इन्दु शर्मा कथा सम्मान कभी किसी कमज़ोर किताब को नहीं दिया गया: तेजेन्द्र शर्मा

अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के 19 वर्ष

: तेजेन्द्र शर्मा


लगता है कल ही की बात है जब डा धर्मवीर भारती, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित एवं मैं स्वयं भारती जी के घर पर इंदु जी की मृत्यु के एक महीने बाद ही इकठ्ठे बैठे थे. यह पहला मौका था जब दीक्षित जी डा. भारती के घर गये थे. दीक्षित जी इंदु जी के अंतिम दिनों के विशेष मित्र थे. कई कई बार घन्टों इंदु जी के साथ बैठा करते थे. भारती जी भी इंदु को बहुत प्यार करते थे दोनों इलाहाबाद से जो थे. बातचीत के दौरान मैं कह बैठा, ''भारती जी, मैं तो किस्मत वाला था कि इन्दु जी मेरे जीवन में थीं. मेरी कहानियों की व्याकरण, भाषा, कथ्य सभी पर इंदु जी अपनी राय देतीं थीं. हर युवा लेखक तो इतना भाग्यशाली नहीं होता होगा.''

भारती जी तत्काल कह उठे, तो तुम युवा लेखकों के लिए इंदु के नाम पर कुछ करो. लगभग एक घन्टे भर में इंदु शर्मा कथा सम्मान का नाम, पुरस्कार राशि, कहानीकारों की 40 वर्ष की आयु सीमा सभी भारती जी एवं दीक्षित जी ने मिल कर तय करवा दी. और मैं तैयार हो गया टुकड़ा टुकड़ा इंदु युवा कथाकारों में बांटने के लिए. मैंने भारती जी से एक शर्त रखी की कार्यक्रम तभी होगा यदि पहले सम्मान-समारोह के मुख्य अतिथि बनना वे स्वीकार करें. और वे मान भी गये.

मई 1995 में इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थाप्ना हुई. विश्वनाथ सचदेव (जिन्हें मैं अपना स्थानीय अभिभावक कहा करता था), राहुल देव एवं सिने कलाकार नवीन निश्चल इसके न्यासी बने. और ट्रस्ट का पंजीकरण मुंबई में हो गया.

दूसरी मीटिंग में शामिल थे विश्वनाथ सचदेव, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, और डा. विजय कुमार. विचार विमर्श हुए और इन तीनों निर्णायकों ने प्रथम सम्मान के लिए कहानीकार के चयन का काम अपने सिर ले लिया. भारती जी ने साहित्यिक कार्यक्रमों में शिरकत पर स्वयं ही प्रतिबंध लगा रखा था. सेहत ठीक नहीं रहती थी और हिन्दी साहित्य में बढ़ती राजनीति से परेशान भी रहते थे. बहुत लम्बे अंतराल के बाद मुंबई के हिन्दी साहित्य प्रेमियों ने डा. धर्मवीर भारती को मंच से सुना. भारती जी ने गीतांजलिश्री के कहानी संग्रह अनुगूंज पर एक गहरा, गंभीर एवं सारगर्भित वक्तव्य दिया जिसकी लम्बे अर्से तक चर्चा सुनने को मिली.

एअर इंडिया के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने भी इंदु शर्मा कथा सम्मान को जैसे अपना आधिकारिक कार्यक्रम मान लिया था. मुंबई में पहली बार किसी हिन्दी साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन एक कारपेट से लैस, वातानुकूलित हॉल में आयोजित हुआ था. नरीमन पांइट पर एअर इंडिया बिल्डिंग का ऑडिटोरियम इंदु शर्मा कथा सम्मान का प्रतीक बन गया था.

