सिन्दूर टिक नहीं पा रहा था। इसीलिए माँ बार-बार सिन्दूर लगा आतीं। आख़्िार में मँगटिका पहनाकर बैलों को अपने सफर के लिए अंतिम तौर पर तैयार कर दिया गया था।

बाबूजी ने एक बोरे में अल्यूमीनियम की एक टगार और कुछ दाने रखकर बोरे को साइकिल के कैरियर से बाँध दिया था। फिर एक बोरी भूसे को साइकिल के दोनों पैडलों के बीच की खाली जगह में फ्रेम के बीच फँसा दिया। माँ ने जलखई वाली पोटली साइकिल की हैंडल से लगी हुई हुक में लटका दी। साइकिल जैसे कार्गो बन गई थी।

गहराया अँधेरा फटने लगा था। सितुआ सुबह-सुबह दरवाजे पर आकर बैठ गया था। वह तैयार होकर ही आया था। चैत्र के महीने में उसकी व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती थी। उसे बैलों के मेले का माहिर खिलाड़ी समझा जाता था। बिना किसी दलाल के बैलों को बेचने में दिक्कत भी तो होती थी! हालांकि दलालों की रूचि इन काम-काजू बैलों में कम ही होती थी। लेकिन सितुआ को अवध की दोस्ती और बिरादरी का वास्ता दिलाकर मना लिया गया था। सितुआ को मालूम था कि इस सौदे में कमाई की गुंजाइश नहीं थी। मोटी कमाई तो उन शाही दिखने वाले बैलों की ख़रीद-फ़रोख़्त में होती थी जो ऊँचे क़द-काठी वाले और मोटे-ताजे होते थे। ये बैल जमींदारों और गाँवों के रईसों के घरों की शोभा होते थे। इन भव्य दिखने वाले बैलों के खरीदार भी तो भव्य और शानदार होते थे ! दलाल ने जितना रेट तोड़ दिया, बात वही पक्की हो जाती थी। ऐसे भव्य बैल प्रदर्शन के लिए रखे जाते थे। ये काम-धाम तो नहीं करते थे लेकिन गँवई समाज में इन्हें 'स्टेटस-सिम्बल' समझा जाता था। गाँवों में आदमी की हैसियत शहरों की तरह लम्बी-लम्बी गाड़ियों से नहीं बल्कि घोड़े, हाथियों और बैलों से ही तय होती थी। ऐसे शाही बैलों को दरवाजों की शोभा बनाकर गाँव के अमीर लोग अपनी अमीरी पर इतराते रहते थे। लोग-बाग भी दूर-दराज से इन्हें देखने आया करते थे। छोटे-छोटे काश्तकार प्रदर्शन वाले इन बैलों को देखकर रस्क किया करते थे। फिर भी वे इन्हें रखने से परहेज करते थे। इनका रख-रखाव उनके वश में था भी नहीं। कहाँ से करते! शहरों में भी तो मध्यवर्गीय लोग लक्जरी गाड़ियों को देख ललचाया करते थे लेकिन यह सोच कर मन मार लेते थे कि इतने कम माइलेज और इतने महँगे रख-रखाव का बोझ कहाँ उठा पाएँगे ! ये बैल साबुन से नहाते थे। सामा और जनेरे भर से तो काम चलता नहीं था, बरसी और चावल की खिचड़ी खाते थे। अब गाँवों में आदमी के खाने के लिए तो चावल की खिचड़ी बड़ी मुश्किल से जुट पाती थी, बैलों को कहाँ से खिलाते! उस पर तुर्रा कि ये जनाब काम-काज भी नहीं करेंगे। ऐसे बैल गाँव के चौधरियों के लिए ही मुनासिब समझे जाते थे। कभी-कभार चौधरी साहब के टायर-गाड़ी में जोते जाते और चौधराइन को मैके तक छोड़ आते थे। खाने-पीने की सभी व्यवस्था के साथ एक सहमे हुए सह्रदय बहलवान के साथ जाते और चौधरी जी के ससुराल तक के दो कोस का सफर रास्ते में चार बार सुस्ता कर तय करते थे। ये अपने मालिकों की तरह ही पड़ुआ होते थे। जहाँ पड़ जाते, बस पड़ ही जाते थे। इसीलिए मेहनतकश किसान ऐसे बैलों से परहेज करते थे।

रामजतन महतो के बैल कद-क़ाठी से तो छोटे ही थे लेकिन थे बड़े फुर्तीले और काम-काजू। लेकिन बाज़ार में अन्दरूनी गुणों को कौन देखता है! इसीलिए सितुआ का सहारा लिया गया था।

अवध को सुबह उठने की आदत नहीं थी। बाबूजी इस बात को लेकर झिड़कते भी रहते थे, "शहर जाकर आदत बिगाड़ आया है। इतनी देर तक सोते रहने वाले बच्चे क्या खाक पढ़ेंगे?" शहरों के रहन-सहन को बाबूजी क्या जानें! शहर में तो बूढ़े-बुजुर्ग ही सुबह-सुबह बिस्तर छोड़ पाते थे। पार्कों में वे ही दिखते थे फूँ-फाँ करते हुए, युवा-पीढ़ी कहाँ नजर आती थी जॉगर्स के बीच ! हालांकि अबतक अवध भी मन दबा कर तैयार हो चुका था। बाबूजी ने थोड़े से पैसे निकालकर उसके हाथों में रख दिये थे। उधर माँ सितुआ को कुछ खुसर-फुसर समझा रही थीं। बैल इन रणनीतियों से बेख़बर जुगाली करते जा रहे थे।

माँ ने दोनों बैलों को आरती दिखाई और हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाने लगीं मानो बैलों से क्षमा माँग रही हों। बाबूजी ने दोनों हाथों से बैलों के गालों को छूते हुए माथा चूम लिया था। बैल भी सिर हिला-हिलाकर जैसे चल पड़ने की अनुमति माँग रहे थे। बाबूजी भाव-विभोर हो आए थे। माँ की भी आँखें भर आर्इं थीं। अवध ने साइकिल सँभाल ली थी। सितुआ ने पगहा खोल बैलों को हाँक लगाई। 'हॉरअ हॉरअ' की आवाज़ सुन, बैल दौड़ पड़े थे।

दूर से ही ढ़ोल और नगाड़ों की आवाज़ सुनाई देने लगी थी। गाँव की सरहद समाप्त हो चुकी थी। लोग चइता गा रहे थे। मेला-स्थल क़रीब आ गया था। गाँव से ज़्यादा दूर नहीं था। जब से बाँध बना है दूरी और भी कम हो गयी थी। बाँध ही सड़क का काम करता था। मिट्टी से बना यह बाँध फाल्गुन आते-आते सूख कर झुर्रट बन जाता था। धूल-धूल भर जाती थी। फाल्गुन और चैत्र के महीने तो यों भी उचाट से लगते हैं। बाँध से लगती हुई बागमती नदी बहती थी। उफनती बागमती से गाँव को बचाने के लिए ही तो इस बाँध को बनवाया गया था। एम.पी. साहब भी हर चुनाव में यह बताते नहीं थकते थे कि यह बाँध उन्होंने अपने एम.पी.लैंड. फंड से बनवाया है। बाहर से ठेकेदार बुलवाए गये थे। स्थानीय ठेकेदारों से कमीशन लेना एक राजनैतिक भूल साबित हो सकती थी, इसीलिए बाहर के ठेकेदारों पर भरोसा किया गया था। बागमती नदी फाल्गुन-चैत्र के महीने में लगभग सूखी ही रहती थी। नदी के तल की इसी सूखी ज़मीन पर हर वर्ष बैलों का यह मेला लगता था।

