कहानी: बनाना रिपब्लिक - शिवमूर्ति

कहानी 

बनाना रिपब्लिक

शिवमूर्ति

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ठाकुर के दालान से निकला तो उसका दिल धाड़-धाड़ कर रहा था। इतनी खुशी वह कैसे सँभाले? कहाँ रखे?

घुप्प अँधेरा। ओस से गीली घास पर चलते हुए पैरों में कीचड़ सने तिनके चिपकने लगे। पहर रात बीते ही इतनी ओस। जाते समय जल्दी में एक पैर की चप्पल ढूँढ़े नहीं मिली तो वह नंगे पैर ही चला आया था। अक्सर एकाध चप्पल छोटा पिल्ला मड़हे के पीछे तक उठा ले जाता है।

खेतों के बीच पहुँच कर वह रुका। दूर जा रही दसबजिया पसिंजर के इंजन ने लंबी सीटी मारी। फिर सन्नाटा। धान की फसल कटने से ज्यादातर खेत खाली थे। ऊपर देखा। तारों की चमक कुछ ज्यादा ही लगी। आसमान में तारे कुछ बढ़ गए हैं क्या? इस साल अगहन में ही इतनी ठंड। अपने टोले की ओर बढ़ते हुए वह कानों पर अँगोछा लपेटने लगा।

हैंडपंप पर पैरों का कीचड़ धोकर वह मँड़हे में घुसा और जमीन पर बिछे बोरे में पैर रगड़ते हुए चारपाई पर सोये बाप को पुकारा - बप्पा, ए बप्पा।

कथरी में लिपटे बाप की आवाज आई - हूँ...

सो गया है, सोच कर उसने भी बगल में पड़ी चारपाई पर कथरी बिछाई और लेट गया। लेकिन इतनी बड़ी बात पेट में रखकर लेटा नहीं गया। फिर आवाज दी - बप्पा! सो गए क्या?

क्या है?

मुँह पास ले जाकर उसने कहा - ठाकुर कहता है, परधानी लड़ जा।

क्या ऽ-ऽ-ऽ ?

परधानी लड़ने को कहता है ठाकुर।

बाप कथरी उलट कर बैठ गया। वह बाप के पैताने आ गया।

इसीलिए बुलाया था? ...कहा नहीं कि मुझे पागल कुत्ते ने काटा है जो ठाकुरों-बाभनों के गाँव में परधानी लड़ूँगा। लड़ कर उनकी आँख का काँटा बनना है क्या?

काँटा क्यों? वे तो लड़ ही नहीं सकते। इस बार अपने गाँव की परधानी हरिजन कोटे में आ गई।

कुछ देर चुप्पी रही।

इसलिए ठाकुर मुझे लड़ाना चाहता है। कहता है - मैं नहीं बन सकता तो मेरा आदमी बने। लाखों की कुर्सी दूसरे के पास क्यों जाए?

कहता था, खुल कर मदद करूँगा। रुपए पैसे से भी।

न बेटा। ए काम ठीक नहीं। परधानी का बवंडर हम नहीं सँभाल सकते। उड़ जाएँगे।

बाप मुँह ढँककर लेट गया। थोड़ी देर तक बिसूरने के बाद वह अपनी चारपाई पर आ गया। लेकिन अब नींद कहाँ!

ठाकुर कहता था - सालाना पंद्रह बीस लाख तक खर्च करने का चांस रहता है। मनरेगा की मद से तो चाहे जितना निकालो। बस कागज का पेटा पूरा करते रहो। नीचे से ऊपर तक सबका मुँह बंद करने के बाद भी रुपए में चार आना कहीं गया नहीं। पाँच साल में पचीस लाख की बचत। एक लाख में सौ हजार होते हैं। एक हजार... दो हजार... सौ हजार। पचीस बार। हर महीने हजार रुपए मानदेय अलग। थाना पुलिस में पूछ-पहचान हो जाती है। फौरन बंदूक का लायसेंस मिलता है। रोज सौ लोगों का सलाम मिलता है। बेटे की शादी में मोटर साइकिल मिलती है। बेटी की शादी में हजारों रुपए न्योता मिलता है।

उसने करवट बदली।

कहता था - दो, तीन तालाबों का जीर्णोद्धार करने का मौका मिल गया तो तेरी सात पुस्त का जीर्णोद्धार हो जाएगा।

कहता था - ब्लाक प्रमुख का चुनाव आने दे। हर कैंडिडेट आकर तीन से पाँच लाख तक गिनेगा।

कहता था - वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन, मिड डे मील और पता नहीं कितनी-कितनी मदों से रुपया पानी की तरह बरसता है। पाँच साल में कितनी कमाई होगी उसका क्या कोई हिसाब लगा सकता है?