कहते हैं ना कि यदि शुरूआत अच्छी हो जाए, तो काफ़िला चल निकलता है. कुछ यूं ही हुआ भी. पहले ही कार्यक्रम को प्रेस द्वारा इतना सराहा गया कि इंदु शर्मा कथा सम्मान को मुंबई के हिन्दी जगत का प्रतिनिधि कार्यक्रम बनने में जरा भी समय नहीं लगा नहीं लगा. कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मनोहर श्याम जोशी, गोविन्द मिश्र, कामता नाथ, ज्ञानरंजन, कन्हैया लाल नंदन, सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा, जितेन्द्र भाटिया, सुदीप, देवमणि पाण्डेय, दिनेश ठाकुर, राजेन्द्र गुप्ता, सुरेन्द्र पॉल, कन्हैया लाल सराफ़, राम नारायण सराफ़, सभी इस सम्मान के साथ जुड़ते चले गये. चालीस वर्ष से कम उम्र के कथाकारों के लिए यह एकमात्र सम्मान उभरने के पश्चात अब प्रतिष्ठित भी हो चला था.

इंदु शर्मा के पुत्र एवं पुत्री मुंबई के सेठ दामोदर दास चुनीलाल बरफ़ीवाला ट्रस्ट के कॉस्मोपॉलिटन स्कूल में पढते थे. इसलिये यह निर्णय लिया गया कि उस स्कूल के पांचवीं एवं नवीं कक्षा में हिन्दी मे प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय आने वाले छात्रों को सौ सौ रुपये के पुरस्कार दिए जाएं. इसके लिए कुछ राशि बैंक में जमा करवा दी गई जिसके व्याज से यह पुरस्कार आज भी दिए जा रहे हैं.

महाभारत में भीष्म पितामह कहते हैं कि काल की गति न्यारी है. समय ने करवट ली और मेरी पत्नी नैना और पूरे परिवार ने मिल कर लंदन वासी होने का निर्णय ले लिया. मित्रों को यह शक हो चला था कि मेरे लंदन-वासी होने के पश्चात यह यज्ञ यहीं समाप्त हो जाएगा. लेकिन मेरे परम मित्र कथाकार सूरज प्रकाश को यह मंजूर नहीं था. उसने ट्रस्ट के सभी काम अपने सिर ले लिए. अपनी पत्नी मधु के साथ वह इंदु शर्मा कथा सम्मान को समर्पित से हो गये. उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि ट्रस्ट के लिए काम करके उन्हें क्या हासिल होता है.उनके लिए मित्रता कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. हम दोनों में तक़रार भी होती है, हम झगड़ते भी हैं, लेकिन सूरज की कमिटमेन्ट में कभी कोई कमी नहीं आती. उन्होंने वर्ष 1999 के लिए मुंबई में कार्यक्रम के आयोजन का भार उठाया जहां मैं और मेरा परिवार अतिथि बन कर पहुंचे. उस वर्ष मनोज रूपड़ा सम्मानित हुए थे. लेकिन आयोजन में पेश आई मुश्किलों को देख कर हमें महसूस हुआ कि अब इस कार्यक्रम का आयोजन लंदन में ही होना चाहिए. वैसे भी हिन्दी साहित्य के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय सम्मान या पुरस्कार तो अब तक कोई था नहीं, और नई शताब्दी शुरू होने जा रही थी. तय किया गया कि इंदु शर्मा कथा सम्मान को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दे दिया जाए.लेकिन इसके लिए साधन कहां से आयेंगे?