हज़ारों की संख्या में बैल और उनसे भी कई गुनी संख्या ख़रीदारों और विक्रेताओं की। अब चूँकि मेला ही था तो संख्या का अनुमान लगाना अर्थहीन ही था। अपने देश में बेरोजगारों की कौन सी कमी थी कि मेला सिर्फ खरीदने-बेचने वालों से ही पटा होता! निठल्लों की भी भारी भीड़ उमड़ी रहती थी। बैलों के खुरों से उठती धूल आसमान तक जा रही थी। समूचा वातावरण धूल-धूल हो रहा था। जैसे बैल-धूलि की बेला हो।

दिन चढ़ने लगा था लेकिन बैल अभी भी लाए जा रहे थे। बाँध के ढलान तक बैल अपनी मस्ती में झूमते हुए आते और ढलान पर आकर दौड़ने लगते थे। अपने-अपने बैलों को लिए बहलवान पैना लिए "हॉरअ-हॉरअ" करते हुए पीछे-पीछे दौड़ते रहते और बैल अपनी मस्ती में झूमते हुए आगे-आगे चलते रहते। बाँध से उतरता बैलों का हर झुंड पूरे वातावरण को धूल से भर देता था। बैल ढलान से उतरकर फिर अपनी पूर्व गति में आ जाते और मेले में समा जाते थे। बैलों को देखकर ऐसा लगता था मानो यह उनकी दिनचर्या हो। कोई हरकत नहीं, न ही कोई विरोध। मेले में आकर खूँटे से बँध जाना, कतार में खड़े रहना और पूँछ पटक-पटक कर मक्खियों से लड़ते रहना। यही थी उनकी नियति। बैलों की लम्बी कतार होती थी। जोड़ियों में झूमते हुए बैल 'टुन-टुन-रुन-झुन' की मधुर धुन बिखेरते रहते और वातावरण को मोहक बनाते रहते थे।

बैलों के खुरों से उठती धूल से चेहरे पुते जा रहे थे। चेहरे, कपड़े और जूते, सब धूल-धूल।

"जूता पहिन के कौन कहा था आने को?" सितुआ ने अवध को झिड़कते हुए पूछा।

"सितो भाई, बिना जूता के चलने की आदत छूट गयी है।"

सितुआ व्यंग्य से हँस पड़ा।

"अरे सितो भाई, आपके बालों और चेहरे पर तो धूल का नामोनिशान नहीं है" अवध ने आश्चर्य व्यक्त किया।

"हम अंगौछा से मुँह झांप लिये थे", सितुआ ने अपने चातुर्य का बखान करते हुए अपने कंधे पर रखे तौलिये से अवध के ऊपर पड़ी धूल को साफ करने लगा।

अवध के लिए बैल के मेले में आने का यह पहला अवसर था। पढ़ाई-लिखाई से समय कहाँ बच पाता था कि गाँव और घर-गृहस्थी! महतो ने बेटे को ख़बर भिजवाई थी कि इस बार बैल बेचना ज़रूरी है। घर में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो बैलों को लेकर मेले में जा पाता। जो बड़े थे वे बूढ़े हो चुके थे, इतने झिरकुट कि मेले में जा नहीं पाते। घर-गृहस्थी वाले दूसरे जवान लोग तो पहले से ही गाँव छोड़-छोड़ शहरों में बस गए थे। इसीलिए अवध को शहर से बुलवाया गया था।  अवध एक अर्धशहरी युवक था। शहर में रहकर बाप का नाम रौशन करने के बचपन में ही तय कर दिये गए अपने एजेंडे पर काम कर रहा था। खेत-खलिहान, माल-जाल कहाँ यह सब! किताबों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी। अगले वर्ष इंजीनियरिंग का टेस्ट था। कॉलेज, किताब, कोचिंग और बाबूजी,  यही थी अवध की दुनिया। दिन में कभी पड़ोस की खिड़की से सुमन का चेहरा दिख जाता, तो एकाध घंटा कट जाता था। नहीं तो इन घर-गृहस्थी की बातों के लिए समय ही कहाँ होता था उसके पास !

मेले की तैयारी में सरकारी महकमे को ज़्यादा परेशान नहीं होना पड़ता था। प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर बस दो-चार सिपाही डंडा लिए घूमते रहते और उगाही करते रहते थे। मेले के लिए टेंडर होता था। कोई एक बड़ा ठेकेदार पूरे मेले का ठेका ले लेता था और बहुतेरे छोटे-छोटे ठेकेदारों को 'सब-कॉन्ट्रैक्ट' दे दिया करता था। ऐसी व्यवस्था भी ठीक ही होती थी। कुछ दिनों के लिए छुटभौये अपराधी भी अपना-अपना धंधा बंद कर मेले की सब-कॉन्ट्रैक्टरी में लग जाते थे। यहाँ भी अच्छी कमाई हो जाती थी और इस काम में अपराध की दुनिया वाला स्वाभाविक ख़तरा भी नहीं रहता था।

ठेकेदार भी मेले को व्यवस्थित रखने में खासी दिलचस्पी लिया करते थे। शायद इसी लिए मेले की व्यवस्था सरकारी व्यवस्था जैसी लचर नहीं होती थी। इसतरह मेले की बुनावट अच्छी बन पड़ती थी। हालांकि पुलिस प्रशासन के लिए हर ज़गह की तरह यहाँ भी चाँदी ही होती थी।

मेले में खूँटा बिकता था। प्रत्येक खूँटे की अपनी क़ीमत होती थी। वास्तव में, खूँटों को खरीदने का अर्थ होता था, खूँटे को किराये पर लेना। बिकाऊ बैल जिस खूँटे से बाँधे जाते थे, उस खूँटे के लिए कौड़ी देनी पड़ती थी। कौड़ी के अलावे पगड़ी भी देनी पड़ती थी और चढ़ावा अलग। हालांकि जबतक बैल नहीं बिक जाते थे, कौड़ी नहीं देनी पड़ती थी क्योंकि कौड़ी की रसीद काटी जाती थी। रसीद कट जाने के बाद बिक्री निरस्त नहीं की जा सकती थी। कुछेक बैल तो मेले में आते और तत्काल बिक जाते थे लेकिन किसी-किसी बैल को बिकने में कई-कई दिनों का समय लग जाता था। कुछ अभागे बैल तो बिक ही नहीं पाते थे। बिचौलियों का भी तो जाल बिछा होता था। इसी लिए खूँटे की पगड़ी देते समय कई बातों का ख़्याल रखना पड़ता था। अच्छी लोकेशन वाले खूँटों के लिए अलग से चढ़ावा देना पड़ता था।