लेकिन जितना लगा सका, वह रात भर हिसाब लगाता रहा। सबेरे उठते ही उसने एक बार फिर आमदनी और रोब-रुतबे का लेखा-जोखा बाप के सामने रखा। फिर समझाया - हम नहीं लड़ेंगे तो ठाकुर किसी और को लड़ा देगा। अपना आदमी समझ कर पहले मुझे बुलाया है। समझो लक्ष्मी खुद चल कर आ रही हैं। पचीस लाख!

बाप झुँझला गया - इतने पैसे का हम करेंगे क्या? रखेंगे कहाँ? वही ठाकुर रात में सब लूट ले जाएगा।

बीड़ी का सुट्टा लगाते, हाथ में पानी भरा लोटा झुलाते बाप खेतों की ओर निकल गया।

ऐसा घामड़ बाप किसी को न मिले। उसने कपार पीट लिया।

ठाकुर ने कहा था - सबेरा होते ही अपनी बिरादरी के बड़े बुजुर्गों के दरवाजे जाना। पैर छूकर कहना, आशीर्वाद लेने आया हूँ। सिर पर हाथ रखिए तो खड़ा होऊँ नहीं तो चुपाई मार कर बैठ जाऊँ।

सबसे पहले मुरारी मास्टर को पटाना होगा। गाँव में बिरादरी के इकलौते मास्टर हैं। मीन-मेख निकालने में आगे।

मास्टर ने देखते ही पूछा - सबेरे-सबेरे कैसे राह भूल गए?

मास्टर चाचा, सुना है अपने गाँव की परधानी अपनी बिरादरी के लिए रिजर्व हो गई।

सिर्फ अपनी नहीं, किसी भी दलित बिरादरी के लिए।

तब आप खड़े होइए इस बार।

सरकारी नौकरी वाला नहीं खड़ा हो सकता जग्गू। मास्टर की आह निकली - नौकरी से इस्तीफा देना होगा।

ऐं। यह तो ठीक नहीं। इस्तीफा क्यों देंगे? लेकिन चांस आया है तो बिरादरी का कोई आदमी जरूर खड़ा होना चाहिए।

तो तुम्हीं खड़े हो जाओ।

मैं। जग्गू उनकी आँखों में झाँकने लगा - आप साथ देंगे?

अकेले मेरे साथ देने से क्या होगा? सारे गाँव का साथ चाहिए।

नहीं चाचा। आप अकेले एक तरफ। बाकी सारा गाँव एक तरफ।

खुशामद रंग लाई। मास्टर ढीले पड़े। बोले जाओ, 'पहले और लोगों का मन-मुँह तौलो। मैं तो घर का आदमी ठहरा।

मास्टरवा से इतना मिल गया यही बहुत है। अब यहाँ पल भर भी रुकना खतरे से खाली नहीं। क्या पता बात का रुख किधर मुड़ जाय। जग्गू ने लपक कर मास्टर के पैर छुए - जो आज्ञा! और उँगलियों को माथे से लगाते हुए चल पड़ा।

बिरादरी में सबसे बुजुर्ग पहाड़ी बाबा हैं। मँड़हे के एक कोने में झिलंगा खटिया पर पड़े-पड़े मौत के दिन गिन रहे हैं। लेकिन बिरादरी उनकी बात से बाहर नहीं हो सकती। जग्गू ने उनका पैर थोड़ा जोर लगा कर छुआ।

पहचानने की कोशिश करते हुए पूछा बूढ़े ने, के?