लन्दन पहुंच कर इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट के नए स्वरूप कथा (यू.के.) का गठन किया गया. माननीय दिव्या माथुर, रमेश पटेल एवं नैना शर्मा ने मिल कर लंदन में कथा (यू.के.) का पौधा रोपा. दिव्या जी के अनूठे व्यक्तित्व एवं नेतृत्व का लाभ हमें मिला और बहुत ही कम समय में इंगलैण्ड में कथा (यू.के.) की कथा गोष्ठियों का आयोजन होने लगा. इन गोष्ठियों में दो कहानीकार अपनी रचनाओं का पाठ करते और उपस्थित प्रतिभागी कहानी पर अपनी निष्पक्ष राय देते. इन गोष्ठियों में पद्मेश गुप्त, भारतेन्दु विमल, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, उषा वर्मा, शैल अग्रवाल, डा. गौतम सचदेव, अरुण अस्थाना, कैसर तमकीन, शाहिदा अज़ीज़ ज़ैसे रचनाकारों ने तो अपनी कहानियों का पाठ किया ही, भारत से अलका सरावगी एवं न्युयार्क से सुषम बेदी ने भी अपनी रचनाओं से इन्हें समृद्ध किया. कैलाश बुधवार, रवि शर्मा, अचला शर्मा, सत्येन्द्र श्रीवास्तव, महेन्द्र वर्मा, डा. कृष्ण कुमार, चित्रा कुमार, तितिक्षा शाह, डा. के.के.श्रीवास्तव, नरेश भारतीय, अनिल शर्मा, के.बी.एल. सक्सेना, सलमान आसिफ़, के.सी.मोहन, परवेज. आलम आदि ने इन गोष्ठियों में शिरकत करके इन गोष्ठियों के स्तर को ऊंचा उठाने में सहायता की. हमारा प्रयास यही रहा कि यह गोष्ठियां लोगों के घरों मे आयोजित की जा सकें ताकि उनके घर में हिन्दी कम से कम सुनी तो जा सके. रमेश पटेल, अनिल शर्मा, सुनील पटेल, कैप्टन बिहारी, अरुणा अजितसरिया, ज़किया ज़ुबैरी, महेन्द्र दवेसर, शैल अग्रवाल आदि हमारी कई गोष्ठियों के मेज़बान बने. ऐसी ही एक गोष्ठी में तितिक्षा शाह ने हमें सुझाया कि भारत के लेखकों के लिए तो हम इंदु शर्मा कथा सम्मान के आयोजन की बात सोच रहे हैं लेकिन इंगलैण्ड में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य का मूल्यांकन कैसे होगा? इस तरह पद्मानंद साहित्य सम्मान की योजना बनी. इस सम्मान के लिए किसी विधा की सीमा नहीं बांधी गई. कथा (यू.के.) के वर्तमान पदाधिकारी हैं काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी (संरक्षक),  श्री कैलाश बुधवार (अध्यक्ष), रमेश पटेल (कोषाध्यक्ष), श्रीमती मधु अरोड़ा (मुंबई प्रतिनिधि), एवं तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव)

सदा की तरह एअर इंडिया एक बार फिर हमारा साथ देने के लिए तैयार थी. यू.के. में एअर इंडिया के क्षेत्रीय निदेशक कैप्टन के. बिहारी ने प्रायोजन का जिम्मा अपने सिर उठा कर हमारे विचारों को अमली जामा पहनाया. लंदन का नेहरू केन्द्र इंदु शर्मा कथा सम्मान की नई पहचान बन गया. वर्ष 2000 में नई शताब्दी के आगमन से इंदु शर्मा कथा सम्मान अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप ले कर सामने आया. सम्मान के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप को देखते हुए 40 वर्ष की आयु सीमा हटा दी गई और इसे अधिक विस्तार देने के लिए कहानी के साथ साथ उपन्यास विधा को भी जोड़ दिया गया ताकि सम्मान पूरे कथा साहित्य का प्रतिनिधित्व कर सके. प्रथम अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए चित्रा मुद्गल के उपन्यास आवां का चयन किया गया, वहीं प्रथम पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त करने वाले साहित्यकार बने डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव जिन्हें यह सम्मान उनकी रचना टेम्स में बहती गंगा की धार के लिए प्रदान किया गया.

कार्यक्रम की सफलता का अंदाज़ उसकी प्रेस कवरेज देख कर लगाया जा सकता है. सूरज प्रकाश प्रथम कार्यक्रम को देखते हुए लंदन स्वयं पहुंचे और हमारा मार्गदर्शन किया. चित्रा जी के उपन्यास के चयन पर जहां हमें आमतौर पर सराहना मिली, वहीं हंस पत्रिका ने हमारी कडी आलोचना करते हुए इसे पिछले दरवाजे से किया गया कार्य घोषित किया. आवां को हाल ही में मिले व्यास सम्मान ने हमारे निर्णायकों की समझ बूझ और चयन पर स्वीकृति की एक और मोहर लगा दी है.मजेदार बात यह है कि वही मित्र जो पहले चालीस वर्ष की आयु सीमा पर एतराज क़रते थे, आज वही आयु सीमा हटाने और उपन्यास को भी कहानी के साथ जोडने की आलोचना कर रहे थे. हमें ख़ुशी इस बात की थी कि यदि कोई हमारे काम की तारीफ़ कर रहा है, तो कोई आलोचना कर रहा था. यानि कि प्रतिक्रियाएं मिल रही थीं. कोई भी हमारे काम के प्रति उदासीन नहीं था.