बैलों की ख़रीद-फ़रोख्त बहुत कुछ खूँटे के लोकेशन पर भी निर्भर करती थी। अच्छी लोकेशन वाले खूँटे से बँधे बैल ऊँची क़ीमत पर बिकते थे। इसीलिए अच्छी लोकेशन वाले खूँटे की क़ीमत भी अच्छी होती थी। मेले के मुख्य द्वार के पास के खूँटे सबसे ऊँची कीमत पर बिकते थे। इसी प्रकार अन्दर के चौराहों पर के खूँटों की क़ीमत भी अधिक होती थी क्योंकि चौराहों पर ख़रीदारों की आवा-जाही सतत बनी रहती थी। कई बार खूँटा अच्छा होने पर लोरलाभ बैल भी अच्छी कीमत पर बिक जाते थे, जबकि सजीले छरहरे बदन के दो दाँत वाले बैल भी अच्छी लोकेशन के अभाव में कौड़ियों के मोल ही बिक पाते थे। बैलों को गाँव वापस लेकर लौटने का अर्थ होता था उन्हें हमेशा ही ढोते रहना। मेले से लौट कर आए बैलों को कौन ख़रीदता? अब तो कोल्हू के लिए बैल ख़रीदने वाले तेली भी मेले से ही ख़रीदारी करने लगे थे।

आधुनिक खेती के चलन से गँवई समाज भी बहुत कुछ बदलने लगा था। अब बैलों के ख़रीदार भी चूजी होते जा रहे थे। खेती के लिए बैलों को अब उतना कारगर नहीं समझा जाता था। बड़े किसानों ने ट्रैक्टरों की ओर रुख कर लिया था। भाई-भाई के बीच होने वाले बँटवारों ने खेतों के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिये थे। संयुक्त परिवारों के टूटने-बिखरने के कारण अब एक परिवार के पास खेत का कोई बड़ा भाग रह भी नहीं गया था। प्रत्येक किसान के पास अपना कहने को एक-आध बीघा ही रह गया था। सब के पास अपना ट्रैक्टर नहीं होता था। लेकिन ट्रैक्टर भाड़े पर भी मिल जाते थे। एक-दो चास के लिए भाड़े पर मिलने वाले मिनी ट्रैक्टर ही सस्ते पड़ते थे। फिर बैल कौन खरीदे! यदि बैल खरीद भी लें तो बैलों को लेकर साल भर कौन ढोता रहे! चारा भी तो महँगा हो गया था। पुआल, भूसा, खली सब महँगे हो गए थे और पानी-सानी का झंझट अलग। आदमी-जन तो मिलने से रहे। मिलते भी तो इतने महँगे कि रखना मुश्किल। इस नए ज़माने के पढ़ने-लिखने वाले बच्चे पानी-सानी को अपनी शान में बट्टा समझते थे और बूढ़े-बुजुर्ग अब यह सब कर नहीं पाते थे। शरीर भी तो थक चुका था। पहले तो गोबर भी काम आ जाता था और अच्छी क़ीमत पर बिक जाता था। गोहरे-गोइठों की भी ख़ूब माँग हुआ करती थी। खाद के लिए तो गोबर सोने सरीखा समझा जाता था। लेकिन अब तो स्थितियाँ ही उलट हो गई थीं। मल्टीनैशनल्स ने इतने केमिकल बाज़ार में उतार दिये थे कि अब गोबर की बात कौन करता! इन सब बातों का सीधा असर बैलों के इस मेले पर साफ़ दिख रहा था। शायद इसीलिए अब बैलों के मेले की अवधि भी कम हो गयी थी। नहीं तो कुछ साल पहले तक बैलों का यह मेला महीने-महीनों तक चलता रहता था। 

महतो के पास ले देकर यही एक जोड़ी बैल बच गए थे। लेकिन बेटी का ब्याह टाला नहीं जा सकता था। पहले तो दहेज के नाम पर बैल भी चल जाते थे, लेकिन अब ट्रैक्टर से नीचे कहाँ बात बनने वाली थी! अब बेटी का ब्याह तो करना ही था! घर में बैठा के तो रख नहीं सकते थे! गाँव, समाज और बिरादरी को जवाब भी तो देना होता है! इसीलिए इस वर्ष बची हुई इस एक जोड़ी को भी बेच देने का निर्णय ले लिया गया था।

"अवध, गाँव में एक कहावत है। किसी से दुश्मनी हो जाए तो उसे बैल बेचने भेज देना चाहिए। जब स्साले को बैल लेकर दो-चार कोस बैल के पीछे-पीछे दउड़ना पड़ेगा और दिन भर धूरा फांकना पड़ेगा, तब बुझाएगा....." बोलते हुए सितुआ हो-हो कर हँसने लगा था।

अब तक अवध और सितुआ बैलों को लेकर मेले में धँस चुके थे। सितुआ की चतुराई काम नहीं आई थी। अपनी लाख़ तिकड़मी बुद्धि के बावजूद वह अच्छी लोकेशन वाला खूँटा नहीं ले पाया था। रसूख भी काम नहीं आया था।

"कहाँ बाँधना है", अवध ने पूछा।

"खुँटवा तो अंदरे में मिला है", सितुआ ने कहा।

"क्या फर्क पड़ता है, अन्दर हो कि बाहर हो!" अवध ने निश्चिंतता दिखाई।

"नहीं, फर्क कइसे नहीं पड़ता है", दबी ज़ुबान में बोलते हुए सितुआ ने मानो गूढ़ रहस्य को छुपा लिया था।

 चौराहों पर कुछ खोमचे वाले भी दुकान सजाए बैठे होते थे।  लाई-मूढ़ी, कचरी-प्याजी, लट्ठ-हवा मिठाई जैसी बच्चों को भुलावे में रखने वाली कई और भी चीज़ें बिकती रहती थीं। इन दुकानों पर बच्चे और मक्खियाँ टूट पड़ते थे। मेले के अन्दर की सड़कों के किनारे-किनारे कुछ कपड़ों की छोटी-छोटी दुकानें भी होती थीं। यह उम्मीद रहती थी कि बैलों की बिक्री के बाद प्राप्त धनराशि से उत्साहित किसान कुछ कपड़े ही ख़रीद लें। लेकिन बैलों की तरह ये दुकानदार भी मक्खियाँ ही उड़ाते रहते थे।

बैलों के खरीदारों और विक्रेताओं के चेहरे दिन चढ़ने के साथ-साथ अँगौछों से ढँकते जाते थे। पूरा दिन निकल आता तो अँगौछे खुलकर चेहरे और सिर पर आ जाते। धूप से ज़्यादा धूल का भय होता था। मेले में दिन-भर चिल्ल-पों मचता रहता था।

आदमी ही ज्यादा शोर-शराबा करते थे। बैलों को तो बोलने की भी अनुमति नहीं होती थी। मुँह में जाब लगे होते थे। बैल एक कतार में खड़े होते थे। ठेकेदार खूँटों की संख्या से अंदाजा लगाते थे कि मेले में कितने बैल लाए गए होंगे। बैलों के मालिक अपने अंगौछों से बैलों पर उड़ती मक्खियों को भगाने में बैलों की मदद किया करते थे। गोबर ही मक्खियों का कारण होते थे इसीलिए जैसे ही बैल गोबर करते, गोबर को काछ कर हटा दिये जाने की पूरी कोशिश की जाती थी।  लेकिन जमीन पूरी तरह साफ नहीं हो पाती और मक्खियाँ फिर से भिनभिनाने लगती थीं। बैलों को कुकुरमाछी और डस परेशान करते रहते और बैल अपने पैरों को पटक-पटक कर इनसे लड़ते रहते थे। कुकुरमाछियों-डसों और बैलों का यह संघर्ष सतत जारी रहता और बैल अपनी पूँछ घुमा-घुमाकर मक्खियाँ उड़ाते रहते थे। पूँछ और पीठों की इस जंग से उठती पट-पट की आवाज़ बैलों के गले में बँधी घंटियों के टुन-टुन-रुन-झुन की आवाज़ में घुलमिल कर एक नयी धुन बना रही होती थी।