मैं हूँ बाबा। तुम्हारा भतीजा, जग्गू।

पहाड़ी ऊँचा सुनते हैं। जग्गू ने ऊँची आवाज में देर तक उन्हें पूरी बात बताई। बुढ़ऊ खुश हुए। पोपले मुँह में हँसी घोलकर कहा - तुम्हारे कंधे पर बैठ कर वोट देने चलूँगा।

टोले में चमकट बिरादरी के सात घर हैं। इतनी देर में पूरे टोले में बात फैल गई।

दसई के दुआरे तक पहुँचते-पहुँचते नौजवानों ने जग्गू को घेर लिया - फिर से पूरी बात बताओ भैया।

अपनी बिरादरी में परधानी की कुर्सी आए, इससे बढ़कर खुशी की बात क्या होगी? पासी, धोबी, खटिक, चमार की बिरादरी के परधान तो आस पास बहुत सुने गए हैं लेकिन अपनी बिरादरी का? एक भी नहीं। हम लोग तुम्हें जिताने के लिए रात दिन एक कर देंगे।

नौजवानों की खुशी देखते बन रही है।

लेकिन लड़ने में तो बहुत खर्च होगा। कैसे करोगे?

तीनों घेंटे बेंच दूँगा।

उतने से हो जाएगा?

ठाकुर ने कहा है कि वह भी कुछ मदद करेगा।

लेकिन उसको लौटाओगे कहाँ से?

जीतने के बाद सब वसूल हो जाएगा।

और कहीं हार गए तो?

अरे शुभ-शुभ बोलो भइया। आप सब लोग साथ देंगे तो हार कैसे जाएँगे? यह हम सभी के मान सम्मान की लड़ाई है।

सही बात। सही बात।

दरअसल ठाकुर भी पूरी ताकत लगाएगा। उसे पदारथ दुबे से अपनी पिछली हार का बदला लेना है। बीच में फायदा हम लोगों को मिल जाएगा।

सही बात! सही बात! पदारथ किसे खड़ा कर रहे हैं?

एक दो दिन में पता चल जाएगा। ...चलता हूँ...

ठाकुर ने कहा है - दोपहर तक दलित बस्ती को कवर करके शाम तक ब्राह्मणों, खासकर पदारथ के पट्टीदारों के दरवाजे पर पहुँचना है। कह रहा था कि जो पहले पहुँचता है उसका पहला हक बनता है। रात में जाकर बताना है कि किसने क्या कहा?

दोपहर ढल गई। होंठों पर पपड़ी पड़ गई। लेकिन भूख का कहीं नामोनिशान नहीं। जितने लोगों के पैर आज छूने पड़े उतने तो सारी जिंदगी में नहीं छुए होंगे। इसमें दूर से हाथ जोड़ कर ब्राह्मणों को की गई पैलगी शामिल कर लें तो यह संख्या दो सौ तक पहुँच जाएगी

घर पहुँचा तो दसबजिया पसिंजर आने का समय हो रहा था। दुआर पर अँधेरा और सन्नाटा था। मँड़हे में बप्पा की नाक बज रही थी। दरवाजे को धक्का देकर वह आँगन में पहुँचा। रसोई से ढिबरी के प्रकाश की पतली फाँक आँगन तक आ रही थी। लगता है, खवाई पियाई हो गई।

पत्नी रसोई से जूठे बर्तन लेकर निकल रही थी। पूछा - कहाँ थे दिन भर?

लाओ, क्या है? बाल्टी टेढ़ी करके हाथ धोते हुए वह बोला। बर्तन नाबदान के पास रखते हुए पत्नी ने बताया - थाली ड्योढ़ी के पास ढँकी रखी है

वह लोटे में पानी लेकर लौटी।

न कुल्ला न दातून। सबेरे के गए अब घर की सुध आई?

वह सिर झुकाकर खाने में जुट गया।

दिहाड़ी कमाने क्यों नहीं गए? सुअर दस बजे तक बाड़े में बंद घुर्र-घुर्र करते रह गए तो मैने बेटी को उन्हें चराने बजराने भेजा। बेटी कह रही थी कि बप्पा बभनौटी में हाथ जोड़े घूम रहे थे। ऐसी क्या गलती कर दिए कि बाभनों के आगे हाथ जोड़ने की जरूरत पड़ गई।

गलती नहीं, अपनी गरज से...

अपनी कौन सी गरज?

सारे गाँव में हल्ला हो गया और तुझे कुछ खबर ही नहीं? ...अरे, सहसा वह चौंका - अभी तो मुझे ठाकुर के घर जाना था।

क्यों?