चित्रा जी जब हमारे परिवार के साथ रहीं और लंदन देख कर लगभग एक बालक की सी प्रतिक्रियाएं दीं, तो हमे महसूस हुआ कि हर व्यक्ति में एक बालक हमेशा जिन्दा रहता है.

दरअसल एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान की कुछ वांछित जरूरतें होती हैं और फिर यदि यह सम्मान हिन्दी का पहला ही अंतर्राष्ट्रीय सम्मान हो तो हमारी जिम्मेदारियां और भी बढ ज़ाती हैं. अब क्योंकि मैं स्वयं किसी साहित्यिक ख़ेमे से जुडा हुआ नहीं हूं, इसलिए (मुझे ऐसा लगता है कि मेरी कहानियों का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया. हमें महसूस हुआ कि ऐसा बहुत सा लेखन हिन्दी में मौजूद है जो केवल इसलिए उपेक्षित पड़ा है क्योंकि किसी मठाधीश ने उस पर अपना हाथ नहीं धरा. संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, और विभूति नारायण राय, विकास कुमार झा, हृषिकेश सुलभ कुछ ऐसे ही नाम हैं जिन्होंने उच्चकोटि के साहित्य का सृजन किया है किन्तु पुरस्कार एवं सम्मान उनसे कन्नी काट कर निकल जाते हैं. हमारे निर्णायक मण्डल के सदस्य इस बात की चिन्ता नहीं करते कि लेखक का कद कितना बडा है, उसकी किस किस से पहचान है उसके माध्यम से कथा (यू.के.) को क्या क्या लाभ हो सकते हैं. उनका केवल एक ही पैमाना होता है कि रचना कितनी सशक्त है. चाहे फिर वो रचना किसी लेखक की पहली रचना ही क्यों न हो. इस मामले में हम इंगलैण्ड के बुकर्स प्राइज क़ी राह पर चलते हैं. इस मामले में एक पुस्तक ऐसी याद आती है जो दो वर्षों तक दूसरे स्थान पर रही. अब सम्मान तो एक ही रचना को मिल सकता है, किन्तु भगवान दास मोरवाल का उपन्यास काला पहाड, और मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास शिगाफ़ हमें हमेशा अपनी याद दिलाता रहेगा कि कई बार एक से अधिक महत्वपूर्ण रचनाएं प्राप्त होने से निर्णय लेने में कितनी कठिनाई होती है। लगता है कि हम किसी एक रचना के साथ नाइन्साफ़ी कर रहे हैं। हमें बहुत बार सुनने को मिलता है कि फलां लेखक का काँट्रीब्यूशन फलां से कहीं अधिक है, हमारा कहना है कि हम सम्मान काँट्रीब्यूशन के लिए नहीं दे रहे हैं.

अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान केवल उत्कृष्ट कृति के लिए दिया जाता है.

एक मजेदार बात और, मैं व्यक्तिगत तौर पर सम्मानित साहित्यकारों से परिचित भी नहीं था. अधिकतर लेखकों को पहली बार एअरपोर्ट पर ही पहली बार मिला. इसीलिये हम एकदम नये लेखकों जैसे कि प्रमोद कुमार तिवारी (डर हमारी जेबों में) एवं महुआ माजी (मैं बोरिशाईल्ला) को सम्मानित करने का साहस कर पाये. मैं बोरिशाईल्ला का रूपा प्रकाशन द्वारा अंग्रेज़ी में अनुवाद करवा कर प्रकाशित करवाना हमारे निर्णायक मण्डल की समझ बूझ और हिम्मत की दाद देता है।

बहुत से वरिष्ठ लेखकों ने और अन्य मित्रों ने भी कहा कि संस्था को चाहिए कि निर्णायकों के नाम सार्वजनिक किये जाएं. उससे पारदर्शिता बढेग़ी. हमारा उनसे एक ही प्रश्न है कि साहित्य अकादमी अपने निर्णायकों के नाम सार्वजनिक करती है, क्या आम लोग उनके निर्णय से सहमत हो पाते हैं. क्या लोगों को नहीं लगता कि कहीं कोई गडबड हो गई है. जब तक हमारे निर्णायक सही काम कर रहे हैं, उनके सार्वजनिक होने या न होने से क्या अन्तर पडता है. प्रक्रिया से अधिक हमारे काम पर निगाह रखिये. कहीं हम चूकें या किसी कमज़ोर रचना को सम्मानित करें, हमें अवश्य सही राह दिखाइए.