अपने-अपने खूँटों से बँधे बैल इस बात से बेख़बर रहते थे कि आने-जाने वाले लोग उन्हें क्यों छू रहे हैं। कोई पीठ पर हाथ फेरता तो कोई सींग पकड़ कर हिला देता। कोई पुट्ठों पर ठोंक लगा जाता तो कोई पूँछ पकड़ कर खींचता। कोई जबड़ों के अन्दर जबरदस्ती झांकने की कोशिश करता तो कोई नीचे बैठकर पता नहीं टांगों के बीच क्या निहार जाता। लोग आते, टटोलते और चले जाते। फिर अंगौछे अंगौछों में क्या बातें होती, मालूम न चलता। आधी टांग तक धोती बाँधे, कंधों पर अंगौछा डाले, उम्र से पहले ही बूढ़े हो चुके इन कंकालनुमा ख़रीदारों से बे-ख़बर ये बैल मुँह उठाये अपनी मासूमियत का बयां करते रहते थे। तरतीब क्यारियों में खड़े ये बैल अपनी-अपनी बारी का इन्तज़ार करते रहते और खरीदारों की बेतरतीब भीड़ इनका मोल-तोल कर रही होती।  बैल जोड़ियों में बिकते थे इसीलिए बैलों की जोड़ी लगायी जाती थी। यह जोड़ी इंसानों की जोड़ी की तरह नर और मादा की नहीं होती थी बल्कि यह जोड़ी होती थी दो मजबूत कंधों की।

बैल इंसानों की तरह अपनी जाति या धर्म से नहीं बल्कि अपने दाँत से पहचाने जाते थे। बैलों की कीमत दाँत देखकर ही आँकी जाती थी। दो दाँतों वाले बैलों की बड़ी कीमत होती थी। कदवा-हरवाई में तो ये ट्रैक्टर से भी ज़्यादा कारगर समझे जाते थे। मूल्य की दृष्टि से इनके समकक्ष सिर्फ चार दाँत वाले बैल ही खड़े हो पाते थे, नहीं तो सतधर आदि को पूछता ही कौन था। अदन्त और तउल की क़ीमत सबसे कम होती थी। अदन्त को दो दाँत का होने तक पालने का झंझट था और तउल तो बूढ़े और नकारे ही समझे जाते थे। आठ दाँत वाले इस अनोखे पशु के दाँतों का बड़ा महत्व होता था। इसीलिए इस बात का खासा ख़्याल रखा जाता था कि इन्हें कसौया जैसे दाँतों का कोई  रोग न हो। बैलों की गुणवत्ता के आकलन के लिए तो ऐसे कई मापक थे लेकिन मेले में आए ख़रीदारों की आंतों की गहराई का अंदाज़ा लगाने की कोई तरक़ीब नहीं दिख पाती थी।

बैलों की छटा देखते बनती थी। ऊँचे-ऊँचे बैल, छोटे-छोटे बैल, फुर्तीले बैल, पड़ुआ-लोरलाभ बैल, सींग वाले और बिना सींग वाले बैल, तरह-तरह के बैल, लेकिन सभी बिकाऊ। ख़रीदार जब पुट्ठों पर हाथ रखते तो बैल सिहर उठते थे। फिर कंधों को हिलाकर अपने कौमार्य का परिचय दे देते थे। सिर हिला-हिलाकर घंटियाँ टुनटुनाते हुए पता नहीं क्या संदेश देते रहते थे।

"का भइया, महतो का बैल यही है?" किसी ने जोर से पूछा।

"हाँ-हाँ, यही है। आइये देखिये", अवध ने हुलस कर कहा।

लेकिन सितुआ ने निर्विकार भाव से बस 'हाँ' में सिर हिला दिया था। उसकी अनुभवी आँखें शायद यह भाँप गयी थीं कि यह ख़रीदार नहीं है।

"अरे भाई, सोरहट वाले पंडी जी तो कह रहे थे कि चार दाँत का है, ई तो सतधर बुझाता है?"

"सतधर है? अँखियाँ में बट्टम घुसा हुआ है? अइसा बैल देखें भी हैं का कभी? सतधर है..हूं..बात करता है.." सितुआ ताव में आ गया था।

"अरे भाई हम तो मजाक कर रहे थे। महतो का बैल तो हम तब से देख रहे हैं जब अदन्त था।" वह बोलकर हँसने लगा और आगे बढ़ गया था।

सितुआ ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे अब इस बात में कोई सुबहा नहीं रह गया कि यह ख़रीदार नहीं बिचौलिया था।

"का देवता, दू कि चार?" एक और ख़रीदार मुख़ातिब था।

"कोई चोरी-छुपे थोड़े है, अपने से देख लीजिए?" सितुआ ने कहा।

"फिर भी", उसने धीरे से पूछा।

"है त चार दाँत, लेकिन जोत के देखिए। बाकी सब फेल है।" सितुआ ने आग्रह किया।

खरीदार ने पहले तो नीचे बैठकर बैलों को निहारा फिर बैलों की आँखों के सामने हाथों को लहराने लगा।

"क्या देख रहे हैं? अंधा थोड़े है।"

"कितना?" उसने पूछा।

"देख लीजिए, लग जाएगा। इतना सस्ता पूरे मेले में और नहीं मिलेगा। किलौर देख रहे हैं? पालो चप्प से बैठता है। एक बार जुआ डाल दीजिए तो क्या मजाल कि हिल जाए", सितुआ बैलों की विशेषता का बखान करने लगा था।

"दमवा त बोलिए?"

सितुआ ने क़ीमत बतायी तो उसकी आँखें चौड़ी हो आर्इं। वह बोल पड़ा,

"ई तो बहुत जादा है।"

"आप ही बोल दीजिए", सितुआ ने दबाव देते हुए कहा।

इसी बीच साथ खड़े एक अन्य ख़रीदार ने पूछ लिया,  "ई दाग कइसा है भइया? जला हुआ तो नहीं है?"

"ना देवता, जला हुआ देंगे। ई पाप हमी करेंगे!" सितुआ ने सफाई दी।

"झनक त नहीं है?" उसने फिर से छेड़ा।

"का बात करते हैं भाई, रोगी बैल देंगे? हमारा ईमान मर गया है क्या? अरे हाथ कंगन को आरसी क्या, बैल सामने है, चला कर देख लीजिए। झनक होगा त आपको पता चल ही जाएगा", सितुआ का स्वर नर्म ही रहा।

लेकिन थोड़ी देर इधर-उधर करने के बाद खरीदार आगे बढ़ गए थे। इसी बीच मोटे फेंटे वाले दो खरीदार अवध से पूछताछ करने लगे थे। इन नए ख़रीदारों ने शानदार और करीने की पोशाक पहन रखी थी। धूप-चश्मा चढ़ाकर बैलों का मोल-तोल करने वाले इन ख़रीदारों को देख अवध चकित था।

"देख लीजिए, आपके ही लायक हैं।" सितुआ ने आग्रह किया

"सतधर है कि तउल?" बैलों पर उड़ती नज़र डालते हुए इस नए ख़रीदार ने पूछा था। इतना सुनते ही सितुआ के कान खड़े हो गये।

"हम लोग हिन्दू हैं, कोई मुसलमान नहीं कि तउल का सौदा करेंगे। जोत का है, आगे बढि़ए।" सितुआ ने चेहरा कठोर करते हुए कहा था।

"पूरा दाम ले लीजिए।" उन्होंने कहा।

"बोले ना, नहीं बेचना है। आगे बढि़ए।" सितुआ अब चिढ़ गया था।

अवध ने गौर किया कि इन नए ख़रीदारों ने न तो बैलों के जबड़े खोले थे और न ही यह देखा था कि पेट सपाट है कि लटका हुआ। न तो कंधों पर जुआ रख कर देखने की पेशकश की थी और न ही यह जानना चाहा था कि जब बैल चलते हैं तो उनके पैर आपस में टकराते तो नहीं। सीधे-सीधे बैलों की कीमत देने को तैयार हो गए थे। अवध को खरीदार अच्छे लगे थे। लेकिन उसे इसबात पर घोर आश्चर्य हुआ कि सितुआ ने उन्हें डाँट कर क्यों भगा दिया था।

अवध ने पूछा, "सितो भाई, दाम तो दे ही रहा था, क्यों भगा दिया?"