अरे, काम से।

ठाकुर से क्या काम पड़ गया?

अरे भाई, जैसे पहले बप्पा ठाकुर का खेत जोतने जाते थे, बाद में ठाकुर अपने ट्रैक्टर से हम लोगों का खेत जोतने लगा। वैसे ही पहले वह परधान बनने के लिए हम लोगों के टोले में वोट माँगने आता था। अब मुझे बनना है तो उसके पास जाना होगा।

क्या अंड-बंड बोल रहे हो। कहीं से पी पाकर आए हो क्या? इधर आओ। तुम्हारा मुँह सूँघूँ।

अरे हट। मुँह में क्या रखा हैं? हाँ, चुम्मा लेने का मन हो तो साफ-साफ बोल। ...और दौड़ कर तेल गरम कर ला। मालिस करना होगा। पैर दर्द से फटे जा रहे हैं।

पत्नी बाहर जाने के लिए मुड़ भी न पाई थी कि उसने जूठे हाथ ही उसे अँकवार में भरा और लिए-दिए बगल की खटिया पर गिर पड़ा।

खटिया की पाटी टूटी - चर्र-ऽ-ऽ !

गाँव में जैसे भूडोल आ गया है।

आज भी यहाँ ऐसे लोग मिल जाएँगे जिन्होने जिला मुख्यालय का मुँह नहीं देखा। बस घर से खेत तक। बहुत हुआ तो बाजार तक चले गए । साल में एकाध मेला और एक दो बारात।

पिछड़ी या दलित औरतें तो सभा, जुलूस या मेले ठेले में चली भी जाती हैं, सवर्ण औरतों की बड़ी आबादी अभी भी गाँव से बाहर नहीं निकलती। मायके से विदा हुईं तो ससुराल में समा गईं। ससुराल से निकलती हैं तो सीधे श्मशान के लिए। देवी के थान पर लपसी, सोहारी चढ़ाने के लिए जाना ही उनकी तीर्थयात्रा या पिकनिक है। ऐसी एक बड़ी आबादी है जो आज भी जाति व्यवस्था को ब्रह्मा की लकीर मानती है। वह मानती है कि सवर्णों के गाँव में दलित को परधानी की कुर्सी पर बैठाना सवर्णों के सिर पर बैठाना हुआ। लोहिया तो समाजवाद नहीं ला पाए लेकिन आज की सरकारें लगता है ला के रहेंगी। किसी आदमी ने ऐसा किया होता तो उसका मूँड़ फोड़ देते। सरकारों का कोई क्या करे?

ठाकुर अपना दुख किससे कहें? असली रोब रुतबा तो जमींदारी के साथ ही चला गया था। रहा सहा परधानी के साथ चला गया। तीन बार उनके बाप प्रधान रहे। दो बार वे खुद थे। यह नाहरगढ़ गाँव उनके पुरखों का बसाया हुआ है। पुराना खंडहर हो चुका घर अभी भी गढ़ी कहलाता है। मास्टराइन राजगढ़ स्टेट की राजकुमारी हैं। किसी गैर की मौजूदगी में वे उन्हें हमेशा रानी साहब ही कह कर पुकारते हैं। पिछली हार से उन्हें इतना झटका लगा कि महीने भर चारपाई पकड़े रहे। सोचा था कि इस बार सीट निकालकर पिछली हार का बदला ले लेंगे तो इस आरक्षण ने सब मटियामेट कर दिया।

ट्यूबवेल घर के ओसारे में चारपाई पर बैठे-बैठे वे वोटरलिस्ट के पन्ने पलट रहे हैं। चारपाई के नीचे जातिवार और घरवार गणना कर-करके फेंके गए रद्दी कागजों का अंबार लग गया है।

उजाला होते ही आने के लिए कहा था जगुआ को। राह देखते-देखते आँखें पक गईं। अब दिखाई पड़ा है, पहर दिन चढ़े। मुँह से गाली न निकले तो क्या निकले!

जग्गू ने दोनों हाथ जोड़ कर, झुक कर सलाम किया।

अब तेरे आने का समय हुआ? इसी सहूर से परधानी करेगा?

