रविवार, जून 25, 2017

गांधीवादी सलमान ! @BeingSalmanKhan 's #Tubelight


गांधीवादी सलमान ! @BeingSalmanKhan 's #Tubelight
एक अलग तरह के सलमान हैं यहां। अपनी छवि से अलग। न मारधाड़ और न कमीज उतारकर अधनंगे बदन खलनायकों की पिटाई करनेवाले

ट्यूबलाइट: इस फिल्म में एक मासूमियत है 

फिल्म समीक्षा — रवींद्र त्रिपाठी



रवींद्र त्रिपाठी
निर्देशक-कबीर खान कलाकार-सलमान खान, सोहेल खान, ओम पुरी, जू जू. माटिन रे टांगू, मोहम्मद जीशान अयूब, यशपाल शर्मा 

इस फिल्म में सलमान खान न तो रोमांटिक हीरो हैं और न ही एक्शनमैन। यानी न तो यहां कोई जबर्दस्त प्रेम कहानी है और न ऐसे धाँसूँ एक्शन जिसमें सलमान विरोधियों की ऐसी पिटाई करते हैं कि उनका भुस्सा भर देते हैं। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे मासूम पहाड़ी नौजवान लक्ष्मण सिंह बिष्ट की भूमिका निभाई है जो भोला-भाला है। पढ़ाई में कमजोर और दुनियावी चीजों में फिसड्डी। एक बावला शख्स। ट्यूबलाइट कह कर उसका मजाक उड़ाया जाता है। उसके मां और पिता बचपन में ही गुजर गए। उसे अपने छोटे भाई भरत सिंह बिष्ट (सोहेल खान) का ही सहारा है जो उसकी देखभाल करता है। लेकिन जब भरत सिंह बिष्ट फौज में भरती हो जाता है तो लक्ष्मण की दुनिया बदल जाती है। वह भी फौज में जाना चाहता है लेकिन जैसी कि उसकी शख्सियत है उस कारण उसे वहां भरती नहीं किया जाता। अब लक्ष्मण क्या करे? चीन से युद्ध शुरू हो चुका है और उसे भरत की चिंता होती है? क्या भरत सही सलामत लौट पाएगा? गांव के बन्ने चाचा (ओमपुरी) गांधीजी का हवाला देकर कहते हैं कि यकीन करो तो चट्टान हिल जाएगा तो लक्ष्मण खुद पर यकीन करना शुरू कर देता है। क्या सचमुच इस यकीन का नतीजा निकलेगा और भरत युद्ध से जिंदा लौटेगा?



`ट्यूबलाइट’ मेक्सिको के फिल्मकार अलेजांद्रो गोमेज मोंतेवेर्दे की फिल्म `लिटलबॉय’ (2015) का हिंदी रूपांतर है। ये 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर रूपांतरित है लेकिन ये युद्धविरोधी फिल्म है। युद्ध के दृश्य नाम मात्र को हैं। ये बताती है कि युद्ध होते रहते हैं लेकिन किसी को दुश्मन मानना न तो सही है और न मानवता के अनुकूल। चीनी अभिनेत्री जू जू ने इसमें चीनी मूल की लिलिंग नाम की ऐसी महिला का किरदार निभाया है जिसका परिवार लंबे समय से भारत में रह रहा है लेकिन युद्ध के कारण उसे और उसके परिवार को संदेह की निगाह से देखा जाने लगा है। उसका एक बच्चा गुओ (माटिन रे टांगू) भी है। वह सहज ढंग से `भारत माता की जय’ बोलता है लेकिन मां-बेटे की देशभक्ति संदिग्ध मानी जाती है। लक्ष्मण पहले इन मां-बेटों को चीनी जानकर दुश्मन मानता है लेकिन बन्ने चाचा जब उसे गांधीजी के उस कथन का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया है कि आंख के बदले दूसरे की आंख लोगे तो पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी, तब से लक्ष्मण का रवैया इस चीनी-मूल के भारतीय परिवार प्रति बदलने लगता है। वह गांधीवादी बन जाता है। फिर दोनों उसे अपने लगने लगते हैं। दोनों से उसका जज्बाती रिश्ता बन जाता है।


निर्देशक कबीर खान की पिछली फिल्म `बजरंगी भाईजान’ भी एक तरह से युद्ध विरोधी फिल्म थी। ये दीगर बात थी कि उस फिल्म की कहानी पेंचदार थी। पर ऐसा `ट्यूबलाइट’ के बारे में नहीं कहा जा सकता है। लक्ष्मण की तरह इसकी कहानी भी सरल है। इसलिए .ये `बजरंगी भाईजान’ की तरह लोकप्रिय होगी ऐसा कहना कठिन है। सलमान को जिस स्टाइल के लिए जाना जाता है वो भी यहां नहीं है। एक अलग तरह के सलमान हैं यहां। अपनी छवि से अलग। न मारधाड़ और न कमीज उतारकर अधनंगे बदन खलनायकों की पिटाई करनेवाले। फिल्म का नायक लक्ष्मण सिंह बिष्ट शुरू से आखिर तक हकीकत से कटा हुआ है। एक दिन एक जादूगर (शाहरुख खान) उसमें खुद पर यकीन करने की भावना भरता है। इसी यकीन के कारण उसे आगे चलकर, बन्ने चाचा की बात की वजह से भी, लगने लगता है कि वो पहाड़ को भी हिला सकता है। एक दृश्य ऐसा है जिसमें लक्ष्मण जब अपनी अदा से पहाड़ को हिलाने की कोशिश करता है तो उसी समय भूकंप आ जाता है। सिर्फ लक्ष्मण को ही नहीं, गांव वालों को लगता है कि ऐसा लक्ष्मण के खुद पर यकीन का नतीजा है। किंवदंतियां और मिथक किस तरह बनते हैं उधर भी फिल्म संकेत करती है।

चिरपरिचित अंदाज से अलग दिखने वाले सलमान के बावजूद इस फिल्म में एक मासूमियत है। ये बॉक्स ऑफिस पर कितनी सफल होगी ये अलग मसला है लेकिन ये कहना और मानना पड़ेगा कि फिल्म की सोच में ईमानदारी है। एक ऐसे समय में जब युद्धोन्माद फैलाए जाने की कोशिश कुछ ताकतें कर रही हैं, `ट्यूबलाइट’ एक अलग तरह का संदेश है। हालांकि `लिटलबॉय’ बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थी। देखते हैं वहां `ट्यूबलाइट’ का क्या हश्र होता है। बहरहाल इस फिल्म के बाद ये गॉसिप तो अब समाप्त हो जाना चाहिए कि शाहरुख और सलमान में तनातनी है। शाहरुख ने जादूगर वाली छोटी सी भूमिका निभाकार इस चर्चा पर पूर्ण विराम लगा दिया है। फिल्म में `रेडियो’ वाला गाना हिट हो गया है और उसे फिल्माया भी बेहतर ढंग से गया है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ईद मुबारक और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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