सितुआ ने उसकी बातों को अनुसुनी करते हुए कहा, "पैसा ही सबकुछ नहीं होता। बैल बेचने आए हो, हड़बड़ाने से थोड़ी होगा।"

दिन पूरा चढ़कर अब उतरने लगा था। जलखई की रोटियों को चट कर दोनों ने लोटा भर कर पानी पीया। जलखई के बाद सितुआ खैनी ठोंखने लगा था। खैनी को होंठों में दबाने के बाद सितुआ ने अवध को कहा,

"अच्छा सुनो, तुम यही ठहरो, हम अभी आते हैं।"

"कहाँ जा रहे हैं?" अवध ने बेचैन होते हुए पूछा।

सितुआ ने कनखी मारते हुए कहा, "वहीं। कल बताये नहीं थे? आ रहे हैं अभी। बैठो ना परेशान काहे होता है! तू तो जाएगा नहीं। तू तो अभी तक बच्चा ही है.....तुम बैठकर मेला का मजा लो, हम अभी आते हैं।"

फिर हँसते हुए बोला, "बैल छोड़कर कहीं जाना नहीं। और हड़बड़ाने का भी कोई ज़रूरत नहीं है। आज नहीं बिकेगा तो कल बिकेगा और कल न तो परसो सही। हमारे रहते कोई दिक्कत नहीं होगा। अब मेले में आ ही गए हैं तो आराम से बेचकर ही जाएँगे। ठीक ना? हम अभी आते हैं, तुम यही रहो..." बोलते हुए सितुआ गोबर के टाल की ओर बढ़ गया था।

बाँध के किनारे नीचे की ओर गोबर का एक टाल होता था जिसे माँद कहते थे। गोबर को यही एकत्र किया जाता था। यहाँ से रात-बिरात गोबर की चोरी भी होती थी। गोबर बीनने वाली महिलायें और बच्चे इसी ताक में तो रहते थे कि कब मौका मिले और वे एक-आध छींटा लेकर भागें।

इसी गोबर के टाल के पीछे टाट के कुछ झोपड़े बने होते थे। इन झोपड़ों में भी एक मेला लगा होता था। बैलों के मेले में इन अस्थाई झोपड़ियों के होने का शायद वही अर्थ होता था जो हाथी के मेले में ऊँटों के होने का होता था। फूस और सरकंडों के साथ बाँस की खरपच्ची को जोड़-जाड़ कर बनायी गई इन झोपड़ियों में कोई सुचारु व्यवस्था नहीं दिखती थी। पन्द्रह-बीस की संख्या में दो कतारों वाली झोंपड़ियाँ अति सघन होती थीं। प्रत्येक झोपड़ी से ओसारे लगे होते थे। ओसारों के बाद दरवाज़े होते थे जहाँ पर्दे लगे होते थे। पर्दों के पीछे कतार से खाटें लगी होती थीं। ठेकेदार यहाँ भी होते थे। टेंडर यहाँ भी होता था लेकिन अवैध। यहाँ भी खाटों का किराया खूँटों की तरह ही लोकेशन के अनुसार तय होता था। लेकिन यहाँ का समीकरण बैलों के मेले से विपरीत होता था। इस मेले में मुहाने की खाट की क़ीमत कम होती थी जबकि अन्दर कोने की खाट महँगी बिकती थी। मुहाने की खाट का अच्छा माल भी सस्ता बिकता था जबकि अन्दर कोने की रोशनी विहीन खाट का घटिया माल भी ऊँची कीमत पर बिक जाता था। कोने की चोर-खाट के लिए वस्तु की गुणवत्ता से भी समझौता कर लिया जाता था।

बैल तो अपने बालपन से ही जि़दगी की मस्ती के इस रहस्य से महरुम कर दिये गए होते थे। फिर भी ये बैल इन झोपड़ियों की ओर मुँह उठाये क्या देखते रहते थे, मालूम नहीं। बैलों के मेले में शोर-शराबा बहुत होता था। हऱ तरफ लोग घूम रहे होते और सीना फुलाए बैलों का मोल-भाव कर रहे होते थे। मोल-भाव तो इन झोपड़ियों में भी होता था, लेकिन दबी ज़ुबान में। सामने चलते हुए, अपने बराबर में खड़ी लड़की से उसका भाव पूछ लिया जाता। कोई शोर-शराबा नहीं। सब कुछ चुप-चुप सा होता था। निगाहें झुकाए सहमे-सहमे से ख़रीदार। यहाँ सीना फुलाए वही ख़रीदार घूम रहे होते जो वास्तविक ख़रीदार नहीं होते थे। यहाँ समय काटने वाले निठल्ले मनचले भी तो आते थे।

चूँकि झोपड़े अस्थायी होते थे और एक छोटी सी अवधि को ध्यान में रखकर ही बनाए जाते थे, इसीलिए यहाँ भी अपने देश की काम-चलाऊ व्यवस्था जैसी व्यवस्था ही दिखती थी। झोपड़ों से निकासी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण पानी निकलकर गली में गिरता और वहाँ की कच्ची मिट्टी को गीली करता रहता था। झोपड़ों के साथ लगा गोबर का टाल भी बास मारता रहता था।

इन झोपड़ों में ओसारे से होकर खुलने वाले मुख्य-द्वार के अन्दर खाटों का सिलसिला शुरु होता था। खाटों को कतार में रखा जाता था। ये मूज की रस्सियों से बुनी हुई होती थीं। दो खाटों के बीच में गोपनीयता बरक़रार रहे इसके लिए कपड़ों की दीवारें खड़ी कर दी जाती थीं। प्राय: ये दीवारें फटी-पुरानी झीनी-झीनी साड़ियों या पुरानी चादरों से ही बनायी जाती थीं। पुरानी साड़ियों से अलगाई गई खाटें, जेल की बैरकों सरीखी दिखतीं थीं। गारे-सीमेंट से बनी लोहे की सलाखों वाली जेलों की मोटी-मोटी दीवारों में तो सेंधमारी हो जाया करती थी लेकिन झीनी-झीनी साड़ियों से बनी इन दीवारों को तोड़ पाने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती थी। कभी-कभी खाटों के बीच की चादर गिर जाती, और पर्दे के पीछे की स्याह आकृतियाँ अपने मूर्त रूप में सामने आ जाती थीं। हालांकि यहाँ पड़े यांत्रिक बुतों को कोई अन्तर नहीं पड़ता था। यहाँ शर्म और हया जैसे शब्द बेमानी समझे जाते थे। यहाँ एक केयर-टेकर भी होती थी, जिसे आमतौर पर मौसी कहने का प्रचलन था। बेपर्दा होने की ऐसी स्थिति में यंत्र तो अपना काम करते रहते, लेकिन मौसी इसबात का ध्यान रखतीं और आकर दीवार जोड़ जाया करती थीं।