क्या करें मालिक। सुअरों को बजराना जरूरी था। बेटी को बुखार है। और कोई है नहीं।

यह पकड़ कागज कलम और लिख।

जग्गू चारपाई के सामने जमीन पर उकड़ू बैठ कर लिखने लगा।

जो काम तहसील और ब्लाक से करवाना है उसे ठीक से नोट कर ले। नंबर एक, जाति प्रमाण पत्र बनवाना। आगे लिख - तहसील में बनेगा। फार्म भर कर जमा करना होगा। पचीस रुपए फीस जमा होगी। पक्की रसीद ले लेना। फोटो भी लगेगा। सौ रुपए अलग खर्च होगा।

ठीक।

ठीक नहीं। एक-एक प्वाइंट नोट कर ले नहीं तो वहाँ एक का तीन लेने वाले घात लगाए बैठे हैं।

फोटो पहले लगेगा कि जिस दिन प्रमाण-पत्र लेने जाएँगे?

पहले बे। खिंचा कर साथ ले जाना।

जग्गू घुटने पर कागज रख कर जल्दी-जल्दी घसीट रहा है। लिखने की आदत कब की छूट गई। पढ़ना तो चाय की दुकान पर अखबार के साथ कभी-कभी हो जाता है।

नंबर दो लिख, नो ड्यूज सर्टीफिकेट बनवाना। आगे लिख - दो जगह से बनेगा। ब्रेकट में लिख, क - उसके आगे लिख, पंचायत सेक्रेटरी बनाएगा। सौ रुपया लेगा। फिर नई लाइन से ब्रेकेट में लिख, ख - अमीन की रिपोर्ट पर नायब तहसीलदार की दस्कत से जारी होगा। खर्चा दौ सौ।

रेजर्ब की खबर आते ही उन्होंने अंदाजा लगा लिया था कि पदारथ मुंदर धोबी को खड़ा करेंगे। उससे जम कर पैसा खर्च कराएँगे। उसका बड़ा बेटा सउदिया कमा रहा है। पाँच साल में रुपए का पहाड़ खड़ा कर दिया है। खुद छोटे बेटे और बहू के साथ बाजार में लांड्री चलाता है। जितना चाहे खर्च करे। लेकिन धोबियों के वोट हैं कितने? तीन घर तेरह वोट। उन्होंने डायरी के पन्ने पर विपक्ष वाले कालम में लिखा - धोबी, तीन घर तेरह वोट। खास अपने पट्टीदार ठाकुर भी उनके कहने से जग्गू को वोट दे देंगे, इसमें संदेह है। उनके पिता कहते थे - बनिया तो एक जुट रहते ही हैं। ब्राह्मण भी जाति के नाम पर एकमत हो जाएँगे। लेकिन ठाकुर अगर गाँव में दो घर हैं तो भी दो गुट बना लेंगे। इस तरह ठाकुरों के साठ वोट में चालीस की उम्मीद कर सकते हैं। उन्होंने पक्ष वाले कालम में लिखा - ठाकुर चालीस वोट।

बस। इंतजार करता जग्गू पूछता है।

अबे, बस कैसे? अगला नंबर डाल। शपथ-पत्र बनवाना कि मेरे खिलाफ कोई मुकदमा कोई एफआईआर नहीं है।

इसी में आगे लिख, न कभी सजा हुई है न दिवाला निकला है।

मुंशी गरीब नेवाज किसी के खेत से एक गोभी और तीन चार मूलियाँ लेकर सामने चकरोड से गुजर रहे थे। ठाकुर की बात सुनकर रुक गए। हँसते हुए पूछा - किसका दिवाला निकलवा रहे हैं राजन?

आइए मुंशी जी, आइए। अपना जगुआ है। इस बार इसी को खड़ा कर रहे हैं परधानी के लिए। उसी के लिए एफिडेविट का मसौदा लिखवा रहे हैं। अभी तक आपके पास आशीर्वाद लेने नहीं पहुँचा? उठ बे...। मुंशी जी के पैर तो छू।

पैर छूते हुए जग्गू ने सफाई दी - गया था। चाची मिली थीं। मुंशी चाचा तब तक कचेहरी से नहीं लौटे थे।

कोई बात नहीं राजन। मुंशी जी जाते-जाते बोले - जहाँ आप हैं वहीं हम हैं और वहीं विजय है।