हमसे बहुत बार कहा जाता है कि हम अपने निर्णायक मण्डल की घोषणा क्यों नहीं करते। यह ठीक वैसा ही है कि जैसे कोई कहे कि आप आम खिला रहे हैं गुठली क्यों नहीं दिखा रहे। हम अपना काम पूरी शिद्दत और ईमानदारी से कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि हमारे सम्मानित साहित्यकारों की सूचि इस बात की गवाह है। वैसे तो  साहित्य अकादमी के बारे में समाचार उड़ते हैं कि आजकल गुलज़ार, गोपीचन्द नारंग के यहां आते जाते देखे गये तो इस साल गुलज़ार को साहित्य अकादमी का सम्मान मिल जायेगा। हमने अपने निर्णायक मण्डल को इन सब बातों से बचा रखा है। न उन्हें कोई जाने और न उनसे संपर्क साधने का प्रयास करे। हमने देखा है कि अंतिम तीन पुस्तकों में से चयन करना आसान काम नहीं है। बहुत बारीक़ी से परखने के बाद ही निर्णय होता है। देखिये हम यह दावा नहीं करते कि देश में प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक हम पढ़ ही लेते हैं। यह दावा कोई भी पुरस्कार या सम्मान नहीं कर सकते। हां हम यह अवश्य कह सकते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान कभी किसी कमज़ोर किताब को नहीं दिया गया।

हमारी संस्था के साथ एअर इण्डिया की भागेदारी सबसे पुरानी है। हमारे पहले पांच कार्यक्रम (1995-1999) नरीमन पाइण्ट स्थित एअर इण्डिया बिल्डिंग के वातानुकूलित सभागार में आयोजित किये गये। एअर इण्डिया हमारे पुरस्कार विजेताओं एवं मुख्य अतिथि के लिये हवाई टिकट भी देती रही। लंदन में हमारे रीजनल डायरेक्टर के अतिरिक्त श्री यादव शर्मा का योगदान हमेशा याद रखेंगे।

इन 19 वर्षों ने हमें बहुत सी यादें दी हैं, खट्टी, मीठी, कड़वी सभी तरह की. लेकिन मैं केवल उन्हें ही याद रखना चाहूंगा जो मन में ख़ुशियां भरती हैं. दिव्या माथुर के नेतृत्व के दो वर्ष, एअर इंडिया लंदन के  कैप्टन बिहारी , कैप्टन अश्विन शर्मा, श्री आर.डी. राव, शैलेन्द्र तोमर एवं भाषा ठेंगडी क़ा सहयोग, भारतीय उच्चायोग के श्री पी सी हलदर, रजत बागची, आसिफ़ इब्राहिम, एस.एस. सिद्धु अनिल शर्मा, राकेश दुबे, आनन्द कुमार एवं बिनोद कुमरा का निरंतर साथ एवं प्रेरणा, विभाकर बख्शी जैसे मित्रों का साथ यह सभी हमारी यादों की धरोहर हैं. जब तक सूरज प्रकाश हमारे साथ जुड़े रहे  उनका व्यक्तित्व हमारी सोच को संतुलन प्रदान करता था. कमलेश्वर जी का दिल्ली - मुंबई के लिए हवाई जहाज क़ी टिकट के पैसे लेने से इन्कार कर देना, ज्ञान चतुर्वेदी, एवं एस आर हरनोट द्वारा सम्मान की सूचना मिलने पर भीगी सी प्रतिक्रिया देना, नैना जी एवं उनकी सहेलियों का कमिटमेन्ट एवं जुडाव, ज्ञान चतुर्वेदी का कहना कि तेजेन्द्र का पूरा परिवार इस यज्ञ से जुडा हुआ है भारत एवं इंगलैण्ड के साहित्यकार मित्रों का स्नेह यह सभी हमारी हिम्मत बढाते हैं.