खाटों के बीच की दीवारों से एक खाट से दूसरी खाट पर हो रही हरकतें साफ-साफ देखी जा सकती थीं। लेकिन हाँफती-हँफाती आकृतियाँ अपनी साधना में इतनी लीन होतीं कि दूसरी खाट की ओर देखने की फुर्सत ही किसे होती थी! एक अज्ञेय ब्लौक-होल में समा जाने को आतुर आकृतियाँ एक-दूसरे पर अपनी-अपनी गर्म और बदबूदार सांस छोड़ती रहतीं।

 पतली-सँकरी गलियों में फैले कीचड़ से बचते-बचाते प्रेतों के काफिले ओसारों पर चढ़ते-उतरते रहते और अपनी मंजि़ल की तलाश में लगे रहते थे। झोपड़ियों के ओसारों की चौखटों से टँगी गंगाएँ, इन गलियों में भटकती प्रेतात्माओं को मोक्ष पाने को ललचाया करती थीं। चलते-फिरते ये प्रेत अपनी-अपनी धोती या पायजामा ऊपर उठा, ओसारों का सहारा लेकर आगे बढ़ते रहते थे। परिचित चेहरों से अपने को बचने-बचाने की भी ख़ूब असफल कोशिश की जाती थी।  झोंपड़ों के दरवाजों पर आमंत्रण देते रंग-बिरंगे पुतलों में तब्दील कंकालों से दबी जुबान में मोल-भाव किया जाता और भाव तय होते ही प्रेत झटके से पर्दे के अन्दर विलीन हो जाता था। पर्दा गिरा दिया जाता और शुरु हो जाती एक प्रेत-लीला। प्रेतात्माएँ कंकालों में समा जातीं। पाँच-सात मिनटों का खेल होता और फिर तृप्त प्रेतात्माएँ पर्दे की ओट से बाहर निकल आतीं।  हरेक को पाँच-सात मिनटों का समय मिलता अपना पौरुष आजमाने को। इन्हीं पाँच-सात मिनटों में अपने-अपने पौरुष का इम्तेहान देकर प्रेत बाहर निकल आते और अगले दो-चार मिनटों में, फिर से किसी और प्रेत का पौरुष आजमाने को कंकाल पुन: खड़े हो जाते थे। पुतलों को कंकालों में और कंकालों को पुतलों में बदलते रहने की यह प्रक्रिया दोपहर से शाम और शाम से रात तक चलती रहती और कंकालों में शरीर तलाशते ये प्रेत देर रात तक इन्हीं गलियों में भटकते रहते थे।

एक महिला ने एक छोटी सी लड़की की गर्दनी पकड़ रखी थी। यही कोई बारह-चौदह साल की रही होगी.

महिला ने सितुआ को झंकझोड़ते हुए दहाड़ा, "खाली आँख सेंकने आया है कि बैठेगा भी? इसे ले जा। माल ताजा है।"

"कितना?" सितुआ ने मोल किया। सितुआ को शायद लड़की का भोलापन भा गया था।

"पाँच सौ", महिला ने हाथ से इशारा करते हुए कहा।

"पाँच सौ !" सितुआ ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए लड़की को निहारा।

"अइसा खिच्चा माल पूरे मार्किट में नहीं है। पहिला बार आई है। एकदम ताजा है", महिला ने आग्रह किया।

सितुआ ने लड़की पर फिर से एक उड़ती नज़़र डाली और बोला, "कब की उतरी है?"

महिला ने भौं टेढ़ी की, "ले जा कुछ कम दे देना।"

"कितना?" सितुआ ने फिर मोल किया.

"चल पचास रूपया कम दे देना", महिला ने दाम तोड़ा।

"पाँच मिनट में त काम निपट जाता है। पाँचे मिनट का एतना?" सितुआ ने विस्मय से मोल किया ताकि भाव कम हो सके।

"तीन घंटा रख के अचार डालेगा?...चला है बात बतियाने।" महिला भुनभुनाने लगी थी। महिला ने पूछा, "तुम्हीं बोल दो कितना देना है..."

"सौ रुपया में भेजेगी तो बोल," सितुआ ने अंतिम मोल किया।

"सौ रूपया में तो बुढि़या नहीं मिलती है इस मार्किट में, फिर यह तो कच्ची है.... महँगाई केतना बढ़ गया है...हमलोग का पेट नहीं है का?" महिला ने लड़की के सिर पर हाथ फेरते हुए लड़की को पुचकारते हुए कहा।

"नहीं, नहीं, सौ ठीक है...." सितुआ ने ज़ोर देकर कहा और आगे बढ़ गया।

"चार सौ देगा? फाइनल बोल?" ग्राहक सीरियस दिखा था। कहीं दूसरे झोंपड़े की ओर मुँह ना कर ले, इसी आशंका से महिला ने दबाव डाला था।

"नहीं, सौ से एक पइसा जादा नहीं", सितुआ ने अपनी अंतिम राय दे दी थी।

"चल भाग इहाँ से हरामी....बोहनी बट्टा के टाइम ही कहाँ से स्साले आ जाते हैं... सौ रुपया में जाके अपनी......." महिला उग्र हो चली थी।

सितुआ ठिंठियाते हुए आगे बढ़ गया था। सितुआ  की तलाश जारी थी।

"कइसे किलो?"  सितुआ ने लापरवाही से पूछ लिया था।

"तीन सौ", सफेद पाउडर में लिपटे हुए चेहरे के बीच लिपिस्टिक पुते हुए लाल टह-टह होठ हिले थे।

"पचास में देगी?" सितुआ ने आगे बढ़ते हुए पीछे मुड़कर ठिठोली से पूछ लिया था।

इस बार केवल होठ नहीं हिले, समूचा मुँह खुला। पान से सँड़ चुके काले-काले दाँत दिखे और कर्कश आवाज़ गूँजी, "पच्चास में तोरी.............."

सितुआ खीं-खीं करके हँस पड़ा।

उसने दूसरा दरवाज़ा टटोला, "माल है?"

"इधर आ इधर। बैठना हो तो मोल कर, फकैती नहीं" एक मोटी महिला ने बीच में पड़ते हुए सवाल किया।

"फकैती किस चीज़ का? माल दिखाओ, और फीस बताओ", सितुआ ने जोर देकर कहा।

महिला ने पास वाले दरवाजे से टिकी गुमशुम खड़ी लड़की की ओर इशारा किया।

सितुआ को लड़की भा गई। लड़की की ओर एक टक देखते हुए महिला से मोल किया, "कितना"?