ठाकुर दूर तक मुंशी को जाते देखता रहा फिर जग्गू को सावधान किया - इस मुंशिया के आगे-पीछे घूमते रहना लेकिन अपना भेद हरगिज मत देना। फौरन पदारथ के पास पहुँचाएगा... आगे लिख, शपथ-पत्र का खर्च दौ सौ रुपए।

बनिया पार्टी का भेद मिलना तो मुश्किल है। अंत तक पता नहीं चल सकता कि किसको देंगे। हाँ, मुसलमानों के सत्रह घर अपनी तरफ आ जाएँगे, बशर्ते उन्हें कायदे से याद दिला दिया जाय कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय पदारथ महीने भर तक उस मुँड़खोल्ली सधुआइन का हाहाकारी कैसेट गाँव के शिवाले पर बजवाए थे। पिछली बार मुस्लिम टोले से बरकत मौलवी न खड़ा होता तो वे किसी हालत में न हारते। पूरे के पूरे एक सौ आठ वोट बरकत ने काट लिए जो मेरी झोली में गिरने वाले थे। यह तो साल भर बाद पता चला कि खुद पदारथ ने दस हजार देकर खड़ा किया था बरकत को।

तो अब चलता हूँ। ठाकुर को कागजों में खोया देख जग्गू कहता है।

अरे काहे की हड़बड़ी है?

दिहाड़ी कमाने जाना है।

दिहाड़ी कमाने जाएगा कि ए कागज पत्तर दुरुस्त कराएगा?

दो चार दिन और कमा लूँ। आखिर कागज पत्तर बनवाने का खर्च कहाँ से आएगा?

अब कमाने की नहीं खर्च करने की सोच। अभी से रात-दिन एक करना पड़ेगा। घेंटे बिके कि नहीं?

अभी कहाँ? दाम ही नहीं चढ़ा कायदे का।

अच्छा दो चीजें और नोट कर ले। पर्चा खरीदने का खर्चा सौ रुपए और रेजर्व की सिक्यूरिटी मनी पाँच सौ रुपए।

उन्होंने पक्ष वाले कालम में लिखा - मुसलमान 108 वोट। फिर 108 को काटकर 100 कर दिया।

अब हाथ पिराने लगा। दाएँ हाथ की उँगलियों को बाएँ पंजे में दबाते हुए जग्गू बोला।

अबे चुप। ठाकुर ने डपट दिया - चार अच्छर लिखने में पिराने लगा?

ब्लाक आफिस पर मेला जैसा लगा है।

दाखिल पर्चों की जाँच चल रही है। जिसके घर पर साबुत फूस का छप्पर और पैरों में चप्पल तक नहीं है वह भी परधानी का सपना देख रहा है। पाँच जातियो में बँटे चालीस घर दलितों के बीच से जग्गू को जोड़ कर तेरह उम्मीदवारों ने पर्चा भरा है।

प्रमाण-पत्र, शपथ-पत्र वगैरह बनवाने के लिए हफ्ते भर की भागदौड़ से ही जग्गू की हिम्मत पस्त हो गई। सबेरे निकल कर दस ग्यारह बजे रात तक लौटना। तहसील के लिए एक ही बस। ब्लाक के लिए वह भी नहीं। सरकारी अमले से पहली बार पाला पड़ा था। पास के डेढ़-दो हजार कब फुर्र से उड़ गए, पता ही नहीं चला। हार कर उसने ठाकुर के आगे सरेंडर कर दिया - मेरे मान का नहीं।

तब ठाकुर ने मोटर सायकिल सहित अपने मैनेजर राम सिंह को साथ लगाया। कागजात बनवाना, पर्चा दाखिल कराना। पर्चा दाखिले में ठाकुर खुद अपने चालीस-बयालीस लोगों के साथ शामिल हुआ। तीन बुलेरो, दस मोटर साइकिल। गाँव के कई मानिंद लोग। हर बिरादरी के। जग्गू के आगे मुंदर का जुलूस फीका पड़ गया।

दो दिन से राम सिंह उसके साथ ब्लाक पर डटा है। ठाकुर ने कहा है - ब्लाक से हटना नहीं है, जब तक पर्चा पास न हो जाय। कोई लफड़ा हो तो फौरन मेरे मोबाइल पर रिंग करो।