हम आत्ममुग्ध नहीं हो रहे. यह केवल पीछे मुड क़र देखने की एक प्रक्रिया है. क्या हमने एक मजबूत नींव बना ली है, जिस पर हम कल एक सुदृड ऌमारत खडी क़र पायेंगे? यह सपना ज़रूर देखता हूं कि जिस तरह अंग्रेज़ी में बुकर पुरस्कार के लिये लेखक साहित्य जगत प्रतीक्षा करता है, ठीक वैसे ही इन्दु शर्मा कथा सम्मान के लिये भी हो।
वर्ष रचनाकार सम्मानित रचना विधा/प्रकाशक कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्थल
1995 गीतांजलिश्री अनुगूंज कहानी संग्रह / राजकमल प्रकाशन  डा. धर्मवीर भारती, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित एअर इंडिया भवन मुंबई
1996 धीरेन्द्र अस्थाना उस रात की गंध कहानी संग्रह / वाणी प्रकाशन कमलेश्वर, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित एअर इंडिया भवन मुंबई
1997 अखिलेश शापग्रस्त कहानी संग्रह / राधाकृष्ण प्रकाशन  राजेन्द्र यादव, कन्हैया लाल नंदन एअर इंडिया भवन मुंबई
1998 देवेन्द्र शहर कोतवाल की कविता कहानी संग्रह / आधार प्रकाशन  मनोहर श्याम जोशी, ज्ञानरंजन एअर इंडिया भवन मुंबई
1999 मनोज रूपड़ा दफन कहानी संग्रह / आधार प्रकाशन  गोविन्द मिश्र, कामता नाथ एअर इंडिया भवन मुंबई
2000 चित्रा मुद्गल आवां उपन्यास / सामयिक प्रकाशन डा. गिरीश कारनाड, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित नेहरू सेंटर, लंदन
2001 संजीव जंगल जहां शुरू होता है उपन्यास / राजकमल प्रकाशन  डा. गिरीश कारनाड, केशरी नाथ त्रिपाठी नेहरू सेंटर, लंदन
2002 ज्ञान चतुर्वेदी बारामासी उपन्यास / राजकमल प्रकाशन  नीलम अहमद बशीर, श्री पीसी हलदर नेहरू सेंटर, लंदन
2003 एस.आर. हरनोट दारोश कहानी संग्रह / राजकमल प्रकाशन  जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, श्री पीसी हलदर नेहरू सेंटर, लंदन
2004 विभूति नारायण राय तबादला उपन्यास / राजकमल प्रकाशन  रवीन्द्र कालिया, पवन कुमार वर्मा नेहरू सेंटर, लंदन
2005 प्रमोद कुमार तिवारी डर हमारी जेबों में उपन्यास / सामयिक प्रकाशन  पवन कुमार वर्मा  नेहरू सेंटर, लंदन
2006 असग़र वजाहत कैसी आगी लगाई उपन्यास / राजकमल प्रकाशन  टोनी मैकनल्टी रजत बागची हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स
2007 महुआ माजी मैं बोरिशाइल्ला उपन्यास / राजकमल प्रकाशन  टोनी मैकनल्टी मोनिका मोहता  हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स
2008 नासिरा शर्मा कुइयां जान उपन्यास / सामयिक प्रकाशन टोनी मैकनल्टी, ज़कीया ज़ुबैरी हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स
2009 भगवान दास मोरवाल रेत उपन्यास / राजकमल प्रकाशन टोनी मैकनल्टी, मोनिका मोहता हाउस ऑफ़ कॉमन्स
2010 हृषिकेश सुलभ वसन्त के हत्यारे उपन्यास / राजकमल प्रकाशन नलिन सूरी, बैरी गार्डिनर हाउस ऑफ़ कॉमन्स
2011 विकास कुमार झा मैकलुस्कीगंज उपन्यास / राजकमल प्रकाशन नलिन सूरी, विरेन्द्र शर्मा हाउस ऑफ़ कॉमन्स
2012 प्रदीप सौरभ तीसरी ताली उपन्यास / वाणी प्रकाशन विरेन्द्र शर्मा (M.P.), ज़किया ज़ुबैरी हाउस ऑफ़ कामन्स
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