"बोहनी का टाइम है, जो समझ में आए, दे देना", महिला ने निरीह भाव से कहा था।

"दो सौ रूपया देंगे, मंजूर हो तो बोल", सितुआ ने अंतिम फैसला सुनाया।

"जा ले जा, पैसा इधर जमा करा", महिला ने सौदे पर अंतिम मुहर लगा दी।

सितुआ की तलाश ख़त्म हो चुकी थी। उधर दोनों महिलाओं में भिड़न्त हो चुकी थी। मोटी महिला पर ग्राहक छीन लेने का आरोप था। लेकिन इस बाज़ार के भी अपने नियम होते थे। इन झगड़ों से ग्राहकों को अलग रखा जाता था और ग्राहक भी इन झगड़ों से कोई लेना-देना नहीं रखते थे। सितुआ खाट की ओर बढ़ गया। मौसी ने पर्दा गिरा दिया था।

इधर अवध बैठा-बैठा ऊब रहा था। ऊब से नींद भी आने लगी थी। धूप और धूल का मिश्रण शहरी शरीर को थकाने के लिए काफी था। अकेला था। बैलों को छोड़कर कहीं जाए  भी तो जाए कैसे! सितुआ ने कहीं जाने से मना कर रखा था।  उसकी बेचैनी बढ़ने लगी थी।

भुनभुनाने लगा, "ये सितुआ भी कहाँ रह गया!"

वह अभी सोच ही रहा था कि किसी ने आवाज़ दी, "क्या भाई, बेचना नहीं है?"

अवध ने देखा यह वही धूप-चश्मा वाला ख़रीदार था।

अवध ने कहा, "क्यों नहीं बेचना है, आइये देखिए।"

"हम तो उसी समय देख लिए थे। बेचना हो तो रसीद कटवा देते हैं, बोलिए।" उसने बिना विचार किये जोर देकर बोला।

अवध की खुशी का ठिकाना न रहा। लेन-देन के बाद आख़िररकार कौड़ी की रसीद कट गयी। ख़रीदारों ने बैलों को खूँटे से खोल लिया और आगे बढ़ गए थे।

सितुआ वापस लौटा तो उसके चेहरे से तृप्ति-भाव टपक रहा था। अवध ने बैलों का सौदा हो जाने की खुशख़बरी सुनाई तो सितुआ हैरान रह गया। अवध ने बैलों का सौदा कर लिया यह उसके लिए आश्चर्य का विषय था। इसीलिए विस्मय के साथ हर्षित भी हुआ। फिर उसने अवध से सवाल किया, "ख़रीदार कौन गाँव का था? क्या नाम था?"

"यह तो पूछे नहीं", अवध ने भोलेपन से कहा।

"बिना कुछ जाने-सुने बेच दिए? हूँ, लेल्ह ही हो। रसीद में देखो, नाम-पता लिखा होगा।" सितुआ ने झिड़कते हुए कहा था।

"अरे, उ चश्मा वाला नहीं था, उसी को तो बेचे हैं" अवध ने बताया।

यह सुनना था कि सितुआ ने सिर धुन लिया।

सितुआ आहत मन से बोल पड़ा "क्या? ई क्या किया तुम ! अरे तुम देखे नहीं थे कि बिना कुछ देखे-सुने कइसे अंधा जईसा बतिया रहा था। समझ में नहीं आता है तुमको कुछ भी? इतना बड़ा शहर में पढ़ रहे हो और दिमाग ढेला भर का नहीं है।"

"काहे क्या हो गया? हमको बताइये। क्या बात है सितो भाई?" अवध का मन अब बेचैन हो गया था।

"अरे यार, उ कसाई था।" सितुआ ने चीख़ते हुए कहा।

फिर थोड़ा थमकर बोला, "पाप हो गया रे अवध। चाची बहुत गुस्साएंगी।"

सितुआ आसमान की ओर देखकर कुछ बुदबुदाने लगा था मानो अपने पीर-पुरखों से क्षमा-याचना कर रहा हो।

अवध ने सहमे हुए स्वर में कहा, "सितो भाई, माँ को मत बताइयेगा।"

सितुआ उसे देखकर मुस्कुराया और धीरे से बोला, "चलो जो हुआ सो हुआ। ठीक है, हम चाची को कुछ नहीं बताएँगे। लेकिन तुम भी हमारे घर में भनक मत लगने देना कि हम तुमको छोड़कर कहीं और भी गए थे।"

मौन समझौते पर सहमति बनते ही दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।

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(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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हमको कभी माफ़ मत करना, तबरेज़... #IndiaAgainstLynchTerror



हमको कभी माफ़ मत करना, तबरेज़...

दो दिन हुए, तबरेज़ की पिटाई का वीडियो न जाने कितने ही लोगों ने भेजा...देखने की हिम्मत जुटाना मुश्किल था...और फिर आज एक दोस्त से बात हुई और वहां से जवाब आया, "मुसलमान के लिए अब इस मुल्क़ में कोई जगह नहीं...तुम लोग जो चाहें कोशिश कर लो, अब इस मुल्क़ के ज़्यादातर हिंदू, हमारे ख़िलाफ़ हैं...हम बस चुपचाप पंचर बनाते रहें और ज़िंदगी की ख़ैर मनाएं..."

हमारे पास सारे मैसेज साम्प्रदायिक तो नहीं आते...समाज को बेहतर करने के भी आते हैं...लेकिन हम वो मैसेज किसको फॉरवर्ड करते हैं? उन्हीं दोस्तों को, जो पहले से ये सारी बातें समझते हैं...क्या हम ये मैसेज अपने पिता, मां, भाई-बहन, रिश्तेदारों और दोस्तों को भेजते हैं, जो इस साम्प्रदायिकता से भरते जा रहे हैं...जो इन शैतानों के मानसिक चंगुल में आते जा रहे हैं...हम इग्नोर करते हैं...

मैं आज पहली बार ये नहीं कह सका कि ऐसे कैसे हो जाएगा...
   मैं नहीं कह पाया कि सब ठीक हो जाएगा...

   मैं ये भी नहीं कह पाया कि हम लड़ेंगे मिलकर...

   मैं ये भी नहीं कह पाया कि आखिरकार हम इनको हरा देंगे...

मैं क्या कहता आखिर और क्या कह पाता???

इसके ठीक बाद एक और दोस्त का मैसेज आया, जिसने हनुमान चालीसा का वीडियो भेजा था...मैंने बस इतना कहा कि यार ये सब मत भेजा करो...और फिर उससे आगे बात हुई...उसका पहला रिएक्शन था,
'यार, उसे मुसलमान की तरह क्यों देख रहे हो...वो चोरी कर के भाग रहा था...क्रिमिनल में भी तुम लोग यार हिंदू-मुस्लिम करते हो...'

मैं फिर चुप था...

   मैं उससे ये नहीं कह पाया कि अगर बात हिंदू-मुस्लिम की बात नहीं थी तो उस से जय श्री राम और जय हनुमान के नारे क्यों लगवाए गए?

   मैं उससे ये भी नहीं कह पाया कि क्या कोई हिंदू चोरी करते पकड़ा जाता, तो भी उससे जय श्री राम के नारे लगवाए जाते?

   मैं उससे ये भी नहीं पूछ सका कि क्या जय श्री राम बोलने से चोरी या कोई भी अपराध कम हो जाता है?