बैठे-बैठे झपकी आने लगी तो जग्गू ने राम सिंह को आवाज दी - मनीजर साहेब, आओ चाय पी लें।

राम सिंह नीम के पेड़ के नीचे मोटर साइकिल की हैंडिल से सीट के पिछले हिस्से तक लंबा होकर लेटा है। दुबारा आवाज देने पर वह चाभी का छल्ला उँगली में घुमाता जम्हाई लेता आता है। जग्गू उसके बैठने के लिए अपने अँगोछे से बेंच की धूल झाड़ता है।

रामू को अब सभी राम सिंह कह कर बुलाते हैं। ठाकुर खुद राम सिंह कहते हैं। ठाकुर की बाग में लगने वाली बरदाही बाजार की तहबाजारी की वसूली उसी के जिम्मे है। हर हफ्ते हजार बारह सौ वसूल कर देता है। कहता है - बैलों की आमद कम न हुई होती तो ठाकुर के घर में रुपए रखने की जगह न बचती। ठाकुर को धक्का लगा है तो दोनों बेटों से। बड़ा वाला तो चलो इंजीनियर बन गया। विदेश में नौकरी लग गई। जापानी लड़की से ब्याह कर लिया इसलिए गाँव छोड़ गया। छोटा वाला तो चीनी मिल में 'मेट' लगा है फिर भी बीबी बच्चों को लेकर चला गया। बताइए भला, जो मजा गाँव में 'राजा' की तरह रहने में है वह कभी बाहर मिल सकता है। लेकिन कौन समझाए? बड़े ने इतना तो अच्छा किया कि जापान में भी अपनी ही बिरादरी में शादी किया। समुराई वहाँ के क्षत्री होते हैं।

अब राम सिंह ही उनका हाथ पैर है।

राम सिंह ठाकुर की ससुराल का आदमी है। पाँच छः साल पहले आया तो देंह बाँस की कच्ची कइन की तरह लचकती थी। और अब देखिए। ऐंठ कर चलने, घुड़क कर बोलने, बैल जैसी बड़ी-बड़ी आँखें और दाढ़ी मूँछ भरे चेहरे को देख कर लगता है जैसे सचमुच ठाकुर का बच्चा हो।

वह तो मैं हूँ ही। राम सिंह कहता है - मेरी जाति के साथ तो ठाकुर जमाने से लगा है।

जग्गू को राम सिंह का सब कुछ अच्छा लगता है। उसका चलना-फिरना, उठना-बैठना, घूरना, अकड़ना। वह भी चाहता है कि राम सिंह की तरह अकड़ कर चले। घुड़क कर बोले। लेकिन इस गाँव में रहते हुए यह कब संभव होगा? उसे तो अपना नाम भी पसंद नहीं। जगत नारायण तो फिर भी ठीक था लेकिन लोगों ने उसे भी काट कर बाँड़ा कर डाला - जग्गू। परधानी मिल जाय, हीरो होंडा मिल जाय और नाम बदल जाय, या एक कायदे का 'सरनेम' मिल जाय... जिससे थोड़ा रूआब झरे। 'टाइगर' कैसा रहेगा?

दो दिन से उसे राम सिंह के नजदीक आने का मौका मिला है। कल भी उसे दो चाय पिलाई। आज भी यह दूसरी है। अगर यह मोटर साइकिल सिखाने को राजी हो जाय... लेकिन राम सिंह उससे दूरी बनाए हुए है।

जग्गू चाय का कप खुद राम सिंह के हाथों में पकड़ाता है। फिर बातचीत जारी रखने के लिए कहता है - बेकार ही यहाँ दो दिन से पड़े हैं। जब पर्चा सही-सही भर दिया है तो खारिज कैसे कर देंगे?

सब कुछ हो सकता है। पदारथ कितना जालिया है, तुम्हें क्या पता? मैं नहीं होता तो वह कब का ठाकुर की बर्दहिया बाजार पर जिला परिषद का कब्जा करा देता। अभी तुम्हारे पर्चे में बाप के नाम पर एक बूँद स्याही गिर जाय तो वह टंटा खड़ा कर देगा कि तुम्हारे बाप का नाम बदलू राम नहीं बदलू पांडे है। तुम्हारा जाति प्रमाण-पत्र फर्जी है। गए बेटा काम से। जेल जाने की नौबत अलग।

बाप रे! लगा, सचमुच जेल जाने की नौबत आ गई है। नमकीन की प्लेट आगे बढ़ाते हुए उसका हाथ काँप गया।

वह बात बदलने के लिए पूछता है - अच्छा मनीजर साहेब...

अब जरा कायदे से बोलना सीख। मनीजर नहीं मैनेजर बोल।

हाँ, हाँ, मैनेजर साहेब। वह थोड़ा रुकता है - अच्छा मैनेजर साहेब, मोटर सायकिल चलाना कितने दिनों में सीख सकते हैं?

एक घंटे में। राम सिंह उसके चेहरे की ओर देखकर मुस्कराता है। फिर चाभी का छल्ला उसकी ओर बढ़ाते हुए कहता है - ले, चल उतार स्टैंड से।

इसको कहते हैं - लक! लक्क!

सचमुच फुलझरिया की 'लक्क' तेज है। सबसे कैचिंग सिंबल उसे ही मिला - खुला हुआ छाता।

ठाकुर कहते हैं - ऐसा सिंबल जो अंधे को भी अँधेरे में दिख जाय। फिर आह भर कर कहते हैं - हमारी ही किस्मत गाँड़ू निकली। घंटी भी कोई सिंबल है। इससे तो अच्छा था, बिगुल बजाता सिपाही या धान ओसाता किसान मिल जाता।

घंटी तो सबसे शुभ है। पूजा के काम आती है। जग्गू कहता है।

अबे! शुभ से क्या मतलब? जरूरत है पहचानने की। गाँव की औरतें घंटी को भंटा-बैगन समझ लेंगी।

ससुराल की परित्यक्ता फुलझरिया। उसके मायके में शरण लेने पर किसी को क्या एतराज? गाँव में एक सस्ता मजदूर बढ़ा। खुशी की बात। वोटर लिस्ट में नाम चढ़ गया। बीपीएल कार्ड बन गया। खुद पदारथ ने बनवा दिया। यह भी ठीक। लेकिन एक दिन परधानी लड़ जाएगी, किसने सोचा था। जीते भले न, अपनी बिरादरी के पचीस-तीस वोट तो काट ही लेगी। पदारथ का मानना है कि उसे ठाकुर ने खड़े होने के लिए उकसाया। ठाकुर इसे पदारथ का काम मान रहे हैं। पर्चा दाखिले के समय भी भेद नहीं खुला। न कोई भीड़ न जुलूस। भाई-भतीजे साइकिल से जाकर पर्चा दाखिल करा लाए। जाँच में पाँच पर्चे खारिज हुए लेकिन फुलझरिया उसमें भी पास हो गई।

ठाकुर को सबसे ज्यादा निराशा मुंदर को 'हत्थेदार कुर्सी' मिलने से हुई है। बाकी में से तीन कैडिंडेट तो ऐसे हैं कि दो जोड़ी कुर्ता पजामा के साथ हजार रुपए भी पकड़ा दो तो आपके पीछे-पीछे घूमने लगेंगे। माटी के मोल बिकने को तैयार। इंतजार में रहेंगे कि कोई आकर खरीद ले तो सुर्ती-तमाखू का खर्च निकल आए।

अब पहला काम है, प्रचार के लिए पर्चा छपवाना। एक कागज हाथ में लेकर ठाकुर जग्गू को समझा रहे हैं। इधर बाईं तरफ हाथ जोड़े तुम्हारी फोटो। दाईं तरफ घंटी का फोटो। मजमून अभी बैठ कर बना लेंगे। तुम जाकर पता करो, मुंदर का पर्चा छपकर आ गया हो तो ले आओ। उसी की टक्कर का छपवाना होगा। घेंटे बिके कि नहीं?

दो बिक गए। आज पैसा देकर ले जाएगा।

गुड्ड! एक काम और करो। रजिस्टर में उन लोगों की लिस्ट बना लो जो परदेस में रह रहे हैं। उन सबको चिट्ठी लिखो कि बाइस तारीख को वोट पड़ेगा। आप के भरोसे ही खड़े हुए हैं। चिठ्ठी पाते ही चले आवैं। चिठ्ठी को तार समझें।

सबको?

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