   मैं उससे ये भी नहीं पूछ सका कि क्या अगर उसने चोरी की भी थी, तो क्या उसे पीट कर मार डालना चाहिए था?
मैं चाहता हूं कि मेरी दाढ़ी को देख भी किसी दिन मुझे ये लोग मुस्लिम समझें...मैं भी अपना नाम तबरेज़ बता दूं...मुझे भी पीट कर ये लोग मार डालें और शायद उस रोज़ कम से कम मेरे परिवार, मेरे रिश्तेदारों और मेरे दोस्तों को ये अहसास हो जाए कि वो किस पागलपन के साथ खड़े थे...और कोई रास्ता मुझे नहीं सूझता है...
मैं दोनों से कुछ नहीं कह सका...मैं किसको समझाऊं...और क्या कह कर...क्या कहूं मैं अपने मुस्लिम दोस्तों से कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा? क्या 5 साल में कुछ ठीक हुआ? क्या हम इतनी ताकत और मेहनत से लड़ रहे हैं साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ कि हम कुछ ठीक कर सकें? क्या हम रोज़ देश की तमाम राजनैतिक विपक्षी ताकतों से लेकर, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को ,साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ने की जगह एक-दूसरे की छवि खराब करने में लगे रहते नहीं देखते हैं...हम किस मुंह से उनको ढांढस बंधा दें...हम कैसे उनसे कहें कि हम बचा लेंगे...

क्या कहूं मैं अपने उस दोस्त से, जो इस घटना को सीधे नहीं तो अप्रत्यक्ष तौर पर सही ठहरा रहा है...ऐसे तमाम दोस्तों से सिर्फ दोस्ती बचाए रखने के लिए हम सालोंसाल चुप नहीं रहे हैं क्या...क्या हमने पिछले ही तमाम वक्त में संवाद की जगह सोशल मीडिया पर ब्लॉक कर देना या ऐसे लोगों को इग्नोर करने का रास्ता नहीं चुना...हमारे पास सारे मैसेज साम्प्रदायिक तो नहीं आते...समाज को बेहतर करने के भी आते हैं...लेकिन हम वो मैसेज किसको फॉरवर्ड करते हैं? उन्हीं दोस्तों को, जो पहले से ये सारी बातें समझते हैं...क्या हम ये मैसेज अपने पिता, मां, भाई-बहन, रिश्तेदारों और दोस्तों को भेजते हैं, जो इस साम्प्रदायिकता से भरते जा रहे हैं...जो इन शैतानों के मानसिक चंगुल में आते जा रहे हैं...हम इग्नोर करते हैं...

हम में से कितने लोग ये सवाल लेकर अदालत जाएंगे कि आखिर मेडिकल कंडीशन्स के बावजूद कैसे तबरेज़ को जेल भेज दिया गया...हम में से कितने लोग शरीक होंगे किसी विरोध प्रदर्शन में कि सरकारों और मुल्क के तमाम लोगों को दिखे कि इतने सारे लोग, तबरेज़...हर तबरेज़ के साथ हैं...घूम फिर के उन प्रदर्शनों में वही छोटे और लम्बे बालों, कुर्तों, किताबों और चश्मों वाले चेहरे दिखेंगे...जबकि आपमें से कितने ही लोग इस सब के खिलाफ़ हैं...पर आप नहीमं आएंगे...और देश को ये संदेश दे दिया जाएगा कि कुछ इंटेलेक्चुअलस् के अलावा किसी को इससे दिक्कत नहीं है...देश इसके साथ है...

मैं अभी बिल्कुल साफ तौर पर कहता हूं कि ये चोरी का मामला ही नहीं है, जय श्री राम और जय हनुमान के नारे लगवाने, पुलिस के तबरेज़ को बिना किसी प्रोसीज़र को फॉलो किए गिरफ्तार करने, मेडिकल स्थिति के बावजूद हिरासत में भेज दिए जाने से...और अब झारखंड के बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रिया से साफ है कि इसमें स्थानीय प्रशासन, नेता, पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया तक में शामिल लोगों की या तो मिलीभगत है, या फिर लापरवाही है...ये मामला साफ करता है कि हम नाज़ी जर्मनी बनने से बहुत दूर नहीं हैं...और ये भी कि अब भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस चाहे भी तो अपने ही पैदा किए भस्मासुरों को कंट्रोल नहीं कर सकती...हालांकि वो ऐसा चाहती भी नहीं है...

मैं चाहता हूं कि मेरी दाढ़ी को देख भी किसी दिन मुझे ये लोग मुस्लिम समझें...मैं भी अपना नाम तबरेज़ बता दूं...मुझे भी पीट कर ये लोग मार डालें और शायद उस रोज़ कम से कम मेरे परिवार, मेरे रिश्तेदारों और मेरे दोस्तों को ये अहसास हो जाए कि वो किस पागलपन के साथ खड़े थे...और कोई रास्ता मुझे नहीं सूझता है...

मैं मरना नहीं चाहता पर ये हालात किसी समझदार आदमी के जीने के लायक नहीं हैं...आपको लगता है कि अभी इतने खराब हालात भी नहीं हैं...या सबकुछ ठीक है...तो मैं आपको बता दूं, आपको किसी ने बताया नहीं है...आप मर चुके हैं...

नाथूराम गोडसे को माफ़ कर दीजिए और उसके नाम को गाली की तरह मत इस्तेमाल कीजिए क्योंकि गांधी को हम सब इतनी बार मार चुके हैं कि गोडसे को गांधी का क़ातिल कहना, गांधी और गोडसे, दोनों के ही साथ अन्याय होगा...गांधी, अगर कहीं हो सकते होंगे तो अनशन पर बैठे होंगे...अगर होते, तो झारखंड में अनशन पर बैठ गए होते...

और तबरेज़...मेरे भाई...मेरे दोस्त...मैंने आखिरकार तुम्हारा वीडियो देखा...मैं ज़ार-ज़ार रोने लगा...तुम बेहद ख़ूबसूरत नौजवान थे और सुनो हमको कभी माफ़ मत करना...हम इस लायक भी नहीं हैं कि हमको माफ़ किया जा सके...दरअसल हम इस लायक भी नहीं हैं कि हम तुम्हारा नाम भी अपने मुंह से लें....

अलविदा मेरे मुल्क़...अलविदा नागरिकों...आपको श्रद्धांजलि...अपने-अपने लिए आप सब दो मिनट का मौन रखिए...क्योंकि जब सब मर गए हैं तो आपके लिए कोई और कैसे मौन रखेगा...

रेस्ट इन पीस...

#तबरेज़
#JharkhandLynching

- मयंक सक्सेना

मयंक सक्सेना


(मयंक सक्सेना की फेसबुक वाल से / ये  लेखक के अपने विचार हैं।)
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ये गई रात के किस्‍से हैं — कहानी — योगिता यादव

फ़ोटो: भरत एस तिवारी


कहानी

कृश्न चन्दरजी का कालजयी व्यंग्य 'एक गधे की आत्मकथा' अभी इसलिए याद आ रहा है कि हिंदी को अच्छी-अच्छी कहानियों से समृद बना रही युवा कहानीकार योगिता यादव की कहानी 'ये गई रात के किस्‍से हैं ' पढ़ने के बाद यह अहसास अभी तक बना हुआ है कि कहानी 'एक पत्रकार की आत्मकथा' है. अच्छी कहानी पढ़ना वैसे भी एक पाठक के लिए सुखद होता है और अगर वह अच्छी कहानी साथ ही साथ पाठक को उसके किसी मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार की ज़िन्दगी का वह हिस्सा बगैर जजमेंटल हुए दिखला दे जो उसका वह मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार छुपाये रखने को मजबूर होता है तो वह एक सुघड़ जीवनरेखा वाली बेहतरीन और फुटनोट में संदर्भित की जाने वाली कहानी हो जाती है. 

बधाई योगिता यादव.

भरत एस तिवारी
१८.६.२०१९ 
नई दिल्ली